Sunday, March 18, 2007

गिटारवाली लडकी और मैक्सिको में रवीश कुमार

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: सात

किसी शवदाह गृह की जगह मैं नीली मद्धिम रोशनी के किसी अधुनातम आईसीयू फसिलिटी की ओर ले जाया जा रहा था. स्‍ट्रेचर ठेलते वॉर्ड व्‍यॉज़ के बगल परेशांहाल मुक्‍ता दौड रही थी. मगर ये देशज हिंदी और भोजपुरी में प्रगतिशील गीत गुनगुनाने वाली वह मुक्‍ता नहीं थी जिसके फ्रॉड का थोडी देर पहले मैंने साक्षात किया था. यह मुक्‍ता आईसीयू की आधुनिकता के ही अनुरुप दबे रंगो के स्‍कर्ट-ब्‍लाउज़ में थी. माथे पर ऊनी टोपे की जगह अंगुल भर छोटे बाल थे. देखकर ‘प्रोफेशन रिपोर्टर’ की मारिया श्‍नाइडर याद आ रही थी. लगा तक़लीफ में रंगा उसका चेहरा मुंह खोलते ही हिंदी-अंग्रेजी की बजाय फ्रेंच या जर्मन में अपनी भावनायें व्‍यक्‍त करेगा. मगर मुंह खोलने से जैसे वह खुद को रोक रही थी. शायद वॉर्ड व्‍यॉज़ बात करने की उसकी इच्‍छा के आडे आ रहे थे. यहां कब कौन शिकारी था और कब शिकार आधुनिकता के नये परिधान के बावजूद बेचारी मुक्‍ता के लिए भी तय करना मुश्किल रहा होगा. मैं उसकी असहाय बेबसी की कल्‍पना करके भावुक होने लगा. सांत्‍वना और ढाढस की वे सारी अभिव्‍यक्तियां कल्‍पना में तैरने लगीं जो मुक्‍ता मेरे लिए जर्मन या फ्रेंच में प्रकट करने को उत्‍कट हो रही थी लेकिन यथार्थ में कर नहीं पा रही थी. मैंने सफेद चादर के नीचे से हाथ निकालकर उसकी उंगलियों को छू लिया, बुदबुदाकर कहा- मैं तुम्‍हारे लिए चिंतित हो रहा था, लडकी!... तुम ठीक हो ना?...

वह धीमे से मुस्‍कराई. जैसे ‘एट एंड हाफ’ के अंत में मारचेल्‍लो के लिए क्‍लाउदिया कार्दिनाले मुस्‍कराकर संसार में हमारे होने को धन्‍य कर देती है. भले ही यह संसार रवीश कुमार का सिरजा व नियंत्रित क्‍यों न हो. वह बोली, मुझे क्‍या होगा. हालत आपकी खराब है, चिंता तो हम सबको आपको लेकर हो रही थी.

तो मैं गलत कल्‍पना नहीं कर रहा था. वह सचमुच मेरे बारे में चिंतित हो रही थी. होंठों पर एक भीनी मुस्‍कान सजाये उनींदे अधमुंदी आंखों से मैं गलियारे की छत की बत्तियों का एक के बाद एक गुजरना तकता रहा. लग रहा था आईसीयू के रुमानी, ठंडे गलियारे किसी भी पल सलिल चौधरी के किसी अच्‍छी धुन में नहा उठेंगे. मगर ऐसा कुछ हुआ भी होगा तो मुझे उसकी याद नहीं. मैं दुबारा बेहोश हो गया था.

आंखें वॉर्ड के मुलायम गद्दे पर खुली और फ्रेंच-जर्मन बोलनेवाली मुक्‍ता का कहीं कोई पता नहीं था. कमरे की दीवारों पर अलग-अलग मुद्राओं में रवीश कुमार की फ्रेम्‍ड तस्‍वीरें मरीज के स्‍वागत में लगी थीं. ग्‍वातेमाला के राष्‍ट्रपति के साथ आज़ादी के जश्‍न की फौजी सलामी लेते हुए, एपल के सीईओ स्‍टीव जॉब्‍स के मज़ाक पर हंसते हुए, मैक्सिको सिटी में शहरी प्रदूषण की रोक के लिए बीस मिलियन सहायता राशि का चेक देते हुए. बीस वर्ष बाद की किसी नई एंजेलिना जोली के साथ भूमध्‍यसागर में किसी याट पर पार्टी मनाते. कोने में नई तर्ज का एक छोटा टीवी सेट भी था जो कभी सुरक्षा मॉनिटर का काम करता बाकी वक्‍त दुनिया के अलग-अलग हिस्‍सों में रवीश कुमार की ह्यूमने‍टेरियन व तकनालॉजी के क्षेत्र में नये योगदानों की रपटें प्रसारित करता. फिलहाल रवीश कुमार जापान के उत्‍तर के किसी गांव में स्‍कूली बच्‍चों को चीनी में पिछड जाने की फटकार पिला रहे थे. बच्‍चे और बुजूर्ग शर्म से सिर झुकाये उसे पीते दिख भी रहे थे. दसेक दफा रिमोट दबाने के बावजूद जब टीवी किसी सूरत में ऑफ नहीं हुआ तो हिक़ारत से मैंने तकिये पर मुंह दूसरी ओर कर लिया. इस वक्‍त बिस्‍तरे के बाजू स्‍टील के आधुनिक चेयर पर मुक्‍ता विराजे होती तो उसके मुलायम फ्रेंच की तसल्लियों से मैं कितना आश्‍वस्‍त हो जाता. शायद वह मेरे लिए भावुक होकर बोदलेयर की किसी कविता का मूल फ्रेंच में पाठ करने लगती, या मुझे हल्‍का महसूस करवाने के लिए एडिथ पियाफ का कोई गीत गिटार पर गाने लगती. मैं तडपकर कहता, प्‍लीज़, मुक्‍ता... और वह तेज़ी से रुमाल चेहरे पर डाल अपने आंसुओं को छिपाने की कोशिश करती.

मगर मुक्‍ता या जो कोई भी वह थी आस-पास कहीं नहीं थी. मैं था और इस नई उलझन पर सोचकर बहुत चिंतित हो रहा था. थोडे समय में इतनी ज्‍यादा घटनायें घट चुकी थीं और किसी की भी ठीक-ठीक प्रोसेसिंग करने में मैं स्‍वयं को असमर्थ पा रहा था. क्‍या स्‍कर्ट-ब्‍लाउज़ और छोटे बालों वाली यह मुक्‍ता असल मुक्‍ता थी या असल मुक्‍ता का खोजा जाना अभी भी एक छूटा हुआ काम था? और मुझसे नज़रें चुराता जो अविनाश दिखा था वह वास्‍तविक था या वह भी अविनाश का कोई सस्‍ता बहुरुपिया संस्‍करण था? कोई मेरे इन सवालों का जवाब नहीं दे रहा था. रवीश कुमार दे सकता था लेकिन अभी वह चीनी वित्‍त सचिव के साथ मिंग काल के हथियारों की एक एतिहासिक प्रदर्शनी का स्‍वाद ले रहा था या पब्लिक कंसंप्‍शन के लिए स्‍वाद लेते दिखने की एक्टिंग कर रहा था. फिर जाने क्‍या हुआ टीवी से आवाज़ आई- मज़ा कीजिये, प्रमोद भाई. मैं जल्‍दी ही लौटकर आपके ब्‍लॉग की समस्‍या हल करता हूं. हां, रवीश ही था, बेजिंग से लाइव एड्रेस करता. इसके पहले कि मैं बदहवासी में बिस्‍तरे से झूलकर उससे सवाल करुं, उसने मस्‍ती में बाईं आंख दबाई जैसे बीसेक वर्ष पहले हॉलीवुड के जॉर्ज क्‍लूनी दबाकर प्रैस और वयस्‍क स्त्रियों को लहालोट कर दिया करते थे और उतनी ही आसानी से वापस प्रदर्शनी के स्‍वाद में लौट गया. अचानक खिडकियों पर तने भारी पर्दो की ओट से एक कमसिन नौजवान बाहर आया और गुस्‍से में तमतमाया तार खींचकर टीवी ऑफ कर दी. मुझे नौजवान को पहचानने में चूक नहीं हुई मगर इस बार मैं दुबारा धोखा खाना नहीं चाहता था. इसलिए भावुक होने से खुद को रोकते हुए और संभलकर मैंने नौजवान से सवाल किया- पहले तुम ये बताओ तुम तुम्‍हीं हो या अपना डबल?...

(जारी...)

4 comments:

  1. फिर तारीफ करना चाहता था पर लेकिन अपने आपको रोक रहा हूँ कि कहीं .....

    पर बंधु जिस रफ्तार से तुम मुक्‍ता का पब्लिक डोमेन में लिटरेरी (या जो भी ये है) कंजप्‍शन कर रहे हो। सवाल मुँह तक आ रहा है कि तुम अविनाश ही हो क्‍या ? डबल ???
    पता नहीं।।।

    बता दो किसी से नहीं कहेंगे

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  2. बंधु, आपके ज़बान और समझ की मिठास पर मैंने पहले भी टिप्‍पणी की थी, पर लगता है आप फेंकते चलने के बाद मुडकर पीछे देखने के आ‍दी नहीं कि पीछे क्‍या फेंका है. दूसरों की विवेचना में जाने के साथ-साथ ज़रा अपने भीतर भी झांक लिया करें. मेहरबानी करेंगे.

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  3. आपका वर्चुअल संसार तो ग़ज़ब ढा रहा है. बीस वर्ष बाद ब्लॉग और रवीश कुमार की पिछली वाली किश्त में आपने शिकायत की थी कि मै सवाल बहुत करता हूं. अरे प्रमोद जी, सवाल दागे नहीं थे. और वो सवाल जैसे भी कुछ नहीं थे. आपके व्लॉग वाली दुनिया में ना जाने क्यों मेरी इमेज दागने वाली ज़्यादा बन गई है.
    आप फिर मुक्ता को ले आए हैं तो बहाने से अर्ज करता हूं. अविनाश-मुक्ता की वर्चुअल इमेज से रू-ब-रू होने के बाद मैंने अविनाश को फोन किया और कहा कि गुरु देखो बीस साल प्रमोद जी ने तुम्हें तो बूढ़ा बना दिया लेकिन मुक्ता लड़की ही है. बात मज़ेदार रही. ठहाके भी लगे. आपकी बनाई वर्चुअल इमेजेज हमारी रियल लाइफ का हिस्सा बनती जा रही हैं. कल्पना की इस उडा़न में यथार्थ कई-कई रंगों में आ रहा है.
    वैसे फ्रैंच में बोदलेयर की कविता और पियानो बजाते पियाफ का गीत गाती मुक्ता की इमेजरी बहुत अच्छी लगी. इसे पढ़कर ऐसा ही लगा जैसे अभी-अभी फ्रैंच सेंटेर से कोई अच्छी सी फिल्म देखकर बाहर निकला हूं और फिल्म के पात्र बाहर मेरे इंतज़ार में बैठे हैं. अब आप कहेंगे कि मैं बहुत जल्दी उत्साहित हो जाता हूं. खैर.

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  4. फ़रेब व छायाओं की झिल्‍ली का तुम वास्‍तव के लोगों से मिलान कर रहे हो, जानकर दुख हुआ, भूपेन. कल को भूपेन नाम के किसी चरित्र को मैं सामने ले आया तो तुम उसका भी स्‍वयं से मिलान करने के झंझट में उलझ जाओगे. तब एनडीटीवी वाले अविनाश को फोन करके हंसोगे नहीं, मन ही मन मेरे लिये गालियां बुदबुदाते दुखी होगे, और मुझको भी दुखी बनाओगे. यह तो कोई बात नहीं हुई.

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