Tuesday, March 20, 2007

फर्श पर ख़ून और नाअग्रा का विश्‍वासघात

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: बारह

रवीश की गुलामी स्‍वीकार करके किस तरह उन्‍होंने मेरे विश्‍वासों को कुचल डाला है, मेरी आत्‍मा को तहस-नहस कर दिया है- नज़रों से रघुराज को कुछ इसी स्‍केल के मैसेजेस कन्‍वे कर रहा था. वो रिसीव नहीं कर रहे थे. चल्‍ले-बल्‍लों को अपना मैसेज कन्‍वे करने में लगे हुए थे कि उनके दस बिलियन युआन के तेल करने से वे कैसे सुखी नहीं हैं. मगर दिन भर मुस्‍कराने की एक्टिंग करते और दस दफे डिज़ाइनर कपड़ों की बदली करते लौंडे संभवत: सुख और दु:ख की गंभीर परिभाषा भूल चुके थे. उन्‍हें लग रहा था लताड़ की नॉर्मल रुटिन है, थोड़ी देर में झमेले की कोई नई कड़ी खुलेगी और उनका कसूर भुला दिया जाएगा. मैं भी लगभग यही मानने लगा था जब रघुराज ने इतमिनान से जेब में हाथ डाला और एक छोटा पिस्‍टल बाहर किया. और इसके पहले कि कोई कुछ समझता गोली दाग दी और जो चल्‍ला सबसे ज्‍यादा चहक रहा था स्‍नानागार के खूबसुरत फर्श पर ढेर हो गया. रघुराज का यह रुप देखकर मैं बिना गोली खाये ढेर होने की अवस्‍था में था. नहीं हो रहा था तो सिर्फ इसका पुनर्साक्षात्‍कार करने के लिए कि जिंदगी बड़ी ज़ालिम चीज़ है. रघुराज ने बर्फ़ के से ठंडे चायनीज़ में कहा- टेक द बास्‍टर्ड अवे!

क्‍वेंटिन तारंतिनो की फिल्‍मों में जिस मात्रा में सेट पर लाल रंग का इस्‍तेमाल होता है कुछ उतनी ही मात्रा में यहां असल खून का इस्‍तेमाल हो गया था. और उतनी ही फुर्ती से सेट पर से गायब भी कर दिया गया. रघुराज हमेशा के नफीस, साफ-सुथरे रहे हैं. रवीश के सेटअप में भी उनकी बाहरी सुघड़ता को आंच नहीं आई थी. मुंह में गुटके की जुगाली के साथ विमल लौटे तो साफ-सफाई के नज़ारे को इस उदासीन भाव से देखा मानो फर्श पर लाश नहीं पान की पीक देखी हो. फुर्ती से साहब यानी रघुराज को प्रसन्‍न करने के काम माने क्‍लीनिंग ऑपरेशन में जुट गए. रघुराज ने उन्‍हीं बर्फीली नज़रों से मुझे भी देखा, लापरवाही से बोले- व्‍हाट्स यूअर केस?

चीनी में बात करके यह व्‍यक्ति चालीस वर्षों की हमारी मित्रता का क्‍यों मज़ाक बना रहा है? बखूबी जानते हुए कि चीनी जब विश्‍वविद्यालय के गलियारों और पोस्‍ट ग्रेजुएट लड़कियों की आंखों तक में फैशनेबल था और बात-बात में लोग लाल किताब और लु शून का जिक्र छेड़ देते थे तब भी मैंने चीनी में दिलचस्‍पी नहीं दिखाई थी फिर भी यह मेरे सामने चायनीज़ फेंक रहा है! क्‍यों फेंक रहा है. इसीलिए कि व्‍यवस्थित तरीके से मेरे राजनीतिक आग्रहों को चिन्हित करके मेरे खिलाफ़ केस तैयार कर सके? और विमल लाल कह रहे थे अपनी नौकरी की पैरवी करुं! तत्‍काल मुझे भी तारंतिनो के सेट के किसी बेमतलब लाश में न बदल दें इतनी पैरवी करने की हिम्‍मत भी बची नहीं रह गई थी. अम्‍मां की पहली बरसी पर बाबूजी रुंआसे होकर बोले थे दुनिया में कोई साथ नहीं देता. अधिक से अधिक रघुराज को भी मैं इतना भर ही कह पाता. पता नहीं इस तरह की भावुकता वह अब कितना सुन या समझ पाते. विशालकाय स्‍नानागार में अपनी उपस्थिति मुझे भारी षड्यंत्र लग रही थी. यह महज़ संयोग नहीं है कि मेरे जैसा बेमतलब आदमी इस तरह की बेशकीमती इटैलियन संगमरमर के फर्श पर खड़ा है. इसीलिए खड़ा है कि साफ-सफाई और पानी की इमिडियेट एक्‍सेसिबलिटी है. और खड़े होने की जगह जब गिरा दिया जाऊं तो मुझको भी ठिकाने लगाने में वक्‍त न लगे. और इसके पहले कि मैं हकलाकर अपनी सिफारिश में कुछ कहूं- अभय को, ब्‍लॉग को, अपनी पॉलिटिक्‍स को (अगर वह कोई हो तो) डिसओन करुं- रघुराज फुर्ती से एक कदम मेरी ओर बढ़े. पिस्‍टल से मेरी छाती में गोली नहीं दागा, चेहरे पर एक झन्‍नाटेदार तमाचा जड़ा. कापी गंदा करने पर स्‍कूल में झा सर और घर में पैसा चुराने पर बाबूजी भी कुछ ऐसी ही इंटेंस मोहब्‍बत ज़ाहिर करते थे मगर रघुराज के तमाचे में मुझी से नहीं, खुद से भी नफरत छिपी होगी इसलिए कोई बचाव-पत्र पढूं इसकी जगह मैं फर्श पर ढेर हो गया.

***

आंख खुली तो सिर किसी स्‍त्री की गोद में था और वह मुझे ज्‍यूस पिला रही थी. चूंकि वह साहिब, बीवी और गुलाम की वहीदा रहमान नहीं थी हमने उसके ज्‍यूस को ज़हर समझा और मुंह का सबकुछ उसके स्‍कर्ट पर उगल दिया. वह ‘यू इडियट!’ (चायनीज़ में) बोलकर दो रास्‍ते के मुमताज़ की तरह नाराज़ हो गई और मेरे सिर के नीचे से अपना गोद खींच लिया, माने मुझे वापस फर्श पर पटक दिया. दर्द से कराहते आंखें खोलीं तो हाई एंगल फ्रेम में नाअग्रा के चिट्ठाकारों का पूरा जमावड़ा दिखा. फर्श पर लस्‍तम-पस्‍त पड़ा उनको देखकर मैं भावुक होने लगा. जैसे 2007 के वेस्‍ट इंडीज विश्‍व कप के पहले राउंड में हारने के बाद भारतीय क्रिकेट टीम अपने को लेकर हो गई थी. जमावड़े में रवि और शशि दोनों थे और दोनों ही मुझे संदिग्‍ध नज़रों से जज कर रहे थे. रवि की बात समझ सकता था, मैंने कभी एमपी जाने का उत्‍साह नहीं दिखाया लेकिन शशि को तो मैं परिचित कह सकता था. दहिसर चेक नाके पर ही नहीं मीरा रोड में भी हमारी मुलाकात हुई थी. बीस वर्ष पहले लगे रहो मुन्‍नाभाई पर हमारी बातचीत तीखे बहस और हाथा-पाई की अंतरंगता में जाते-जाते रह गई थी. और यह आदमी मुझे ऐसे देख रहा है जैसे आज से पहले कभी देखा तक नहीं! सचमुच दुनिया में कोई साथ नहीं देता. बाबूजी की याद आ गई. बकरी की सी कातरता से मैंने शशि को एड्रेस किया- इस तरह हमें अकेला मत छोड़ो, बंधु, आपही की बिरादरी के हैं!

जवाब गुस्‍से में कांपते शशि की बजाय किसी श्रीकुमार ने दिया- बकवास बंद करो. अपने साथ जोड़कर हमें बदनाम मत करो. तुम ब्‍लॉगर हो, हम चिट्ठाकार है!

(जारी...)

3 comments:

  1. भविष्य-कथा में अब रस आने लगा है . अनिश्चितता और किंचित उलझाव के साथ औपन्यासिक शिल्प की यह नई भविष्यवादी भंगिमा रोचक है .

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  2. बंधुवर, उम्‍मीद करता हूं कि कथा कहीं से कहीं जाती, और कुछ खड़ा करती चल रही हो, हम चहक-चहककर बस अपने से प्रसन्‍न ही नहीं हो रहे हों.

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  3. इस अद्भूत उपन्यास पर घटती टिप्पणियों की चिंता कतई मत कीजिये... अब आपका ये प्रयास 2006-07 के टिप्पणी वाले दौर से काफी आगे निकल चुका है। सरसरी तौर पर तकरीकन हर कड़ी पढ़ ही लेता हूं... पर सच कहूं, अब तो इंतजार है इसके पूरा होने का... जब हम इसे फिर शुरू से दोगुना रस लेकर पढ़े और बार-बार पढ़े। - शशि सिंह

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