Friday, March 23, 2007

रघुराज का रंग और जापानी लड़कियां

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: तेरह

रघुराज के कमरे में घुसते ही एकदम-से सन्‍नाटा छा गया. दो जापानी लड़कियां भागती हुई आईं, मुझे टांगकर कोने के एक सोफे पर फेंक दिया. मैं चाहता था वे मेरे आजू-बाजू ही रहें मगर वो रवीश की व्‍यवस्‍था में अपनी नियत जगह पर ही खड़ी रह सकती थीं. माने भागकर वापस रघुराज के पीछे खड़ी हो गईं. इस पहलू पर मैंने पहले गौर नहीं किया था. अब गौर करके रघुराज की नौकरी से रश्‍क करने लगा था.

श्रीकुमार, शशि ने ही मुझे नहीं भुलाया, नाअग्रा के बाकी चिट्ठाकार भी मुझसे नज़रें फेरकर अपने-अपने ब्‍लॉगों की व्‍यवस्‍था पर फोकस होने लगे. मुझसे संबंधित दिखकर कोई भी रघुराज के आगे अपना इंप्रेशन खराब करना नहीं चाहता था. मैं उनकी दिक्‍कत समझ रहा था लेकिन बहुत पीड़ा हो रही थी कि किसी ने मेरी दिक्‍कत समझने की कोशिश नहीं की. खासतौर पर जापानी लड़कियों ने.

फुसफुसाहटें हुईं, किसी ने किसी को धक्‍का दिया, फ्लैश की रोशनी में दो-तीन तस्‍वीरें खींची गई लेकिन नाअग्रा के पैदल सिपाहियों में से किसी ने मुंह नहीं खोला. सेनापतियों की मैं ठीक-ठीक पहचान नहीं कर पा रहा था लेकिन वो भी इतना लंबा पॉज़ दिये रहे कि झुंझलाकर रघुराज को जेब में हाथ डालना पड़ गया. मैं सोफे में अंदर धंसा हुआ था एकदम-से ऊपर उठ गया. नहीं चाहता था कि बड़े स्‍तर पर यहां तारंतिनो का कोई दृश्‍य मंचित हो और जीवन के आखिरी फोटो में मैं सोफे पर निठल्‍ला आराम करता पाया जाऊं. रघुराज से किसी पैरवी की मैंने उम्‍मीद छोड़ दी थी. अगर यहां इस कमरे के भीतर जालियांवाला बाग ही खेला जाना है तो मैं बैठे रहने की बजाय बाहरी संसार की स्‍मृति के रिफरेंस के लिए अपने को प्रतिरोधी मुद्रा में दिखाना चाहता था. अलग नहीं अपने को जनता के बीच पाना चाहता था. मगर नाअग्रा की जनता मुझे अपने बीच होने से रोक रही थी. ऐसे ही क्षणों में इतिहास रचा जाता है. असल जननायकों की पहचान होती है. अबतक सारे मौके गंवाते रहकर मैं इस आखिरी मौके को भी नाली में बहाने का रिस्‍क नहीं ले सकता था.

सोफे से कूदकर मैंने रघुराज को ललकारा- हम तुमसे नहीं रवीश से मिलने आये हैं!

नायकत्‍व पर जैसी जन-प्रतिक्रिया होनी चाहिये थी वैसी हुई नहीं. सब चुपचाप निरपेक्ष खड़े रहे मानो आलमपनाह के कॉस्‍ट्यूम में रामावतार धोबी की असलियत जानते हों और घटिया नाटक की हिस्‍सेदारी से बच रहे हों. मुझे धोबीनुमा कैटेगरी में मानते हुए रघुराज भी एक हत्‍या के पाप से बचे रहे. अलबत्‍ता जापानी लड़कियां ज़रुर सक्रिय हुईं, उनका सक्रिय होना प्रीतिकर भी लग रहा था, कुछ ही पलों में मेरे हाथ मेरी पीठ पर बंधे थे और मुंह पर ताइवानी टेप की चिप्पियां चढ़ी थी. हाथ-पैर चलाता थोड़ी देर तक मैंने नायकत्‍व वाले सीन को स्ट्रेच करने की कोशिश की मगर मान्‍या तक को अपनी एक्टिंग में दिलचस्‍पी लेता न देख, मैंने हार मान ली. माने सोफे पर आराम से पसर गया. मंच से कटकर दर्शक दीर्घा में हो गया. तसल्‍ली से नाअग्रा के सिपाहियों का नज़ारा लेने लगा.

पृष्‍ठभूमि में थोड़ी देर खुदबुदाहट हुई, अंतत: सत्‍ता का सामने करने के लिए कोई सेनापति नहीं सामान्‍य सिपाही ही बाहर आया. अनामदास रुपी गुमनाम ये साहब चूंकि काफी वर्षों बाद स्‍वदेश लौट रहे थे चकमक धोती-कुर्ते की तैयारी में आए थे मानो किसी वैवाहिक समारोह में हिस्‍सा लेने आए हों. गला खखारकर इन्‍होंने तीन दफे सज़दे में देह टेढ़ा किया फिर मिश्री की मिठास में बोले- सर, मैं फ्रेंच, जर्मन, लैटिन, फारसी और संस्‍कृत पर अच्‍छा अधिकार रखता हूं लेकिन क्षमा करेंगे चीनी की तरफ मेरी गति अभी धीमी है. हां, अगली बार भेंट होगी तो आप निराश नहीं होंगे...

रघुराज ने हाथ झटककर अनामदास को अपने समय की कमी और असल बात पर आने का इशारा किया. एक जापानी लड़की भागती हुई, मेरी ओर नहीं रघुराज की तरफ गई और उनके होंठों में एक क्‍यूबन चुरुट सुलगाया. उन्‍होंने जल्‍दी-जल्‍दी कुछ कश लिये और हवा में धुंए के छल्‍ले छोड़ दिये. दूसरों की मुझे खबर नहीं (चिट्ठाकार समाज में अभय की देखा-देखी धूम्रपान निषेध एक नए छूत की तरह फैल रहा है और लोग इस बीमारी से पटापट चूहों की तरह मर रहे हैं) मगर मैं धुंए की महक में एकदम आत्‍म-विभोर हो रहा था. अनामदास ने पीठ पीछे खड़े सह-समाजियों को देखकर एक बार तसल्‍ली की फिर वापस अपनी मिठास में लौटकर बोले- सर, नाअग्रा हमारी भावनाओं का सामाजिक समुच्‍चय है. हमारा पवित्र गृहस्‍थान है, पूजा की वेदी है, मंदिर का प्रागंण है. आपके चरणों में विनती है, प्रभो, हमसे हमारा नाअग्रा न छीनें!

मुंह में चुरुट दाबे रघुराज ने अनमनस्‍क नज़रों से एक बार अनामदास की कोमलता का जायज़ा लिया, फिर टहलते हुए ऊंची फ्रेंच खिड़की के निकट वीनस की नंगी देह के नज़दीक जाकर खड़े हो गए. मैंने सोफे में धंसे कयास लगाया वीनस की निकटता का कहीं कोई प्रतीकात्‍मक अर्थ तो नहीं. निश्‍चय ही होगा. बिना प्रतीकात्‍मक उद्देश्‍य के रघुराज सड़क तक पार नहीं करते.

रघुराज ने मुंह खोलकर सिर्फ अनामदास को नहीं उपस्थित समूची सभा को संबोधित किया- भावुकता का प्रवचन सुनने मैंने यहां आपलोगों को इकट्ठा नहीं किया है.

एक सेनापति पीछे से बाहर आए- आप हमारे रोल को कम आंक रहे हैं, सर! टेक्‍नॉलॉजिकली अगर हमने...

- आपने टेक्‍नालॉजी खोजकर कोई एहसान नहीं किया. आपने नहीं तो किसी और ने खोज लिया होता. फुदकिये मत. बोलने को कहा जाए तभी बोलिये.

(जारी...)

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