Friday, March 30, 2007

बीस के वर्चुअल में रियल में वर्चुअल

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: बीस

लेकिन.. लेकिन?.. लेकिन, किंतु, परंतु करते सिर धुनने की इच्‍छा हो रही थी. धुनाई से अलग चारा भी नहीं था.

- यार, लेकिन ये कैसे हो सकता है? मेरे सामने बैठकर घरवाला पराठा-भिंडी की भुजिया खा रहा था! बॉस (दि बिग) को गालियां दे रहा था, गांव और अंड-बंड की याद में दुखी हो रहा था.. लाजपत नगर के पौने तीन सौ के शर्ट और मिक्‍स्‍ड कॉटन के घटिया पैंट में.. शर्तिया वह रवीश ही था.. ऐसी हालत में आदमी एक पायंट के बाद पागल हो सकता है, किसी चैनल को मिट्टी बनायेगा? उसकी औकात क्‍या है, यार?

ऊबा हुआ अविनाश इधर-उधर देखता रहा, जवाब नहीं दिया. शायद चेंज के लिए मेरी बजाय उसने एक गजब ढावक जापानी लड़की पर नज़र मारी, मुस्‍कराने लगा. उंगलियों से गजब ढावका को पास आने का इशारा किया. वह चेहरे से ही नहीं, कमर से भी भाव बनाती हुई आई. अविनाश के कंधे पर रेशमी बाल गिराकर उसकी गंदी फुसफुसाहटें सुनती रही. मैं जलकर खाक़ होता रहा. फिर वह उसी तरह से कमर हिलाऊ भाषा में मैसेजेस देती वापस लौट गई. ये मैसेजेस गुप्‍त नहीं थे, उसका लाभ मैं भी ले सकता था. ले सकता क्‍या ले रहा था. अपनी अधेड़ अमरीकन प्रेयसी के साथ बगल के टेबल पर बैठे एक इज़रायली बिजनेसमैन भी ले रहे थे. अविनाश ने एक ही घूंट में ग्‍लास की वाईन खत्‍म कर दी और मुस्‍कराकर जाने किन नज़रों से मुझे देखने लगा.

- आपको याद है डलहौजी में आप तीन-चार महीने रहे थे?.. एक लड़की थी आपके साथ.. सिरिंज, टेबलेट-सेबलेट यूज़ करती थी?..

कैसे याद नहीं होगा! रंजु सरकार.. मगर उसके टेबलेट्स नहीं उसकी देह की याद आई, और एक बार फिर तेजी से छाती में हूक उठी और अहसास हुआ कि जीवन में सुख कितना क्षणिक होता है!

सुख की सुलगती यादों पर पानी गिराता अविनाश ने अपनी बात पूरी की- तो आपके इन रवीश मियां को भी बीच-बीच में टेबलेट लेने का फितूर चढ़ता है. नशा करने के बाद इसी तरह बहकी-बहकी बातें करते हैं. पुराने कपड़े पहन लेते हैं, गांव, बाप और बॉस को याद करके कभी गालियां देते हैं, कभी रोने लगते हैं. पर्स से निकालकर वाईफ और बेटी वाली फोटो भी दिखाई होगी?

मैंने जवाब नहीं दिया, दुखी होकर मैं भी अविनाश को जाने किन नज़रों से देखता रहा. इस बार सन्‍न होने की सहूलियत भी नहीं हुई. फौजी गेटअप की बजाय अविनाश डॉक्‍टरी गाउन में होता तो ज़रूर उससे थोड़ी देर के लिए साइकॉबैबल करना चाहता. पूछता आधुनिक जीवन की इन अजीबो-गरीब बहकों का अंत कहां है. उपभोक्‍तावाद के सुख के चरम पर पहुंचकर मनुष्‍य सबसे निकृष्‍ट और कंगले प्राणी में कैसे बदल जाता है. क्‍या वापस अशिक्षित होकर और मकई की खेती करते हुए मनुष्‍यता सरलता के सुखी जीवन में लौट सकेगी? मगर अविनाश ने मनोविज्ञान नहीं प्रगति प्रकाशन, मॉस्‍को का पूंजी: एक परिचय पढ़ा है और वैसे भी मैं प्रकृति से दुखी और निराशावादी हूं. नतीजतन सवालों को बाहर लाने की बजाय करीने से तह करके उन्‍हें अंदर ही रखे रहा. बाहर, प्रकट में, दुखी दिखता रहा.

- तो रवीश का डबल-ट्रिपल नहीं था रवीश ही था?.. तुम मुझसे मज़ाक तो नहीं कर रहे, अविनाश? क्‍योंकि दोस्‍त, मैं इस फैंटेसी में भटक गया हूं.. स्‍वप्‍न-दु:स्‍वप्‍न का भेद समझ में नहीं आता!.. थोड़ी देर में मुक्‍ता आकर बतायेगी कि जिसे अविनाश समझकर बातें कर रहा था वह मेरे परिचय का व्‍यक्ति नहीं एम्‍सटरडम के किसी साइंटिस्‍ट का क्‍लोन है..!

अविनाश मुस्‍कराता रहा. बोला- मैंने सोचा था जापानी लड़कियों के प्रेसेंस में आपका एंटरटेनमेंट होगा लेकिन आप तो दुखी हो गए. आपको तरो-ताज़ा करने के लिए क्‍या किया जा सकता है, बताईये?

मैंने बुदबुदाकर कहा- सीधे-सादे परिवार का सीधा-सादा बच्‍चा था! एनडीटीवी में अच्‍छी-सी नौकरी थी, इतना सारा खुराफात फैलाने की क्‍या ज़रूरत थी उसे?.. और इंवेस्‍टमेंट के लिए इतना पैसा कहां से आया! सचमुच मेरी समझ से बाहर है..

- आपने ब्‍लॉग में वहां की फिल्‍मों के बारे में लिखा था लेकिन एक्‍चुअल में कभी गए नहीं.. चलिये, आपको घुमा लाते हैं.. दिल बहल जाएगा!

- दिल बहल जाएगा? जापानी लड़कियां बुरा मान जाएंगी, अविनाश.. जा कहां रहे हैं?

- चलिये, उठिये तो.. !

***

कोई हेलीकॉप्‍टर या रॉकेट की सवारी करके हम नहीं पहुंचे थे, हज़ारों किलोमीटर की यह दूरी पलक झपकते कैसे तय हुई थी इसका सही भेद तो अविनाश ही खोल सकता है, मगर आंखों के आगे जिस वास्‍तविक शहर का साक्षात कर रहा था वह अलबोर्ज़ पहाडियों के ढलान पर बसा फारस की खूबसुरत राजधानी तेहरान ही था!

हम मेहराबाद अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डे पर नहीं उतरे, न ही कहीं किसी ने हमसे हमारा पासपोर्ट या वीसा मांगा. मिलाद टॉवर और बोर्ज़-ए-सफेद की एक झलक लेकर हमारी टैक्‍सी पसदारान, पुनाक, जमरन, ज़न्‍नताबाद से होती पुराने तेहरान की ओर चल निकली. मैंने खुश होकर अविनाश की पीठ पर तीन-चार धौल जमाये- सही है, गुरु, एकदम सही जगह आए हैं!

यकीन नहीं हो रहा था मैं क्‍यारोस्‍तामी, घोबादी और मजीदी के शहर में था. उन्‍हीं सड़कों, कहवाघरों और बच्‍चों के बीच टहल रहा था जिसकी देखी-अदेखी अनगिन कल्‍पनाओं के चित्र मन के अलग-अलग खानों में करीने से टांक रखे थे. टैक्‍सीवाले बूढ़े ड्राईवर ने अविनाश या मुझसे यह नहीं पूछा अह्ल ए कोजा हस्तिद? (आप कहां से हो?), क्‍योंकि टैक्‍सी में हमारे चढ़ते ही उसे अंदाज़ हो गया होगा जभी उसने रेडियो पर मुकेश का छोड़ गए बालम ऑन कर दिया. गाने से लापरवाह अविनाश ने मेरे छूटे हुए सवाल का अब इतमिनान से जवाब देना चालू किया.

- आपके साथ दिक्‍कत है, प्रमोद जी.. आपको लगता है हिंदी में सब राजेंद्र यादव और पंकज बिष्‍ट हैं. दो हज़ार-चार हज़ार के सर्कुलेशन से ज्‍यादा के झंझट में नहीं पड़ना चाहते! मगर हिंदी की सीमा समझकर सबने हथ्रियार डाल दिया हो ऐसा नहीं है.. खास तौर पर बिहारियों ने. आप समझते हैं मंत्री पद पाकर एक रामविलास पासवान की महत्‍वाकांक्षा आज संतुष्‍ट हो जाएगी? छपरा और सहरसा के गुंडे चार करोड़ की फिरौती पाकर चुपा जाएंगे? वो दिन गए, महाराज. आज हिंसा और अनाचार में रवीश कुमार कोई अकेले थोड़ी हैं!

मैंने जफर पनाही के ‘ऑफसाईड’ में खुले चेहरे वाली लड़कियां देखी थी लेकिन फिर भी तेहरान की सड़कों पर बिना बुरके की लड़कियों को स्‍वीकारने में ताजुब्‍ब हो रहा था. उसी ताजुब्‍ब में अविनाश से सवाल किया.
- लेकिन इस तरह के एक मामूली बिहारी पर कोई इतना इन्‍वेस्‍ट क्‍यों करेगा?

टैक्‍सीवाले से मुकेश का गाना बंद करवाकर अविनाश ने जवाब दिया- आपको दूसरी गलतफहमियों के साथ रवीश के मामूली होने की भी कुछ ज्‍यादा ही गलतफहमी है. वह मामूली नहीं है; एनडीटीवी में एसएमएस से पहले जिन दिनों चिट्रठयां आया करती थी उनको छांटने-बांचने का काम रवीश बाबू के ही जिम्‍मे था, लेकिन खाली चिट्ठी नहीं पढ़ रहे थे रवीश बाबू. हेगेल, अंतोनियो ग्राम्‍शी, एडवर्ड सईद सब घोंट रहे थे. नौकरी के ही दौरान वूहान विश्‍वविद्यालय से कानून की डिग्री ली. वेन जियाबाओ के किसी नज़दीकी को सेट करके एक अरब शेख फंसाया, इनके ब्‍लॉग पर मूल जर्मन में रिल्‍के पर की गई इनकी टिप्‍पणियां पढ़कर किसी जर्मन बिधवा का सिर घूम गया. वह इनको खोजती हुई अबू धाबी पहुंची. जनाब ने उस पर डोरे डालकर बेचारी के करोड़ों का चूना लगाया. रवीश के बड़े और जटिल फ़रेबी तंत्र का यह दो प्रतिशत भी नहीं, और इस समूचे प्रसंग का ऑफिशियल-अनऑफिशियल कोई रिकॉर्ड उपलब्‍ध नहीं क्‍योंकि जो कोई भी इस कहानी में किरदार या साक्षी था उनमें अब एक भी जीवित नहीं बचा! रवीश के ऑपरेशंस की पेचिदगियां आपकी-हमारी कल्‍पनाओं से बहुत आगे की उड़ान उड़ चुकी हैं, भाई साहब.. पिछले दिनों दानापुर में इनके एक भाई ने पांचवी में इनके फेल होने का रिज़ल्‍ट एक स्‍थानीय अख़बार में प्रकाशित करवा दिया. एक हफ्ते के भीतर न वह अख़बार बचा न बेचारा भाई. आप जितना कम जानें उतना ही अच्‍छा रहेगा, क्‍योंकि रवीश की सच्‍चाईयां ऐसा कुंआ है जिसमें झांकने पर सिर्फ बेहोशी के चक्‍कर आते हैं, कोई उजाला नहीं दिखता!

ट्रैफिक सिगनल पर टैक्‍सी के रुकते ही हमारी खिड़की पर बुरके में खिला एक हसीन चेहरा उपस्थित हुआ. नीली आंखों के बारे में सुना था मगर देख पहली बार रहा था. हसीना ने मुस्‍कराकर फ्रेंच में सवाल किया- क्‍या आप मेरी‍ फिल्‍म में अभिनय करेंगे?..

(जारी...)

2 comments:

  1. chaliye ab saare rahsay bhi khul rahe hain.. ravish kumaar ke saamrajay sthapanaa ke..

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  2. गज़ब का लग रहा है आपका वर्चुअल संसार तो. देखते हैं आगे-आगे होता है क्या.

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