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Mar 26, 2007

ब्‍लॉग में कौन आए की बहस का एक और पहलू

बेजी ने अपने ब्‍लॉग पर कल एक पोस्‍ट चढ़ाया- पत्रकार क्‍यूं बने ब्‍लॉगर?- और नारद पर उसे खूब हिट्स मिले. प्रतिक्रियायें उतनी नहीं मिलीं. माने इस विषय में जिज्ञासा बहुतों की थी, मगर राय ज़ाहिर करने से भाई लोग कतरा गए. क्‍यों? इसलिए कि चबर-चबर बोलनेवाले पत्रकारों से वे फिर किसी नये विवाद में उलझना नहीं चाहते थे? याकि यह विषय उन्‍हें चिंतित तो करती है मगर पत्रकार बिरादरी से वे अपने संबंध बिगाड़ना नहीं चाहते? वजह जो भी हो कुल जमा यही रहा कि बेजी ने एक चिंता को स्‍वर दिया जिसमें ढेरों लोग हिस्‍सेदार हैं, लेकिन सार्वजनिक तौर पर नतीजे तक आने से कतरा रहे हैं. इम्‍तहान देकर टेंशन सबने पाल लिया है मगर रिज़ल्‍ट को पेंडिंग कर रहे हैं.

यह बात समझ में आती है कि लोकप्रियता की गरज से या जेनुइन चिंता में, जो भी वजह रही हो, अविनाश ने अपने ब्‍लॉग पर कुछ बहसों का सिलसिला चलाया. कुछ मुद्दे ऐसे निकल आए कि दो सौ-ढाई सौ (ठीक संख्‍या मुझे मालूम नहीं है, क्षमा करेंगे) के इस चिट्ठाकार समाज में विरोधी कैंप बन गए. शायद हंसी-खेल की अंताक्षरी में एक निहायत नया स्‍वर घुस आया था और खेल बिगाड़ रहा था.

अब इस पर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है कि खेल के बिगड़ने का मतलब क्‍या है. खेल क्‍या है. चिट्ठाकारी और ब्‍लॉगिंग क्‍या है. ऑन लाईन डायरी गुलज़ार की किताब को पा लेने के सुख, पास्‍ता का वर्णण और लिट्टी-चोखा का आस्‍वाद, अपनी कविताओं को सजा-छपा देखने की खुशी, किसी देखी गई फिल्‍म और उतारे गए फोटो पर हमारी-आपकी राय, मन की उधेड़-बुन और यार-दोस्‍तों की गपास्‍टक, इंटरनेट व हिंदी ब्‍लॉगिंग की तकनीक व नई जानकारियों को जानने-बांटने का उल्‍लास- के दायरों में ही रहे ऐसा हम क्‍यों चाहते हैं? क्‍या यह कक्षा में किसी नये छात्र के चले आने पर पैदा हुई बेचैनी है जिसका व्‍यवहार, रंग-ढंग ठीक-ठीक वैसा ही नहीं है जैसा सामुदायिक तौर पर हम देखते रहे थे? अपने बारे में आपकी राय मैं नहीं जानता मगर समुदाय में रवीश कुमार और अनामदास को पाकर आप प्रसन्‍न नहीं हैं? भाषा और विचारों की प्रस्‍तुति का उनका अंदाज़ आपको लुभावना नहीं लगता? ये दोनों पत्रकार हैं, मैं नहीं हूं, लेकिन दोनों के ही पोस्‍ट बड़े चाव से पढ़ता हूं, जबकि अनामदास की चिंतायें बहुत मेरे मिजाज़ के अनुकूल भी नहीं हैं. फिर भी. क्‍योंकि उनको पढ़ने में एक विशेष रस मिलता है.

आप फिर मुझे बड़बोला और सर्वज्ञानी की गाली देकर धिक्‍कारेंगे, दीजिये. वह ज्‍यादा अच्‍छा और स्‍वास्थ्‍यकर है बनिस्‍बत किसी फारुकी या नीलेश मिश्र के लिखे पर बम-गोला होने लगने के. भई, पत्रकार समीक्षा करेगा तो ज़ाहिर है अपनी बिरादरी को पहले याद करेगा. आप किसी तकनीकी फॉरम में चर्चा करेंगे तो तकनीकी बिरादरी के कामों की तारीफ करेंगे, रवीश की लिखाई को याद करना शायद तब आपको याद न आए. इसमें ताजुब्‍ब और तकलीफ क्‍यों है? अंतत: तो आप भी मान ही रहे हैं अच्‍छे और सार्थक पोस्‍ट्स ही अपनी तरफ ट्रैफिक खींचेंगे, कोरा सेंशेनलिज्‍म नहीं. मेरी जानकारी इस विषय में कम है मगर हिंदी के अच्‍छे और बुरे ट्रैफिक में भी अभी फ़र्क कितना है? चार सौ? पांच सौ? सिलेमा वाले मेरे ब्‍लॉग पर औसतन पचास लोगों की आवाजाही होती है, कभी-कभी और भी कम. अभय अच्‍छा लिखते हैं मगर वह भी पचास पाठक पाकर सुखी हो लेते हैं. तो उसके लिए अभय और मैं पत्रकारों को तो दोष नहीं दे सकते. ढाई सौ की बिरादरी में जिनकी संख्‍या पंद्रह से ज्‍यादा तो कतई नहीं ही होगी, और उसमें भी हल्‍ला करनेवाला अकेला अविनाश है.

भई, अंताक्षरी के खेल के बिगड़ने की अभी तो यह ढंग से शुरुआत भी नहीं है. अपने माध्‍यम में अपनी इच्‍छा का करने से वंचित हुए पत्रकार ब्‍लॉग में मन की भड़ास निकाल रहे हैं. हम फिल्‍म बनाना चाहते थे, पैसा लगानेवाला मिला नहीं, मगर सिनेमा की जो हमारी पसंद है उस पर अपने ब्‍लॉग में लिख रहे हैं. लिखते रहेंगे. पैसे का अभाव हमारे इस एक्‍सप्रेशन के राह रोड़ा नहीं बन रहा. इसमें क्‍या बुराई है? हेल्‍दी ही है. गंध तो आनेवाले दिनों में मचेगा. जैसे-जैसे सुलभता बढ़ेगी, नये खिलाड़ी आयेंगे. बाज़ार के विचार, सेक्‍स और सामान बेचनेवाले.

ब्‍लॉग में बात कम विज्ञापन ज्‍यादा होगा. हमारे गरीब टेप्‍लेट से ज्‍यादा चमकदार, ज्‍यादा प्रभावी होगा. वीडियो क्लिपिंग्‍स दिखाएगा, हिट गाने सुनाएगा. उनके ट्रैफिक के आगे हम कहीं नहीं टिकेंगे. फिर? तब क्‍या करेगा नारद? शायद तब तक नारद का और विस्‍तार हो, ज्‍यादा साधन-संपन्‍न बने, मगर जो बीस तरह की नई आवाज़ें होंगी और जिनके पास बाज़ार की ताकत और ज्‍यादा साधन-संपन्‍नता होगी वो चुप तो नहीं ही बैठेंगे. लुभावने ठाट-बाट के आकर्षण से लैस नए पोर्टल खोलेंगे. ट्रैफिक की नाटकीयता से हमें चकाचौंध कर देंगे. तब? उस बड़े परिदृश्‍य के आगे बिचारे चार अदद पत्रकारों का ‘नाटक’ क्‍या मायने रखता है? हमारे लिए तो वह स्‍वास्‍थ्‍यकर चुनौती होनी चाहिये. नये चैलेंजेस का मज़ा लेने की बजाय हम नये विद्यार्थियों की तरफ ढेला क्‍यों फेंके? उन्‍हें पहचानना हो तो सीधे उन्‍हीं से क्‍यों न बात करें? आप फिर हमें गालियां देकर चुप्‍पा मारकर गुमसुम मत हो जाइयेगा. मारना ही होगा तो कमेंट मारियेगा. स्‍वागत होगा.

28 कमेंट:

अविनाश said...

जिस ज़लज़ले से हिंदी ब्‍लॉग जगत के तथाकथित जनक त्रस्‍त होते से दिखते हैं, वो तो अभी ठीक से आया भी नहीं है- जिसकी ओर आपने इशारा भी किया है। इनकी दिक़्कत ये है कि गिनने लायक ब्‍लॉगर्स की संख्‍या को ये लोग संचाल‍ित करना चाहते हैं। एक परिवार में बुज़ुर्ग के सामंती अनुशासन की नकेल कसना चाहते हैं। आचार संहिता की बात करना चाहते हैं। जब इनकी परिधि के बाहर कोई चमकता हुआ-सा दिखता है, इन्‍हें घबराहट होने लगती है। इसी घबराहट का नतीजा है बेजी की चिट्ठी। बेजी को मालूम होना चाहिए, दुनिया के महान विचार और सर्वाधिक पठनीय सामग्री ग़ैर पत्रकारों की देन है। जहां तक ब्‍लॉगर्स की बात है, अभी हिंदी में कोई बात करने लायक ब्‍लॉग नहीं है। हंसी-ठट्ठे वाले ब्‍लॉग ही हैं, जैसा आपने गिनाया है। इसलिए हम जैसे पत्रकार दंभोक्ति की तरह ही सही, कुछ सामाजिक मुद्दों की बहस लेकर आ जाते हैं- तो विजिटर हमारी तरफ खिंचते हैं। रवीश जैसे पत्रकार अपनी अप्रतिम प्रतिभा का इस्‍तेमाल ब्‍लॉग लिखने में करते हैं, तो विजिटर मधुमक्‍खी की तरह चक्‍कर काटने लगते हैं। लेकिन यक़ीन मानिए, ब्‍लॉगर्स बढ़ेंगे, तो पत्रकारों को भी उनकी औक़ात में करने लायक प्रतिभाएं सामने आएंगी। उसके बाद बाज़ार भी अपना खेल दिखाएगा, जैसा कि आपने कहा ही है।

Debashish said...

पत्रकार समीक्षा करेगा तो ज़ाहिर है अपनी बिरादरी को पहले याद करेगा

मैं इस बात से सहमत नहीं। अखबार, टीवी पर प्रस्तुत रपटों से पाठक अमूमन ये अपेक्षा रखता है वे निष्पक्ष रूपेण किसी विषय का समग्र पहलू प्रस्तुत करेंगे। मैं ये मान सकता हूँ कि बाईट्स लेते समय वे अपनी बिरादरी के किसी सुलभ व्यक्ति से संपर्क करेंगे पर क्या पूरी रपट का समूचा रुख ही ऐसा हो जाना चाहिये कि यों लगे की "रवीश के पहले ब्लॉग नहीं था, ब्लॉगिंग भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था"। अगर वे मित्रता निभाने के लिये ही स्टोरी लिखना चाहते थे तो ये सब एक ब्लॉग पोस्ट होने के ही लायक था नैशनल टीवी पर आने के नहीं।

Debashish said...

अविनाश आप ये तो मानेंगे कि पूर्वाग्रह दोनों तरफ ही रहे हैं। आपके हाल ही के स्पष्टिकरण जिसमें आपने मौज में लिखा कि चिट्ठाकारी से आप लोगों की नौकरी ही खतरे में है ने मुझे अपनी राय थोड़ा बदलने का मौका दिया। एहसास हुआ कि शायद मेरा कयास वाकई पूर्वाग्रह ही रहा हो।

अब मैं आपसे कहूँ कि कुछ पूर्वाग्रह आप भी छोड़ें। "सामंती अनुशासन की नकेल" की बात आप केवल एक साईट के विषय में कह रहे हैं वो है नारद। नारद एक जालस्थल है, मुहल्ला की ही तरह, जैसे आप ये निर्णय लेते हैं की पूर्व प्रकाशित रचना स्वीकार नहीं करेंगे वैसे ही नारद के संचालक ये निर्णय लेते हैं की फलां फलां किस्म के ब्लॉग शामिल नहीं करेंगे। अगर आप अपना निर्णय सही मानते हैं तो नारद का भी मानें और ये निर्णय लेने की उनके हक को सम्मान दें। क्या मेरे द्वारा प्रेषित पैरिस हिल्टन की अधनंगी तस्वीर आप अपने चिट्ठे पर छापना चाहेंगे? आप कहेंगे ये मेरा निर्णय होगा, बिल्कुल! जिसकी साईट उसका निर्णय, इसको पूरी बिरादरी पर न थोपें।

दूसरा, "अभी हिंदी में कोई बात करने लायक ब्‍लॉग नहीं हैं", वाली राय तभी बदल सकती है जब आप दूसरे मुहल्लों में भी विचरें। अनूप, सुनील दीपक, ईस्वामी, सृजन शिल्पी, निरंतर आदि को पढ़ें और फिर अपनी राय को नई जानकारी के सांचे में डालकर पुनः आकार दें। वरना ये भी पूर्वाग्रह ही बना रहेगा और फिर किसी टीवी रपट में आप लोग बेसिरपैर के निष्कर्ष पेश कर देंगे।

संजय बेंगाणी said...

अविनाश एण्ड पार्टी नारद के सन्दर्भ में कहे को निजी ब्लोग के लिए कहा बता कर तथा लगातार ऐसा ही प्रचारित कर आप अपने आप को सच्चा पत्रकार साबित कर रहे है.

अविनाश said...

मैं देबू दा की बातों से सहमत हूं।

जगदीश भाटिया said...

आप लोग नारद का फायदा भी लेना चाहते हैं और नारद को लतियाते भी हैं, नारद का अनूठा प्रयोग जो कि हिंदी चिट्ठाकारी में हो रहा है उसे जानबूझ कर आप लोगों ने हाशिये पर डाल कर केवल अपने चिट्ठों को प्रचारित करने के लिये समाचार पत्रों मे स्टोरीस प्लांट कीं। हिंदी चिट्ठाकारी केवल दो माह पुरानी या केवल दो चिट्ठों से नहीं है।

आम लोगों के चिट्ठों में अगर आप पत्रकारों वाला प्रोफेशनलिज्म देखना चाहते हैं तो आप शायद गलत जगह पर हैं। जो कुछ हम रोज चैनलों पर देखते हैं और अखबारों पर पढ़ते हैं वही अगर हमें चिट्ठों पर भी पढ़ना होता तो शायद दुनिया का पहला ब्लाग ही न बना होता।

देखिये चिट्ठों की क्वालिटी की बात कौन कर रहे हैं जो समाचारों के नाम पर राखी मीका और शाहिद करीना के एमएमएम अपने चैनलों पर दिखाते नहीं थकते। बाजार को देखिये कौन धिक्कार रहे हैं, जो बाजार की ताल पर हमेशा था था थैया करते हैं।
इन पत्रकारों से कौन बच पाया भैया।

आप स्वस्थ बहस की बात करते हैं, आप भी अपने चैनलों पर आम लोगों को बुलाते हैं न बहस के लिये, कभी ऑन एयर पूछ के देखिये किसी भाग लेने वाले से -"कितने मुस्लमान मारे तुमने?"

मोहिन्दर कुमार said...

ब्लागिंग एक मार्किट (बाजार) की तरह है.. यहां तरह तरह के दुकानदार (ब्लागर) चाहे वह पत्रकार ही हों या कोई और तथा ग्राहक (आने जाने वाले) भोली भाली जनता से ज्यादा ब्लोगर स्वय ही एक दूसरे के ब्लाग पर जा कर मन की भडास निकालते हैं.... फिर अगर बाजार में एक नयी दुकान खुल रही है तो इस पर किसी को आपत्ति क्यों है मेरी समझ में नही आता..

avinash said...

जगदीश भाटिया ने बहुत ही व्‍यक्तिगत होकर जवाब दिया है। जबकि आपने विषय बड़ा उठाया है। हिंदी ब्‍लॉग जगत की दिक्‍कत दरअसल यही है। चीज़ों को बड़े संदर्भ में समझने के बजाय छोटी सीमा रेखा में समझना चाहते हैं। नारद का योगदान हिंदी में बड़ा है, इसमें कोई शक नहीं। बल्कि जब भी इंटरनेट पर हिंदी की बात होगी, नारद के बिना अधूरी रह जाएगी।
जगदीश भाटिया जी, हम जैसे पत्रकारों की विडंबना है कि हम जहां काम करते हैं, अपने विवके से नहीं, बाज़ार के आदेश से करते हैं। यह हम जैसे पत्रकारों का दो चेहरा है और ये पूरे परिदृश्‍य की नियति है। लेकिन आप बताइए हिंदी में कोई ऐसा ब्‍लॉग है, जो इस दोमुंहेपन को बेनकाब करे। नहीं। आप ये काम कर सकते हैं, नहीं कर रहे हैं। क्‍यों नहीं कर रहे हैं, नहीं जानता। बीच में एनडीटीवी के कुछ कार्यक्रमों की समीक्षा बेंगाणी ने की, वैसी समीक्षाओं की तादाद बढ़नी चाहिए, लेकिन नहीं बढ़ रही। वो तो पत्रकार ही हैं, जो अपनी दुनिया का कच्‍चा-चिट्ठा सामने रख देते हैं। तो क्‍या पत्रकार अपना ही पोल खोलने के लिए ब्‍लॉग्‍स की गली में आये हैं? शायद ऐसा नहीं है। अभिव्‍यक्ति की बेचैनियां उन्‍हें यहां तक लायी हैं।
कितने मुसलमान मारे वाली अपनी टिप्‍पणी पर मैं माफी मांग चुका हूं। लेकिन बातचीत में तल्‍खी की अनौपचारिकता कभी कभी बहस-मुबाहिसे में आ जाती है जगदीश भाई!

Jitendra Chaudhary said...

सबसे पहले तो प्रमोद भाई को बधाई, सार्थक बहस शुरु करने का। इस बहस मे शामिल होने वालों से निवेदन है कि मुद्दे आधारित बहस करें।

देखो भाई, ब्लॉग एक अलग तरह का माध्यम है। हमारी पहुँच, आकांक्षाए और सपने बहुत सीमित है। हम जहाँ भी है, वहाँ काफी खुश है। आज नही तो कल, हमारे प्रयासो को दुनिया देखेगी। हम इन्टरनैट पर हिन्दी ब्लॉगिंग को बढते हुए देखना चाहते है, लेकिन साथ ही प्रदूषण भी नही चाहते, ना ही गुटबाजी, राजनीति और किसी तरह का कलह।

ये सच है कि अभी तो शुरुवात है, कई तरह के लोग आएंगे। अभी तो दस परसेन्ट भी नही आए, तब शायद नारद को भी अपस्केल करना पड़े, या ऐसे कई नारदों की जरुरत रहे। लेकिन तब भी, हम अपने नारद को साफ़ सुथरा ही रखना चाहेंगे। आपके लिए नारद शायद एक माध्यम होगा, लेकिन हमारी भावनाएं जुड़ी है नारद से।

जिस तरह मोहल्ला वाले स्वतन्त्र है अपने मोहल्ले को साफ़ रखने मे, उसी तरह नारद के संचालक भी स्वतन्त्र है,नारद को स्वच्छ रखने में। हमने एक आम सहमति बनाने की कोशिश की थी, इस दिशा मे, लेकिन वो शायद नही पाई, लोगों ने उसे अलग तरीके से लिया, खैर। आपने यदि ब्लॉगिंग शुरु की थी तो नारद के भरोसे नही की थी, ना ही हमने कभी मीडिया की जरुरत महसूस की थी। नारद से शायद आपको कुछ ट्रैफ़िक मिलता होगा और हमे एक सुख, कि एक और भाई हमारे गाँव मे शामिल हुआ। लेकिन यदि किसी ब्लॉग विशेष से गाँव की शांति भंग होती है तो व्यवस्था देखने की जिम्मेदारी भी गाँव वालों की ही है। या तो आप साल छह महीने टिको, हमारे साथ घुलो मिलो, हमारा ही एक हिस्सा बनो, तब शायद हमे शंकाए ना रहे, लेकिन यदि आप आते आते ही हवा बदलने की कोशिश करोगे, तो हम भी सोचने पर मजबूर हो जाएं कि आप लोग किसी एजेन्डे के साथ आए हो।नए मीडिया चिट्ठाकारों ने जिस तरह अपने ब्लॉग का प्रचार करके, बाकी को दरकिनार किया, उससे इन शंकाओं को बल मिलता है। आप कहेंगे कि कुछ पत्रकारों ने ऐसा किया, तो मै पूछता हूँ, आपने प्रतिकार क्यों नही किया? आपने उनसे सवाल जवाब क्यों नही किये?

मै तो नए साथियों को नारद के सहयोगी के रुप मे देखता हूँ, आने वाला हर ब्लॉगर, हिन्दी का प्रचार करता है, यही हमारा उद्देश्य है। कुछ बाते और भी है, जिन्हे मै अपने ब्लॉग पर बिन्दुवार लिखने की कोशिश करूंगा।

Pramod Singh said...

जिस चिंता से बात शुरु हुई थी बात उस दायरे से बहुत आगे निकलती दिख नहीं रही. यह सचमुच दु:ख की बात है. अंतत: चर्चा इसी पर हो रही है पत्रकार वर्सेस नारद, या कहें मोहल्‍ला वर्सेस नारद. भावनात्‍मक रेकॅर्ड की सूई इससे आगे खिंच नहीं रही. दो अखबारों में रिव्‍यू हो लेना इतनी बड़ी विजय है? अविनाश और मोहल्‍ले से परे इस विषय पर हमारी और कोई राय नहीं?

आशीष said...

मुझे जो कुछ कहना था वो देबुदा और जीतु भाई ने कह दिया !

ज्यादा दिन नही हुये हिन्दी चिठठा जगत मे वो भी दिन थे कि हमे लिखना पढ़ता था कि मै हिन्दी मे क्यों लिखता हूं !

आज खुशी है कि इतने सारे लोग आ रहे है, हर पेशे से लोग आ रहे है और लिख रहे है। नेट पर हिन्दी मे सामग्री बढ़ रही है। चाहे वो किसी भी रूप मे हो।

Beji said...

पत्रकार क्‍यूं बने ब्‍लॉगर?
यह आपत्ति नहीं प्रश्न है।

मुमकिन है कि शायद हिन्दी चिट्ठाकारिता के लिए यह सबसे अच्छी बात है।

मुमकिन यह भी है कि हम सभी सबकुछ नहीं जानते।
मैं नारद की तरफ से नहीं बोल रही.....मैं मोहल्ले के खिलाफ भी नहीं हूँ। विश्लेषन करने के लिए किसी को भी दोषी ठहराना जरूरी नहीं है।

कुछ प्रश्न है....जिनका जवाब ईमानदारी से ढूँढा जा सकता है।

जगदीश भाटिया said...

निजी टिप्पणी का प्रयोग केवल तथाकथित स्वस्थ बहस का चेहरा दिखाने के लिये किया गया।

बाकी बात आम मीडीया और ब्लाग में फर्क बताने के लिये लिखी, किसी खास चैनल के लिये नहीं।
वैसे अविनाश ने एन्डीटीवी का नाम लिया तो एनडी टी की ब्लाग पर समझ पर बहुत पहले यह लिखा था
http://aaina2.wordpress.com/2006/11/24/ndtv/
http://aaina2.wordpress.com/2006/07/31/ndtnparhum/

Pratik said...

प्रमोद जी, आपका यह विश्लेषण अच्छा है। लेकिन सार्थक मुद्दों पर चर्चा करने का मतलब यह तो नहीं है कि हिन्दी चिट्ठाकारों में आपसी समझ विकसित न हो सके। ऐसे हालात में जबकि हिन्दी के चिट्ठाकार बहुत ज़्यादा नहीं हैं, सभी का समंवय स्थापित कर आगे बढ़ना इंटरनेट पर हिन्दी के उत्थान के लिए ज़्यादा मायने नहीं रखता है?

जहाँ तक नारद का प्रश्न है, इसका मूल पूर्णत: लोकतांत्रिक विचारधारागत प्रणाली पर अवस्थित है और किसी अन्य ब्लॉग एग्रीगेटर के विरुद्ध नहीं है चाहे उसे कोई और ब्लॉगर खड़ा करे या बाज़ार या फिर कोई और। इसका उदाहरण एक अन्य हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर HindiBlogs.com है। जब किसी कारणवश मैं HindiBlogs को बंद करने पर विचार कर रहा था, तब नारद के प्रबन्धक जीतेन्द्र चौधरी ने ख़ुद इसको बन्द न करने की अपील की थी और नारद की इसी सर्वसमंवयी नीति के कारण आज भी हिन्दीब्लॉग्स.कॉम सुचारू रूप से अपनी भिन्न नीति के अनुसार कार्यरत है। नारद का काम महज़ एग्रीगेशन को अपने वैचारिक आदर्शों, जो हिन्दी ब्लॉग जगत के शुरुआती दौर से उसकी उन्नति के साथ सहज तौर पर विकसित हुए हैं, को आधार बनाकर हिन्दी चिट्ठों को पेश करना है।

अविनाश said...

दिक्‍कत ये है कि मेरी टिप्‍पणी को लोग नारद से जोड़ कर देख रहे हैं। हिंदी ब्‍लॉग में विविधताओं से भरी आवाजाही से आने वाले समय में होने वाले सामाजिक हस्‍तक्षेप पर बात हो, तो ज़्यादा सही होगा। जीतेंद्र जी भी इसी दिक्‍कत के शिकार हैं। नारद एक बड़ा मंच है। वो बड़ा इसलिए है, क्‍योंकि ये मानकर नहीं चलाया जा रहा कि मीडिया में इसकी चर्चा होगी। ये सोचकर कभी कोई बड़ा काम संभव भी नहीं। इसलिए बार-बार ये कहने की ज़रूरत नहीं कि मीडिया की परवाह नहीं। हम एनडीटीवी पर हिंदी ब्‍लॉग्‍स की चर्चा करते हैं नारद पर उपकार करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए क्‍योंकि नारद हिंदी पर उपकार कर रहा है। लेकिन मेरा कहना ये है कि हिंदी ब्‍लॉग्‍स के भीतर इस परोपकारी भाव से ऊंचा उठ कर चर्चा करने की ज़रूरत है।
जहां तक रही अपने ब्‍लॉग का प्रचार करके दूसरों को दरकिनार करने की, तो थोड़ा समाचार को समझना सीख लें जीतू भैया। हिंदुस्‍तान में नीलेश ने मोहल्‍ले का प्रचार नहीं किया। बल्कि मोहल्‍ले के से जुड़े एक अदद अविनाश से इंटरनेट पर हिंदी ब्‍लॉग्‍स की बढ़ती धमक पर राय ली। कोई बता दे कि एक भी बात मैंने अपनी प्रशस्ति में गायी हो। अब बिना किसी परिचय के नीलेश ने मुझसे ही बात करने की ज़रूरत क्‍यों समझी, ये तो नीलेश से ही पूछा जाना चाहिए। उसके बाद आरोप लगाना चाहिए।
बात जगदीश भाटिया जी की, मेरे सवालों के जवाब में फिर से व्‍यक्तिगत संदर्भ ले आये, इसका खेद है।

नीरज दीवान said...

बहुत अच्छा होगा कि इस विषय पर सीधी बात हो और ''परिचर्चा'' इसके लिए उपयुक्त मंच है. क्योंकि मेरा विचार है कि यह बहस अभी सिर्फ़ अपनी भूमिका के स्तर पर है. इसे उपसंहार तक पहुंचाना चाहते हैं तो साझा चर्चा की जानी चाहिए.

अतुल शर्मा said...

प्रमोदजी, मैं एक वर्ष से ब्लॉग लिख रहा हूँ। लिखने से पहले चार-पाँच माह तक लगभग हर ब्लॉग की सभी पोस्ट पढ़ीं। इतने समय में मैंने यह जाना कि चिट्ठा जगत एक छोटे गाँव की तरह हैं जहाँ खुली हवा है और प्रदूषण नहीं है, तथा सभी चिट्ठाकार एक परिवार की तरह रहते हैं। नारद उनका घर है। सभी लोग एक दूसरे से इस तरह घुल मिल गए हैं कि वे एक दूसरे सुख में सुखी और दुख में दुखी होते हैं। पहले यह गाँव छोटा था और इस गाँव में कोई मोहल्ला या बाज़ार नहीं था। अब मोहल्ला भी बना और बाज़ार भी खुला। अच्छा है गाँव की तरक्की ही हुई है। परंतु यह न समझें कि इस गाँव में हिन्दी में कोई बात करने लायक ब्लॉग नहीं है।
''ऑन लाईन डायरी गुलज़ार की किताब को पा लेने के सुख, पास्‍ता का वर्णण और लिट्टी-चोखा का आस्‍वाद, अपनी कविताओं को सजा-छपा देखने की खुशी, किसी देखी गई फिल्‍म और उतारे गए फोटो पर हमारी-आपकी राय, मन की उधेड़-बुन और यार-दोस्‍तों की गपास्‍टक, इंटरनेट व हिंदी ब्‍लॉगिंग की तकनीक व नई जानकारियों को जानने-बांटने का उल्‍लास- के दायरों में ही रहे ऐसा हम क्‍यों चाहते हैं?
भैया यह सब चीजें तो अखबार और पत्रिकाओं में भी होती है और इन सबकी व्यवस्था पत्रकार लोग ही तो करते हैं। ब्लॉग में ऐसा लिख देने से वह छोटा थोड़े ही हो गया। हो सकता किसी को अपनी कविता सजी हुई देख कर, चित्रों को ऑनलाइन देख कर खुशी होती हो। वैसे ब्लॉग में केवल यही नहीं लिखा जाता। गंभीर मुद्दे पहले भी आते रहे हैं। आप इस गाँव को घूमकर तो देखें, यहाँ परिचर्चा, निरंतर, अनुगूँज आदि गलियाँ 'समवेत स्वर' में हैं। कभी अनुगूँज सुनिए। फुरसतिया, ई-स्वामी, सुनील दीपक, सृजनशिल्पी की एक झलक तो देखिए कितनी रौशनी और खुशबू है वहाँ पर। आप लोग शब्दों के खिलाड़ी है इसलिए उन शब्दों के कारण जनता खिंची चली आई। कई बार तो आप लोग टिप्पणियों और पोस्ट के माध्यम से आपस में ही चर्चा कर लेते हैं। आमजन तो वहाँ दिखाई ही नहीं देता। वैसे अविनाशजी ठीक कह रहे हैं कि एक समय यह गाँव अपना रूप बदल कर महानगर बन जाएगा।
एक बात और यहाँ अविनाश द्वारा लिखी हुई टिप्पणियाँ तो 'मोहल्ला' में जाती है परंतु avinash द्वारा लिखी टिप्पणी Profile Not Available पर ले जाती है। क्या पहेली है यह?

Pramod Singh said...

बेजी,
आपके प्रति कोई अभद्रता हुई हो तो उसके लिए निजी तौर पर मैं क्षमा मांगता हूं. आप अपनी फोटो वाली हंसी बनाये रहियेगा.

Jitendra Chaudhary said...

मेरा फिर सभी से निवेदन है कि, व्यक्तिगत टिप्पणियां ना की जाए। मुद्दे से ना भटका जाए।

मै सबसे पहले यह जानना चाहूंगा कि नीलेश वाले मसले मे हमारे मीडिया वाले ब्लॉगर साथियों ने क्या किया?
क्या नीलेश से बात की गयी?
क्या उस रिपोर्ट पर कोई स्पष्टीकरण दिया गया?
क्या कोई कवरेज की गयी?

भैया कहना आसान है, और ये तो कोई नही मान सकता कि अविनाश भाई से कोई हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे मे पूछे और अविनाश भाई नारद के बारे मे बात करना भूल जाए। कैसे भूल गये भैया? अगर भूल भी गए तो कोई बात नही, नीलेश को कुछ कहो तो कम से कम, वो भी नही कहना तो चलो कोई बात नही, क्या अब भी हम कुछ उम्मीद रखें?

इन्टरनैट पर हिन्दी को बढावा देकर हम कोई उपकार नही कर रहे है, ना ही कोई और करेगा। हम इसे अपनी जिम्मेदारी समझकर कर रहे है। हमने सिर्फ़ एक ज्योति जलाई थी, उसे तूफ़ानो से बचाकर जलाए रखा था, इसको आगे तो नए लोगों को ही लेकर जाना होगा ना, इसको मशाल बनाने का काम हमे नही आपको करना होगा, आगे बढकर।
जिस तरह अगर आपको ब्लॉग मे तकनीकी दिक्कत आए और हम आपकी सहायता करने आगे ना आए, तो आपको बुरा लगेगा कि नही। ठीक उसी तरह आप ब्लॉगर है और मीडिया से है इसलिए मीडिया सम्बंधी बातों मे भी हमे उम्मीदे भी आपसे ही है।

अविनाश भाई, यदि हमने खबर को गलत तरीके से लिया तो आपने भी बात करके हमे साफ़ साफ़ नही बताया कि आखिर माजरा क्या था? कैसे एडीटर की कैंची सिर्फ़ नारद की बात पर चली, बाकी पर नही। स्पष्टीकरण तो आपको ही देना होगा, या नीलेश को।

मेरे विचार से बहस मुद्दे से फिर भटक गयी है, प्रमोद भाई, फिर से शुरु करिए, सवाल दर सवाल।

नीरज दीवान said...

यह रहा परिचर्चा का लिंक http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?pid=7435#p7435

अविनाश said...

नीलेश न मैंने पहले बात की, न बाद में। हां, जब वे हिंदी ब्‍लॉगिंग पर बात कर रहे थे, तो मैंने तरीका बताया कि हम एनडीटीवी पर ब्‍लॉग चर्चा कैसे करते हैं। पहले नारद पर जाते हैं, वहां से किसी ब्‍लॉग पर। इसी तरीके से नीलेश भी नारद पर गये और ज्ञानदत्त पांडे, प्रमोद सिंह और घुघुती बासुती का चिट्ठा ढूंढ़ लिया।
माज़रे का मामला आप ही पता लगाएं जीतू भाई। हम खुद भी नहीं जानते कि पत्रकारों की इधर हिंदी ब्‍लॉगिंग में रुचि कैसे बढ़ गयी है।

Debashish said...

Neeraj bhai, paricharcha per charcha kai mere jaison ke liye sanket to nahi ki "phoot lo". Jis charcha ki kadi jahan chalti hai wahin chalne diya karein to accha ho.

eSwami said...

मीडिया से जुडा होना या पत्रकार होना अभिव्यक्ति और लेखन में बेहतर होने का भ्रम दे सकता है लेकिन दया के पात्रों, औपचारिक रूप से आपको हकीकत से रूबरू करवाए जाने की जरूरत है - पत्रकारों का ब्लाग लेखन सामग्री, शैली और मात्राओं की कम गलतियों समेत अभी इतना स्तरीय नहीं है की आप गैर-पेशेवरों पर नाक भौं सिकोडते. वो इतना विशाद और विविध भी नहीं की औरों को उनके तकाकथित दायरों से परिचित करवाने का ओहदा ही दे आपको! दूसरे शब्दों में "सबकुछ भूल अपनी औकात मत भूल" या "बिल्ली पाल कुत्ते पाल मुगालते मत पाल" - वैसे भी जितने मुगालते पल रहे हैं वो सारे साफ़ कर दिये जाएंगे!

जलजले लाने के बातें करना उनको शोभा देता है जो अपनी नौकरियां ही संभाल लें. कांच के घरों मे रहने वाले अंधेरा कर के चड्डी बदलते हैं. चलो शुरुआत के लिए एक कडी ही बहुत है अभी तो अमरीका में ८८% मीडिया वालों ने अपनी नौकरियां खोई हैं उस दिन की कल्पना करो जब भारत में भारतीय भाषाओं में अंतर्जाल पर हर जानकारी सनसनीबाजों की दलाली के बिना उपलब्ध होगी!
कडी ये रही अपने ब्राऊजर में चेप कर पढ लीजियेगा - आंखे खुल जाएंगी!

www.upi.com/NewsTrack/Business/20070125-034637-2375r/

Shrish said...

भाई हमारे कहने को तो कुछ बचा ही नहीं, ऊपर की ही कुछ लाइनें कोट कर देते हैं, इन्हें ही हमारी टिप्पणी समझा जाए:

क्या पूरी रपट का समूचा रुख ही ऐसा हो जाना चाहिये कि यों लगे की "रवीश के पहले ब्लॉग नहीं था, ब्लॉगिंग भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था"।

नारद एक जालस्थल है, मुहल्ला की ही तरह, जैसे आप ये निर्णय लेते हैं की पूर्व प्रकाशित रचना स्वीकार नहीं करेंगे वैसे ही नारद के संचालक ये निर्णय लेते हैं की फलां फलां किस्म के ब्लॉग शामिल नहीं करेंगे।

दूसरा, "अभी हिंदी में कोई बात करने लायक ब्‍लॉग नहीं हैं", वाली राय तभी बदल सकती है जब आप दूसरे मुहल्लों में भी विचरें।

आप लोग नारद का फायदा भी लेना चाहते हैं और नारद को लतियाते भी हैं

देखिये चिट्ठों की क्वालिटी की बात कौन कर रहे हैं जो समाचारों के नाम पर राखी मीका और शाहिद करीना के एमएमएम अपने चैनलों पर दिखाते नहीं थकते। बाजार को देखिये कौन धिक्कार रहे हैं, जो बाजार की ताल पर हमेशा था था थैया करते हैं।
इन पत्रकारों से कौन बच पाया भैया।

आपके लिए नारद शायद एक माध्यम होगा, लेकिन हमारी भावनाएं जुड़ी है नारद से।

भैया कहना आसान है, और ये तो कोई नही मान सकता कि अविनाश भाई से कोई हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे मे पूछे और अविनाश भाई नारद के बारे मे बात करना भूल जाए।"

Anonymous said...

चिट्ठों की क्‍वालिटी की जो बात कर रहे हैं, चैनल क्‍या उनके बाप का है, जो वो ये तय करेंगे कि राखी और मीका दिखाया जाएगा या कालाहांडी के आदिवासियों की समस्‍याएं। ये निर्णय करने वाले तो ऊपर बैठे हुए लोग हैं। बेचारे अविनाश या रवीश क्‍या करें कि चैनल में क्‍या दिखाया जा रहा है। वो तो अदने से काम करने वाले हैं, लेकिन ब्‍लॉग तो चैनल के मालिक का नहीं, उनका अपना है। Shrish ji, आप पहले अपने दिमाग की ओबरहॉलिंग करवाएं, उसके बाद इस तरह के बेसिर-पैर के कमेंट करें।

Shrish said...

बेनाम महाशय आप मुझे ऑवरहालिंग की सलाह देने से पहले अपने लिए कोई नाम सोचें। अपने नाम से बात कहने की तो हिम्मत नहीं आपमें और मुझे सलाह देने चले हैं।

Pramod Singh said...

चलो सुहाना भरम भी टूटा जाना कि इश्‍क क्‍या है. कहते हैं जिसको प्‍यार वो चीज़ क्‍या बला है. होना था और क्‍या बेवफ़ा तेरे प्‍यार में...

ज्ञानदत्त पाण्डेय said...

अरे बाप रे. इत्ती बहस चल रही है. कगरिया कर चलना ही बेहतर है. इतना कन्फ्यूज़न है, कौन क्या स्टैण्ड ले रहा है, पता ही नहीं चलता.