Sunday, March 18, 2007

क्रांति से तक्‍त-विरत स्‍वप्‍नाभिमुखी नौजवान

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: आठ

कंधे तक बालों के घूमते छल्‍ले, चारेक दिनों की छूटी दाढी, लाल आंखें. यह क्‍या हाल कर रखा है लडके ने? सिर्फ मैं ही विरुप नहीं हुआ था, आस-पास की दुनिया भी उबड-खाबडपने के किसी अपहचाने लय में उतर रही थी. तेजी से बंद दरवाज़े में लगी शीशे की खिडकी से बाहर का एक नजारा लेने के बाद बेचैनी से भूपेन मेरे नज़दीक आकर बैठ गया. दबी आवाज़ में फुसफुसाकर बोला मानो कोई गहरा राज़ खोलने जा रहा हो- जानता तो आपके सवाल का जवाब देता. लेकिन मैं नहीं जानता ऑरिजनल हूं या डबल. हमारे समय में अब कुछ ऑरिजनल बचा भी है क्‍या. एक बच्‍चे की हंसी के सिवा सब सजावटी है. कमॉडिटी है. ऑरिजनल कुछ भी नहीं है. फिर मैं कैसे हो जाऊं, कहां से हो जाऊं!

जैसे अपना कहना खुद उसे भारी लग रहा हो, थकान में दोनों हाथ उठाकर भूपेन ने चेहरा ढंक लिया, आंखें पोंछी, और फिर गहरी उदासी से मेरी ओर देखता मुस्‍कराने लगा, मालूम नहीं आपको याद है या नहीं. बीस वर्ष पहले अनामदास ने अपने चिट्ठे में अभय तिवारी के सवाल के जवाब में लिखा था कि वे न आस्तिक हैं न नास्तिक. वे भ्रमित हैं. मैं भी अपनी मौलिकता को लेकर भ्रमित हूं. चाहता हूं ऑरिजनल होना लेकिन नहीं जानता आज के समय में रोज़गार व सामाजिकता के दूसरे तकाज़ों को जीते हुए ऑरिजनल होना कैसे संभव है! आप जानते हों तो रास्‍ता दिखायें. ताउम्र आपकी चाकरी बजाऊंगा!

दरवाज़ा ठेलकर कमरे में अचानक एक फौजी अफसर दाखिल हुआ. हाथ के वॉकी-टाकीनुमा एलेक्‍ट्रोनिक गजेट से रंगीन किरणें छूट रही थी. बौखलाहट में बंदे ने सवाल किया, और कौन है यहां कमरे में?...

भूपेन गायब था. मेरी जान में जान आई. सस्‍ती शेरो-शायरी वाला यह क्षण नहीं था मगर मुंह से यही पंक्ति निकली- मैं हूं और मेरी तनहाई है. (फिर मंगलेश डबराल व श्रीकांत वर्मा की कुछ फूहड नकल में...) आत्‍मा के फफूंद हैं, समाज की कुछ क्षीण-सी छायायें हैं, काली रातों में किले की बुर्ज़ पर दौडता एक पागल घुडसवार है जो मेरी ही प्रतिछाया है. मेरा वह रुप जो मेरे ही अंदर दबा-घुटा रहा, उसके बाहर आने के सभी रास्‍ते मैंने बंद किये रखे... फौजी ने हाथ झटककर मुझे चुप करा दिया, सरसरी तौर पर कमरे के आर-पार नज़रें मारता रंगीन गजेट अपने रौबिले लिबास के रौबिले ऊपरी जेब में रखी और खट्-खट् बूट बजाता दरवाज़ा बजाता बाहर निकल गया. उसी क्रम में भूपेन बाहर निकल आया. और उसके साथ-साथ उसकी गहरी पहाडनुमा उदासी.

इसके पहले कि वह बात कहीं और ले जाकर उलझा दे, मैंने सवाल किया- तुम्‍हारे लक्षण मुझे चिंतित कर रहे हैं, भूपेन. कहीं तुम भी अभय के साथ क्रांतिकारी दस्‍ते में तो नहीं लग गए? सुनकर भूपेन और उदास हो गया. मानो मैंने क्रांतिकारी दस्‍ते में उसे भेजकर कोई गाली दी हो. प्रागैतिहासिक हलद्वानी खादी भंडार के झोले में हाथ डालकर उसने कुछ बाहर किया. क्‍या वह नवचेतना, लखनऊ, ट्वेंटी ईयर्स लेटर का छपा लाल किताब का अपडेटेड संस्‍करण निकालकर मुझे डराना चाहता था? मगर भूपेन के छिपाये हाथ के पीछे माओ नहीं ओल्‍ड मॉंक था. नीट कडवे घूंट से हलक तर करने के बाद उसने मेरी बात का जवाब दिया- क्‍यों मुझे क्रांति-श्रांति में उलझाते हैं, भाई साब. क्‍या होगा क्रांति से. इस देश में कुछ नहीं होगा. सभी सभाओं, मंचों, जुलूसों में भागीदारी की, नारे लगाये, भूखों रहकर पंप्‍लेट बांटे और इसी नतीजे पर आया हूं कि क्रांति इस देश का भला नहीं करेगी. थोडे राजनीतिक सुधार हो जायें, शायद बहुतों के लिए बेरोजगारी से किसी हद तक सुरक्षा हो जाये लेकिन जबतक हमारे अंतर्लोक को दीप्‍त करने का काम क्रांतिकारी राजनीतिक दल अपने हाथों नहीं लेंगे, जबतक वे हमारे सपनों के पारदर्शी परतों की पहचान नहीं करेंगे, इस देश में कोई भी क्रांति अधूरी ही नहीं, खोखली होगी. और मैं भूपेन भट्टराय सिंह उस राजनीतिक तमाशे में अपनी आहुति देने नहीं जाऊंगा!

चिढकर मैंने उसे रोका- तुमसे लेक्‍चर देने को नहीं कहा था. बस इतना पूछ रहा हूं अभय के तोड-फोड में तुम भी उसके साथ हो या नहीं!

भूपेन ने धीमे-धीमे पूरी बोतल खत्‍म कर दी, क्षोभ में बुदबुदाता उठ खडा हुआ- आप जैसे लोगों की यही दिक्‍कत है, भाई साब. आप अच्‍छी-अच्‍छी किताबें पढकर अच्‍छी-अच्‍छी बातें करते हैं. मगर मनुष्‍य का आंतरिक संसार, उसकी जटिल बुनावट, सपनों से उसके गहरे जुडाव के गंभीर विवेचना में आप नहीं जाते. राजनीतिक परिस्थिति की समीक्षा करके मर्म की असल बात हमेशा टाल जाते हैं. आप ऑब्‍सक्‍युरैंटिस्‍ट हैं, भाई साब. और किसी अभय-बिभय के साथ नहीं हूं मैं. अपने राजनीतिक आग्रहों के साथ हूं. कितना ऑरिजनल है किसी दिन जान पाया, और तबतक मैं और आप जिंदा रहे, तो बताने ज़रुर आऊंगा!

इतना कहकर भूपेन तेजी से कमरे से बाहर निकल गया. जैसे मंच पर अपना पार्ट प्‍ले करने के बाद वहां ठहरे रहने की अब उसे ज़रुरत नहीं थी. मैं जो वॉर्ड के अकेलेपन में ज़रुरतमंद था उसके इस तरह निकल जाने का बुरा मान गया. और वह करने लगा जो बीस वर्ष पहले करता तब भी शर्म महसूस होती. टीवी के टूटे तार के साथ छेडछाड करता उसे वापस चालू करने के जतन करने लगा. बावजूद मेरे घटिया तकनीकी ज्ञान के थोडी देर में वह चालू हो भी गई. मैं आराम से डोलता बिस्‍तरे तक लौटा मानो इस वॉर्ड में महज़ तफरीह के लिये आया होऊं और उपलब्‍ध सहूलियतों का हर स्‍तर पर पूरा आनंद उठाने की मंशा रखता होऊं. ऐसी ही उल्‍लसित अपेक्षाओं से तकिये पर कुहनी टेके मैंने टीवी सेट की ओर अलसाई नज़रें फेंक दी.

टीवी स्‍क्रीन पर फौजियों की एक टुकडी मार्च करती फाईटर प्‍लेन में सवार हो रही थी. फ्रेम के तनाव से लगता था फिर कोई नया युद्ध शुरु होनेवाला है. एक आईसीयू वॉर्ड में इस तरह की खबरें प्रसारित करके रवीश मरीजों की मदद नहीं कर रहा था. उन्‍हें नये तनाव दे रहा था. मिलने पर मैं यह सब डिस्‍कस करुंगा उससे. और वह अपनी गलती एक्‍सेप्‍ट करेगा. तभी बाहर कॉरीडॉर में लोगों के भागने की आवाज़ें आईं. हो सकता है लोग नहीं सिर्फ भूपेन भागा हो. फिर एकदम-से गोलियों की टक्-टक्-टक्-टडाक्-ठांय-धांय और धुंए की घुटन फैल गई. किसी के चीखने की आवाज़. कोई गिरा. गोलियों का नया दौर. इसके बाद रोशनी धीमी हुई और फिर एकदम से अंधेरा छा गया. बिजली की सप्‍लाई काट दी गई हो जैसे.

(जारी...)

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