Monday, March 26, 2007

शहर में रामकुमार

जै कन्‍हैयालाल की, मदन गोपाल की. रेलवे क्रॉसिंग की भीड़ से दोपहिया निकालते रामकुमार उससे आगे का भूल रहे हैं. परात में सिंघाड़े का हलुवा याद है मां की साड़ी का छापा भुल रहा है. लोहरदगा की छोटी लाईन नहीं भूले लेकिन मंजु मई की गर्मी में बेदम होकर गिर पड़ी थी की याद धुंधली पड़ गई है. बगीचे की छांह याद है पर आम का स्‍वाद मुंह से उठ गया है.

सड़क के किनारे दोपहिया रोककर जतन से अंतर्देशीय खरीदते हैं रामकुमार लेकिन मन की परत दर परत उघाड़कर अगली रेल से वापस घर भेज सकें ऐसा होता कहां है. दोपहिये की पेट्रोल की तरह मन की उथल-पुथल भी शहर की सड़कों पर चुक जाती है. रात के निबिड़ खालीपन में बस एफएम रेडियो का गाना और गली के कुत्‍तों का शोर बचता है. नल का टपकना सुनकर अचकचाये उठते हैं रामकुमार. भोर की भागा-भागी में कुम्‍हलाया चेहरा तकते हैं आईने में. कितने महीने हुए, कितने साल. कितनी तेज़ी से बदले हैं रामकुमार.

1 comment:

  1. वास्तव में काफी बदल गये हैं राम कुमार.
    अच्छी रचना है सर

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