Tuesday, March 20, 2007

सेज़: आर्थिक सुधार या सहूलियत का कारोबार?

अपने पिछले पोस्‍ट में हमने बिज़नेस स्‍टैंडर्ड के नितिन देसाई की सेज़ संबंधी आशंकाओं पर लिखे लेख का लिंक दिया था. कुछ बंधु होंगे जो संभवत: टिप्‍पणी के अंग्रेजी में होने की वजह से उससे परहेज़ करें. तो उनकी सहूलियत के लिए साथी अभय तिवारी नितिन के लेख का निचोड़ यहां हिंदी में प्रस्‍तुत कर रहे हैं:



सेज़ बाज़ार अनुकूल नहीं व्यापार अनुकूल हैं, और स्वस्थ प्रतियोगिता की आर्थिक नीति के खिलाफ़ काम करते हैं.

क्या फ़र्क है बाज़ार अनुकूल और व्यापार अनुकूल में? जैसे बाज़ार और व्यापार में फ़र्क है..बाज़ार अनुकूल सरकार और व्यापार अनुकूल सरकार में भी फ़र्क है. बाज़ार अनुकूल सरकार सभी क्षेत्रों, सभी व्यापारियों के लिये एक समतल मैदान और खेल के नियम मुहैय्या कराने का काम करती है जबकि व्यापार अनुकूल सरकार कुछ चुनिंदा व्यापारियों के साथ मिल कर चुने हुए काम करती है.

सेज़ की नीति साफ़ तौर पर बड़े घरानों के हितों की पूर्ति ही कर रही है..जो इस केक का पीस पाने के लिये गिरे पड़ रहे हैं. और वही सफल हो रहे हैं जो आर्थिक सुधारों के पहले कोटा लाइसेंस राज में धंधा करने और नेताओं को लुभाने और लपटाने के गुर और चालबाज़ियां भूले नहीं हैं.

तो क्या है सेज़ में जो इनकी लार इतनी टपक रही है:

ऐसी नीतियां जो देती हैं;

करों में भारी छूट ..

विदेशों से पैसा उठाने में ज़्यादा रियायत..

फिर पर्यावरण और श्रम क़ानूनों को ताक़ पर रखकर मनमानी करने की आज़ादी..

इस तरह के डेसपेरेट मेज़र्स का क्या मतलब है.. ऐसा लग रहा है कि किसी मरते हुये शाकाहारी को रेगिस्तान में ऊँट खाने के लिये तमाम किस्म के लालच दिये जा रहे हों.. गौर तलब है कि ये नीतियां बाज़ार की कमज़ोरी का नतीजा नहीं हैं. ये सरकार की कमज़ोरी का नतीजा हैं. ये नीतियां इस सोच से उपजी हैं कि सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास साथ-साथ नहीं हो सकता. और इस समझ पर पहुँचने के बाद सरकार सामाजिक न्याय की अवधारणओं को धता बताते हुये..फ़ैसला किस के हक़ मे कर रही है.. आर्थिक विकास के हक़ में नहीं.. चंद व्यापारिक घरानों के हक़ में..

अगर सरकार इन नीतियों को सही समझती है तो लागू करे इन्हे देश भर में.. और अगर सेज़ सिर्फ़ क़ानूनों को बाईपास करने का एक प्रपंच है तो देर सवेर जनता इनके खिलाफ़ सर उठायेगी.. आज किसान अपनी ज़मीन के लिये कहीं लड़ रहे हैं, कहीं रो रहे हैं.. कल को पर्यावरण और मज़दूर सम्बंधी मामलों में भी गहरे आन्दोलन खड़े हो सकते हैं..

सेज़ हर स्तर पर भेद भाव को बढ़ायेगा.. घरेलू उत्पादकों के बीच.. और सेज़ के अपने अन्दर भी उत्पादकों के बीच.. हर केस में नियम और नीतियां बदलेंगी.. और ये सब राजनेताओं और नौकरशाहों और उनके दलालों का एक घिनौना गठजोड़ बन के रह जायेगा.. और भारतीय बाज़ार का 1991 के पहले वाले समय में पतन हो जायेगा..

लब्बे लुबाब ये है कि आज हमें एक ऐसी आर्थिक नीति की ज़रूरत है जो पूरे अर्थतंत्र में प्रतियोगिता, नवीनता, और विकास को बढ़ावा दे. एक ऐसी शहरी नीति जो सब लोगों के जेबों के मुताबिक घर और दूसरी सुविधायें प्रदान कर सके. एक ऐसी सामाजिक नीति जो सभी इलाक़ो और वर्गों के लिये बराबर के अवसर प्रदान कर सके. और एक ऐसी राजनैतिक नीति जो उदार पूँजीवाद के हौवे से खौफ़ खाये लोगो और सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों के समर्थकों के बीच पुल का काम कर सके.. मगर सेज़ ऐसी किसी नीति के दायरों मे तो नहीं ही आता बल्कि उलटा ऐसी नीतियों के खिलाफ़ काम करता हुआ नज़र आता है..

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