Sunday, March 11, 2007

कस्‍मे वादे प्‍यार वफ़ा के वादे हैं वादों का क्‍या

अबतक मोर्चे पर पार्टी वर्कर की पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी किस्‍त आपने पढी. नीचे पेश है आगे का बयान...

मुबारक के पीछे-पीछे एक लौंडा चाय के दो गिलास लिये आया. एक गिलास मुबारक ने अपने हाथ में रखी, दूसरी गोपाल जी को सौंप बीडी की खोज में अंदर लौट गया. कोई और मौका रहता तो गोपाल जी उत्‍साह से चाय का स्‍वाद लेते मगर आज उत्‍साह एकदम सूख-सा गया. गिलास बाजू में रख दी और चिंतित होने का पोज़ ही नहीं लिये, वाकई चिंतित हो भी गए. कल शाम तक मशीन पर कुंजी ही चढी रहनेवाली है तो हमारा पर्चा कहां से छापेगा ये लोग. गुप्‍ता जी के आने तक बैठे भी रहें तो क्‍या फ़र्क पडनेवाला है. आदमी झिकझिक करेगा कि मौका पर पैसा तो देते नहीं उल्‍टे बेमतलब का मुसीबत लेकर आते हैं.

आज के समय में पास में पैसा न होना भी एक तरह का अभिशाप ही है. हाथ का सब सुभीतापन छिन जाता है. लाचार हो जाता है आदमी. पार्टी फंड में खनखन गोपाल होता तो नकुल जी की मजाल होती उनका अनादर करने की? नहीं होती. मोहन भी जिम्‍मेदार होकर उनकी बात सुनता. गमला इज़्ज़त से समाज में आना-जाना करती. यह सोचने के साथ गोपाल जी ने दिमाग में गमला को इज़्ज़त से समाज में आने-जाने की एक छवि भी देख ली और ज्‍यादा मायूस हो गए.

अंदर से ट्रांजिस्‍टर पर टूटी-उडी मन्‍ना डे की आवाज़ में ‘उपकार’ वाला गाना बज रहा था. कस्‍मे-वादे प्‍यार वफ़ा के वादे हैं सब वादों का क्‍या. किसी ने गोपाल जी से कभी कोई वादा नहीं किया था फिर भी अभी ऐसा ही लगा मानो वह कदम-कदम पर छले गए हों. नियति ने, इतिहास, भूगोल- अर्थ सबने उन्‍हें ठगा है. एक लंगड बीडी सुलगा के सुखी हो लेता है. वह हाथ में आज़ादी का मजमून लिये भी सुखी नहीं हो पाते. हर जगह पैसे की इतनी हाय-हाय लगी हुई है, उनके जैसे थोडे लोग कहां से सामाजिक धारा मोड लेंगे? पार्टी का प्रभाव और साधन हैं कितने? फिर हर छठवें जिले में नकुल जी जैसा एक पार्टी तोडक एलिमेंट घुसा हुआ है! नहीं, वह क्षोभ और नाराज़गी में नहीं कह रहे हैं. समाज और पार्टी की चिंता है इसलिए सच्‍चाई खोल रहे हैं. कडवा है इसलिए सच्‍चाई को छिपा के पार्टी का हित थोडी सधेगा! मन में ऐसे ऊंचे विचार घुमड रहे हैं जानकर गोपाल जी को संतोष हुआ. पर्चा अटक भी गया तो क्‍या हुआ वह नकुल जी का दिलेरी से सामना करेंगे. यथार्थ और वस्‍तुस्थिति से उनका सही-सही परिचय करायेंगे और इसका फ़ैसला जनता पर छोड देंगे कि वह सही लाईन वाले के पक्ष में खडी हो! सोचते हुए गोपाल जी अभी मन में व्‍यवस्थित हुए भी नहीं थे कि नई आशंकायें उनको डगमग करने लगीं. किस जनता की समझ पर वह इतना भावुक हो रहे हैं? चंद्रिका सही लाईन का मतलब समझेगा, कि बिसेसर और दीपचंद महतो? सब नकुल जी का आगा चुपा जायेगा और वह मज़ाक और भद्दगी का पात्र बनेंगे. और वही सब क्‍यों, खुद उनकी जबान कितना खुलेगी वह जानते नहीं हैं? ऊपर से उनको नीचा, पोल्टिकली फेलियर दिखाने में नकुल जी को विशेष सुख मिलता है. उनको तो बहाना चाहिये बस. बीच-बीच में लेनिन-माओ का कुछ उल्‍टा-सीधा साटके वहीं पार्टी दफ्तर में गोपाल जी का अनालिसिस शुरु कर देंगे!

गोपाल जी उठते-उठते फिर बैठ गए. बिना पर्चा का मामला सेट किये आज उनका घर जाना उचित नहीं होगा. गुप्‍ता जी का चिरौरी करना पडे, उनके गोड गिरना पडे सब करेंगे लेकिन पर्चा फरियाये बिना आज यहां से उठेंगे नहीं. गुप्‍ता जी चार गाली सुना दें वह मंजूर है उनको लेकिन नकुल जी के मुंह का कोई, किसी तरह का कुवचन नहीं. इतने में नीचे गुप्‍ता जी का बजाज का खडखड हुआ. सीनियर लेबर हैं दीनदयाल उनको गुप्‍ता जी नीचे से आवाज़ दिये, फिर भागे-भागे खुदे हांफते हुए ऊपर चले आये. गोपाल जी बेचैनी से हाथ जोडे एकदम उठ खडे हुए. उनके नमस्‍ते का जवाब दिये बिना गुप्‍ता जी दीनदयाल पर बरसने लगे. तनातनी का यह माहौल गोपाल जी को अपने लिए शुभ संकेत नहीं लगा.

बाकी का आगे...

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