Monday, March 26, 2007

दीवार में मदन पुरी को खिड़की से फेंकनेवाला सीन भूला नहीं हूं, सर!

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: सोलह

- यहां कोने में बैठ के अब ये कौन नाटक खेल रहे हो?- मैं लगभग चीखता हुआ रवीश तक गया.

अच्‍छे काम के बावजूद ऑफिस में डांट पड़ रही हो के अंदाज़ में रवीश का चेहरा उतर गया. धीमे-धीमे मुंह में पराठा घुमाते हुए बोले- आप फिल्‍मवालों के साथ यही दिक्‍कत है, भाई साहब, हर जगह नाटक दिखता है. चार घंटे की शुद्ध रगड़ाई के बाद मुंह में दो निवाला डाल रहा हूं मगर आप चाहते हैं वह भी हराम हो जाये. ऑफिस में बॉस को कहते हैं एक लैपटॉप दे दो, फील्‍ड से रिपोर्टिंग में आराम हो जाएगा तो वो कहता है कानपुर जा रहे हो कि कैलिफोर्निया? ग्रेटर कैलाश में में थ्री बेडरुम फ्लैट भी खरीदकर दे दूं? अच्‍छा तमाशा है. आदमी जिम्‍मेदार अधिकारी से अपनी परेशानी बोल रहा है और साहब व्‍यंग्‍य में जवाब दे रहे हैं! क्‍यों मजाक कर रहे हैं, सर? आपका डंडा हुआ है उसके लिए हम रेस्‍पॉंसिबल हैं? बीस साल पहले मीरा नायर ने एक फिल्‍म बनाई थी. द नेमसेक. जाईये, जाकर वो फिल्‍म देखिये, फिर आदमी की तरह हम से बात कीजिये. हम सब अपने जड़ों से कटे हुए लोग हैं, सर. गांव से तोड़कर पेट ने हमें महानगर से जोड़ दिया है. डीटीसी की बस और इकानॉमी क्‍लास में चार पैसे बचाकर इंसानियत सहेजने की कोशिश करते रहते हैं. दिहाड़ी मजूर की तरह जूझे रहते हैं साले को. शिकायत का कभी मौका नहीं दिया. आपसे लैपटॉप मांग लिया गलती हो गई? गुनाह हो गया, आलमपनाह? घर में जो कुत्‍ता पाल रखा है उसका मंथली बजट क्‍या है? जो लड़कियों की संगत में शाम को वाईन ऑर्डर होता है उसका! हम सवाल करें तो खराब? और आप दिन भर हमारे ऊपर थूकते रहें वो जॉनी लीवर का जोक! मुस्‍कराकर कहें अच्‍छा कर रहे हैं? प्‍लीज़, डू इट अगेन, थैंक्‍यू, सर? कमाल है! लैपटॉप मांग के ऐसी गलती कर दी? आप भी छोड़ दो फिर कंपनी का टाटा सियेरा? जेपी के टाईम के कुरता झोले में घुमो! जाओ जनता के पास?

लगा मेरा सामने खड़ा होना मात्र संयोग है. मन के तारों के खुलने का बहाना भर है. बस. रवीश मेरे साथ नहीं दफ्तर में अपने बॉस के साथ संवाद में हैं. झुंझलाकर मैंने रवीश को रोकने की कोशिश की- चबर-चबर किये जा रहे हो! बात सुनो, यार!

भरी-भरी पनीली आंखों से रवीश ने एक बार मेरी तरफ देखा, फिर बचे हुए पराठे की तीन-चार परत करके मुंह के अंदर ठूंस लिया और लगभग अंदर ठेलते हुए निगल गया. गले में तकलीफ हुई तो हाथ उठाकर ठहरने को कहा. प्‍लास्टिक की बोतल से गट-गट दो घूंट भरी, फिर लंबी सांस खींचते हुए भारी देह को सामान्‍य के सम पर लौटाने लगे. बुदबुदाकर कहा- खड़े-खड़े किसी दिन गिर पड़ेंगे साला तब आप लोगों को चैन पड़ेगा!

- यहां मंच पर नाटक नहीं हो रहा, रवीश!, मैं बरसा. - कि तुम दर्शकों की सहानुभूति के लिए आत्‍म-दया का पार्ट खेल रहे हो. कि मुझको भटकाने के लिए यह फिर कोई रुप धरा है तुमने!

- ऐसा ही प्‍यारा रुप है तो आप ही क्‍यों नहीं ले लेते? ले लीजिये!, दुखी होकर रवीश पुराने अखबार से टेबल की गंदगी बुहारने लगा.

- सीधे बात करो तो किसी के समझ में ही नहीं आता! गांधी शांति प्रतिष्‍ठान में संवेदना और युग का सच बोलेंगे! इंडिया इंटरनेशलन सेंटर में आम आदमी की पीड़ा और संवादहीनता पर पर्चा पढ़ेंगे. क्‍या नहीं समझ में आता है, भाई साहब? क्‍यों? आपको है और हमको लैपटॉप की दरकार नहीं है! अशोक विहार पैलेस में लंच खाके आप बारह हजार का चेक काट दीजिये और हमने मुंह खोला तो कंकड़बाग के घसियारे? प्रैस क्‍लब के शराब का बिल लाकर दिखाऊं आपको? या एनालिस्‍ट के यहां सीटिंग पर पैसा बहाया है वो लाकर रखूं सामने?...

लंबी सांस खींचकर रवीश ने आंखें बंद कर लीं. दोनों हाथों से चेहरा मला फिर थकी नज़रों से सामने की दीवार तकने लगा.

- पटना-दानापुर कहीं बैंक की नौकरी कर लिये रहते तब ठीक रहता. दिन भर अंतरविरोध नहीं जीते. गुस्‍सा आता तो गुस्‍सा ज़ाहिर करते. मुस्‍कराकर माफ़ी नहीं मांगते कि गलती हो गई. सॉरी, सर! दिन भर सॉरी बोलते-बोलते थक गए हैं लेकिन आप अभी भी समझने से इंकार कर रहे हैं. किसी दिन बांध टूट गया, कोने में भागकर आपका गला पकड़ लिये तो बहुत देर हो जायेगी. फिर सॉरी मैं नहीं आप कहने के लिए छटपटायेंगे मगर तब तक बहुत देर हो चुकी हो होगी. बांध को टूटने से रोके हुए हैं. बटुए में सुखी परिवार की एक पुरानी फोटो है. बेटी और पत्‍नी का मुस्‍कराता चेहरा है. मैं भी उनकी खुशी में कदम मिला कर चलने का प्रयास कर रहा हूं. गौर से फोटो देखिये तो आपको दिखेगा. इसे हमारी कमज़ोरी मत समझिये. गांव की शिक्षा और शुद्ध संस्‍कार हैं. किसी दिन फैल गया तो फिर आप भागकर किसी चैंबर, केबिन में छिप नहीं सकियेगा, सर! अमिताभ बच्‍चन की पुरानी फिल्‍मों का फैन हूं. पटना के मोना टॉकीज में दीवार सात दफे देखी थी. परवीन बाबी की मौत के बाद एक सीन है. होटल के कमरे में मदन पुरी लड़की को लेकर लेटा हुआ है. उसे लगता है मौज है. एवरीथिंग इज़ फाईन. लेकिन दरवाज़ा ठेलकर अमिताभ घुसता है अंदर और कठघरे में और खबरों की खबर का खुलासा नहीं करता. सीधे मदन पुरी को टांगकर हाई राइज़ होटल की खिड़की से बाहर फेंक देता है! मेरे लिए बहुत सिंबोलिक सीन था सर! वह सीन आज भी भूला नहीं हूं, सर!

अमरीकी फिल्‍मों में सीबीआई का अफसर जिस तरह मुज़रिम को घेरने के लिए देह टेढ़ा और पैर नीचे लटका कर टेबल पर नितंब की टेक लेता है, कुछ उसी अंदाज़ में टेबल को अपना भार सौंपकर मैंने रवीश को घेरा. ब्‍लॉग विक्टिम की जगह फिलहाल सरकारी वकील वाले रोल में था. पूछा- एक बात बताओ. तुम्‍हीं नहीं थके हो, तुम्‍हारे पीछे नाच-नाचकर मैं भी पक गया हूं. इतना बताओ तुम जो दिख रहे हो अभी वह रियल है या...?

हैरानी से एक दफे मुझको देखकर रवीश ने मुंह फेर लिया. पेपर की गंदगी को मुट्ठी में बंद करते हुए कहा- परौठा-भुजिया खाता आपको रियल क्‍यों लगूंगा! आपको तो शो चाहिये, टीम-टाम चाहिये? क्‍या करुं फिर? सिर के बल खड़ा हो जाऊं! फिर रियल लगेगा आपको?

रवीश के कंधे पर हाथ रखकर मैंने कहा- तुम ये हो तो वो कौन है? ज़मीनों का कब्‍जा, लोगों का दमन? चीन के साथ सांठ-गांठ. रवीश रिसोर्सेस इंक! अब ये मत कहो तुम्‍हें इन सबकी कोई खबर नहीं है?

(जारी...)

1 comment:

  1. बेहद भावपूर्ण,सच्चा और निर्मम लेखन . पढ़ कर मन बेचैन हो उठता है .
    कभी-कभी एक पछतावा होता है . मित्रों की तरह पत्रकारिता में क्यों नहीं गए . क्यों आए लगभग चुनौतीविहीन, धीमे ज़हर से मारने वाली इस स्थायी कही जाने वाली नौकरी में . अब भी कभी-कभी १६-१७ साल की सरकारी कुलीगीरी के बाद भी उचंग चढती है कि इसे छोड़ देना चाहिए . थोड़ी हिम्मत जुटाता हूं पर अज़दक बहुत निर्मम हो कर पंसेरी फ़ेंक कर मारते हैं और मेरा 'हाफ़ बेक्ड' संकल्प ढेर हो जाता है .

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