Saturday, March 31, 2007

उच्‍चवर्ग का बाकी देश से विभाजन भारत का सबसे सफल विभाजनकारी आंदोलन है: अरुंधति रॉय

सिंगुर और नंदीग्राम एक सवाल खड़ा करते हैं- क्‍या हर क्रांति का आखिरी स्‍टॉप विकसित पूंजीवाद है?...आक्रामक भोग व उपभोक्‍तावाद की खुराक पर विकसित हो रहे हमारे देश के मध्‍यवर्ग को विस्‍तार चाहिये, नए संसाधन चाहिये. औद्योगिक बन रहे पश्चिमी देशों में यह मांग औपनिवेशिक संसाधनों की लूट-पाट व सस्‍ते गुलामों की बहाली से पूरी हो रही थी. चूंकि अब उपनिवेशों का समय नहीं रहा, हमें अपने भीतर ही उपनिवेश खड़े करने हैं, कच्‍ची ज़मीनों पर हाथ मारना है. हमने अपना स्‍वयं का मांस-मज्‍जा खाना शुरु कर दिया है.
''भारत एक पुलिस राज्‍य में बदल रहा है. जो कुछ इन दिनों इस देश में घट रहा है उसके खिलाफ़ राय रखनेवाला हर व्‍यक्ति आतंकवादी करार दिये जाने के खतरे में है. इस्‍लामिक आतंकवादी होने के लिए पहले मुसलमान होना ज़रुरी है- तो उस छतरी के नीचे हम सारे लोगों को शामिल करने में ज़रा दिक्‍कत है. इन्‍हें थोड़ा ज्‍यादा फैली हुई छतरी चाहिये. तो इसका इलाज है डिफिनिशन को ज़रा ढीला, अनडिफाइन्‍ड छोड़ दिया जाए. यह ज्‍यादा असरकारी रणनीति है क्‍योंकि वह दिन ज्‍यादा दूर नहीं जब हम सभी माओवादी या नक्‍सलवादी, आतंकवादी या आतंकवादी समर्थक कहे जाएंगे, और हमको वे लोग चुप करा रहे होंगे जिन्‍हें माओवादियों या नक्‍सलाइटों की पहचान है न परवाह. गांवों में तो यह खेल शुरु हो ही गया है- समूचे देश में हज़ारों लोगों को जेल के अंदर इसी ढीली कैटेगरी और इल्‍ज़ाम के तहत बंद रखा गया है कि वे आतंकवादी हैं जो राज्‍य का तख्‍ता पलटने की कोशिश कर रहे थे...''

मध्‍यवर्ग की बढ़ती भूख, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्‍य में तेजी से मिटते वाम और दक्षिण का फर्क, लोकतांत्रिक प्रतिरोध की मुश्किलें और सीमा और भारतीय राज्‍य का स्‍वरुप क्‍या है. एक समझदार, संवेदनशील नागरिक के सामने चयन क्‍या हैं: ये ढेरों सवाल हैं जिन पर अरुंधति रॉय ने खुलकर बेलौस, जीवंत टिप्‍पणी की है. तहलका के लिए शोमा चौधुरी से अरुंधति की पूरी बातचीत यहां पढ़े.

1 comment:

  1. आधी जिन्दगी तो श्रीमती गांधी के विकल्प के रूप में समाजवादी रोमांस ने चौपट कर दी. अब आप नक्सली और माओवादीयों का चिन्तन समझाने को प्रेरित कर रहे है. जब तक वह पल्ले पडे़गा तब तक बर्लिन की कोई और दीवार ढ़ह जायेगी.
    पुलिसिया आतंकवाद खराब लगता है. ठीक वैसे ही जैसे सरकारी भ्रष्टाचार/अल कायदा/डेनिश कार्टूनिस्ट पर फतवा/नक्सली-माओवादी हिंसा खराब लगते हैं.

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