Sunday, March 25, 2007

पराठे में भिंडी लपेटकर खाता मामूली आदमी

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: पंद्रह

मानता हूं तीन झटकों के असर में था फिर भी इस तरह के बेहूदा सवाल का क्‍या जवाब देता? कहता कि दीपशिखा की शादी में हमलोग पंडाल के पीछे जाकर साथ-साथ रोये थे! कि पुलिस जब इनको दारागंज की कोठरी से टांग के ले गई थी हमारी पत्‍नी के सगे मामा ने इनको अपने रसूख से छुड़वाया था? क्‍या फायदा वह सब याद दिलाने का. मुंह से कुछ निकालेंगे, उसका इस्‍तेमाल करके बाद में हमारे ही खिलाफ़ केसा खड़ा कर देगा. वैसे भी मुकेश और कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन जैसे गानों का अब कोई मतलब नहीं रहा. शालीनता की एक्टिंग ठेलते हुए मैंने फ्रॉड को फ्रॉड से मात किया. मुस्‍कराकर कहा- हां, शायद मेले-ठेले में कहीं भेंटाये हों.

रघुराजरुपी फ्रॉड ने बहुत ही गौर से मेरी बात सुनी. एकटक मेरी ओर देखते रहे मानो मैंने मेले में मिलने की बात नहीं कही हो, इराक से चीनी फौजों की निकासी और शांति का बीस सूत्री समाधान उनके हाथ में रख दिया हो! थोड़ा बेचैन होकर सुराही तक गए. कांसे के गिलास में पानी ढाला और कटे हुए तरबूज, पपीते के फांकों की तश्‍तरी लिए पास चले आए. मेरी ओर बढ़ाकर बोले- लीजिये, आपको भूख लगी होगी!

भूख से ज्‍यादा चिंता लगी है. किस नौटंकी के किस खंड का कौन पार्ट खेला जा रहा है! मगर उसका तो यह पाजी जवाब देगा नहीं. माथे पर तेल चुपड़े इसे आनंद के बाबू मोशाय वाला चरित्र निभाने की चढ़ी है. अपने ब्‍लॉग पर यहां-वहां से उड़ाई फोटो के ऊपर एक हेडिंग डाले रहता था- क्‍या रंग है ज़माने का. उसी तर्ज़ पर अभी कहने की इच्‍छा हुई क्‍या गंध है ज़माने का. हाथ हवा में लहराकर और मुस्‍कराकर कहा- नहीं, नहीं, तकल्‍लुफ की बात नहीं. हम यूं ही मज़े में हैं.

रघुराज बाबू हमें ऐसी चोट खाई नज़रों से देखते रहे मानो हमने दिल चीरनेवाला काम कर दिया हो. बुदबुदाकर बोले- आश्‍चर्य हो रहा है. क्‍योंकि मेला तो आजतक हमने देखा नहीं. हमारी मुलाकात निश्‍चय ही कहीं और हुई होगी. न्‍यूज़पेपर के दफ्तर, किसी इंटर-कॉलेजियेट फेस्टिवल में... फिर अचानक जैसे याद पड़ा हो मेरी ओर पलटकर कहा- कहीं आप टीके मिश्रा की गणित कक्षा में तो नहीं थे?...

यह आदमी पपीता और तरबूज खाकर बहक गया है या मुझको दुखी करके चोर-पुलिस के खेल का अपना शौक पूरा कर रहा है. अपने गाल पर पड़ा तमाचा अभी भूला नहीं था. उठकर एक हाथ मैं भी लगाऊं कि इनकी सारी बहक झड़कर बाहर आ जाए! लेकिन अगरबत्‍ती और दीवारों पर गोबर का असर रहा होगा, भावुकता में मुंह से निकला- तो आपको याद है! गणित की कक्षा में आप टॉप आया करते थे सुनंदा सेकेंड हुआ करती थी और मैं... हमेशा रोता रहता था.

अबकी दफा रघुराज मियां हंसने लगे. अचक्‍के में मेरी ओर आए, कंधे पर थपकी दी- वही सोच रहा था चेहरा जाना-पहचाना लग रहा है. पहले बताया क्‍यों नहीं?

कब बताता. जब भले आदमी ने फर्श पर लाश बिछा दी थी, या मेरे गाल को अपने भारी हाथ से नवाजा था? कि जब इनकी जापानी चेलियां हाथ-पैर बांधकर मुझे सोफे पर पटक गई थीं? लेकिन यह सब टेढ़े सवाल पूछकर इस मनभावन प्रकृति की छटा को खराब क्‍यों करता.

- तब तो आपको मनोहर की भी याद होगी? और संदीप की?... रघुराज बच्‍चे-सा खुश होकर चहकने लगे- संदीप चौबे कितना भावुक था याद है? बाद में वह आईपीएस में चला गया... बेचारा...

- और आप उसके हॉस्‍टल के कमरे में रात के एक बजे उसे पीटने गए थे! चीख-चीखकर उसे गद्दार और जनता का दुश्‍मन कहा था!...

मुझसे रहा नहीं गया. भावावेश में उत्‍तेजित होकर उठ खड़ा हुआ. रघुराज फटी आंखों देखते रहे. इच्‍छा हो रही थी खींचकर एक हाथ लगाऊं इस नमूने को. मगर हाथ का गुस्‍सा मुंह से छूटकर निकलता रहा- क्‍यों नौटंकी कर रहे हो? किसके लिए कुशवाहा कांत का ये सस्‍ता उपन्‍यास खेल रहे हो! मेरे लिए? कि मैं भूल जाऊंगा थोड़ी देर पहले तुमने कितना और कैसा क्रांतिकारी पार्ट अदा किया? राक्षस की तरह लोगों से पेश आके यहां राजा हरिशचंद्र खेल रहे हो! और हम चूतिया हैं दांत चियारे कॉलगेट वाली मुस्‍कान देकर दाद देते रहें कि सही है, गुरु? बड़े अच्‍छे हो, इंसानियत के अवतार हो?...

घबराहट और शर्म से रघुराज कांप रहे थे. फिर कुछ चटका. बिजली के दो नंगे तारों को एकदम-से जोड़ दिया गया हो जैसे. फिर ‘गम्‍म्‍म्’ की एक भारी आवाज़ हुई. मानो सिनेमा हॉल में बीच फिल्‍म के दौरान प्रोजेक्‍टर बैठ जाए! ऐसे क्षणों में सिनेमा हॉल में रोशनी हो जाती है, यहां अंधेरा हो गया. ‘गम्‍म्‍म्’ की दूसरी आवाज़ के साथ रोशनी लौटी. और इस बार झरने का स्‍वर, अगरबत्‍ती की खुशबू और गोबर-लिपी दुनिया का कहीं कोई पता नहीं था. उसकी जगह सेटिंग बदलकर एक बड़े गोदाम में परिवर्तित हो गई थी. और कोने के एक मामूली ऑफिस टेबल पर एक मामूली-सा दिखता आदमी अखबार में लिपटा पराठा तोड़-तोड़कर टिफिन की भिंडी की भुजिया के साथ खा रहा था. पहचानने पर इस असाधारण-मामूली आदमी को देखकर मेरे माथे में खून चढ़ने लगा. किसी जापानी मांगा का चरित्र होता तो माथे की नसें अब तक चटक चुकी होती. मगर इस बेशर्म के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. मुझे देखकर रवीश मुस्‍कराये, पराठे की पैकिंग मेरी ओर सरकाकर कहा- खाओ, खाओ. एकदम घर का है.

(जारी...)

1 comment:

  1. ये कैसा तानाशाह है..हमारी तरह घर का बना भिंडी परांठा खाता है.. जल्दी दीजिये अगली कड़ी..

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