Thursday, March 8, 2007

सिंगुर का सबक

विकास की आंधी: तीन

तो विकास का हव्‍वा बनाकर पिछले कुछ अर्से से इस देश के अलग-अलग हिस्‍सों में सरकारें एक खास तरह का आचरण क्‍यों कर रही हैं? दक्षिणपंथियों की नीयत तो जगजाहिर है उन्‍हें रहने दीजिये, आईये पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार की कारस्‍तानियों का जायजा लें. कलकत्‍ते से 45 किलोमीटर की दूरी पर बसा सिंगुर नाम का गांव पहली दफा खबरों में पिछले वर्ष मई में आया. लगातार सात बार विजयी होकर सरकार में लौटे वाम मोर्चे के मुख्‍यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने ताज़ा-ताज़ा ऐलान किया कि राज्‍य के औद्योगिक पिछडेपन के सुधार के लिए वह लोगों को सिंगुर में टाटा मोटर्स की नई फैक्‍ट्री भेंट में देने जा रहे हैं. टाटा सस्‍ती जन-कारों का निर्माण करेगी और हज़ारों लोग रोज़गार पायेंगे. बंगाल में औद्योगिकीकरण की एक नई शुरुआत के लिहाज़ से मध्‍यवर्गीय मानस में इस घोषणा का उत्‍साहवर्द्धक स्‍वागत हुआ. लेकिन खुद सिंगुर में जल्‍दी ही गडबडियां शुरु हो गईं. रैली, विज्ञप्तियों और विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरु हो गया.

सरकार मुआवजा देकर गांववालों की ज़मीन टाटा को सौंपने की जिद पर अडी हुई थी और गांववाले थे कि ज़मीन क्लियर नहीं कर रहे थे. 25 सितंबर को कृषि जामी रक्‍खा कमिटी की छतरी के नीचे विविध किस्‍म की सांगठनिक गोलबंदियों का जमाव मुआवजे के वितरण में गडबडी के सवाल पर ब्‍लॉक डेवलपमेंट ऑफिस के आगे प्रदर्शन करने इकट्ठा हुआ. जवाब में पुलिस की जो लाठियां चलीं उसमें राजकुमार भूल नामक एक भूमिहीन परिवार का चौबीस वर्षीय बेटा पहले तो चोटों से बेदम होकर पोखरे के पास गिर पडा और फिर जान से हाथ धो बैठा. 27 औरतों समेत 72 कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई. बहुतों पर आईपीसी की धारा 307 (हत्‍या की कोशिश) डाल दी गई. बाद में लोगों के गुस्‍से पर नियंत्रण रखने के लिए सरकार ने समूचे सिंगुर क्षेत्र में धारा 144 लागू कर दिया. 2 दिसंबर. पुलिस की मदद से सरकार ने कब्जियाये ज़मीन की फेंसिंग शुरु कर दी. विरोध में लोग आगे आये और इस बार की झडप में साठ गांववालों की गिरफ्तारी हुई, इनमें 18 औरते थीं. इसके बाद से सिंगुर लगातार सुगबुगाहट की ज़द में रहा है. और वाममोर्चे की सरकार अपने जिद पर अडिग है कि टाटा मोटर की छोटी कारें कहीं बनेंगी तो वह सिंगुर में ही बनेंगी.

सवाल उठता है कलकत्‍ता के पडोस के एक छोटे गांव में स्‍थानीय निवासियों और सरकार की फंसान को हम इतना खींच क्‍यों रहे हैं. आखिर सरकार मुआवजा देकर ही तो गांववालों से उनकी ज़मीन ले रही है. यहीं कैच है. क्‍योंकि सिंगुर न ‘जायज मुआवजों’ की कहानी है न ममता बैनर्जियों के उकसावे का किस्‍सा. सिंगुर वह सुलगता हुआ किस्‍सा है- एक बढती व गहरी बीमारी का लक्षण है- जिसके क्षेत्रीय नमूनों की संख्‍या देश के अलग-अलग कोनों में ठीक-ठाक मात्रा में अब दिखना शुरु हो गए हैं. सिंगुर अकेला नहीं है. रायगड, कलिंगनगर, ददरी, कलाहांडी, काकीनाडा, बीजापुर, चंद्रपुर, औरंगाबाद, हरिपुर, बछेरा, चौरिंगा, तिरुपति, मंड- सब जगह सिंगुर की ही कहानी का दुहराव है. विकास या बडे उद्योग के नाम पर ज़मीन का कब्‍जा. स्‍थानीय लोगों की निकासी, विस्‍थापन. अपर्याप्‍त मुआवजा. राय-मशविरा या लोगों की मंजूरी के प्रति स्‍पष्‍ट बेरुखी. पुलिस कारर्वाई और राज्‍य का दमन. लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को ताक पर रख देनेवाला नज़रिया. पूरे दंभी आचरण का लब्‍बो लुआब ये कि अगर आप ऊंचे ओहदे पर और ऊंची जीवन शैली के मालिक नहीं और आपको अंग्रेजी बोलनी नहीं आती तो भारतीय विकास के इस नये उठान पर आपको अपनी राय रखने का कोई हक नहीं. आप कानूनन हमारे साथ खडे हों ऐसे भारतीय भी नहीं!

सिंगुर का उदाहरण इसलिए भी दिलचस्‍प है क्‍योंकि यहां आमने-सामने झगडे में उलझ गई सभी इकाईयों की पहचान अपेक्षाकृत साफ-सुथरी रही है. टाटा हमेशा से साफ-सुथरे औद्योगिक घराने की तरह देखा गया है, वाममोर्चा भी मुंह खोलने पर जनहित की ही बात करता है, और बंगाल अपने में शिक्षित व सजग प्रदेश रहा है. सिंगुर की फंसान इसका अच्‍छा नमूना पेश करती है कि भारत की नई अर्थव्‍यवस्‍था आनेवाले समयों में कैसे-कैसे झमेले अपने पिटारे से बाहर करनेवाली है. इक्‍तीस वर्षीय बलिष्‍ट देह का श्रीकांत कोली गोपालनगर में पांच बीघे ज़मीन का मालिक था. वह ज़मीन टाटा प्रोजेक्‍ट के चुने क्षेत्र का हिस्‍सा हुई और अब बाडे के घेरे में है. आत्‍मनिर्भर किसान से अब वह रोज़ाना की मजूरी पर आश्रित लेबर हो गया है, लेकिन श्रीकांत मुआवजा लेने से अभी भी इंकार कर रहा है. आसपास सब्‍जी के हरे-भरे टुकडे की तरफ इशारा करता वह पूरी हिकारत से टाटा को अपनी गालियों से नवाजता है- कि कोरस खरीदने के पीछे वे 1,50,000 करोड खर्च सकते थे, और यहां सरकारी दल-बल से और सब्सिडी पर हम गरीबों की ज़मीन हडपना चाहते हैं. क्‍या टाटा इतने बडे भिखारी हैं! सिंगुर की ही सांतना मलिक तमकते हुए सवाल दागती है, यह ज़मीन तो ही हमारा सबकुछ है. इसे बेचकर अमीरों के घर में नौकरानी का काम करुं? क्‍यों...

मज़ा यह है कि यह सब जनहित के नाम पर हो रहा है. किस ‘जन’ का हित है इसमें? इसपर हम अगली दफा लौटेंगे.

(जारी...)

4 comments:

  1. आपकी समीक्षा "ऑल द किंग्‍स मेन की चर्चा की थी कि कैसे सत्‍ता एक भले-भोले आदमी को बर्बर और निरंकुश जानवर में बदल डालती है."

    सत्ता हर किसी को बदल देती है.

    बहुत स्पर्शी लेख है.

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  2. पिछले दिनों सिंगुर लगातार चर्चा में रहा लेकिन किसी भी तक़्लीफ़ देने वाली खबर की उपेक्षा करने की उदासीनता बरतने की अपनी आदत से भटकना ना हो सका..यहाँ पर इतने सरल शब्दों में पूरे मुआमले की समझ पाकर अच्छा लगा..

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  3. सिंगूर यथास्थिति के ख़िलाफ प्रतिरोध की एक आवाज़ भी तो है. जिसको दबाया तो जा सकता है ख़त्म नहीं किया जा सकता.
    सच है कि मजदूर-किसानों की बात करने वाले वाम मोर्च के मुंह से अब वहीं बातें निकलने लगी हैं जो टाटा सोचता है.

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  4. एक सिंगूर का दुःख क्या! अब तो समूचे देश का ही सिंगूरीकरण हो रहा है. सिंगूर का दुःख इसलिये ज्यादा नुकीला और पैना है क्योंकि यहां यह सब कुछ मजदूरों-किसानों की यानी सर्वहारा की पार्टी के हाथों हो रहा है.

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