Monday, March 26, 2007

नीचता के समर्थन में

साहित्‍य की अप्रगतिशील धारा का घोषणापत्र (एड हॉक)

हमारी आंखें बंद थीं. अब खुल गई हैं. इसके लिए रवीश कुमार के सामाजिक अध्‍ययन काम न होने का मानसिक तनाव के हम आभारी है. आनेवाले कुछ घंटे रहेंगे. आभारी (इससे ज्‍यादा रहने में हमारा दम फूलने लगता है. अपने बाप तक के नहीं रहते. कुछ घंटों के बाद. बीवी तक हमारी नहीं रहती. आभारी. श्री रकु सामाजिक प्रकिया समझते हैं सो हमारी मुश्किल भी समझेंगे. और आभारी होंगे और बने रहेंगे). बाकी जहां तक काम न होने के मानसिक तनाव की बात है उसका हल हमने खोज लिया है. प्रेमचंद, निराला, यशपाल, रेणु, और ‘जहां लक्ष्‍मी कैद है’, ‘एक पत्र और तीन आलपिनें’ के रचयिताओं ने जहां साहित्‍य की धारा को छोड़ दिया था मैं उसे वहां से उठाकर एक कदम आगे ले जाने को कृतसंकल्‍प हो गया हूं. भैरव, भवानी, अमरकांत, मार्कण्‍डेय, दूधनाथ, गुप्‍ता, शर्मा जहां पहुंचने में चूक गए मैं वहां जाकर अपनी विजय-पताका लहराना चाहता हूं. मैं साहित्‍य में अप्रगतिशील धारा का सूत्रपात करना चाहता हूं.

काम न होने के मानसिक तनाव से बचने का इससे अचूक औषध दूसरा मुझे नज़र नहीं आ रहा. फिर आज के समय के लिए ऐसा साहित्‍य बहुत प्रासंगिक भी रहेगा. चतुरी चमार और बिल्‍लेसुर बकरिहाओं को निकट रखकर सामाजिक शर्मिंदगी के भय से मैं मुक्‍त हो जाऊंगा. तॉल्‍सतॉय और दॉस्‍तेवेस्‍की पुराणों के भारी-भरकमपने को खिड़की से बाहर फेंक देने में मुझे फिर तकलीफ नहीं होगी (रणनीति में थोड़ा परिवर्तन किया है. खिड़की से बाहर फेंकने की बजाय उन्‍हें रद्दीवाले को सौंपकर मैंने आंदोलन का अभी-अभी बिगुल बजा दिया है). नीच लोगों को लगातार गालियां देकर थकते रहने की जगह उन्‍हें साहित्‍य में नायकत्‍व देकर इस थकान से बचा जा सकता है. समाज के बाहर हो ही रहा है साहित्‍य में भी नये मूल्‍यों की स्‍थापना हो सकेगी. साहित्‍य और समाज के अंतर्संबंध प्रगाढ़ होंगे. सस्‍ता साहित्‍य मंडल, एनबीटी और श्रीराम कला सेंटरों की दया पर आश्रित रहने की जगह साहित्‍य सा‍माजिक मुख्‍यधारा में स्‍थान पाएगा. जो काम बीस वर्ष पहले दीप्‍ती नवल से लिखवाकर गुलज़ार साहब ने किया था वैसे ही करीना कपूर व प्रियंका चोपड़ाओं से पोयम लिखवाकर मैं साहित्‍य को उन्‍नत करने की दिशा में योगदान कर सकूंगा. पत्‍नी के पास भी तब शिकायत करने को नहीं रहेगा कि पढ़ने की मेज़ पर विवेकानंद को हटाकर मैंने करीना कपूर को क्‍यों सुशोभित किया है. हो सकता है मेरी बजाय वही इस पुण्‍य काम को अंजाम दे. और दीवार पर करीना को टांगने के बाद दो कदम पीछे हटकर हम साथ-साथ फोटो की ओर देखकर मुस्‍करायें और कोडेक फैमिली मोमेंट जेनरेट करके पारिवारिक सामंजस्‍य का एक सुखी क्षण भी क्रियेट कर जायें. इस तरह पत्‍नी साहित्‍य-संहारक से साहित्यिक-संगिनी के कमनीय, रोमेंटिक रोल में शिफ्ट हो लेगी. फ़ायदे ही फ़ायदे होंगे, गुरु. यादव और कमलेश्‍वर ने आंख खुली रखी होती तो चालीस साल पहले ही आंदोलन ले उड़े होते. मगर ईश्‍वर और रवीश की दया से यह ऐतिहासिक कार्य मेरे हाथों होना लिखा था.

अप्रगतिशील साहित्‍य के क्रियान्‍वयन का एक दूसरा फ़ायदा यह है कि आयोजन-संयोजन कमेटियों में सब तरह के लुच्‍चों को डाला जा सकेगा. फिर छोटे शहरों के कंगले कवि दारु-कबाब को तरसेंगे नहीं. मंत्रालयों व दूतावास के लुच्‍चों के समर्थन से विदेशों में सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान का सुख भी फिर जेनुइन साहित्य की झोली में ही बना रहेगा. मंगलेश डबराल व वीरेन डंगवालों की बेमतलब बकवास सुनने की जगह हम दूतावास की दारु के साथ-साथ हिमेश रेशमिया को भी सुन रहे होंगे. कैलाश खेरों के मुंह से घड़ी-घड़ी सूफियाना सुनना भी फिर अटपटा नहीं रहेगा. म्‍यूजिक टुडे के लिए ही नहीं, साहित्‍य अकादमी की ओर से भी मुज़फ्फर अली को सूफी संगीत सभा के आयोजन के लिए आमंत्रित किया जा सकेगा. उषा उत्‍थुप का भी स्‍वागत होगा. और आह्लादित होकर सिर डुलाने के एक्‍सप्रेशंस एक्टिंग नहीं फिर ऑथेंटिक और जेनुइन होंगे. समकालीन साहित्‍य के संपादकत्‍व से भी अरुण प्रकाश को हटाकर मुझे स्‍थापित किया जा सकता है. और कवर पर करीना और शाहिद की तस्‍वीर डालकर उसकी बिक्री हिंदी आउटलुक के बराबर की जा सकती है. तरुण तेजपाल भी अपने भंडाफोड़ तहलका में करने की बजाय साहित्यिक मंचों पर करने का फायदा उठा सकेंगे. न केवल उनकी छपाई का पैसा बचेगा बल्कि लुच्‍चे लोग उनकी आलोचना को व्‍यंग्‍य वाली श्रेणी में सुनकर हंसते हुए उड़ा देंगे और समाज में सौहार्दपूर्ण शांति बनी रहेगी.

इस नये आंदोलन की सोचकर मैं बहुत एक्‍साइट हो रहा हूं. मन में आभार भी अभीतक बचा हुआ है. आशा है आप सुधी पाठक अपनी अप्रगतिशील कविताओं, कमेंटों से आंदालन की आग को प्रज्‍वलित करेंगे.

3 comments:

  1. कुछ गुणीजनों का विचार से साहित्‍य की इस धारा को अप्रगतिशील की बजाय पतनशील का नाम देना ज्‍यादा सार्थक रहता. वर्तमान समय की भावनाओं की उसमें ज्‍यादा मार्मिक अभिव्‍यक्ति होगी. चूंकि घोषणापत्र अभी भी एडहॉकवस्‍था में है, नाम का सवाल अंतरंग कमेटी में विचारणीय बना रहेगा. आपके मतों का स्‍वागत है.
    . प्रमोद सिंह, अप्रगतिशील/पतनशील धारा के प्रणेता व जनक

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  2. सही है गुरुदेव... सही है... आप अप्रगतिशील पतनशील धारा के प्रणेता-जनक ही न बनें, नये युग के प्रवर्तक भी बनें। लेकिन ऐसा हो न सकेगा। जैसा कि आपने खुद ही पोल खोल दी है रवीश कुमार ने मार्क्‍स-एंगेल्‍स की तरह मामला थ्‍योराइज़्ड कर दिया है, अब आपके ज़ि‍म्‍मे लेनिन की तरह सांगठनिक झंडाबरदारी का काम ही बचा है। यानी क्रांति आप लाएंगे और बाद की दुनिया के दफ्तरों में आपकी तस्‍वीर रवीश कुमार से नीचे ही लगेगी। अब आप अफ़सोस करने बैठें, हम आपको कोडेक इंडिविज़ुअल मोमेंट में क़ैद करके मज़े लेते हैं।

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  3. नहीं इसका नाम अप्रगतिशील ही रहे । हम प्रगति के खिलाफ हैं । पतन से हमारा झगड़ा नहीं । उसे क्यों लपेट रहे हैं बीच में । मैं इस आंदोलन का समर्थन करता हूं । हंस हंस कर लोट पोट हुआ जा रहा हूं । हम सब को मिटा कर रद्दी बना देंगे । साहित्य के दरिद्रनारायणों के कबाब खाने का वक्त आ गया है । प्रमोद जी जय हिंद । रवीश

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