Friday, March 23, 2007

राग्रा बीईंग कंसिडर्ड अगेंस्‍ट नाअग्रा

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: चौदह

हाथ उठाकर सेनापति को चुप कराने के बाद रघुराज टहलते हुए जन के करीब आ गए. एक-एक कर चेहरों का अंदाज़ लेने लगे मानो ‘अनटचेबल्‍स’ का कप्‍पोने अपने गद्दार की पहचान कर रहा हो. सभा में एक ठंडी लहर दौड़ गई. सेनापति भी दो कदम पीछे चले गए. मुंह पर पट्टी चढ़ी थी लेकिन नज़रों से मुस्‍कराकर मैं जापानी लड़कियों को रिझाने लगा.

शायद सिर्फ असर पैदा करने की गरज से रघुराज ने जेब से पिस्‍टल निकालकर हाथों में ले लिया, खिलौने की तरह खेलने लगे. सभा में एकदम सन्‍नाटा छा गया. मान्‍या हितेश भाई के कंधे से लगकर रोने लगी. रघुराज ने बोलना जारी रखा- रवीश रिसोर्सेस इंक ने अगर नाअग्रा के पोर्टल को सीज़ कर लिया है तो इसलिए नहीं कि आप कोई क्रांतिकारी साहित्‍य छाप रहे थे और हमें आपसे कोई भय हो रहा था. नहीं. नाअग्रा हमने बंद किया तो इसलिए किया क्‍योंकि हमारी नज़र में उसका कोई मतलब नहीं था...

- आप ऐसा नहीं कह सकते, सर!... पीछे से चीखने वाले ये शशि सिंह थे. इन्‍हें खबर नहीं थी मुन्‍ना भाई खेलने का यहां नतीजा क्‍या हो सकता था. उसी क्षण खबर हो गई.

समुराइयों के वेश में दो भारी देहवाले बाबू शशि सिंह पर कूदे और टांगकर कमरे के बाहर लिये गए. प्रतिरोध में किसी ने चूं तक नहीं किया.

इसके बाद आप और हम ही नहीं शशि सिंह के परिवार के लोग भी शशि सिंह की आवाज़ नहीं सुनेंगे. लिट्टी चोखा की दुनिया शांत और उदास हो जाएगी. ऐसा ही कुछ शोक संदेश ब्‍लॉग पर चढ़ाऊंगा, अगर ब्‍लॉग की वापसी हुई तो. फिलहाल पिनड्रॉप साइलेंस में रघुराज की हुई.

- एब्‍सोल्‍यूट नॉनसेंस. दैट्स व्‍हॉट आई वुड कॉल द कंटेंट सर्कुलेटिंग ऑन नाअग्रा. पर्सनली आई अम एगेंस्‍ट एनी काइंड ऑव सेंसरशिप, बट आई डोंट सी एनी प्‍वॉयंट डिफेंडिंग नाअग्रा. बिकॉज़ इट्स सिंपली जस्‍ट बुलशिट.

थोड़ी देर तक हिंदुस्‍तानी में सुर बांधते रहने के बाद रघुराज एकदम-से क्‍लासिकी चायनीज़ में चले गए. लेकिन असर दोनों का लगभग बराबर था. सभा सन्‍न थी. बीस वर्ष पहले यहां अविनाश होता तो इस शोकज़दा हतप्रभता का भी मोहल्‍ले में इस्‍तेमाल करने की तरकीब भिड़ा लेता. गनीमत है इस मुश्किल घड़ी में हम सभी उससे मुक्‍त थे. रघुराज फिर फैज़ाबादी सुरीली हिंदुस्‍तानी में लौट गए- नाअग्रा को भूल जाईये आपलोग. वह पोर्टल अपना जीवन जी चुका और अब इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए फ्रीज़ हो चुका है. आपकी शादी-व्‍याह की खबरों, गली-मोहल्‍ले की बहसों की मुझे चिंता नहीं. आपको है तो उसका एक उपाय है हमारे पास.

अनामदास समेत बाकी सबका चेहरा ताड़ने के बाद दुष्‍ट ने बात पूरी की- रवीश रिसोर्सेस इंक के नाम पर नाअग्रा नहीं लेकिन राग्रा हम शुरु कर सकते हैं. आप सभी को आपका ब्‍लॉग दुबारा वापस मिल सकता है.

इतने में बम छूटा. एक दो नहीं चार, या शायद पांच. भारी धमाके. खिड़की से लगी हवा लेती वीनस की नंगई के परखचे उड़ गए. भगदड़ मच गई. लोग एक-दूसरे के ऊपर गिर रहे थे. दोनों जापानी लड़कियों में कोई भी मेरे ऊपर आकर नहीं गिरी. दो-तीन धमाके और हुए. ये बिल्डिंग के बाहरी हिस्‍से में हो रहे थे. रघुराज का कहीं कोई पता नहीं था. सिगरेट छोड़ने की नौटंकी से लोकप्रिय होने के सस्‍ते खेल के बाद यह पहला मौका था जब मैं अभय से जेन्‍यूनली नफरत कर रहा था. धुंआ छंटते ही फर्श पर चार-पांच लाशों के चिथड़े दिखे. मैंने राहत की सांस ली क्‍योंकि उनमें जापानी लड़की कोई भी नहीं थी. जापानी लड़की दिखी मगर वह बेतहाशा भागती हुई मेरी ओर आ रही थी. मैंने उसे समूचे लाड़ से अपनी ओर आने दिया. मगर पास वह प्‍यार करने नहीं आई थी. जो करने आई थी उसने किया. मैं जापानी जानता होता तो भी बात करने की हालत में नहीं था. कंधे पर पंजे की चोट खाकर इतनी चेतना थी कि मुझे किसी ने कंधे पर लादा है, और धुंए और लोगों के शोर-तमाशे के बीच से गुजारा जा रहा हूं. तीखे स्‍वर में साइरन लगातार बजता रहा. उसके बाद आंख लग गई.

***

आंख खुली तो वह रवीश की दुनिया का पहचाना लैंडस्‍केप नहीं था. हवा भी एसी कंट्रोल्‍ड नहीं प्राकृतिक लग रही थी. पड़ोस में झरने का स्‍वर और अगरबत्‍ती की महक थी. हाथ फिराकर देखा तो नीचे इटैलियन मार्बल या ऑस्‍ट्रेलियन टर्फ नहीं सचमुच की मिट्टी थी. ये क्‍या माजरा है? मैं कहां आ गया हूं? क्‍या फिर किसी तकनीकी खेल ने मुझे बीस वर्ष पहले के किसी रमणीक तमिलनाडु के गांव में फेंक दिया है? लेकिन कोई तमिलियन लड़की तो मुझ पर जान लुटा नहीं रही थी. जापानी लड़कियों पर मैं लुटा रहा था. वो अपने को बचा रही थीं.

मैं घबराकर उठ गया. झटका नंबर टू. बिस्‍तरा फ्रेंच मेक की बजाय खालिस फैजाबादी प्रॉडक्‍ट था. मतलब मैं खटिये पर लेटा हुआ था और पाटी के नज़दीक कटोरी में सरसों का तेल रखा हुआ था. कमरे की दीवार गोबर से लिपी थी और एक ओर लाल कपड़े में लिपटे ग्रंथ के ऊपर बांसूरी सजी थी. फोन-सोन या अन्‍य एलेकट्रिकल गजट कहीं कुछ भी नहीं. ये किस तरह का मायाजाल है? किसी गहरे सुरंग में उतार कर मैं किसी पराये मुल्‍क में तो नहीं भेज दिया गय? शायद सच्‍चाई नहीं यह कोई स्‍वप्‍न हो. और तरकीब लगाकर मैं इस दु:स्‍वप्‍न से बाहर निकल आऊं. मैं चिंता कर रहा था क्‍या हो सकती है वह तरकीब कि झटका नंबर थ्री की एंट्री हुई.

गोबर पुते संसार में रघुराज चले आए. मुंह में चुरुट और थ्री पीस सूट नहीं देह पर इस दफा धोती-कुर्ता था. और आंखों में आनंद का नशा मानो एकदम कृष्‍णमूर्ति के प्रवचन से लौट रहे हों. मुझको देखकर किंचित असमंजस में गए फिर हंसते हुए सहज हो गए. बांसूरी उठाकर किसी धुन का रियाज़ करने लगे. मानो प्रैक्टिस बीच में छोड़कर कृष्‍णमूर्ति जी को सुनने गए थे अब लौटकर वहीं से शुरु कर रहे हों. मुझे बड़ा गुस्‍सा आ रहा था लेकिन हैरानी भी हो रही थी. ये आदमी किस तरह का फ्रॉड खेल रहा है? द्वंद्वात्‍मक भौतिकवाद का स्‍टडी सर्किल चलाने के बाद चिरकुट बहुरुपियेगिरी के लेवल तक गिर आया है! आस-पास स्‍कॉच की बोतल होती तो मैं ऐसे ही नीट चार-छै घूंट हलक के नीचे उतार लेता. मगर इस अगरबत्‍ती लोक में स्‍कॉच का होना थोड़ा अस्‍वाभाविक लग रहा था. अपना होना भी लग रहा था. तभी रघुराज जी लाल किताब (माओवाली नहीं) पर बांसूरी रखकर खड़े हो गए, आनंद और नशे वाला एक्‍सप्रेशन कंटिन्‍यू किया और ठेठ फैजाबादी में बोले- बंधुवर, लगता है पहले भी कहीं हमारी मुलाकात हुई है!

(जारी...)

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