Saturday, March 24, 2007

फुरसत के रात-दिन नहीं बस एक सुबह

योगिता बाली सुबह से कुछ ज्‍यादा ही फुदक रही थी. चाय लेकर आई चुप थी. अख़बार देकर गई चुप थी. नाश्‍ते की मेज़ पर भी कनखियों से देखकर मुस्‍की मार रही थी और चुप थी. चूंकि मैंने गाना सुना है चुप-चुप खड़े हो ज़रुर कोई बात है समझ गया ज़रुर कोई बात है. पूछ लिया कौन बात है कि सुबह-सुबह फोन पर महाराजगंज की मौसी से रोने और चायल की चाची से हंसने की बजाय मुझे कनखियों से देखती मुस्‍की मार रही है. जवाब देने की जगह योगिता रानी हमारा हाथ पकड़कर कंप्‍यूटर तक ले गई और फुरसतिया जी का पोस्‍ट दिखाकर हंसने लगी. सरसरी तौर पर पोस्‍ट पर एक नज़र मारते हुए मैंने कहा इसमें ऐसा क्‍या लिखा है कि तुम्‍हारे पेट में इतना बल पड़ रहा है.

हंसी में देह पर काबू नहीं रहा के आड़ में वह हमारे ऊपर गिर क्‍या गई, लगभग हमें भी गिरा दिया. मैंने झिड़कते हुए परे किया- होश में आओ. मालूम है हंसते हुए कितनी अनोखी हो जाती हो!

बुरा मान गई हूं वाली नज़रों से मुझे देखती योगिता सोफे तक चली गई. आंखों के आगे गृहशोभा तान, मुंह फुला कर बैठ गई. मुंह फुलाये-फुलाये ही बोली- दूसरे कहें तो कुछ नहीं, और हम कहें तो दुश्‍मन!

मैंने कहा- बुझव्‍वल में बात करना है तो सखी-सहेलियों का नंबर मिलाओ, हमारा वक्‍त मत खराब करो!

- आंख की जगह बटन लगा है तो हम क्‍या करें? यही तो कह रहे हैं फुरसतिया जी कि बहुत वक्‍त वाला लगाते हो तुम लोग अपने आप को!, चीढ़कर योगिता बोली.

- तुम लोग? यहां और कौन-कौन देख रही हो मेरे साथ? या तुमको भी यही लगता है कि हम पत्रकार हैं?.. किसी अख़बार से आजतक डेढ़ सौ का भी चेक आया है इस घर में?..

- तुम्‍हारे मुंह बजाने से क्‍या होगा! दुनिया कह रही है तो किसी वजह से कह रही है. शराबी-कबाबी के बीच बैठनेवाले को लोग शराबी-कबाबी ही कहेंगे! हमने कहा तो हमको बाहर कर दिये थे अब उनको जाके भी बाहर करो.. कह तो रहे हैं कि रवीश कुमार की कहानी शायद बीस बरस बाद समझ में आये.. जाओ, जाके कराओ चुप?.. मौसी-चाची काहे तुमसे बतियाती नहीं? काहे कहती हैं बबुनी को फोन देना? इसीलिए कि समाज में बनाकर चलना तुम्‍हें नहीं आता. मीठा बोलने में कलेजा फटता है! लगता है अदालत में खड़ा करवा के सबका मुकदमा पढ़ रहे हो! अपने को लगाने से अलग और क्‍या आता है?.. चार पैसा कमा के कभी हमारे हाथ में नहीं दिये.. जिंदगी निकल गई इस घर में रोते-रोते लेकिन आज तलक...

योगिता बाली लाईन पर आ गई थी. बिना वास्‍तव में डाले लेकिन मानकर कि कान में रुई डाल लिया है के अंदाज़े से मैं बाहर वाले कमरे में चला आया, अख़बार पर नज़र डाली. इंडिया श्रीलंका से हार कर विश्‍व कप से बाहर हो चुका है. अच्‍छा है. पागलपन की जुनूनी हवा से कुछ राहत हुई. चैपल साहब पता नहीं कितनी राहत महसूस कर रहे होंगे. मेरे पास उनका नंबर होता तो फोन करके कहता- हुज़ूर, होटल के कमरे में अकेले मत सोइयेगा, और सोना ही पड़े तो तकिये के नीचे एक पिस्‍तौल रखकर सोइयेगा.

2 comments:

  1. itni samanya aur saral bhasa me pad kar aacchaa lagaa

    Ashish Maharishi
    Mumbai

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  2. वाह प्रमोदजी, आपके यहां योगिताबाली हमारा लिखा पढ़-पढ़ाकर खिलखिलातीं हैं, आपको कोहनियाती हैं हमें पता ही नहीं था। बड़ी पारखी नजर है योगिताजी की! :)

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