Thursday, March 29, 2007

सच क्‍या है और क्‍या है मिथ्‍या की मदहोशी

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: उन्‍नीस

लहीम-शहीम हूनान प्रांत का चीनी और अल-बसरा का इराकी केश संवारे, हाथ बांधे ऐसे खड़े हो गए मानो स्‍कूल के सालाना समारोह में ईनाम मिलने की घोषणा होने वाली हो. प्रेमिल चितवन की बहार फैलाये बाबा ने भी अपनी बांकी अदाओं की टंकी खोल दी और अलग-अलग अंदाज़ में अविनाश को इम्‍प्रेस करने की होड़ में जुटे रहे. अलिखित कालातीत रचना की एक-एक पुर्जी, पन्‍नी, कागज़, नोट्स, पु‍लिंदा पसारकर दिखाने लगे जैसे आईसीएससी बोर्ड के पहले छात्र महंगे ट्यूटर को अपनी विहंगम तैयारी की झलक दिखा रहा हो.

- उन्‍नीसवीं सदी में फुकॉन और मार्सेलस की यात्राओं का विशद इस्‍तेमाल किया है, नोटबुक नंबर सत्रह के सत्रहवें पृष्‍ठ पर नज़र डालिये, सर.. किसी शहर की पुनर्रचना पर हिंदी में कर्मठता और बौद्धिक जिज्ञासा की पहले कभी इतनी लागत नहीं हुई, अविनाश बाबू.. अतिरंजना नहीं यथार्थ बोल रहा हूं! ज़े-सुआन काउंटी के इन उच्‍च अधिकारी का फैक्‍स देखिये आप.. ये साहब भी यही राय रखते हैं! रांची मेरी रचना से अमर हो जाएगी, सर!

प्रेमदर्शन के फैलाये कागज़ी अंबार को पैर से एक ओर हटाकर अविनाश हंसने लगा. ऐसी हंसी या तो पागल हंसते हैं या फिर पुलिसवाले. बाबा को घूरकर देखा जैसे दुनिया के सबसे बड़े पागल हों.

- हमसे कह दिया किसी और के सामने रांची मत कहियेगा. दो सौ कोड़ों की सज़ा मिलेगी और उठाकर सोलिटरी सेल में डाल देंगे!.. अपनी परिचित गुस्‍से की शैली में अविनाश ने बकना शुरू किया- आपको मालूम है, प्रेमदर्शन जी, उस शहर की सीमा के डेढ़ सौ किलोमीटर तक के क्षेत्र में आदिवासियों का घुसना निषिद्ध है? बिरसा का शहर एशिया के सबसे बड़े कसीनो में बदल गया है? शंघाई और शेज़्वान से वहां लोग लड़कियां खरीदने आते हैं? एक कोलंबियन-जर्मन कंपनी प्रदेश के सारे जंगलों को काटकर वहां मिनरल- मॉल डेवलप कर रही है? आपके बचपन का शहर प्रेतनगरी हो गया है.. अब वहां ऐसा कुछ भी नहीं रहा जिसे अमर करने का आप मुग़ालता पालें, प्रेमदर्शन जी!..

बाबा के हाथ का पुलिंदा छूटकर कमरे में कागज़ उड़ाने लगा. भिंचा चेहरा ज़र्द हो गया, लगा थोड़ी देर में मुंह से फेन फेंकने लगेंगे. अविनाश ने उदासीन भाव से हूनान के चीनी और अल-बसरा के इराकी की ओर देखा. डील-डौल वाले दोनों पट्ठे जिम्‍मेदारी से भागते हुए आए और पलक झपकते में अविनाश के सामने से प्रेमदर्शन और उनका कालातीत साहित्‍य क्लियर कर दिया.

- देश बिक गया और ये अमरता का लैमनचूस चूसना चाहते हैं!- बाबा की ओर हिक़ारत से एक नज़र मार अविनाश ने आंखें फेर ली. इसके पहले कि उसका तनाव किसी और बिंदु पर फटे, मैंने अपना आवेदन पत्र खोल लिया. चिढ़कर कहा- मुझे पहचान रहे हो, या मैं भी किसी प्रेतनगरी के कंकाल में बदल गया हूं?

अविनाश बेतिया मेन बाज़ार के उपभोक्‍ताओं की रुचियों के स्‍तर वाले विज्ञापन की हंसी में हंसने लगा. प्रेमदर्शन, प्रेतनगरी सब भुल गए, और वह वापस हमेशा वाली नौंवी कक्षा के फुटबॉल कप्‍तान के जगमग बाल-सुलभ निश्‍छलता में चमकने लगा. हंसते हुए ही जवाब दिय- कैसी बात करते हैं, भाई साहब.. आपको नहीं पहचानेंगे?

चिढ़ में झुंझलाहट घोलकर मैंने जोड़ा- लेकिन मैं तुम्‍हें नहीं पहचान रहा हूं! देवानंद के जॉनी मेरा नाम में भी आईएस जौहर के तीन ही रूप थे मगर तुम्‍हारा तो यार, थाह ही नहीं लग रहा है? कभी दिल्‍ली यमुना पार के निम्‍न मध्‍यवर्गीय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हो जा रहे हो, कभी रवीश के सताये सर्वहारा तो कभी पिनोशे टाईप दमनकारी मशीनरी का सुरक्षा कवच! क्‍यों इतना टंटा खड़ा किये हो? क्‍या है तुम्‍हारी असल पहचान!..

अविनाश की हंसी उड़ गई. बीस वर्ष पहले मुक्‍ता एक असमिया पत्रकार के प्रेम में गौहाटी भाग गई थी उन दिनों अविनाश जैसे घायल और कटा-कटा रहता था, कुछ उन्‍हीं दिनों की एक्‍सप्रेसिव उदासी में उसने जवाब दिया- गरीब घर का बच्‍चा हूं, प्रमोद जी. कहां दमनकारी मशीनरी से जोड़ते हैं! सर्वहारा थे, वही रहेंगे..

- तो ये मैडल और बैज-सैज क्‍या है? बेल्‍ट में दो-दो पिस्‍तौल क्‍या है?- मैं एकदम-से उबलने लगा.

कंधे पर हाथ रखकर अविनाश ने मुझसे उठने का इशारा किया- बाहर चलिये, आपसे कुछ बात करनी है.

***

फैंसी इंडी पत्रिकाओं व टोक्‍यो के वेबसाइटों में भी मैंने ऐसी रंगीन तस्‍वीर नहीं देखी थी जिस तरह के रंगीन बार में लिफ्ट के चालीस माला दूरी को लांघकर अविनाश मुझे ले आया. काउंटर के पीछे, टेबलों के बीच हर किस्‍म की त्‍वचा और कटावों वाली जापानी लड़कियां घूम रही थी. झिलमिल रोशनी और किसी जैपनीज़ ब्‍लू बैंड के नशीले संगीत में यह कोई अन्‍य मौका होता तो मैं उन्‍माद में पागल होने लगता. अभी संज़ीदा होकर अपनी वासनाओं पर नियंत्रण रखने की चेष्‍टा की. लड़कियों को निरखने की जगह खुद को अविनाश की उदासी पढ़ने पर मजबूर किया. नीले फव्‍वारे से लगी स्‍कूली यूनीफॉर्म में एक तीस वर्षीय बाला लेकिन फिर भी गजब ढा रही थी, उससे सायोनारा कहने के लिए मैं मचलने लगता तभी हमारी मेज़ पर एक दूसरी गजब ढावक आ गई, मेज़ पर अविनाश की फ्रेंच वाईन और मेरी काली कॉफ़ी सजाने लगी. मेरे बिला वजह मुस्‍कराने को भंग कर अविनाश बताने लगे.

- पिस्‍तौल से गलत नतीजा मत निकालिये, भाई साहब.. ये बहुत बड़ा रैकेट है, मैं इस बड़ी मशीन का मामूली कल-पुर्जा भी नहीं!

- मगर यह सब रवीश के नाम पर क्‍यों हो रहा है? उस बेचारे को क्‍यों मोहरा बना रहे हैं? उसकी कहानी सुनकर मेरा तो मुंह ही खुला रह गया! जान कर वह तो मर जाएगा, यार? उसे बचाने के लिए कुछ कर नहीं सकते?- यही दिक्‍कत है मेरे साथ. अभी मिनट भर पहले हंस रहा था, अभी भावुक होकर लगभग रोने-रोने को होने लगा.

- आप एक तानाशाह की तरफदारी न करें. जैसी करतूतें रवीश करता रहा है जानकर मेरा भी मुंह पहले भक्‍क से खुला रह गया था!

- तुम असली रवीश को किसी और के साथ मिलाकर कन्‍फ्यूज़ कर रहे हो. उसकी फटीचर हालत मैंने देखी है, अविनाश. मुझसे अपनी सच्‍चाई कह रहा था इसीलिए तो मुझे जेल में डाला गया, उसे पता नहीं कहां ले के गए! उसका इस्‍तेमाल हो रहा है, अविनाश. कुछ बड़ी ताक़तें हैं जो उसके नाम के नीचे बड़े फ्रॉड खेल रही हैं!- जापानी लड़कियों वाली उत्‍तेजना रवीश के बहाने प्रकट होने लगी.

होंठों से वाईन का ग्‍लास हटाकर अविनाश वापस गहरी उदासी में डूब गया- आपने नहीं, एनडीटीवी की नौकरी मैंने की है! आपको मालूम है उस गौरवपूर्ण संस्‍था को मिट्टी करने में किस एक व्‍यक्ति का अकेले का जिम्‍मा है? आप जानते हैं उस उच्‍च संस्‍था का सबसे बड़ा शेयर होल्‍डर आज कहां है? प्रणय रॉय मैक्सिको की एक घटिया ऑयल रिफायनरी में मामूली क्‍लर्क की नौकरी कर रहे हैं और राधिका रॉय काठमांडू में एक व्‍यूटि पार्लर चलाती हैं. अपने नौ साल के बॉस दि बिग को अपने ड्राईवर का ड्राईवर बनानेवाला और प्रेमदर्शन को विक्षिप्‍तावस्‍था में पहुंचाने वाला और कोई नहीं आपका वही रवीश कुमार है! और आप उस घिनौने आदमी की तरफदारी कर रहे हैं?..

बिजली का करंट लगा हो मैं इस तरह सुन्‍न हो गया. यह कहानी ठीक-ठीक मेरे भेजे में साफ नहीं हुई तो प्रेमदर्शन की तरह जल्‍दी ही मैं भी विक्षिप्‍त होने को प्रस्‍तुत हो सकता था.

(जारी...)

6 comments:

  1. त्वचा के साम्राज्य पर एक कवि की टिप्पणी के लिए 'अनहद नाद' की ओर आएं .

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  2. दिलचस्प और मार्मिक..

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  3. pramod ji

    main elex cover kar raha hun. meri aisee ki taisee karne waalee rachnaa nahi parh paa raha hun. itnaa mat likjiye. varna elex ke baad blog parhne mein vyast ho jaaunga. ye main reliance ke web world se likh raha hun. Guru ka sapnaa humaare kaaam aa raha hai.

    ravish

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  4. Ab tak ki saari unes kisten padh chuki hun.. har baar sochti hun ki shayd ab saare rahsay khul jaayenge.. par har baar ek naya mod lete hain aap kahani mein.. sachmuch bhaut interesting ho rahi hai story.. shuru mein itni dilchasp nahi lagi lekin ab.. padhna hi padta hai jaanane ko ki aage kya hua..

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  5. साथ बनाये रखने का शुक्रिया, मान्‍या.. और बीच-बीच में टांग खींचने की हमारी आदत का बुरा न मानने का भी..

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  6. arre bura maanane ki koi baat nahi hai.. balki hansi aati hai jab aap mujhse gaane gawaate hain.. achcha hai.. asal zindagi mein to sur taal sambhale nahi.. aapke blog apr hi sahi.. aur fir aapne mujhe kaun sa taanashah bana diya hai..

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