Monday, April 2, 2007

जूते मारने का अप्रगतिशील समय शुरू हो गया है

हाथ में जूता लिये रवीश मारने को उद्धत हो रहे थे, भाई लोगों ने रोक लिया. रोकने के सबके कारण रहे होंगे. हम अपना स्‍टैंड ले नहीं पा रहे थे सो पटाये रह गए. आखिर विलेज- बेस्‍ड मुखिया और बेरोज़गार पप्‍पुओं की बात थी. बाद में पछताते रहे कि क्‍यों ऐन मौके रवीश को फोन करके बताने का मौका चूक गए कि नहीं, गुरु, सही है, अरमान पूरे कर ही डालो. ऐसे पप्‍पु और पप्‍पुओं के मुखिया नहीं होते तो शायद आज देश की तस्‍वीर ज़रा अलहदा होती. गंध तो रहता ही लेकिन शायद इतने बदबूदार भभके नहीं उठ रहे होते.

वैसे अपने यहां जूता-जूता मारने के लिए हम गांव की तरफ का ही रुख करते रहे हैं. दीगर बात है कि मुखिया और पप्‍पुओं पर नहीं जूते का प्रयोग एक वर्ग-विशेष के लिए होता रहा है. साहित्‍य में, और साहित्‍य के बाहर समाज में भी. आम तौर पर जूता वही पाते हैं जो वैसे भी जीवन में जूता खा-खाकर अघाये हुए हैं. बहुत पहले निराला जी ने चतुरी चमार लिखकर तब के साहित्‍य और समाज के मुख पर तमाचा नहीं जूता ही मारा था. बाकी लोग संभल-संभलकर और तहजीब से जूते के इस्‍तेमाल में विश्‍वास करते रहे. परंपरा की लीक से हटने से बचते रहे. हाथ में जूता लिये खेत के मेंड़ पर खड़े रहते कि बहुत गर्मी चढ़ी है, ससुर, आज बुधई और बटई का चाम दुरुस्‍त कर ही डालें. बाबू साहेब, मालिक और सरकार के बारे में भी ऐसे ही नेक़ ख़याल पालने में संकोच होता था. तब लोग जूता निकाल कर छिपा देते और गांव नंगे पैर टहल आते. बाबू साहब के बहाने बेचारा जूता बच जाता.

गांव से बाहर बुधई और बटई रिक्‍शावाले और पाकेटमार का भेस बदलकर घूम रहे हैं. मगर उनको पहचानने में लोगों को देर नहीं लगती. साईकिल रिक्‍शावाले या बस के पाकेटमार की गलती पर विचार-विनिमय करके जूता पैर से निकालकर हाथ में करने की ज़रूरत नहीं महसूस होती, जूता स्‍वत:स्‍फूर्त तरीके से चलने लगता है. बहुत सारे बटई तो थाने के भय से जूते को ही अपना प्राण अर्पित करके मुक्‍त हो लेते हैं. जूता धन्‍य बना रहता है.

मगर प्रदेशों में चुनावी हेर-फेर नहीं समूची प्रक्रिया ही प्रहसन में बदल गई हो, कोई खबरी चैनल किसी निजी खानदान की शादी के सार्वजनिक प्रबंधन के काम में हाथ बंटा रहा हो, देश की बजटीय राशि की असली रबड़ी पार्लामेंट में बैठे गुंडे खा रहे हों और देश के हिस्‍से चार रुपये अस्‍सी पैसे का चिल्‍लर गिरा रहे हों तो हम जूता नहीं निकालते, विचार-विनिमय करने लगते हैं. लोकतंत्र में अहिंसा के महत्‍व वाला पाठ याद करने लगते हैं. उन आदिवासियों को भला-बुरा कहने लगते हैं जो अपने विस्‍थापन पर मेधा पाटकर की तरह यहां-वहां धूप में अनशन करने की बजाय तीर-कमान और बंदूक का रास्‍ता खोजने लगे हैं. विस्‍थापकों को झुंड में जूता-दल बनाकर घेरने की बजाय तब हवाई चप्‍पल डालकर क्रिकेट के बारे में दुखी होने का ख्‍याल हमें ज्‍यादा प्रीतिकर लगने लगता है. हम कर्मों से पालतू और विचारों में प्रगतिशील हो जाते हैं.

रघुराज जी का चार रुपये अस्‍सी पैसे वाला पोस्‍ट एक बार फिर पढिये. गौर से पढिये. और उसके जिम्‍मेदार लोगों को जूता न भी मारें, कम-स-कम उसका एक पोस्‍टर निकालकर अपने पनवाड़ी की गुमटी पर ज़रूर चिपका दें. बहुत वक्‍त निकल गया. जूता बचाकर रखने की प्रगतिशीलता बहुत हुई, अब उसे सामाजिक उपयोग में बरतने का अप्रगतिशील दौर शुरू हो जाना चाहिये.

3 comments:

  1. joota ek varg vishesh par hi uthata hai. ameeron ne bhee in gharibon ka maal harhpaa hai magar maine kabhi joote maarne ki baat nahi ki. sirf laanaten bheejeen. kahin main vargiya bhaawnaaon ka shikaar to nahi ho gaya. lekin maine niche parhe rahne waale is hathiyaar ko isliye uthaane ki baat kahi ki shaayad ye bhookha gharib jaag jaaye aur apne netaon ka collar pakarh len. hataashaa mein ummiden inhi sab sambodhanon se baahar aatee hain.

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  2. बंधुवर रवीश कुमार,
    हमाशा में लानतों से आप उम्‍मीद ला पाते होंगे, मेरे अपने लिए वह इसी तरह गुस्‍से के लबर-सबर में व्‍यक्‍त होती है. आपके सफाई देने जैसी कोई बात नहीं है.

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  3. आपने सही राह दिखायी है। पर गुरु हिम्‍मत बहुत चाहिए। हमारी तो सोच कर ही हवा निकल जाती है। मुलायम प्रगतिशीलता की राह कितनी आरामदेह है। आप क्‍यों गरम दल में भेजना चाहते हैं?

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