बीस वर्ष बाद ब्लॉग और रवीश कुमार: सतरह
रवीश उठकर खड़ा हो गया. मेरी बात का जवाब देने की बजाय टहलकर गोदाम के शेल्व्स पर पड़े भारी पैकेटों का मुआयना करने लगा. हाथ के इशारे से मुझे अपनी तरफ बुलाया मानो मैं ताजमहल देखने आया कोई विदेशी टुरिस्ट हूं और वह लोकल राजू गाईड.
- ये वेयर हाऊस देख रहे हैं, भाई साहब? मालूम है मार्केट में कितनी कीमत है?.. फिल्मवाला मामला होता तो मैं भी अमिताभ की तरह कहता इस शहर में आया तो कुछ नहीं था मेरे पास और आज शहर मेरे पैर चूमती है.. सब मेरा है!.. कहकर रवीश हंसने लगा.
- कॉलेज में ये सब खूब किया करता था. लड़कियां पसंद करती थीं. कहती रवीश, वन्स मोर. डू दैट अर्लियर बिट. कल्पनाओं में हमने बहुत सारे शहरों से पैर चुमवाये हैं, सर. ढेरों वेयर हाऊस अक्वायर किया है... हक़ीकत में आकर उलझ जाते. सामनेवाला समझ जाता घसियारे हैं जबर्जस्ती अमिताभ वाले रोल के लिए जिद कर रहे हैं.
- ये सब तुम्हारा नहीं है?, मैंने टोका.
रवीश ने प्लास्टिक वाली कुर्सी खींची. फैलकर बैठ गया. पैर उठाकर टेबल पर फेंक दी. शायद सिगरेट होता तो उसे होंठों के बीच फंसाकर फिर से दीवार वाला कोई डायलॉग बोलता. कहने लगा- बाहर सेक्युरिटी की ड्यूटी पर एक बुड्ढा बैठता है. उसकी जेब में बीड़ी का एक बंडल डालकर लंच के लिए यहां आते हैं. बीड़ी का बंडल उसका रेट नहीं है. यहां आने देकर मुझपर अहसान करता है. इसलिए नहीं करता कि हमारे गांव का है. गांव-टोले की प्रतिबद्धताएं खत्म हो गईं, सर. छोटे बेटे को चीन भेजने के लिए इसने गांव की ज़मीन बेच दी थी. पैसे पूरे नहीं पड़ रहे थे. अंत में बाबूजी ने उबारा था. उसी का अहसान एक बीड़ी का बंडल लेकर मुझे अंदर आने देने से करता है. हालांकि चीन जाकर बेटा फिर वापस नहीं लौटा. और न ही हर महीने कैलेंडर देखकर नियम से बाप के अकाउंट में युआन का एक्सचेंज डालता है. बुड्ढे ने दिल पे नहीं लिया है. बाप का दिल आखिर बाप का दिल होता है. सामाजिक पतन में हम कितना भी ऊंचा हाई जंप ले लें बाप फिर भी बेटों को माफ़ करते हुए ही दिखेंगे. भारतीय समाज है, सर. खालिस गांव के संस्कार हैं.
- तुम कहां बहक रहे हो, यार! तुमसे सीधा सवाल कर रहा हूं जवाब देने की बजाय तुम कभी गांव टहल रहे हो, कभी चीन!...
रवीश बुरा मान गया. टेबल से पैर उतारकर गंभीरता से मेरी ओर देखने लगा- एक बात बताईये, सर. हम पहले कितनी दफा मिले हैं? साथ-साथ डिनर किया है? ढाबे पर बोटी नोंची है? ब्लैक में टिकट खरीदकर फिल्म देखी है साथ?...
मैं बेवकूफों की तरह उसे देखता रहा. बात समझ में नहीं आ रही थी. आखिर कहना क्या चाहता है? रवीश को समझ आ रहा था वह क्या कहना चाहता है.
- तब से आप यार-यार किये जा रहे हैं! चार दफे हमारा लिखा पढ़ लिया, हमने हंसकर दो बात कर ली तो आपके यार हो गए? ऐसे ही आप लाइफ में यार बनाते रहे हैं, सर?.. हमारी बात का बुरा मत मानियेगा. लेकिन हर चीज़ का एक तरीका होता है. तहजीब होती है. सामने वाले को हमेशा जोकर मत समझिये. वह भी हाड़-मांस का आदमी है. कहीं से आया है. शिक्षा ली है. जीवन का अनुभव होगा उसके पास. उसका अंदाज़ है आपको? कभी थाह लेते हैं आप लोग? पलक झपकते यार बोल दिया! किस बात के यार? कहां के यार?.. आप तो नाराज़ हो गए. आप हल्ला मचायें तो ठीक हमने मुंह खोल दिया तो आपकी संवेदना को ठेस लग गई! क्या करे गांव का आदमी आप जवाब दीजिये, सर! शहर आना बंद कर दें? समझ लें कि उसकी जगह टूटी मेंड़ों और खड़खड़ाती बसों में है बड़े शहरों में जाकर वह परिष्कृत संवेदनाओं को सिर्फ ठेस पहुंचाने में ही योगदान कर सकता है? यही कन्वे कर रहे हैं आप?..
मैं थक रहा था. यह आदमी सहज मानसिक अवस्था में नहीं. इससे सिंपल बातचीत होने से रही. फिर? गोद में हाथ डाले इसके सामान्य होने का इंतज़ार करुं? या इसकी पत्नी को फोन मिलाकर पता करुं कि ऐसे मौकों पर रवीश को डील करने का तरीका क्या है. वह जानती होगी? इसका बॉस जानता होगा? मैं क्यों बहक रहा हूं? रवीश या किसी की भी असामान्यता मेरा कंसर्न नहीं. मुझे अपना ब्लॉग चाहिये, बस! एंड ऑव द स्टोरी. वही मैंने उससे कहा भी.
- मेरा ब्लॉग लौटवा दीजिये, महाराज. फिर आप मोतिहारी में रहें कि चीन जायें आपका टंटा है हमको क्या करना है...
रवीश एकदम-से बुरा मानकर खड़ा हो गया. शायद फिर किसी अमिताभ टाईप डेलिवरी के मोह में आ गया था. मुक्ति मिली कि तभी अपने विमल लाल टहलते हुए चले आए. मानो अंदर सिनेमा हॉल में गाना शुरु हुआ हो और साहब सिगरेट पीने बाहर निकल आये. बाहर आकर सिगरेट नहीं दांत से गुटका वाला पाउच काट रहे थे.
- आप भी प्रमोद जी... आदमी दो घड़ी चैन से सांस ले रहा है और आप आकर खोल दिये पिटारा! चलिये, हटिये, यार.
विमल जी रुपक में बोल रहे थे. क्योंकि मैं रास्ते में नहीं था जो हटता. जहां था वहीं रहा. विमल लाल ज़रुर रवीश के बाजू जाकर खड़े हो गए. पाउच का तम्बाकु थोड़ा रवीश की हथेली पर गिराया, कुछ अपने मसूड़े में दाबा. रवीश प्रसन्न होकर चहकने लगे.
विमल मुझको और बीच-बीच में रवीश को घूरता रहा, फिर बेचैन होकर उसने जेब से इंटरकॉम का फोन बाहर किया. चीखकर पता नहीं किस ज़बान में इंस्ट्रक्शन दिये. तब तक रवीश भी बेचैन होने लगे. दाल में काला का केस नहीं यह काली दाल वाला मामला लग रहा था.
रवीश एकदम-से विमल के कंधे पर अपना भारी हाथ रखकर झूलते हुए बोले- ये आपने हमें क्या खिलाया है, विमल जी?
विमल मियां ने जवाब नहीं रवीश के चेहरे पर खींचकर घूंसा जड़ा. रवीश बाबू कटे पेड़ की तरह ढेर हो गए.
मैं कूदकर विमल पर हमला करने वाला था मगर उसकी नौबत नहीं आई. वेयर हाऊस के दरवाज़े से ढेरों फौजी भागते हुए अंदर आ रहे थे.
(जारी...)
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