Thursday, March 29, 2007

रांची नहीं रांचोन और प्रेम के दर्शन

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: अट्ठारह

भौतिक आंखों से पहले अचेतन आंखों का कार्य-व्‍यापार शुरू हुआ. सवाल दर सवाल हैं जवाब हमको चाहिये का भावनात्‍मक उत्‍पात मचा हुआ था. रवीश को क्‍या सचमुच इसकी खबर नहीं कि उसके नाम, उसकी पहचान का कितना भारी षड़यंत्रकारी, बलात्‍कारी दुरुपयोग हो रहा है? वह एक विराट कॉरपॉरेशन का फ़रेबी चेहरा बना हुआ है और भले आदमी को इसकी सूचना तक नहीं? दस-पंद्रह वर्षों में अंतर्राष्‍ट्रीय मानवाधिकार संस्‍थायें जब रवीश रिसोर्सेस इंक को कठघरे में खड़ा करके उसके खिलाफ आरोप पत्र पढ़ेंगी तब कौन रवीश उसका सामना कर रहा होगा? अंतर्राष्‍ट्रीय फ्रॉड का सॉफिस्टिकेटेड क्‍लोन या मोतिहारी का भोला, भावुक रवीश कुमार?.. क्‍या अविनाश, भूपेन, अभय इस दोहरे दोगले यथार्थ से वाकिफ हैं? क्‍या रवीश को बचाने के लिए हममें से कोई कुछ भी नहीं कर सकता?.. अचेतन अवस्‍था में भी आंखों पर सवालों के नुकीले तीरों की बरसात हो रही थी.

वास्‍तविक आंखें एक ऐसे हॉलनुमा कमरे में खुलीं जिसे बंबई के बांद्रा में किराये पर पाने के लिए के लिए बीस वर्ष पहले भी बीस हज़ार पर्याप्‍त नहीं होते. फिलहाल मुफ्त में उसका सुख भोग रहा था. और अकेला नहीं था, हरी और सफेद पट्टियों के यूनीफॉर्म में तीन और लोग भी वही सुख भोग रहे थे. दो अच्‍छी लहीम-शहीम डील-डौल के कॉफी का मग लिये ताश खेलने का लुत्‍फ ले रहे थे, तीसरा- अपनी ही नस्‍ल का सांवला, विरूप, गर्दन तक बढ़ी दाढ़ी- दफ्ती वाले बोर्ड पर कागज़ चढ़ाये अपने विचार दर्ज़ करता दिख रहा था, साथ-साथ दर्ज़ भी कर रहा था. ध्‍यान गया यूनीफॉर्म के डेकोरेशन से ये तीनों ही सज्जित नहीं हैं, मैं भी उसी सजावटी श्रृंगार में हूं. बाकी तीनों की तरह मेरी छाती और कंधे पर भी चंद आंकड़े दर्ज़ थे. मैंनें आंकड़ों की तागोंवाली बुनावट को टटोला. मानो जांच रहा होऊं कशीदाकरी के इस वर्क की आउटसोर्सिंग चायना वाली है या अपने देसी लुधियाना का कमाल है. सामने विमल लाल होते तो चीखकर कहता साले, तुमसे गलती हुई है. हम बीमार नहीं हैं जो तुमने अस्‍पताल में डाल दिया है! लाइफ में कभी तो एक अकलवाला काम किया होता, यार!

सामने विमल लाल नहीं थे, और कंठ के अंदर स्‍वर भी बहुत चीखनेवाला महसूस नहीं हो रहा था. लग रहा था प्रयास करुं तो शायद कंठ से आं-बां जैसा कोई स्‍वर फुटे. मुझे एकदम-से बेचैनी होने लगी. मगर हकलाकर अजनबियों के बीच मैं बेचारा नहीं दिखना चाहता था. मगर दिख शायद वही रहा था. वही ताड़कर सांवले, विरूप सज्‍जन ने हाथ की दफ्ती फर्श पर रख दी और दाढ़ी में हाथ फेरते हुए मेरी ओर देख मुस्‍कराने लगे- घबराईये नहीं. उत्‍तम प्रबंध है. दिलशाद गार्डन के हमारे घर में सिर्फ घंटे भर के लिए आता था लेकिन यहां पानी की सप्‍लाई ट्वेंटी फॉर इन टू सेवन है! वेरी अफिशियेंट. यहां आने के बाद मेरी घटी नहीं क्रियेटिविटी बढ़ी ही है. बच्‍चों को मिस करता हूं इसका दुख ज़रूर है!

हवा में संवाद के इस हस्‍तक्षेप से लहीम-शहीम पार्टी ने अकुताकर दाढ़ीवाले बाबा पर एक नज़र फेरी. रिमोट से एफएम रेडियो ऑन किया और वापस अपने ताश के लुत्‍फ में लौट गए. चैनल पर अरब मुल्‍क चीनी सहयोग से कितनी तेजी से तरक्‍की कर रहे हैं इस पर चीनी में एक बातचीत प्रसारित हो रही थी. बीच-बीच में उल्‍लसित स्‍वर में ‘अल्‍लाहो- अकबर’ का एक कोरस उठता.

हाथ में दफ्ती लिए दाढ़ीवाले बाबा मेरे और करीब सरक आए. प्रेम से मुस्‍कराकर अपना परिचय दिया मानो चालीस वर्ष की स्‍त्री दुस्‍साहसी होकर अपनी उम्र का राज़ खोल रही हो- प्रेमदर्शन. मेरा साहित्यिक नाम है. सलमान रुशदी और ख्‍यातिलब्‍द्ध अंग्रेजी प्रकाशन संस्‍थाओं व हिंदी चैनलों में इसी नाम से विस्‍तरित व सुविख्‍यात हूं. नेहरु ने अहमदनगर किला जेल में भारत की खोज की, मैं यहां नो वंडर जेल में रांची के रंग की रचना कर रहा हूं..

मेरी हकलाहट एकदम से उड़ गई- ये अस्‍पताल है या जेल?

प्रेमदर्शन प्रेम से मुस्‍कराये. शायद मुस्‍कराना इनका फेवरेट एक्‍सप्रेशन है- मैं तो कहूंगा अस्‍पताल से ज्‍यादा सहूंलियत है. अब आपकी जिज्ञासा होगी जिस शहर को हूनान प्रांत के काला बजारियों ने खरीद लिया भला मैं उसके रंगों की रचना कैसे कर रहा हूं? तो सर, मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि रांची से मेरे बड़े निकट, अंतरंग संबंध रहे हैं. और मेरी यह वर्क इन प्रोग्रेस कृति बाल्‍यकाल की उन्‍हीं कोमल स्‍मृतियों को समर्पित होगी. इस संबंध में मैं हूनान प्रांत के जिम्‍मेदार अधिकारियों से पत्र-व्‍यवहार भी कर रहा हूं कि वे आनेवाले समय में रांचोन (रांची का वर्तमान नाम) में मेरी एक कांस्‍य प्रतिमा स्‍थापित करे. क्‍योंकि मेरी (अर्द्धलिखित लेकिन लिखी जाकर कालातीत होनेवाली) कृति रांची व रांचोन के मध्‍य एक सेतु का काम भी करेगी.

अमरता पर अभी और प्रवचन चलता लेकिन मैंने बाबा को रोक लिया- माने आप-हम.. ताश खेलते ये दोनों लफंगे मरीज नहीं.. कैदी हैं?

- एक तो हूनान प्रांत का ही है. गांव की लड़कियों को नेपाल में बेचने का कारोबार करता था. दूसरा इराकी है. युद्धपीडित अपाहिज बच्‍चों की तस्‍करी के इल्‍जाम में पकड़ा गया है- बाबा ने चहकते हुए मेरे ज्ञान में वृद्धि की. मेरी पुस्‍तक में इन दोनों का ही मार्मिक वर्णण होगा. आपका भी होगा, मुस्‍कराकर प्रेमदर्शन बाबा ने स्‍वयं को करेक्‍ट किया- लेकिन उसके पहले आपको अपना परिचय देना होगा?

चार्ल्‍स ब्रॉंसन या यूल ब्राइनर होने की तमन्‍ना नहीं थी फिर भी जेल की दीवारों का महीन निरीक्षण करता उदासीनता से मैं बुदबुदाया- मेरा कोई परिचय नहीं, बाबा. मैं व्‍यर्थ और बेमतलब हूं.

तब तक एफएम के एक अन्‍य चैनल पर पहचानी आवाज़ में प्राथमिक चीनी का काव्‍य पाठ आरंभ हुआ. अंदाज़ करना मुश्किल था मान्‍या का स्‍वर प्रिय के विरह में उदास और कातर हो रहा था या असल वजह थी बलपूर्वक चीनी पाठ को मजबूर किया जाना! तदोपरांत किन्‍हीं सज्‍जन कुमार ने चीनी में ब्‍लॉगिंग के फायदे गिनाना शुरू किया. ऑनलाईन ऑरेंज व स्‍नूकर पुरस्‍कारों का विस्‍तृत विवरण देने के पश्‍चात् उन सभी को आगाह किया जो अभी भी छिपकर छोटी बोलियों व अपनी मातृभाषा में ब्‍लॉग चलाने के जिद पर अड़े हुए थे. इस संबंध में हज़ारीबाग के जंगलों से पटना के एक नौजवान रियाज़ुल हक़ की गिरफ्तारी एक बड़े सबक की तरह पेश की जा रही थी.

इतने में फौजी बूटों का टिक्- टॉक् सुनाई पड़ा. फिर रौबिले ठाठ में फौजी की साक्षात उपस्थिति हुई. लहीम-श‍हीम पार्टी एकदम-से ताश फेंककर अच्‍छे बच्‍चों के आदर्श तस्‍वीर में परिणत हो गई. प्रेमदर्शन बाबा आड़े-तिरछा होते हुए मुस्‍कराहट चुवाने लगे. स्‍वर में रसगुल्‍ले का रस घोलकर बोले- सर, इस फॉर्मल पोशाक में एगो फोटो दे देते त् हमरी पुस्‍तक में चार चांद लग जाता!

- ठीक है, ठीक है, लडियाईये नहीं, प्रेमदर्शन जी. जो संभव है वह अपने समय पर किया जाएगा.

रिमोट से रेडियो ऑफ करने के बाद रोबिले फौजी यानी अविनाश ने पैरों से कुर्सी खींची. होंठों में एक सिगरेट दाबकर आराम से बैठ गया.

(जारी...)

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