Sunday, March 18, 2007

दिखाने के दांत और खाने के

विकास की आंधी: छह

कॉरपॉरेट ज़ंमीदारी के जाल से ज़मीनों की बडी मछलियों को पकडने में अलबत्‍ता एक छोटी मुश्किल है. मुश्किल यह है कि अंतत: भारत के लोग ज़ाहिल, गंवार, देहाती जो भी हों इतने बेवकूफ भी नहीं कि आंख मूंदे चुपचाप किसानों, आदिवासियों की ज़मीनों को सरेआम लुटता देखें. इसलिए कि नये शहराती अमीरों के रंजन-मनोरंजन के लिए वहां एंटरटेनमेंट पार्क बनेगा. यह बात निवेशक भी समझते हैं. और निवेशकों से ज्‍यादा सरकार समझती है. आखिर उसे अब भी हर पांचवे वर्ष चुनकर ही सत्‍ता में लौटना है. और यह दिखाकर तो वह वोट नहीं ही पाएगी कि इस समूचे दरमियान वह लोगों की ज़मीन छीन-छीनकर बडे निवेशकों की झोली में डाल रही थी. उनकी दलाली कर रही थी. मैं भावुक होकर शायद कुछ ज्‍यादा ही डाइडैक्टिक हो रहा हूं. लब्‍बोलुआब यह कि भूमि अधिग्रहण की इन बडी, दूरगामी स्‍कीमों को लागू करने के लिए सरकार ने अपने असल आशयों को विकास के एक चिकने-चुपडे फ़रेब में परोसकर जनता के सामने रखा है. सेज़ इसी नये फ़रेब का नाम है.

देश को नये उद्योग व व्‍यापक इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर चाहिये, आईटी यूनिट्स, आधुनिक सहूलियतों वाले बडे अस्‍पताल चाहियें- सरकार हमें सूचित करती है. और इन सबको हासिल करने के लिए ज़रुरी है कि आज के प्रतियोगी दौर में, दुनिया के अच्‍छे निवेशकों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए हम उन्‍हें भारी सहूलियत और प्राइम लोकेशंस में ज़मीनों के बडे पट्टे प्रदान करें. ऐसा समझाती है सरकार. और यह सदाशयों से भरा नेक़ जनहितकारी कार्य किस तरह संपन्‍न होगा? सेज़ के द्वारा संपन्‍न होगा.

अब सेज़ के इस सर्वहितकारी कार्य में सरकार की दलाली किस तरह कार्य करती है? वह इस तरह काम करती है कि पहले तो वह बाज़ार की बनिस्‍बत सस्‍ते दरों पर ज़मीन प्राप्‍त करने की स्थिति में है तो वह प्राप्‍त करती है. डेवलपर्स के फायदे के लिए खरीदी जा रही ज़मीन में राज्‍य का पैसा लगाती है (सिंगुर जैसे मामले में 150 करोड लगाकर उसी ज़मीन के लिए सरकार टाटा से मात्र 20 करोड की वसूली करेगी, और वह भी एक फीसदी सूद के दर पर पांच साल बाद. यानी जिस ज़मीन के पीछे पश्चिम बंगाल सरकार ने 150 करोड फंसाये उसकी वास्‍तविक कीमत टाटा के लिए उसने महज़ 12 करोड आंकी है!).

दलाली नंबर दो: सरकार ने इसकी पूरी गुजाइश छोड रखी है कि अधिग्रहित भूमि के पचास प्रतिशत का इस्‍तेमाल जिस विशिष्‍ट उद्येश्‍य के लिए ज़मीन ली गई है के बाद का बचा पचास प्रतिशत डेवलपर एजेंसियां जिस तरह मुनासिब समझें उपयोग में लायें. अब यह उपयोग स्‍वीमिंग पुल से लेकर बहुमंजिला इमारत बनाना कुछ भी हो सकता है. माने रियल इस्‍टेट डेवलपमेंट की वही नियमित कार्यवाईयां जिसको लेकर देश भर में हर जगह गला काटू संघर्ष छिडा हुआ हे. लोग खुले हाथों पैसा बहा रहे हैं, सुपाडी देकर प्रतिद्वंदियों की जानें ले रहे हैं. सरकार सेज़ की मार्फत निवेशकों के लिए यह काम सुगम और सुभीते से कर रही है. अगर क्षेत्र मल्‍टी परपस ज़ोन हुआ तो सेज़ एक्‍ट 2005 के अनुसार (यह फरवरी 2006 से लागू हुआ है) वहां और भी रियायतें हैं. यहां पचास नहीं पचहत्‍तर प्रतिशत तक हासिल की ज़मीन मुख्‍य ‘उत्‍पादक’ काम से इतर दूसरे उद्देश्‍यों में बरतने की छूट है. फिर इसकी भी व्‍यवस्‍था है कि काम सिंगल प्रॉडक्‍ट ज़ोन के बतौर शुरु होकर बाद में मल्‍टी प्रॉडक्‍ट की श्रेणी में बदल जाए. ज्‍यादातर हो भी यही रहा है. जयपुर में महिंद्रा जेस्‍को ने आईटी एनेबल्‍ड सर्विसेस के सेज़ विकास के लिए सरकार से 49 हेक्‍टेयर ज़मीन वैध तरीके से प्राप्‍त की, अब उस प्रोजेक्‍ट को मल्‍टी परपस ज़ोन के 1000 हेक्‍टेयर में बदलने की वैचारिक तौर वह सहमति प्राप्‍त कर चुका है. कुछ यही किस्‍सा गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्‍ट्रीज़ ने भी दुहराया. पेट्रोलियम व पेट्रोकेमिकल्‍स के सेज़ विकास पर 440 हेक्‍टेयर ज़मीन पाकर अब उसे 1000 हेक्‍टेयर ज़ोन में बदलने की वह मंजूरी पा चुका है.

इसका सीधा मतलब यह हुआ कि मूल काम से अलग, जिसके लिए ज़मीन विशेष कीमतों पर विकास के लिए सरकार ने मुहैया करवाई, बचे हुए 750 हेक्‍टेयर ज़मीन का वह किन्‍हीं भी रुपों में इस्‍तेमाल करने को स्‍वतंत्र है. चाहे नियत ज़ोन के अंदर ऊंची इमारतें बनवाकर उसे खुले बाज़ार में बेचे, या रिटेल के बडे चेन खडी करे. उसकी मर्जी. शायद वह एक मर्तबा में ऐसा करके बेवजह लोगों का ध्‍यान आकर्षित न करे, धीरे-धीरे करे. मगर यह उसका अपना स्‍वतंत्र मामला होगा.

(जारी...)

3 comments:

  1. विकास की आंधी पर अपनी बात बंद मत कीजिए. ये अज़दक आ एडिटोरिल है. जब तक अज़दक रहे विकास की आंधी का यथार्थ सामने आते रहना चाहिए.

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  2. मुझे.. और बाकी यहां आकर पढनेवालों को डराओ मत, भूपेन. रही अज़दक के एडिटोरियल की बात तो मुझे लगता है डायरी का हम एडिटोरियल तय करने लगें तो डायरी का फिर मज़ा ही नहीं रहेगा. हां, जबतक कोई आकर हमारा गला न टीप दे, हल्‍ला तो हम मचाते ही रहेंगे.

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  3. क्या प्रमोद जी, आप भी! जल्दी में कोई अच्छा शब्द नहीं मिला तो एडिटोरियल कह दिया. बात समझिए आप. डायरी ही कहिए. बाबा मुक्तिबोध के शब्दों में कहूं तो ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान जैसी कोई चीज़ देखने-पढ़ने और जीने की ख्वाहिश है. वो सब आपके यहां मिलता है. इसलिए इस डायरी के पन्ने खाली नहीं रहेंगे तो अच्छा लगेगा.

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