Monday, March 19, 2007

कमेंट क में कोडेड संदेश

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: दस

मूल खबर का अपने लिए मैंने हिंदी में अनुवाद किया: ‘’शहर से गरीबों का खदेडा जाना पूर्ववत जारी है. शहर के बाहर इन लावारिस जन समूहों को अस्‍थाई तौर पर बडे तारबंद अहातों व शरणार्थी शिविरों में तबतक के लिए डाल दिया गया है जबतक उनके लिए किसी वैकल्पिक ठिकाने की व्‍यवस्‍था नहीं हो जाती. शिविरों के भीतर शांति व व्‍यवस्‍था बनाये रखने की कोशिश में कल मध्‍याह्न पुलिस को पुन: बल प्रयोग करना पडा व गोलीबारी में सत्‍ताईस लोगों की मृत्‍यु हुई व छप्‍पन लोग घायल हुए. उपद्रवियों पर शीघ्र नियंत्रण न पाया गया तो आशंका है यह आग अन्‍य शहरों में भी फैल सकती है. अंतर्राष्‍ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर बहस व शर्मिंदगी का विषय बन सकती है. विश्‍वसनीय सूत्रों के अनुसार पूर्वी प्रांत के एक अन्‍य शहर से ऐसे ही कंगले उपद्रवियों के जत्‍थे ने देश की सीमा लांघकर पडोसी राज्‍य बांग्‍लादेश में प्रवेश की चेष्‍टा की लेकिन समय रहते वहां की सरकार चेत गई और उपद्रवियों को अपनी सीमा में घुसने से पहले ही रोक लिया. मगर बीबीसी के रिपोर्टर हैरल्‍ड डिंकंस के अनुसार लोग बांगलादेश में राजनीतिक शरण के लिए बलवा करने लगे नतीजतन स्‍थानीय फौजी टुकडी को फायरिंग के लिए मजबूर होना पडा. गुत्‍थमगुत्‍था में सात उपद्रवियों के मारे जाने की सूचना है. ला लिबरात्श्‍यों की विशेष संवाददाता अंतोनेल्‍ला बुकारेल्‍ली कहती हैं कि शहरों के विस्‍थापितों के यहां-वहां भटकाव की इस नई सामाजिक बीमारी का तत्‍काल समाधान न खोजा गया तो नेपाल और भूटान जैसे अपेक्षाकृत शांत राष्‍ट्र भी दिनों दिन बढ रहे अशांत मुल्‍कों की श्रेणी में आ सकते हैं. उपद्रव पर नियंत्रण के लिए रवीश कुमार के निर्देशन में गठित बीस नौकरशाहों की एक उच्‍चस्‍तरीय कमेटी हथियारों के आयात के संबंध में एक चीनी उच्‍चस्‍तरीय कमेटी से बातचीत के लिए आज ही बीजिंग रवाना हो रही है...’’

फौजियों में किसी की निगाह गई होगी. एक ने लपक कर मेरे हाथ की कटिंग छीन ली. बाकी दोनों ने ठेलकर मुझे दीवार से लगा दिया और एक 47 या जो कोई भी वह खिलौनेनुमा अधुनातम बंदूक थी मेरी ओर तानकर खडे हो गए. मैं जानता था वे मेरी जान नहीं लेंगे. सिंपली इसीलिए कि हुक्‍म नहीं रहा होगा. वे भी जानते थे कि मैं जानता होऊंगा. हम कुछेक पल हास्‍यास्‍पद तनाव में तने खडे रहे फिर अपनी-अपनी सीटों पर लौट गए. बटुए में मंगेतर की फोटो वाला फौजी ने प्रकटत: कहा नहीं लेकिन तकलीफ भरी नज़रों से मुझे ताकता रहा. नज़रों को पढनेवाले वैज्ञानिक जो लिप्‍यांतरण करते उसको उनके न होने पर भी मैंने अपने लिए कर लिया. नज़रों का मैसेज था तुम्‍हारी वजह से आज मेरी नौकरी जा सकती थी. मैंने भी कुछ कहा नहीं, नज़रों से जवाब रिटर्न किया- मैं अपने किये के लिए शर्मिंदा हूं लेकिन तुम्‍हारी नौकरी से ज्‍यादा मुझे अपनी जान की चिंता है. ब्‍लॉग की चिंता में उलझकर लगता है मुझसे भारी भूल हुई.

कुपे में मेरे साथ प्रियंकर होते तो मैं उनसे अपनी भूल पर रघुवीर सहायनुमा एक कविता लिखवाना चाहता और मोहल्‍ले में बीस वर्ष पहले अमिताभ वाली बहस स्‍थगित करवा के अपनी कविता पर बहस चलवाता जिसके लिए प्रियंकर जिरह करते कि वह मेरी नहीं उनकी कविता है, मैं कहता वह सिर्फ साधन रहे हैं कविता मूलत: मेरी ही है. अविनाश हमें टोककर कहता कि मोहल्‍ले में कविता संबंधी बहसों का कोई उपयोग नहीं क्‍योंकि तरुण, विमल, कमल जैसे ढेरों पाठक ऐसे विषयों पर अपनी राय बनाने से संकोच करते हैं और इससे मोहल्‍ले को लोकप्रिय बनाने के उसके अभियान पर प्रतिकूल असर पडेगा. प्रियंकर खीझकर कोई कवितानुमा प्रतिक्रिया करते, मैं उल्‍लसित होकर कहता इस नई कविता का भी असली रचयिता मैं ही हूं. नीलिमा कहती हम उसके समूचे शोध को गड्ड-मड्ड किये दे रहे हैं. मैं आह भरकर कहता... क्‍या कहता. कुछ नहीं कहता. बीस वर्ष पहले के संसार को अभी के यथार्थ से गड्ड-मड्ड करके मैं नीलिमा का शोध नहीं अपनी समझ गड्ड-मड्ड कर रहा था. समय आ गया था कि मैं अपने ब्‍लॉग को विस्‍मृत करके सिर्फ उस जीवन को बचाने की सोचूं जो रवीश कुमार के बडे आर्थिक-राजनीतिक खेल में एक अदद मोहरा बनकर उलझ गई थी. ऊपर से अभय जैसे सि‍रफिरों की बचकानी शरारतें उसे नये संकटों में डाल रही थीं. बीस वर्ष पहले भी लोगों के जीवन में विस्‍थापन था, शहरों के अवांछित शहर सीमा से बाहर खदेडे जाते थे. नर्मदा के ग्रामीणों की रक्षा में मेधा पाटेकर के सारे बाल पक गए थे मेरे कानों पर जूं नहीं रेंगी थी फिर कुछ प्रायोजित तस्‍वीरों व खबरों से मैं अपना जीवन संकट में क्‍यों डाल रहा हूं? हां, खिडकी के बाहर जो था वह असल नहीं हो सकता! एंटरटेनमेंट पार्क के ठीक बगल किसी मवेशीनुमा मनुष्‍यी बाडे का कैसा औचित्‍य ? बीजिंग टाईम व बीजिंग न्‍यूज़वीक के किसी खुफिया पत्रकार ने वह फोटो उतार ली तो मैगजिन के पृष्‍टों पर उसका अटपटापन कितना असहज व एम्‍बैरेसिंग लगेगा इतनी स्‍थूल कल्‍पना तो रवीश को भी होगी. बाडे की वह दुनिया शुद्धत: प्रायोजित है. हो सकता है रोबेर्तो बेन्निनी ने ‘लाइफ इज़ ब्‍यूटिफुल- पार्ट टू’ का सेट लगाया हो!

होंठों में हंफ्री बोगार्ट के अंदाज़ में ब्‍लैक ड्रैगन का एक सिगरेट अटकाकर मैंने दुबारा किसी हसीना के रसभरे होंठ चूमे और आईने में खुद को देखकर इंप्रेस होने के लिए उठकर कुपे से लगे बाथरुम में घुस गया. अंदर बाथरुम में आईना था मगर शीशे के ऊपर क्रांति का पंप्‍लेट चिपका हुआ था. कविता की शक्‍ल दिये संदेश के लिखवैया अभय तिवारी थे. फिर मेरे अंदर झुरझुरी दौड गई. ठीक बगल में डेढ हाथ की दूरी पर क्रांति का बम धरा हुआ था और फौजी मंगेतर की तस्‍वीर टटोल रहे थे! इससे पहले कि फौजियों की निगाह जाये और वे उसे आग के हवाले कर दें मैंने जल्‍दी-जल्‍दी क्रांतिकारी मज़मून को आत्‍मा में उतारने की कोशिश की. मैं दीक्षित होता तो संभवत: शब्‍दों के पीछे छिपे परिवर्तन के असल मर्म तक पहुंच पाता मगर फिलहाल तो वह कोई उल-जलूल पहेली ही लग रही थी. आप भी देखिये, शायद आपकी उन्‍नत चेतना के कुछ पल्‍ले पडे:

टप टप पट पट/ टपर टपर पटर पटर/ पर पर टर टर/रर रर रर रर/ टैप टैप पैट पैट/ टिप टिप पिट पिट/ पिट पिट पिट्ट/ टिप टिप टिप्प/ पिटी पिटी टिपी टिपी/ टिणी टिणी पिणी पिणी/ पिट्ट पिट्ट पिट्टणी/ टिप्प टिप्प टिप्पणी/ टिप्पणी/ टिप पणी/ टि पपणी/ टिपप णी/ टिप्पणी

इससे अलग हाशिये पर खुले हाथ अबूझ लिपी में कुछ सूत्र घसीटे गए थे. कोने में अभय तिवारी का हस्‍ताक्षर था. यह कैसी घोषणा है, क्रांति का किस तरह का मैसेज है? उज़बकों की तरह मैं आईने में देखता रहा. तभी बाहर दस्‍तक हुई. नगा रेजीमेंट वाले होंगे सोचकर चौकन्‍ना हुआ लेकिन इतने में दीवार की फांक खुली और एक के बाद एक दो नकाबपोश फुदक कर अंदर चले आये. एक ने फुसफुसाकर कहा- चलिये, हम आपको लेने आये हैं.

घबराहट में कांपता मैंने सवाल किया- कौन हो तुमलोग? अभय के दल-बल में हो?

नकाबपोशों ने आपस में एक-दूसरे को देखा, धीमे से बोले इसके बारे में उन्‍हें बताने का हुक्‍म नहीं है!

(जारी...)

1 comment:

  1. rocking sir ..mazaa a jata hai aapko padh kar ..bahut kuch seekhne ko milta hai.

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