Monday, March 12, 2007

जनहित के ढिंढोरे में न कहीं जन का वास है न उसके हित का

विकास की आंधी: चार

वाममोर्चे की सरकार कहती है सिंगुर में गंडगोल ममता बनर्जी और उनके गुंडे फैला रहे हैं. सरकार का दावा है कि 997 में से 600 एकडों का आपसी सहमति से भुगतान व हस्‍तांतरण हो चुका है. जबकि स्‍थानीय लोगों व कार्यकर्ताओं के मुताबिक 447 एकडों पर विवाद के एफिडेबिट अभी कलकत्‍ता उच्‍च न्‍यायालय में पडे हुए हैं. सरकार और टाटा दोनों की तरफ से कहा जा रहा है सैकडों की तादाद में स्‍थानीय निवा‍सियों ने राजी-खुशी घेराबंदी वाली ज़मीन पर काम करना शुरु भी कर दिया है. मगर आप बाहर से एक नज़र मारने पहुंचे तो वहां न केवल आपको पुलिस का भारी बंदोबस्‍त दिखेगा, लगभग हर काम करनेवाले के हाथ में आपको एक लाठी भी दिखेगी. तो ज़मीन की यह राजनीति आखिर है क्‍या?

देबब्रत बंद्योपाध्‍याय (पूर्व निदेशक, एशियन डेवलपमेंट बैंक, पूर्व सचिव, ग्रामीण विकास मंत्रालय और वर्तमान बिहार भूमि सुधार कमिश्‍नर) के मुताबिक, औद्योगिक पुनर्निमाण की खातिर वाममोर्चा सरकार किसी भी सूरत में कृषि जमीन के एक लाख चालीस हजार एकड पर अपना कब्‍जा चाहती है. इतनी ज़मीन की आकांक्षा वैसे भी भारी ताजुब्‍ब का विषय है. सरकारी मंशायें इसे कहां तक न्‍यायसंगत ठहराती हैं?

सिंगुर, नंदीग्राम- या आर्थिक नीति नियमन के इस नये संक्रामक रोग से ग्रस्‍त किसी भी ‘क्षेत्र’ में खुद पहुंचने पर ही आपको पता चलेगा कि किस पैमाने पर यह नई धांधली देश में आकार ले रही है. ज़रा कल्‍पना कीजिये दिल्‍ली, देवघर, भिलाई, रायपुर में आपका घर, आपका जीवन- अचानक एक नवीनतम, अनोखे, अद्भुत स्‍पेस सेटेलाईट प्रोजेक्‍ट के चपेटे में आ जाये जिससे आपका कोई सीधा संबंध न हो, मगर जिसके हित में आपको अपनी जगह खाली करने को कहा जाये. और किसी भी स्‍तर पर बातचीत में आपको हिस्‍सेदार न बनाया जाये. पुलिसिया दबाव में बस आपको फरमान मिले कि फलां वक्‍त तक ‘जन हित’ में आप एक तय मुआवज़ा लेकर अपना घर, अपनी समूची जिंदगी, सामाजिक पहचान सब सरकार के हवाले कर के एक ओर हट जायें. कल्‍पना कीजिये कैसा लगेगा आपको? देश के अलग-अलग हिस्‍सों में किसानों के साथ कुछ यही कर रही है सरकारें और उनके विरोध को प्रगति विरोधी और राजनीतिक ड्रामेबाजी का नाम दे रही है.

नहीं तो किस नज़रिये से उद्योग के लिए खेतिहर ज़मीन की खरीद-फरोख्‍त को वाजिब और जायज ठहराया जा रहा है? बडे उद्योग व पूंजीवादी ग्‍लोबलाइजेशन के समर्थकों का कहना है कि सस्‍ते कारों के निर्माण के टाटा मोटर्स जैसे बडे प्रोजेक्‍ट से हजारों लोग रोज़गार पायेंगे और अटकी पडी अर्थव्‍यवस्‍था को गति मिलेगी. विरोधी मत का इसपर जवाब है कि बंगाल में पहले से ही 56,000 कारखाने बंद पडे हैं, सैंतीस लाख एकड अनुर्वर ज़मीन फालतू छूटी हुई है. उस ज़मीन का इस नये औद्योगिक पराक्रम के प्रदर्शन में इस्‍तेमाल क्‍यों नहीं किया जा रहा? सरकार की आंख सिंगुर जैसी जगह को ही कृषि से क्‍यों वंचित करना चाहती है जहां उपज घनत्‍व का प्रतिशत 226 है? टाटा को कार फैक्‍ट्री के लिए छह जगहें दिखाई गईं मगर उन्‍हें सिंगुर ही अपने लिए सबसे मुआफिक लगा. क्‍यों, कहीं सिर्फ इसीलिए तो नहीं कि सिंगुर कलकत्‍ता से सिर्फ पैंतालिस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है? तो टाटा की खुशी के लिए अबतक आत्‍मनिर्भर खेतिहर किसानों को उनकी कृषि से वंचित करके शहरी मजूरों में बदल दिया जाये? वह वाममोर्चे का जन-हित होगा? जनहित के दूसरे उदाहरण देखिये: ज़मीन पर नियंत्रण के पीछे वाममोर्चा सरकार अनुमानत: 140 करोड खर्च कर रही है. इसमें से टाटा सरकार को कितने का भुगतान कर रही है? मात्र 20 करोड, और वह भी ज़मीन हाथ में आने के पांच वर्षों बाद. एक प्रायवेट कंपनी के खर्च को आखिर सरकार अपने खजाने से क्‍यों भर रही है? एक प्रायवेट कंपनी जिसका एकमेव उद्येश्‍य अपना धंधा खडा करना व मुनाफा कमाना होगा उसके पीछे जनता का पैसा लुटाकर यह कैसा जनहित किया जा रहा है? मगर यह सिर्फ सिंगुर और पश्चिम बंगाल की ही कहानी नहीं, सेज़ (स्‍पेशल इकॉनॉमिक जोन) के अंतर्गत देश के अलग-अलग हिस्‍सों में किसानों से हडपी जा रही ज़मीन का कुल जमा यही कच्‍चा-चिट्ठा है. उसके बारे में अगली दफा...

(जारी...)

4 comments:

  1. वस्तुस्थिति तो आप बिल्कुल सही बता रहे हैं. अब इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या हो इस पर भी कुछ कहेंगे तो शायद कुछ बात बने.

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  2. देखिये, एक विश्वास की बात है कि जब दो विचारों मे टकराव हो और दोनो सही लगें, तो कोई रास्ता अवश्य होता है जिसमें दोनो विचार सध जाते हैं. बहुत कुछ win-win जैसी बात है यह.
    जरूरी नहीं कि किसान को निरीह बलि का बकरा व टाटा को कसाई पेंट किया जाये.
    बाकी तो आपकी कलम में कलाकार की कूची की ताकत है - जो कह दें,सो सही!

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  3. भूपेन प्‍यारे, बाहर निकलने का रास्‍ता हिंदी के एक अदने ब्‍लॉग पर चिंतित होनेवाला व्‍यक्ति तो क्‍या करेगा. यह काम तो देश के बडे राजनीतिक दलों के बेमतलब हो चुकने पर कोई नया गठजोड ही करेगी. आप-हमारे जैसे लोग सडकों पर आकर करेंगे. और ज्ञानदत्‍त भाई, आपसे मैं बस यही कहना चाहता हूं कि यह सिर्फ टाटा और जगह विशेष के किसानों का सवाल तो है ही नहीं. देश की आर्थिक दिशा को एक खास तरह से टिल्‍ट देने की शुरुआत भर है. कल को इस खेल में और बडे टाटा आयेंगे, ज़मीन के और बडे पट्टों का हस्‍तांतरण होगा. किसानों को और ज्‍यादा सख्‍त तरीके से बताया जाएगा कि विकास के रास्‍ते में वे कितने बेमानी हो चुके हैं, और उनका जीवन, उनकी नागरिकता सब संदिग्‍ध समझी जाएगी.
    -प्रमोद सिंह

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  4. और बात क्या सिर्फ फिजीकल प्रापर्टी तक सीमित रहेगी? क्या इन्टेलेक्चुअल प्रापर्टी पर भी बड़े हाथों का कब्जा होता दिख रहा है.

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