Sunday, March 18, 2007

ज्‍योति के जोत में बुद्ध का देव बहाल

नंदीग्राम में हुए हत्‍याकांड की प्रतिक्रिया में वाममोर्चा के घटक दलों- सीपीआई, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्‍लॉक का तेवर पिछले दिनों ज़रा बदला-बदला हो चला था. राज्‍य में सेज़ (स्‍पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन) संबंधी सभी गतिविधियों पर तत्‍काल रोक और नंदीग्राम प्रसंग पर मुख्‍यमंत्री की ओर से माफ़ी का उनकी तरफ से जोर-शोर से हल्‍ला हुआ. मगर साल्‍ट लेक के अपने निवास पर घटक दलों के बुज़ुर्ग नेताओं की एक हाजिरी करवाकर ज्‍योति बाबू ने वापस मोर्चे की नकेल दुरुस्‍त कर दी है. कहा जा रहा है कि उनकी निगरानी में समझौते का एक फार्मूला तैयार हुआ कि मोर्चे के अंदर कंसेंशस बने और नंदीग्राम से उपजे असंतोष को पटरी पर लाया जा सके.

तैयार फार्मूले में ऐसा कोई इशारा नहीं कि राज्‍य में औद्योगिकीकरण संबंधी बुद्धदेव की नीतियों में कोई फेरबदल होगा या इसके प्रति शंका रखनेवालों के लिए उन्‍होंने बीच का कोई रास्‍ता मंजूर किया है. नंदीग्राम के मसले पर मुख्‍यमंत्री ने दुख ज़ाहिर किया है, माफ़ी नहीं मांगी है. अलबत्‍ता वहां नियुक्‍त पुलिस दस्‍ते को क्रमवार हटाने की बात मानी है. मगर जानकारों का कहना है नंदीग्राम के बडे हिस्‍से को गांववालों से जीतकर पुलिस को कम करना वैसे भी राज्‍य सरकार के एजेंडे में था. समूचे राज्‍य में सेज़ पर सरकार फ्रीज़ लागू करे की बजाय समझौते फार्मूले में बुद्धदेव ने इतना भर ज़रुर स्‍वीकार लिया है कि नंदीग्राम के लोगों की मंजूरी नहीं होगी तो रसायनिक तामे-झामे के लिए राज्‍य में सरकार कोई और हिस्‍सा तलाशेगी.

रही बात आरएसपी, सीपीआई और फॉरवर्ड ब्‍लॉक के रोष के आसानी से पटरी पर आने की तो संभवत: वैसे भी एक सीमा के बाद उनके हल्‍ले का बहुत मतलब नहीं. 292 सदस्‍यों की सभा में उनकी उपस्थिति महज 37 विधायकों की है, जबकि 40 मंत्रियों के कैबिनेट में उनकी ओर से 10 मंत्री है. लगातार सिकुडते जनाधार की अपनी पुरानी कहानी में वे नहीं ही चाहेंगे कि जनता के साथ-साथ हाथ की सत्‍ता भी जाए. राम नहीं ही मिलनेवाले फिर भला माया से भी क्‍यों हाथ धोया जाये.

ऊपर फोटो एपी से साभार

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