Monday, April 30, 2007

टीन के बक्‍से में बंद भेद..

एच की मौत: सात

दूध पीकर दामोदर दास सोने नहीं गया, खटिये के नीचे से टीन का बक्‍सा खींचकर उसके ताले की जांच करने लगा. शायद इस क्षण को और टालते रहने का अब कोई मतलब नहीं रहा, जिज्ञासा व जुगुप्‍सा शांत करने के लिए ही नहीं, अपने संधान के लिए भी बक्‍से की चीज़ों से गुजरना संभवत: पहला महत्‍वपूर्ण कदम साबित हो! बक्‍से व ताले का मालिक अलबत्‍ता दामोदर दास था लेकिन अंदर की निधि के असल स्‍वामी हजारी भैया थे- कागज-पत्‍तर व अन्‍य अगड़म-बगड़म जो मौका-बेमौका कभी भी उनके आ धमकने पर उनके पीछे-पीछे इस कोठरी में अपनी रिहाइश करता. हजारी भैया निकल जाते और उनकी चिंतायें, कलम-घिसाई, अख़बारी कतरन, पत्र व किताबी नोट्स चटाई व तकिये के नीचे, मेज पर ‘आर्यावर्त’ की पुरानी फाइल से लगे फड़फड़ाते शोर करते कि अरे, कहां निकल लिये.. और हमारा क्‍या? शरणार्थियों की तरह किसके भरोसे छोड़े जा रहे हो, हमारी व्‍यवस्‍था करो, भैया! इन विरह वेदनाओं की गुहार हजारी भैया को लौटाल नहीं लाती (एक बार निकलकर पीछे लौटना भैया का स्‍वभाव नहीं था). तो पत्‍नी जैसे गृहस्‍वामी व बच्‍चों के स्‍कूल निकल जाने पर घर की साज-संभाल व व्‍यवस्‍था करती है, दामोदर दास भैया के कागज-पत्‍तर की व्‍यवस्‍था नहीं करता लेकिन उन्‍हें सहेजकर एक जगह बक्‍से के ताले में बंद कर देता. कि अगली दफा जब भैया आएं और अपनी पुर्ची और कतरन की खोज में व्‍यथित होने लगें तो वह चुपके से उनके हाथ में ताले की चाभी रख दे कि हाय-हाय मत मचाइये, हम नहीं जानते आप क्‍या ढूंढ़ रहे हैं मगर जो कुछ भी ढूंढ़ रहे हैं सब वहीं अंदर पड़ा है!

माथे के पीछे हाथ बांधे जब भी भैया व्‍यथित दिखते, दामोदर दस चट सवाल करता- क्‍या चिंता कर रहे हैं? कुछ खो गया है, भैया? हजारी जैसे सोचते-सोचते काफी आगे निकल गए हों, सवाल सुनकर पीछे लौटे हों उस नज़र से दामोदर दास को देखते, फिर मुस्‍कराकर कहते- नलिन जी और विलोचन बाबू बार-बार सावधान करते रहते हैं, कि आप यह मत करिये, वैसा मत कीजिये.. समझ नहीं आता मेरे हित में मुझे सावधान रहने को ऐसा कहते हैं.. या कोई निहित स्‍वार्थ है जिसकी ये सारे लोग रक्षा कर रहे हैं. जिसके विरूद्ध किसी का कुछ भी ज़ाहिर करना इन्‍हें इतना अप्रीतिकर होने लगता है?.. तुम क्‍या कहते हो, दामोदर? आधुनिक हिंदी की पड़ताल का मेरा विचार तुमको भी गलत लगता है? रामचंद्र शुक्‍ल और रामविलास जी जो कुछ लिख गए हैं, उसका पुनर्पाठ और पुनर्परीक्षा समाज विरोधी है?.. मैं पूछता हूं समाज के किस वर्ग विशेष का विरोधी है! यही तो जानने की मज़ेवाली बात है! इसी के पीछे तो मैं इतनी भागादौड़ी कर रहा हूं! मगर विज्ञजन बार-बार मेरा हाथ पकड़कर चेताते रहते हैं हजारी, तुम बहक रहे हो! गलत लोगों की संगत में फंस गए हो! लोग आगे ठेलकर तुम्‍हारे कंधे से अपनी बंदूक का निशाना साध रहे हैं! ऐसी जगह जा रहे हो जहां जाने का तुम्‍हें कोई नैतिक अधिकार नहीं!

और फिर भैया हो-हो, ठो-ठो कर के देर तक हंसते रहते. दामोदर दास तेजी से इस चिंतन के अंतराल में स्‍टोव पर गुड़ वाली तैयार करके उनके आगे रखता. हजारी सुड़क-सुड़क के बिना दूधवाली गुड़ की चाय का रस लेते. चहकते हुए बोलते- यह समूचा कारोबार चार से चौदह गुणीजनों की बपौती बना हुआ है. उन्‍हीं की लेखनी और मुंह खोलने से हिंदी की दशा और दिशा तय होती है! सरकारी, अर्द्ध-सरकारी पुस्‍तकालयों में प्रकाशकों की सालाना बिक्री का सौदा तय होता है. कोर्स में किताबें लगाई जाती हैं. समाज में क्‍या विचार योग्‍य है और क्‍या नहीं इसका विवरण तैयार होता है! इस दायरे से बाहर कोई मुंह खोले तो ये पूरी कोशिश करते हैं कि उसको एकनॉलेज करने की नौबत ही न आय, और बात अगर खुल ही गई तो फिर ये गुट बांधकर, डंडा लेकर उस स्‍वर के खिलाफ सामूहिक रूप से टूट पड़ते हैं! तो यह तो है इनकी सामाजिकता.. और इसके विरुद्ध मैं सामग्री इकट्ठी कर रहा हूं तो नलिन जी समझाने लगते हैं अनैतिकता कर रहा हूं, समाज विरोधी हो रहा हूं!..

हजारी भैया धाराप्रवाह बोले जाते. इलाहाबाद, बनारस, पटना, दिल्‍ली के दसियों उदाहरण सुनाते; गजेटियर से कोई पत्र या इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी का कोई ज़ेरोक्‍स लहराकर अपनी चिंताओं के प्रमाणस्‍वरूप रखते. आधी से कम बात दामोदर दास के पल्‍ले पड़ती, मगर ज्‍यादा दुख इससे होता कि इतने जतन से सहेजकर रखी अपनी निधि की भैया खोज नहीं कर रहे; कमरे में नई पुर्ची और नई कतरनें फैला रहे हैं, दामोदर दास की जिम्‍मेदारी बढ़ा रहे हैं!

अपनी जिज्ञासा में दामोदर दास ने बक्‍से के अंदर की सामग्री की कभी खंगाल नहीं की. शायद इसके पीछे अवचेतन में यह भोला भय था कि बक्‍से के कागजों में बंद भैया के अजाने जीवन का जाने कौन गुप्‍त रहस्‍य छिपा हो जिसका उनकी गैर-जानकारी में भेद पाकर वह उन्‍हें छोटा कर जाएगा.. और जिस प्रसंग के बारे में भैया स्‍वयं कुछ न कहना चाहते हों, उसे चोरी से जान लेने का अपराध वह किसी भी सूरत में करना नहीं चाहता था. तो इस तरह बक्‍सा बंद रहा. बक्‍से के भेद बंद रहे. ताले की चाभी जो बड़े जतन से सहेजकर रखी गई थी, हजारी भैया के गायब होते ही वह भी गायब हो गई.. मगर अब इन सारी बातों का कोई अर्थ नहीं था. ताले से बक्‍से को मुक्‍त करके अंदर जांचना हजारी भैया के रहस्‍यों से ज्‍यादा उनकी गुमशुदगी का सूराग पाना था. यही सब सोचता दामोदर दास ने बक्‍से को टांग कर दीवार पर लटके बल्‍ब के नीचे रखा. चार कदम चलकर रसोई से संड़सी लाया और रात की खामोशी में तड़-तड़ बजा कर ताला तोड़ने लगा...

(जारी..)

Sunday, April 29, 2007

पुरबिया फुटानीबाज का प्रार्थनागीत

हम सिरनगर नगालैंड नहीं जायेंगे मदुरै का नाम उच्‍चरते ही दांत दिखायेंगे. डेहली वाला बूझे अपने को बड़का बाबू हम भी अपने को कम नहीं बूझेंगे. दतुअन से दांत घसेंगे, बुड़बकई में हरर-हरर नहायेंगे. मनोहर कहानियां का पंखा झलेंगे और बथुआ के साग बास्‍ते लार बहायेंगे. अरुई के फूल और बजका की बात चलेगी तो गुमसुम गंभीर हो जायेंगे. चाचा मौसी मनोरमा सुदामा के बीच दुनिया धरम पुरान सब बांच लेंगे, हटिया मोकामा बिना टिकस घूम अपने को काबिल होसियार समझेंगे. सामनेवाला पसिंजर होसियारी झाड़ेगा तो उसको कयदा से लाइनों पे लायेंगे. बात-बेबात ज्ञान पेलेंगे और अपने को लगानेवाला पाल्‍टी भेंटा गया तो गरदन मोड़ आंखी मूंद लेंगे. गोड़ फैला के सीट छेंक लेंगे और मद्धिम-मद्धिम नाक बजायेंगे. फिर पांड़े जी की दलानी में जाकर बुलका चुआयेंगे बहुत टिराई मारे, पंडी जी, कछु हाथे नय लह रहा है. घर में एगो टरक होता त अच्‍छा होता पुलिस का सर्भिस में होते जमाना सुधार देते. संझा को हसरत से अंसारी का फटफटिया निरखेंगे. महेसरा को महतारी का गाली दे के कहेंगे चीलम बालो, ससुर, मन आज बहुते उदास होय रहा है.

(अनामदास जी, यह 'माल' कल के आपके पोस्‍ट का प्रसाद है. उत्‍साह में दौड़ते हुए जहां जितनी गलती होगी, उसका 'पाप' भी आप ही पर जाएगा..)

Saturday, April 28, 2007

तम्‍बू रोयाल

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: छत्‍तीस

मेरा नाम, कुल, शील जानकर गोविंदा ने ठंडी सांस भरी. तुम तो, यार, पिटे हुए पुजारी हो! संचारी हो न कायदे से बिहारी हो- क्‍यों? फाग और सोहर का फर्क समझते हो? कभी गोइंठे की आग में खिचड़ी पकाया है? साइकिल पर रंगीन झंडी डाल मउगी को मेला घुमाया है? हाट-बजार में हंड़ि‍या पी के लुढ़के हो? फिर कौन बात के घेंवड़ा बिहारी हो!

छाती फैलाकर, और फैली हुई छाती पर वापस गिल्‍बेर्तो पान्‍ना का जैकेट कसते हुए, गोविंदा गंभीर अदायें दिखाकर फिर से मुझे असहज करने लगा. मगर दो कदम पीछे हटकर वापस अपना रस्‍ता पकड़ूं इसके पहले ही उसने अचानक स्‍वर बदलकर नयी रागिनी छेड़ दी. गाने लगा- माई पकाई गरर-गरर पूआ/ हम खाइब पूआ, ना खेलब जुआ.. अइसे आंख फाड के मत देखअ, बबुआ, हमूं कुछ बुझल-साझल बानि.. आवअ देखलाइं तहरा के असल जुआबाज अऊर जुआबाजी!.. हिंया-हुंआ टहल रहे हो, कौनो बुरी बात थोड़े है. कोस-कोस पर पैर धोना/ चार कोस पर खाना/ जहां-जहां मन आवे/ तहां-तहां जाना!

हाथ खींचकर बाबू गोविंदा हमें तम्‍बू के अंदर लिये चले. स्‍वर की धमक और गाने की गमक बनाये रहे. चार कदम आगे मान्‍या मिल गई. सिर झुकाये गुमसुम बैठी थी. मैं हैरान हुआ. कहे बिना रह नहीं पाया- क्‍या बात है, भई.. बहुत दिनों से तुम्‍हारी शेरो-शायरी, दोहा-चौपाई कुछ दिख नहीं रहा? गोविंदा फुसफुसाकर बोले- छेड़ो मत! हमने पहले ही पूछ लिया था, नज़रों की कटार से पा गया था जवाब.. अपने ‘उनको’ लेकर चिंतित है! शेर सूझ रहा है न शायरी.. पिघला हुआ शीशा हो रही है. एक पाती आ जाने दो फिर देखना, उमड़ती हुई नदी हो जाएगी. भर्र-भर्र वापस बहने लगेगी. गुल से गुलिस्‍तान हो गई हूं वाला गाना गाने लगेगी. क्‍यों, मैडम, एम आई करैक्‍ट?

छाती में खंज़र धंसा हो मान्‍या ने ऐसी नज़र से एक बार देखा फिर आंखें फेर लीं. पाती की राह तकने लगी. गोविंदा गाना गाने लगा: जय बजरंग-बली धजाधारी/ कसो लंगोट, उठाओ गदा भारी/ खबर लो हमारी, सरन तिहारी/ लंगोट का पक्‍का मर्द औ सत की पक्‍की नारी/ बात का कच्‍चा भंड़ुआ नेद की कच्‍ची छिनारी.

अंदर की दुनिया ही बदली हुई थी. बाहर की फीकी दुकान से अलग अंदर बहार गुलज़ार था. लाल-नीली बत्तियों के बीच तंग कपड़ों में कमसिन कन्‍यायें ज़ाम सर्व कर रही थीं. कसीनो के लंबे टेबल सजे हुए थे. जायंट स्‍क्रीन पर दुनिया भर के बाज़ार-भाव चढ़-उतर रहे थे. बुशम और बेली डांस चल रहा था. अलबत्‍ता देख मेरे सिवा और कोई नहीं रहा था. उजबकों की तरह मुंह और आंख खोलने के बाद मैं कहना चाहता था- ये कहां ले आए, गुरु? मगर उसके पहले ही गोविंदा दार्शनिक हो गया- कितना सेक्‍स ठेलते रहते हैं, यार! इतनी साली सप्‍लाई हो गई है कि मार्केट में पैसा बहाकर भी अब डिमांड जेनरेट नहीं हो रहा! बंबई की बार-बालाओं की तरह इन लड़कियों को भी जल्‍दी अपना कारोबार समेटना होगा. दुनिया कितनी सैड जगह हुई जा रही है, यू नो!

बेली डांसर से हटकर मेरी नज़र कहीं और अटक गई थी. गोविंदा का प्रवचन अविरल चालू था- मैंने तो पीना-पिलाना एकदम-से बंद कर रखा है. नो डांस, नो बार, नो सेक्‍स, नथिंग. इसीलिए तो फिल्‍म लाईन से हट गया, राम नाईक से जाकर गले मिल आया, पासवान की दोस्‍ती तोड़ दी. सोनिया फोन करती रहती थी मैं उठाता नहीं था. फायदा क्‍या था? एक बार लाइफ का फंडा समझ लो तो बड़े-बड़े सब बौने नज़र आने लगते हैं! मैं तो कैलाश-मानसरोवर में सेटल करने की सोच रहा था फिर सुनीता ने कहा थोड़ा ईस्‍टर्न योरोप देखते हैं तो मैंने कहा, देखो, भई. तुम राधा हो हम कृष्‍ण मुरारी मना कैसे कर सकते हैं?.. मैं यहां तब से ठेल रहा हूं तुम कहां खेल रहे हो, भाई?..

लंबे टेबल के जिस एंगल पर मेरी आंख अटकी हुई थी वहां गोद में एक मिस्री बाला बिठाये रवीश कुमार अपनी चाल खेल रहे थे. हमेशा की तरह जीत रहे थे और जोर-जोर से हंसते हुए आसपास के लोगों को कॉम्‍प्‍लेक्‍स दे रहे थे. गोविंदा ने फुसफुसाकर कहा- पहुंचा हुआ संत है और एकदम सड़ा हुआ अंडा है.. ऐसा अजीबो-गरीब आमलेट मैंने लाइफ में और कहीं नहीं देखा!

मैं रवीश कुमार को देखकर हैरान हो रहा था. और सोच रहा था यह सब यहां छोड़कर रेहाना भला और कौन-सा काम निपटाने कहां गई है!

(जारी...)

इंटरनेट के तार पर चिड़ि‍या: एक चिड़ि‍याहट

सुरभि, सुरुचि, नाद, प्रमाद, विवाद सब इकट्ठा हुए शुरू हुआ संवाद. सज गई महफ़ि‍ल चहकने लगे. कैसे चले आये क्‍यों लिखना शुरू किया? जैसा जो भी था बजने लगा बाजा. मैं प्रकट में मुस्‍कराया भीतर पर्दा खींचकर बड़ा घबराया. अब मैं भी यह लड़कपन करूंगा आईने फैलाके उसमें जोकर बनूंगा? किस रास्‍ते क्‍यों आया हूं मसौदा क्‍या बनाया है कैसी तरतीबें लाया हूं? कोई व्‍यवस्‍था है? दिशा नियम अनुशासन आगे देख क्‍या रहे हैं या ऐसे ही छुच्‍छे भाव खा रहे हैं? यह कालेज के सालाना जलसे में कविता पढ़कर ताली बजवाना नहीं होगा न सत्रह गुना तेरह के फुलस्‍केप पेपर पर सुधड़ अक्षरों में प्रेस कापी तैयार करके फुरसतियाना होगा. यह तो खाली सफ़ेद कभी न चुकनेवाला ऐसा रहस्‍यभरा पन्‍ना है जो दर्र-दर्र घर्र-घर्र इतने हज़ार लाख शब्‍द हजम कर चुका अब तक एक महीन डकार नहीं ली है. पता नहीं अभी कितना कहां घुमायेगा क्‍या-क्‍या और खाएगा. ढेरों सवाल थे जवाब नहीं था. दिगंत से आगे जाने कहां तक पसरा विस्‍तीर्ण मैदान था अंधा बनाती चमक थी माइक्रोसॉफ्ट का नीला आसमान था. कदम-कदम पर चौराहे थे. इतनी गलियां और कितने मोहल्‍ले थे. रामपुर था दामपुर था. बहुत हल्‍ला था विश्रामपुर कहीं नहीं था. मैं खुद को निर्दोष चिड़ि‍ये के रंग में रंग कर भावुक हो रहा था. तार पर ढंग से बैठ रहा था न उड़ रहा था.

Friday, April 27, 2007

रुग्‍ण प्रेमी, क्षुब्‍ध नायक

एच की मौत: छह

कॉलेज के फाटक से लगे ठेले पर लड़कियां गोलगप्‍पे खा रही थीं. लैब की खिड़की के नीचे एक लड़का पेशाब कर रहा था. स्‍टैंड के साइकिलों के बीच शुक्‍ला जी की सेकेंड हैंड कार चमक ही नहीं रही थी, आसपास टहलता भोला वहां पहरा भी दे रहा था. सब अनदेखा करता उद्वि‍ग्‍न-चित्‍त दामोदर दास सीधे कक्षा गया और भारत-भारती का पाठ दोहराने लगा. लड़के उसके पढ़ाने को अनदेखा कर पीरियड का समय मारते रहे. कक्षा निपटते ही चूड़ि‍यों और हरे सलवार-कमीज़ में एक लड़की भागती दामोदर दास के पीछे आई और हाथ में एक लिफाफा थमाया. लजाने लगी जैसे प्रेमपत्र दे रही हो. दामोदर दास घबराकर लिफाफा खोलने लगे तो कानी उंगली दांत के नीचे दाबकर लड़की मुस्‍कराते हुए बोली- मैरिज का इनविटेशन है, सर.. क्‍लास में आज लास्‍ट डे आई हूं. उनके घरवाले कह रहे हैं अब कालेज की क्‍या ज़रूरत है!..

स्‍टाफरुम में भी इनविटेशन ही बंट रहा था. भूगोल की लीना यादव अपनी शादी का पीला लिफाफा घुमा रही थीं और सहकर्मी अध्‍यापकों की छेड़छाड़ का आज बुरा नहीं मान रही थीं. मुंह में खैनी दाबे वीके थपलियाल ने निर्लज्‍जता से कहा- यह अच्‍छी बात नहीं, लीना जी, हमारी बिरादरी छोड़कर जल विभाग में जा रही हैं. आपके चक्‍कर में बिचारे दामोदर दास इतने अर्से से कुंआरे बैठे रहे और आप पल्‍ला झाड़ के फुर्र हो रही हैं?

मुस्‍की मारके रामधनी श्रीवास्‍तव बोले- सोच-विचार के बात किया करो, थपलियाल. कास्‍ट-फास्‍ट कुछ होता है कि तुम किसी को किसी के साथ फंसा दोगे? लीना जी जहां जा रही हैं वह उनके रूप और गुण के एकदम्‍मे अनुरूप है! दामोदर जी ठंडी आह भरके दो-चार महीने में नार्मल हो जाएंगे. वैसे भी व्‍याह के लिए बूढ़े नहीं हो रहे हैं अभी!

थपलियाल, पांडे सब हें-हें करके हंसने लगे. लीना यादव भी मुस्‍करा दीं. दामोदर दास के सामने कार्ड रखकर बोलीं- आप ज़रूर आइएगा, मिस्‍टर दास. सिरवास्‍तव जी की बातों का बुरा मत मानिये.. आपको हज़ार दर्जा अच्‍छी वाईफ मिलेगी. हमसे ज्‍यादा सुन्‍दर और कविता समझने वाली!

दामोदर दास ने जवाब नहीं दिया. कार्ड पर सरसरी नज़र डालकर बोले- क्षमा कीजियेगा, आपके विवाह में आना हो नहीं सकेगा, महीने भर की छुट्टी पर बाहर जा रहा हूं..

थपलियाल खिड़की पर खैनी थूकने गए थे. एकदम-से कंधा मोड़कर बोले- लो, यहां प्रेयसी का व्‍याह भी नहीं हुआ और देवदास जी अपने लिए कनिया ढूंढ़ने निकल पड़े? यह तो प्रेम का उचित समपर्ण भाव नहीं है, बंधु!

इस बार दामोदर दास ने जवाब दिया- हां, अभी तो इस कालेज के अध्‍यापकों को आपसे बहुत कुछ सीखना है!

स्‍टाफरूम में तत्‍क्षण सन्‍नाटा छा गया. लीना यादव भी सकते में आकर दामोदर दास को देखने लगीं. कि ऐसे खुशगवार मौके पर इस तरह की टिप्‍पणी करने की क्‍या ज़रूरत थी. पृष्‍ठभूमि में पिछले महीने वीके थपलियाल द्वारा कॉलेज में किया गया एक कृत्‍य था जिस पर प्रकाश डालने का यह उपयुक्‍त अवसर नहीं. लेकिन दामोदर दास ने वांछित असर पैदा कर दिया था कि लोग उनके बारे में टिप्‍पणी न करें. लोग चुप ही नहीं हो गए, उसे असामाजिक और अछूत की तरह भी देखने लगे. ज्‍यादा असह्य होने लगा तो मन ही मन खुद को गालियां बुदबुदाता दामोदर दास कमरे से बाहर निकल आया. क्‍यों इस तरह करता है वो? दो महीने पहले एक भूतपूर्व छात्र के हाथ पिटने की नौबत आ गई थी तब इन्‍हीं थपलियाल ने बीच पड़कर उसकी रक्षा की थी, और आज सबके बीच उन्‍हें ज़लील कर दिया! मजाक से निकलने का यही रास्‍ता जानता है कि सामनेवाले के मुंह पर तमाचा मार आए?.. क्‍या सचमुच इतना असभ्‍य है, असामाजिक है?..

***

रात में दूध गर्म करते हुए दामोदर दास ने गंभीरता से विचार करना शुरू किया कि आनेवाले दिनों में कैसे चीजें आयोजित करनी है. कहां-कहां जाना होगा, पास में कितना पैसा होना चाहिये इत्‍यादि. मगर उसके सोच लेने भर से महीने भर की छुट्टी थोड़े मिल जाएगी! शुक्‍ला जी ने मना कर दिया तब? वैसे भी वह उससे अप्रसन्‍न और दुखी हैं- वह भी एक समूचा अलग प्रसंग है!

भगौने के दूध के गुनगुन में दामोदर दास को शुक्‍ला जी की जगह अब हजारी भैया की छवि दिखने लगी. कमरे में उनकी हंसी भर गई. चहकती हुई भैया की आवाज़ गूंजी- पटना में नलिन बाबू पांडुलिपि पढ़ने के बाद लौटाते हुए एकदम असहज हो गए. बोले कहां से ये सब सूचना लहा लाये हैं? इसको मत छपवाइये! सब हिंदीवाले आपके दुश्‍मन हो जाएंगे!

दामोदर दास ने बुरा मानते हुए कहा था- पूरी दुनिया को पढ़वा लीजिये! बस मुझी को वंचित रखिये!

हजारी भैया हो-हो हंसने लगे थे- तुम हमारे लिए नलिन-सलिन थोड़ी हो! तुम्‍हारे हाथ में छपी हुई किताब आएगी. पहली कापी! पहले पाठक होगे तुम!..

इसके बाद दो बार और मुलाकात हुई. मगर दामोदर दास उस अभिशक्‍त रचना का पाठक नहीं हो सका. किताब छपकर नहीं आई. हजारी भैया नहीं आए!..

(जारी..)

ब्‍लॉगतंत्र दु:खतंत्र..

बस से उतरते ही हाथापाई हो गई. हाथ फेंककर एक चीखा- नीच! दूसरा बोला धिक्‍कार है आपको! मुंह में सुख की पुड़ि‍या घुमाते हो हमको दु:खतंत्र समझाते हो? फिर गालियां छूटीं कोई गिर पड़ा. किसी की आंख थी किसी का हाथ. चुनरी थी चप्‍पल था कोई पूरा समूचा नहीं दिख रहा था. सबसे पहले दिखा जो अविनाश था, रिक्‍शे से कूदकर भागता आया. क्‍या बात है, जी, क्‍या गर्द मचा रखा है आप लोगों ने, हमारे बारे में बात हो रही है? पीछे दबी कहीं अभय की चोट खायी आवाज़ आई- इतने जतन से धोती निकाल कर पहनी थी मगर देखिये क्‍या सर्वनाश कर दिया! तब तक बोधि चिचियाये- यही तुमने दोस्‍ती निभाया? स्‍वागत कहके बुलाया और फिर गड़ही के कादो में नहलाया? तीन लड़कियां थीं बाजू में अपने संसाधन और श्रृंगार सहेजतीं. एक ने कहा नीलू, अपना कपड़ा बचाना रे, बड़े बत्‍तमीज़ लोग हैं. अविनाश अपनी नयी छपी कवितायें हिलाते, दिखाते लड़कियों के पास आया, आश्‍वस्‍त किया आप लोग घबराइये नहीं मैं हूं यहां. ऊपर प्रभु हैं. ऊपर जो थे उनने पुष्‍पवृष्टि नहीं की न वज्रपात किया, प्रभुगण अंटी ओढ़े सोये रहे. मैं अलबत्‍ता जग गया. आंखें मलकर अंधेरे में तकता रहा, खुद को दो और अभय को दस गाली दी कि स्‍वप्‍न में भी ब्‍लॉग के झमेले चले आ रहे हैं! जीवन कहां जा रहा है!

Thursday, April 26, 2007

गोविंदा आला रे!.. और निकला दिवाला रे!!..

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: पैंतीस

कुली नंबर वन के मुंह से छूटा- मैं यहां वहां कहां, तुमको क्‍या? अरे, जान न पहचान मैं तेरा मेहमान! कौन हो भाई, बिन पेंदी के लोटे, बिना पेटी के हारमोनियम, तुम्‍हें पहचानता हूं? जूनियर में मेरे क्‍लासमेट रहे हो फिर खाली-पीली इस तरह काहे को लोट रहे हो, यार? रास्‍ता देखो न, आगे बढ़ो, चलो, चलो! रोज़ मिलते हैं इधर, हाथ-मुंह उठाये चले आते हैं, हम भी हिन्‍दुस्‍तानी का स्‍लोगन पेलते हुए!.. अबे, तुम हिन्‍दुस्‍तानी हो तो हम क्‍या करें? बीस साल पहले हमारे चुनाव क्षेत्र से होते तो हम एक स्‍माइल दे देते लेकिन उसके बाद? हमारी प्रायवेसी है. पर्सनल पंगे हैं. हर जगह सिर डालते हुए घुस जाओगे? और हम सिर पे लेते रहेंगे इसलिए कि हिन्‍दुस्‍तानी हो? कमाल है, यार. इतना पॉपुलेशन पैदा कर रखा है, देश में तो सबके लिए जगह निकलने वाली नहीं, भाग-भाग के सब इधर-उधर जाएंगे ही.. तो सबको मैं उठ-उठ के गले लगाऊं? अपने गिल्‍बेर्तो पान्‍ना का जैकेट खराब करुं? तुझे लगता है तेरा चेहरा इस लायक है?.. अबे, आंख मत दिखा, भुक्‍खड़, चल, निकल ना, निकल!.. साले, इधर भी भिखारी पहुंचना शुरु हो गए! क्‍या ट्रेजेडी है, काली कमली वाले, अपना इंडस्‍ट्री वहीं इंडिया में रहने दो न, इधर एक्‍सपोर्ट मत ठेलो, प्रभु.. लाइफ में बौत टेंसन चल रैली है, गुरु, रहम करो!..

यह आखिरी की दो पंक्तियां मुझे नहीं इंडिया में हेड ऑफिस रखके दुनिया-जहान के नियंता को एड्रेस करके कही गई थीं. लेकिन उसके पूर्व स्‍नेह भाव की जो डॉक्‍यूमेंट्री देख ली, उससे सचमुच में अपना नायक कुली लगने लगा. जी कड़वा हो गया. गप लड़ाने की इच्‍छा एकदम-से मर गई. तीन कदम पीछे हटकर मैं दायें से आगे चलने लगा मानो इस दो कौड़ी के गिरे हुए इंसान से मेरा दूर-दूर का संबंध न हो. संबंध था भी नहीं..

बेलग्रेड के सबर्ब से नफरत होने लगी. जैसे बीस वर्ष पहले बंबई के सबर्ब से हुआ करती थी. कमर्शियलाइज़ेशन और कंस्‍ट्रक्‍शन. इससे अलग जैसे आसमान, हवा और हमारे जीवन के निंयताओं की नज़र में ज़मीन का और कोई इस्‍तेमाल ही न हो. दूर-दूर तक बड़ी-बड़ी मशीनों की घरघराहट का स्‍वर फैल रहा था. घिसे ओवरऑल्‍स में अमरीकी, अंग्रेज, सर्बियाई, सोमालियन सब कहीं के मजदूर पिले पड़े थे. कोई चीनी या भारतीय मजदूर कहीं काम करता नहीं दिखा. निर्दोष मन से देखनेवाले को लगता दुनिया को बदल डालनेवाली कोई महत्‍वाकांक्षी स्‍कीम क्रियान्वित हो रही है, मगर महानगरों के तलघर में जीनेवाले झट समझ जाते सीमेंट, कॉंक्रीट, ग्‍लास और पैसों का वही परिचित पिशाची तंत्र खड़ा हो रहा है जिसके भीतर सिर्फ पैसे की हवा पहुंचती है, मानवीय जीवन नहीं. महज सहानुभूति जताने के ख्‍याल से दो घड़ी को सुस्‍ता रहे एक सोमालियन मजदूर की तरफ दुआ-सलाम को मैं हाथ उठा ही रहा था कि पीछे से आवाज़ आई- अबे, ओय, तू तो नाराज हो गया? तेरे को तो मिर्ची लग गई? बड़ा टची है, यार! आज के ज़माने में इतना सेंटी-फेंटी रहना था तो अपने गांव में रहता, दल्‍लाल को युआन खिलाकर यहां आने की फिर क्‍या ज़रूरत थी, अंय?..

मैंने कान नहीं दिया. अनसुना करके सोमाली की दिशा में आगे बढ़ता रहा. अपनी ओर आता देख सोमालियन ने एकदम-से अपना फ्लास्‍क हटा लिया. मेरे कदम डगमगा कर अटक गए. वह लुटा-पिटा अजनबी भी मुझे भिखमंगे की ही तरह देख रहा था.. मानो मैं उसकी तरफ उसकी चीज़ हड़पने बढ़ रहा होऊं! मेरा दिल बैठने लगा.. इस दुनिया में अब प्रेम का, मानवीयता का मतलब क्‍या रहा? सब एक-दूसरे को किसी और निगाह से देखने के पहले शक की निगाह से देखते हैं! और नेक मंशायें या तो पैरों तले रौंद दी जाती हैं या फिर हंसी में उनका उपहास बनता है! जो तत्‍काल बना भी.. पीठ पीछे ज़ाहिल और मुझे लांछित करती वह हंसी बेशर्मी से गूंजती रही.. इसके दंश से तकलीफ होने लगी तो पलटकर मैं चीखा- ये तुम्‍हारी फ़ि‍ल्‍म नहीं है, और मैं कोई जूनियर आर्टिस्‍ट नहीं हूं, सो जस्‍ट स्‍टॉप इट यूअर इडियोसी, इट्स सिकेनिंग!

अपने नारंगी जैकेट की जेब में हाथ डाले नायक खड़ा हो गया, मुस्‍कराने लगा- यू आर वेरी टची, मैन.. यू कैनॉट कैरी ऑन लाइक दिस.. नॉट हियर! नॉट एनीवेयर.. दुनिया बड़ी ज़ालिम जगह है, मेरे दोस्‍त!

फिर सिर झटक कर नायक ने मुझे अपनी तरफ आने का इशारा किया. दूसरा कोई चारा न देख, मैं डक पर आऊट हुए बैट्समैन की तरह उसके पवेलियन की ओर लौटा. मेरे निकट पहुंचते ही कुली नंबर वन फिर थेथरों की तरह हाथ-पैर फटकता हंसने लगा, जैसे कॉमेडी का अवतार वह नहीं मैं होऊं.. उसी तरह से फिर एकदम चुप भी हो गया. बोला- यार, तुझे कुछ पीना-पिलाना था, मुझसे कहता.. उस काले, जंगली के पास जाने की क्‍या ज़रूरत थी?.. नाम क्‍या है तेरा? इधर कहां से टपक गया?.. भाई लोगों से कोई कनेक्‍शन तो नहीं?..

(जारी...)

Wednesday, April 25, 2007

लड़की आएगी.. फ़ाम और फ़ाम फताल दोनों आएंगी!

एच की मौत: पांच

थाने से निकलकर दामोदर दास ने साइकिल रिक्‍शा किया. रणनीति के बतौर अच्‍छे लक्षण नहीं थे मगर उसके साथ जबरजस्‍ती मैं भी हो लिया. दामोदर दास हैरानी से मुझे देखता रहा. ये क्‍या तरीका है वाले अंदाज़ से. नज़रअंदाज करके मैंने पूछा- और?.. कैसा चल रहा है?..

खाक़ चलेगा?- दामोदर दास ने चिढ़कर कहा, कहानी किधर जा रही है कुछ सूझ ही नहीं रहा. वैसे ही झमेलों की कमी नहीं थी, लगता है खामखा एक नयी मुसीबत पाल ली है. शुक्‍ला जी की नज़र गई तो मेरी नौकरी पर खतरा भी हो सकता है. वैसे ही कॉलेज में मैं किसी का चहेता नहीं. छात्र तक गंभीरता से नहीं लेते. दो महीने पहले आते-आते बात संभल गई थी वर्ना एक लड़के ने लगभग मुझ पर हाथ छोड़ ही दिया था.. मुझे क्‍यों उलझा दिया है- इस कार्य के लिए मेरी उपयुक्‍त पात्रता नहीं है, लेखक महोदय.. ?

मैंने कहा- जान-बूझकर तुम्‍हारा चुनाव किया है. डेलिबरेट है. सुबाचन यादव के साथ भी तुमने लक्ष्‍य किया होगा- नायकत्‍व नहीं है.. वही चाहिये मुझे.. समय व परिस्थितियों के बीच तनावपूर्ण रिश्‍ते में आबद्ध.. एक तरह का राइटियसनेस लेकिन आत्‍मविश्‍वास का अभाव.. थोड़ा कन्‍फ्युज्‍ड.. एंटी हीरो.. ऐसे ही टॉर्च के साथ मैं अपराध की दुनिया में उतरना चाहता था..

- लेकिन अपराध है कहां?.. खून-रक्‍तपात, अंधेरा, भ्रष्‍ट-तंत्र सामान्‍यत: जो तत्‍व होते हैं ऐसा क्‍या दिख रहा है? विषकन्‍या क्‍या सामान्‍य स्‍त्री तक नहीं है.. हजारी भैया के जीवन में न मेरे..

- आएगी, आएगी.. कन्‍या भी आएगी और पीछे-पीछे विष भी.. मैं इतने वर्ष मेधा पाटकर और वामपंथी सभाओं की संगत में राष्‍ट्रीय परिस्थिति का अध्‍ययन नहीं कर रहा था, और न नौकरी करते हुए पैसा पीट रहा था- देख ही रहे हो मेरी स्थिति, तुम्‍हारे साथ फटी बांह वाले रिक्‍शे में टहल रहा हूं, शिमला में नहीं सेमलगंच में टहल रहा हूं!- जासूसी उपन्‍यासों की संगत में ही यह सारा समय बीता है! तो, बंधु, नैरेटिव की तुम चिंता न करो, चार-आठ फ़ि‍ल्‍में लिखते हुए एलिमेंटरी सस्‍पेंस बिल्‍ड करना हम जानते हैं, ‘पहला पड़ाव’ जैसी चीज़ न भी बने, इतना खराब भी न बनेगा कि श्रीलाल जी दु:खी हो जायें. दु:खी तुम भी नहीं होगे भले हमारी कथा का सुखांत न हो. सुखांतों में हमारा विश्‍वास नहीं.. वह हम अपने व्‍यक्तित्‍व के खास टेढ़ेपन में मजबूर हैं.. मगर दूसरे स्‍तरों पर रोचकता बनी रहेगी, तुम बस अपना उत्‍साह बनाये रखो. लोग टांग खींचें, मुंह बनायें, एच की मौत मील का पत्‍थर बनेगा इससे बेफिक्र रहो!

दामोदर दास अच्‍छे शिष्‍य की तरह बात सुनकर बेफिक्र नहीं हो गया- वैसे भी मुझ-से निराले का वह रामविलास तो नहीं ही हो सकता था, अपने हजारी का किस हद तक नामवर हुआ था इसकी तस्‍वीरें भी अभी खुलकर सामने आनी थीं- चिं‍ता के स्‍वर में बहकने लगा- एक बात बताऊं, महोदय जी? यह आपका जो बालसुलभ, तसल्‍लीबख्‍श तरीका है उसकी सोचकर कभी-कभी बड़ी हैरानी में पड़ जाता हूं! आपने जासूसी उपन्‍यास पढ़े होंगे मगर किशोरीदास वाजपेयी, मैथिलीशरण और महावीर प्रसाद को नहीं पढ़ा.. छायावाद पढ़ा है? प्रयोगवाद, अ-कविता जानते हैं?.. फिर काहे के बूते हिंदी की दुनिया खड़ी करेंगे? मज़ाक है, हंसी-ठट्टा है? यहां सेमलगंज की एक वाजिब, इन-टोटो कल्‍पना खड़ी करने में हंफहंफी छूट रही है और आप हिंदी के विराट कुएं में उतरने की बात कर रहे हैं! और हाथ में मैं बत्‍ती लिये आगे-आगे चलूंगा? कहां से चलूंगा, मालिक? मैं जीवन के बारे में जानता कितना हूं! हजारी भैया तक को ठीक से जानता था दावे के साथ नहीं कह सकता.. बत्‍तीस वर्ष की अवस्‍था हो गई अभी तक प्रेम जैसे स्‍वाभाविक भाव से अछूता रहा हूं और मुझमें नायकत्‍व ठेल रहे हैं और कहते हैं कथा में रोचकता बनी रहेगी? मुझे पहले ही भय था हम प्रपंच नहीं प्रमाद व प्रहसन की तरफ बढ़ रहे हैं!

साइकिल रिक्‍शा संजय गांधी इंटरमीडियेट कॉलेज के बेरौनक और बेमतलब पड़ोसी भीड़भरी गली से गुजर रहा था. दामोदर दास की बातों में अगर सत्‍य का कोई पुट था तो अभी एक उलझे जिरह में उतार कर मैं उसका दिन खराब करना नहीं चाहता था. वैसे भी उसे कक्षा को देरी हो रही थी, और सुबाचन यादव अच्‍छे प्रेरणा-पुरुष नहीं ही साबित हुए थे. जवाब देने की बजाय मुस्‍कराने लगा. दामोदर दास के चेहरे पर हैरानी फैल गई. मेरे रवैये से नहीं जो गली में दिख रहा था उसकी प्रतिक्रियास्‍वरुप..

पान की दुकान पर सैकेंडहैंड फटफटिया रोके उसकी कक्षा के दो छात्र बजाज की दुकान से निकल रही एक पंद्रह साल की लड़की को अपना रंगीलापन दिखा रहे थे. और बाज़ार चुपचाप देख रही थी. दामोदर दास उद्वि‍ग्‍न होकर रिक्‍शे में खड़े हो गए और उसी तेजी से मैंने हाथ खींचकर वापस बिठा लिया.

(जारी..)

Tuesday, April 24, 2007

किताबें और नीना सिमोन

आज लिखने का जी नहीं.. बीस वर्ष नहीं, एच की मौत नहीं.. छंद, मुक्‍त कुछ भी नहीं.. झोले में कुछ किताबें ढोकर लाया हूं, उनके बीच गर्दन धंसाये शाम गुज़ारना चाहता हूं.. नीना सिमोन को सुनना चाहता हूं.. जिन्‍हें जैज़, और खास तौर पर पुराने जैज़ से मतलब है.. शाम की बेचैनियों और इवनिंग ब्‍लूज़ से मतलब है, उनके लिए नीना की ये चंद थरथराती लाइनें..

I want a little sugar
in my bowl
I want a little sweetness
down in my soul
I could stand some lovin'
Oh so bad
Feel so lonely and I feel so sad

I want a little steam
on my clothes
Maybe I could fix things up
so they'll go
Whatsa matter Daddy
Come on, save my soul
Drop a little sugar in my bowl
I ain't foolin'
Drop a little sugar in my bowl

Well I want a little sugar
in my bowl
Well I want a little sweetness
down in my soul
You been acting strangely
I've been told
Move me Daddy
I want some sugar in my bowl
I want a little steam
on my clothes
Maybe I can fix things up so they'll go
Whatsa matter Daddy
Come on save my soul
Drop a little sugar in my bowl
I ain't foolin'
Drop some sugar- yeah- in my bowl.

इस वर्ष के साहित्‍यरत्‍न पुरस्‍कार की घोषणा और बूझिये विजयी कौन?

साहित्‍य की भारी अव‍नति के बीच अभी भी उम्‍मीद का एक दीपक (सुनील नहीं) बाकी

लेखक: मैं मैं मैं

बाबूजी ने लम्‍बी उम्र का फायदा उठाकर जीवन में ढेरों गंदे काम किये थे. अच्‍छे केवल दो किये. पहला यह कि गिरगांव में एक तिमंजिला मकान बनाकर मेरे नाम छोड़ गए, कि मैं निर्विघ्‍न, चिंतामुक्‍त भाव से साहित्‍य को समर्पित हो सकूं (जो मैं हुआ भी), दूसरे अपने साहित्‍य-प्रेम को अमर करने के लिए वे साहित्‍यरत्‍न मंजूषा जैसा पुरस्‍कार स्‍थापित कर गए और इस तरह साहित्‍य में वह और साहित्‍य को अपने में अमर कर गए. उसी अमरता की छांह में बैठा मैं नियमपूर्वक साहित्‍य उत्‍पादन में सेवाभाव से लगा हूं. कभी-कभी सारे दिन लगा रहता हूं कुछ नहीं निकलता और कभी निकलना शुरू होता है तो झड़ी लग जाती है. जैसे, देखिये, आज सुबह से लगी हुई है. एक बानगी लीजिये:

रेल की खिड़की पर बैठकर सफर करना कितना सुहाना लगता है
सुबह नियम से मोहल्‍ले न गया हमको तो वो दिवाना लगता है
रवीश, ऐ रवीश, बजाते रहें आप झुनझुना है यही आपका नसीब
हमसे अच्‍छा लिख ले कोई सोचता है वो बड़ा अनजाना लगता है.
ख़ैर, इस वर्ष के साहित्‍यरत्‍न मंजूषा पुरस्‍कार की घोषणा हो चुकी है, और जैसाकि अपेक्षित था बिना विवाद, बिना प्रतियोगिता मैं फिर विजयी चुन लिया गया हूं. ऐसा नहीं है कि विवादी हवाएं नहीं बह रही थीं या प्रतियोगी ठेलमपेल नहीं थी मगर बाबूजी की छत्रछाया में हम घास नहीं छीलते रहे हैं, हिंदी साहित्‍य का सूक्ष्‍मता से अध्‍ययन ही करते रहे हैं. तो अध्‍ययन, जैसाकि निकलना था, सही निकला और हम आगे आगे निकल गए. मुख्‍य पांच प्रतियोगियों में सबसे ज्‍यादा हाथ-पैर रवीश कुमार ही मार रहे थे. सीधे उंगली घी निकलती न देख धमकियों के लेवल तक गिर गए. फोन पर कहने लगे- साहित्‍य के फेरे में मत रहना, मोतिहारी के पहुंचे हुए गुंडे हैं! साहित्‍यरत्‍न हमें नहीं मिला तो मंजुषा को उठा ले जायेंगे. ऑफिस फूंक देंगे, हां! मैं फोन पर मुस्‍कराता रहा और अंदर ही अंदर ऑफिस की बीमा पालिसी का स्‍मरण कर और ज्‍यादा मुस्‍कराता रहा. उसके बाद रवीश कुमार से निपटने के लिए अपने गुंडे नहीं भेजे. उनके प्रकाशक के पास एक फोन भेजकर उनकी किताब रुकवा ली. रवीश कुमार की देखा-देखी अविनाश भी फुदकने लगे थे. पत्र में हंसते हुए लिखा प्रतियोगिता से रवीश हट गए, अच्‍छी बात है, रास्‍ता साफ हो गया है! पांचवी कक्षा से ही मंच पर जाकर पुरस्‍कार पाने की बड़ी हसरत है, इस बार हमीं को जीत जाने दीजिये, भैया? मैं सन्‍न रह गया. चौबीसों घंटे समाज और साहित्‍य की चिंता का नाटक खेलनेवाला सीधे-सीधे बचपन और बचपने की हसरत के नाम पर साहित्यिक प्रसिद्धी क्‍लेम करना चाहता है! मैंने सन्‍नता प्रकट नहीं की, जेब से अचूक अस्‍त्र निकालकर उसकी तरफ उछाल दिया. ठंडे स्‍वर में कहा- एक बात बताओ, पुरस्‍कार कमेटी के गुजराती सदस्‍य तुम्‍हे वोट देंगे?.. इस बार अविनाश सन्‍न रह गए और उसके बाद से लगातार सन्‍न ही बने रहे हैं. अपने पत्रों में बचपन, हसरत, साहित्‍य, पुरस्‍कार जैसे शब्‍दों का प्रयोग बंद कर दिया है.

अगले प्रत्‍याशी- अभय तिवारी ज्‍यादा टेढ़ी खीर थे. एक तो बाबाओं की तरह भय जगानेवाली दाढ़ी बढ़ा रहे थे, दूसरी ओर राम की शांति-पूजा जैसी लंबी कविता लिखने का प्रपंच भी खेल रहे थे. मैंने सीधे रणभेरी बजाने की बजाय कूटनीति लड़ाने का शांतिप्रिय रास्‍ता पकड़ा. जींस और स्‍नीकर्स फेंककर धोती-कुर्ते में निर्मलानंद पहुंचा, प्रणाम इत्‍यादि के बाद बोला- पुरस्‍कार तो इस बार आप ही को मिल रहा है, पंडित जी! पंडित जी किसी मोटे ग्रंथ पर झुके हुए थे, आठवें स्‍कन्‍ध का सस्‍वर पाठ कर रहे थे, दाढ़ी के लहरीलेपन में हाथ घुमाते हुए आंखों ही आंखों मुस्‍कराये. मतलब था आप बता क्‍यों रहे हैं वो तो हम जान ही रहे हैं. भीतर की तकलीफ को स्‍वर में ढालकर मैंने कहा- यह सब आप क्‍या कर रहे हैं, पंडित जी? इस तरह के आयोजन में उलझकर अपने को लघु बना रहे हैं? अब यही स्‍तर रह गया है आपका कि अविनाश, रवीश और हमारे जैसे चिरकुटों के स्‍तर की प्रतियोगिता में आप भाग लें? इसी दिन के लिए आप राम की भक्ति में आकंठ उतरे थे? क्‍या सोचेंगे पुरुषोत्‍तम? और सृजनशिल्‍पी? सोचा है आपने कैसी-कैसी लम्‍बी प्रतिक्रियाओं का आपको जवाब लिखना होगा? साहित्‍य में है क्‍या? देख ही रहे हैं बोधिसत्‍व तक अपने को डाक्‍टर लगाकर चार-चार पुरस्‍कार दाबे बैठे हैं, उसी स्‍तर तक गिरना चाहते हैं आप? वाजिब लगता है आपको? आपकी तो असल जगह है आश्रम और युगनिर्माण योजना! गीता प्रेस, गोरखपुर से भी पुरस्‍कार मिल रहा होता तो कोई बात थी मगर साहित्‍यरत्‍न मंजूषा? थू-थू-थू! छो‍ड़ि‍ये, सरकार, लात मारिये! अभय जी पर एकदम-से वांछित असर पड़ा, तत्‍क्षण पंडित हजारीप्रसाद की नकल करने लगे. मुस्‍कराहट चली गई और लौटी तो मंजूषा छोड़ ही नहीं चुके थे, लात भी लगा दिया था और हमसे युगनिर्माण योजना को पत्र लिखवा रहे थे!

आखिरी मोर्चा विदेश में बैठे आदमी का था इसलिए हम थोड़ा दायें-बायें हो रहे थे. फिर लेमन सोडा की ठंडई से ताज़ा होते हुए हमने ख्‍याल किया कि दारा शिकोह, सुलतान शुजा, मुरादबख्‍श को ठिकाने लगा चुके हैं तो बुड्ढे शाह आलम से किस बात का डर? बड़ी बेग़म जैसी किसी कहानी की ख़बर होती तो वहीं से लपेटते मगर चूंकि ऐसा कोई भेद हमारे पास था नहीं, हमने उन्‍हीं के हथियार से उन पर चोट किया. पूछा- तो आप भी पुरस्‍कार के प्रत्‍याशी हैं? सुनते ही परदेसी बाबू चहकने लगे- सोलह वर्ष की अवस्‍था से ही कवितायें लिख रहा हूं! कविताओं के चक्‍कर में ही दो बार इम्‍तहान के नतीजे खराब हुए. करियर छूट गया, कवितायें नहीं छूट सकीं! पाठक और पुरस्‍कार मोह स्‍वाभाविक है.. आपको नहीं लगता?.. मुझे क्‍या लग रहा था बताने की जगह मैंने काउंटर क्‍वेस्‍चन किया- पुरस्‍कार के आवेदन हेतु अपना नाम बताइयेगा आप?.. सवाल सुनना था कि अनामदास हांफने लगे, फिर पाला छुड़ाकर पुरस्‍कार से विपरीत दिशा में भागे. पुरस्‍कार की दिशा में मैं भागा!

(ऊपर: जाने किसका प्रतिनिधित्‍च करता एक बेमतलब का चित्र, नीचे: मेरे साहित्‍य से लाभान्वित होती एक ज्ञानशील पाठिका)

Monday, April 23, 2007

ज़माने की बेवफ़ाइयां और कुली नंबर वन की एंट्री

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: चौंतीस

नीचे टेंट के सामने कटिंग पी रहे इंडियन से गप्‍प लड़ाओ तब तक दुनिया के महान कार्य करके आती हूं कह के मनमोहिनी ईरानी ड्रीमगर्ल नहीं आने के लिए चली गईं! मैंने धूल में बनायी अपने दिल में धंसी तीर के गैर-महान स्‍केच को वापस धूल में मिला दिया और झींकने लगा. यह सब क्‍या होता रहता है मेरे साथ और क्‍यों होता रहता है! अविनाश मोहन राकेश के स्‍तर के चरित्र अभिनीत कर रहा है, अभय तिवारी चे ग्‍वेवारा और श्री अरविंद के बीच सेतु बन रहे हैं, रवीश कुमार मोतिहारी से मैक्सिको सिटी के बीच पता नहीं कितनी पूंजी इधर से उधर से इधर कर रहे हैं, और रेहाना रानी नारी के सभी प्रचलित, घिसे रूपों को झुठला कर जाने किस नए, अनोखे रूप की स्‍थापना को कृतसंकल्‍प है. माने सांस्‍कृतिक नवजागरण और पूंजी के जाने किस लेवल का जटिल एक्‍सपेरिमेंटेशन हो रहा है. एक के बाद एक सभी महानता के स्‍तर वाले कामों में ही हाथ, पैर, घुटना सब फंसाये हुए हैं (बीस वर्ष पहले का समय होता तो दूरदर्शन के ‘सुरभि’ के लिए सबका सिद्धार्थ काक टीवीआंकन कर रहे होते), अकेला एक मैं ही चिरकुट साबित हो रहा हूं जो माया मिली न राम का टीशर्ट पहने कभी इसके तो कभी उसके पीछे भाग रहा है. न अभी तक अपना ब्‍लॉग हाथ में आया है न ब्‍लॉग या बेब्‍लॉग की कोई बाला!

सबसे ज्‍यादा तकलीफ तो रुपाली से हो रही है.. जेपी आंदोलन के दौर से खादी भंडार का झोला और दिनमानी रंग-ढंग दिखाकर नचा रही है, और मैं नाच रहा हूं! सलमान खान ने भी एक पॉयंट पर जाकर हथियार (प्रेम के) डाल दिये थे, डब्‍ल्‍यूएस मैरियट के कॉफी शॉप में दूसरी लड़की को वाईन पिलाने चले गए थे- और मैं बजाय इसके कि वसंत विहार वाले घर में (हाय, जो हो न सका!) शेव करते हुए रुपाली से होन्‍डा सिटी बेचकर फोर्ड में शिफ्ट होने के सजेशन लेता, बिना शेव के अभी भी प्रेम का हथियार (जो वास्‍तव में बेड़ी साबित हो चुका है) लिए डटे हुए हूं! नीलिमा ने दो घंटे के लिए अपना शोध स्‍थगित करके प्रेम के इस निरर्थक, निर्मम चक्र से निकलने का कोई रास्‍ता सुझाया? नहीं. ब्‍लॉग की बत्‍ती बुझ जाने पर प्रत्‍यक्षा तो आ सकती थी. इतना तो कह सकती थी कि मैं भी बिहार की हूं और जिसे तुम बिचारी समझ रहे हो वह बिहारी नहीं बला और विषबाला दोनो है. बच के रहो. सच्‍चा प्रेम कैसे पाया जाता है इसपर मैं पेंग्विन हिंदी के लिए दो सौ पृष्‍ठों का एक लघु उपन्‍यास लिख रही हूं जो अरुधंति के लघु चीज़ों के देवता को बाज़ार में मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ेगी, किरण देसाई के ‘द इनहेरिटेंस ऑफ लॉस’ का अनुवाद स्‍थगित करवा देगी, तुम तब तक बस बेलग्रेड के पड़ोस में टीले पर मतवालेपन से बचे रहो, लेकिन नहीं, प्रत्‍यक्षा ने थोड़ा-सा भी सच्‍चा बिहारीपन नहीं दिखाया; मेरे दुख:हरण के साहित्यिक अनुसंधान की जगह लगभग मेरा माखौल-सा उड़ाते हुए पिकनिक के नाम से कहानी लिख ही नहीं डाली, उसे यादव के काले हंस में छपवा भी लिया. आह!.. कमसकम एक एसएमएस तो कर सकती थी कि प्रमोद, जानती हूं तुम्‍हें गहरी चोट पहुंची है, मगर पिकनिक सामाजिकता की मजबूरी थी, पति और साहित्यिक समाज के सामने अपने को स्‍थापित करने के लिए लिखा था, तुम्‍हारे लिए अभी दफ्तर के कंप्‍यूटर पर लिख रही हूं- तुम्‍हारे अंदर के प्रेम को बचा लूंगी, इट्स अ प्रॉमिस, लेकिन नत्थिंग ऑव दैट सॉर्ट! कुछ नहीं बचाया! हरियाणा की बिजली, अपना घर और ब्‍लॉग बचाने में फंसी रही एंड दैट्स इट! क्‍या निष्‍ठुर निर्ममता की यही छवियां देखने और इसी तरह का ठंडा स्‍नेह पाने के लिए मैं ब्‍लॉगजगत में आया था? क्‍या इसीलिए कहां-कहां से गुजरकर भी मैं कहीं नहीं गुजर पाया था! एकदम-से भोजपुरी में भावुक हो गया- ओह, रवीश, व्‍हॉट काइंड ऑव क्रुएल ट्रुत्‍थ्‍स यूअर एक्‍ट इज़ फोर्सिंग डाऊन अपॉन माई माऊथ?..

तीसरी कसम के आखिर में वहीदा रहमान को खोकर जो अवस्‍था हीरामन गाड़ीवान की होती है, कुछ वैसे ही गहरे सदमे से मैं भी गुजर रहा था. हालांकि यह ठीक-ठीक तय नहीं कर पा रहा था किस प्रेमिका को इन मीठे घावों के लिए जिम्‍मेदार ठहराऊं. रफी साहब वाली आवाज़ होती तो मैं मन ही मन गाईड का क्‍या से क्‍या हो गया का बर्मन दा वाली धुन गुनगुनाता, फिर शैलेंद्र को गालियां भी देता कि ये सब लिखकर आपने अच्‍छा नहीं किया, शैलेंद्र साहब, ये दर्द की मीठी गोलियां प्रेमी के दुख का निवारण नहीं करतीं, जीवन भर का टंटा दे देती हैं! मगर ये सब मैंने कुछ नहीं किया, मधुमती के दिलीप कुमार की तरह हाथ की छड़ी घुमाता हुआ बिना हुर्र-हुर्र किये टीले से नीचे उतर आया. दैत्‍याकार टेंट के सामने पीले पैंट और नारंगी जैकेट में जो भी साहब कटिंग पी रहे थे, अब तक पी चुके थे और दिहाड़ी के सर्बियाई मजदूरों को मां-बहन की गालियां पिला रहे थे, और ठेठ हिंदुस्‍तानी में पिला रहे थे. ज़ाहिर था इससे ज्‍यादा शानदार तरीके से किसी इंडियन का इंट्रोडक्‍शन संभव नहीं होता. मगर इस रौबिले शख्‍स को पहचानना अभी अधूरा था, क्‍योंकि उसके चेहरे पर नज़र जाते ही मेरे मुंह से बस इतना ही फूट पाया- अरे, हीरो नंबर वन? आप यहां?

(जारी...)

Sunday, April 22, 2007

क्‍या मनुष्‍य पशु-पक्षियों के बराबर पहुंच गया है?

एक अप्रगतिशील चिंतन

लेखक: चतुर्भूज शास्‍त्री

पहली बात तो यह कि मनुष्‍य-पशु चर्चा में पक्षियों को हटाइये. पक्षी होते क्‍या हैं? जान कितनी होती है, देह में कितना मांस होता है? गुलेल का एक छोटा कंकड़ खाकर ढेर हो जाती हैं ऐसी नाचीज़ चीज़ पर क्‍या चिंता करना! डॉ सलीम मोइज़ुद्दीन अली ने पूरी ज़ि‍न्‍दगी चिंता में गुज़ार दी- काफी नहीं है? चिंता करते-करते मर गए, खामखा पंछियों तक स्‍वयं को केंद्रिंत करने की वजह से ही वैसी ही पतली-दुबली काठी के नाचीज़-से इंसान रह गए थे! पक्षियों की बात मत कीजिये. ना-ना-ना. पशुओं की बात अलग है. हिंदी ब्‍लॉगजगत में पशुवत भाव आते ही देखिये, कैसी जीवंतता आ गई. पक्षी पचास पैसे वाला स्‍टैंप हैं जबकि पशु महानगर के फ्लाइओवर पर अस्‍सी इनटू अठारह फीट का पोस्‍टर है. गैंडे को लीजिये, भालू, भैंस, चिंपैंजी को देखिये, सब मनुष्‍य के बराबर खड़े हो सकते हैं. मनुष्‍य भी उनके बराबर खड़ा हो सकता है (कुछ अपवादस्‍वरुप उदाहरण भी होंगे, मसलन- जब अप्रगतिशील मित्र पी सिंह ओंकारेश्‍वर के बन्‍दरों के बराबर खड़े होने की बजाय भाग खड़े हुए थे, मगर उन्‍हें अपवाद की तरह ही देखा जाना चाहिये- सामान्‍यीकरण करते हुए हम प्रगतिशील ब्‍लॉग मोहल्‍ले की टंटेबाजियों का शिकार होंगे जैसाकि आज के माफ़ीनामे वाले पोस्‍ट पर पंडित-प्रोफेसर-डाक्‍टर अभय जी तिवारी जी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए साफ किया भी है- क्‍योंकि समाज के सामने दारा सिंह और धर्मेंद्र जैसे सशक्‍त उदाहरण भी उतनी ही मात्रा में हैं जहां ये महानुभाव न केवल पशुओं के बराबर खड़े हुए बल्कि पशुवत मुकाबला करके उन्‍हें पराजित भी किया.

धर्मेंद्र ने बॉक्‍स ऑफिस पर बुरी तरह पिटी मशहूर फिल्‍म ‘आज़ाद’ में बबर शेर- राज बब्‍बर नहीं- को पछाड़ ही नहीं दिया था, दुम दबाकर भागने पर मजबूर कर दिया था. फिर अन्‍य ढेरों फिल्‍में हैं जिसमें सिर के गंजे पशु के मानवीय अवतार शेट्टी को धर्मेंद्रपा लगातार धोते रहे हैं. शेट्टी के आते ही दर्शकगण समझ जाते कि अब यह धुलेगा, चांद में दरार और खून की धार फुटेगी आदि-आदि). पशु के ढेरों ऐसे गुण हैं मनुष्‍य जिनका अनुकरण करने में सक्षम हुआ है. क्षमा कीजियेगा मैं पुन: धर्मेंद्रपा पर लौट रहा हूं- राज खोसला जी की उस युगांतकारी कृति ‘मेरा गांव मेरा देश’ के उस अमर दृश्‍य का स्‍मरण करें जिसमें नायिका आशा पारेख के ध्‍यानाकर्षण के लिए वह पशुवत पंछी की तरह आवाज़ निकाल रहे हैं! (किस पंछी की तरह निकाल रहे थे इस जानने के लिए कृपया डॉ सलीम अली की संपूर्ण रचनावली, ऑक्‍सफर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्‍ली कंसल्‍ट करें) फिर हमारे एक अभिन्‍न मित्र की ग्‍यारह वर्षीय पुत्री हैं जो अभी भी सीधे सवालों का जवाब अजीब-अजीब तरीकों से मुंह बनाकर ऐसे स्‍वर निकालकर देती हैं जो मित्र के परिवार से अलग कोई पहुंचा हुआ पशु विशेषज्ञ ही डि-कोड कर सकता है. स्‍वर के साथ-साथ क्रिया-समानता के भी विस्‍तृत प्रमाण हैं. दरभंगा के पुनिया ओझा अपने गांव की दीवारों व झाड़ में ही नहीं, दरभंगा बस डिपो के बसाते परिसर में भी- लघुशंका से निवृत होते वक्‍त जिस अदा से एक टांग थोड़ा ऊपर करके दूसरे टांग की मनमोहिनी टेक लेते हैं, अपना नहीं किसी श्‍वान का ही बोध कराते हैं. ढेरों उदाहरण हैं. इस पर बात करना शुरू कर दूंगा तो पंडित अभय जी तिवारी अपनी पंडिताई और रवीश कुमार अपनी पत्रकारिता और प्रत्‍यक्षा अपनी ग्रीवा टाईप अप्रगतिशील कवितायें भूल जायेंगी इसलिए चुप रहकर यहीं इतिश्री करता हूं. आपकी जिज्ञासा के बंध अगर फिर भी खुले रह गए हों तो कृपया राजकमल से छपकर आ रही मेरी आसन्‍न पुस्‍तक ‘पशुवत’(पैसों के सवाल पर श्री माहेश्‍वरी ने कोई नया खेल न खेला तो) के आ जाने तक धीरज रख लें (पत्‍नी, प्रेमिका, बच्‍चों की पिटाई करते हुए, ‘भेजा फ्राय’ देखते हुए किसी तरह टाईम पास कर लें, प्‍लीज़).

(अप्रगतिशील लोकोदय माला, ग्रीष्‍मकालीन पशु विशेषांक से साभार)

संभावनाओं की हत्‍या

एच की मौत: चार

थाना प्रभारी सुबाचन यादव सोच रहे थे उनकी पत्‍नी समझदार और बच्‍चा बड़ा हो गया है. बच्‍चे के चेहरे की आभा को देखते हुए वैसा ही अनुकूल नाम चुना है उन्‍होंने- विवेक! पिता की गोद में चार साल का विवेक देह पर महंगा जाकिट और माथे पर ऊनी टोपा डाले जिज्ञासु दृष्टि से चौतरफा सौंदर्य का अवलोकन कर रहा है. कंधे पर कश्‍मीरी शॉल और हाथ में विवेक के दूध का फ्लास्‍क लिए पत्‍नी मुदित मन साथ चल रही है. सुबाचन सुखी हैं परिवार पहाड़ घुमने आया है. परिवार में पहले व्‍यक्ति हैं जो प्रदेश से बाहर निकला है. किसी काम-काज व रिश्‍तेदारी के संबंध में नहीं पर्यटन हेतु यात्रा कर रहा है. पर्यटन उद्योग से जुड़ गया है. सैकड़ों वर्षों के पददोलन के उपरांत क्रमश: स्थिति बदल रही है. और इसे परिवार और बिरादरी में उन्‍होंने कर दिखाया है. इसकी उन्‍हें प्रसन्‍नता है. गर्व है. उनका बेटा दो कदम और आगे जाएगा. दो क्‍यों बीस कदम आगे जाएगा! अध्‍ययन के लिए पहले दिल्‍ली फिर विदेश जाएगा. डाक्‍टरी और फिर जाने क्‍या-क्‍या की पढ़ाई करेगा. विवेक के मुंह से ज्ञान व तकनीक के ढेरों शब्‍द वे पहली दफा सुनेंगे और ताजुब्‍ब करेंगे कि संसार में शिक्षा के साथ कितना कुछ संभव है. हर्षातिरेक से तर सुबाचन यादव ने गोद में उनींदे बेटे का गाल चूम लिया. बेटे ने कुनमुनाकर बंधन से निकलने की छटपटाहट दिखाई. थाना प्रभारी चिंतित हुए- क्‍या परेशानी है? विवेक ने शांत स्‍वर के सुलझेपन में जवाब दिया- पप्‍पा, मुझे नीचे उतारो! मैं गोद की सुरक्षा में नहीं अपने पैरों के स्‍वावालंबन पर चलना चाहता हूं! बच्‍चे के जवाब से थाना प्रभारी का गला भर आया. भरी हुई अवस्‍था में ही था जब उन्‍हें संजय गांधी इंटरमीडियेट कॉलेज के मास्‍टर को अपनी कुर्सी में व्‍यग्र व उद्वेलित अवस्‍था में कसमसाते देखने का ध्‍यान हुआ. और बेख्‍याली में माचिस की तीली से मसूड़े के अवांछित स्‍थल को घायल करके एकदम-से सुबाचन यादव यथार्थ में लौटे. किंचित अप्रसन्‍नता से मसूड़े पर जीभ फिराते हुए बोले- जघन्‍य है जो है इसका वास्‍तविक प्रमाण कहां है, मास्‍साब? सब अनुमान, संभावना के दायरे में है. फिर आप हिंदी और हजारी जी को मिला रहे हैं. फिर एक्‍चुअल लाश है कहां? जब तक एक्‍चुअल बाडी नहीं मिलती एक्‍चुअल में केस नहीं बनता- आप समझ रहे हैं क्‍या कह रहा हूं?..

नहीं. दामोदर दास समझ नहीं रहा था. वह अब एक्‍चुअल में सुन भी नहीं रहा था.

थाना प्रभारी फिर माचिस की डिब्‍बी खोल तीलियों से छेड़छाड़ करने लगे- मुझे लगता है बिना भावुक हुए अभी भी पूरे मसले पर विचार करने की ज़रूरत है. हो सकता है हमेशा की तरह, जैसा आप खुद कह रहे थे- हजारी जी बनारस, इलाहाबाद, उज्‍ज‍यनि कहीं की यात्रा पर निकल गए हों और एक्‍चुअल में जो है कांड जैसा कोई कांड हुआ ही न हो!.. नहीं, आप बुरा मत मानिये, मैं ऐसे ही एक संभावना सजेस्‍ट कर रहा हूं. एक पॉसिबिलिटी हो सकती है, नहीं?..

सुबह से भूखे पेट थाना प्रभारी सुबाचन यादव थे लेकिन झुंझलाहट दामोदर दास को हो रही थी. कुर्सी से उठते हुए चिढ़े स्‍वर में कहा- एक क्‍यों सब संभावनाएं खुली हुई हैं. हिंदी एक दमित जाति की मार्मिक ज़बान हो सकती है, पुस्‍तकों की बिक्री में एक क्रांतिकारी उछाल आ सकता है मगर यह भी संभव है हिंदी रसातल में चली जाये. दुनिया की सारी तकनीकी क्रांति उसकी रक्षा न कर सके और एक भाषा का अंत हो जाये. यही सब तो सवाल थे जिसकी हजारी भैया ने अपनी पुस्‍तक में परीक्षा की थी.. मगर थानेदार साहब, उलझा प्रसंग है, समझ सकता हूं आप नहीं समझेंगे. आप सबूत और दरयाफ्त‍गी की भाषा बोलते हैं.. जबकि हजारी भैया इतिहास और राजनीति की पड़ताल में लगे थे. दो अलग-अलग धुरियों पर खड़े हैं आप लोग.. खड़े थे मेरा मतलब.. हजारी भैया..

- मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है, मास्‍साब, मगर...

- आप गलत समझ रहे हैं. मैं यहां दृश्‍य में हूं ही नहीं. मैं तो साधन मात्र हूं.., तुनककर दामोदर दास ने कहा- हमदर्दी तो आपको हिंदी से होनी चाहिये, जिसका वध हुआ है, जिसकी हजारी भैया पड़ताल में जुटे थे.. लेकिन आप उतना भी कष्‍ट न करें. मरियाडीह में और आपराधिक मामले हैं, आप उन्‍हीं पर ध्‍यान दें.. और यह जो जघन्‍य कांड हुआ है.. जो आपकी नज़र में अभी वास्‍तविकता भी नहीं मात्र संभावना, पासिबिलिटी और एक विचार भर है उसका मैं अनुसंधान करता हूं. काम के कुछ तथ्‍य हाथ लगे तो फिर लौटकर आपके पास आऊंगा.. हमारी मुलाकात होगी.. तब तक के लिए नमस्‍कार!- इतना कहकर थानेदार बाबू के जवाब की प्रतीक्षा किये बिना दामोदर दास तेज कदमों से कमरे से बाहर निकल आया. सुबाचन यादव थोड़ी देर तक असमंजस में रहे फिर नाराज़ होने लगे. दामोदर दास पर नहीं अपनी पत्‍नी पर हो रहे थे. कि बेवकूफ औरत मां के यहां बुलाये जाने पर राजी क्‍यों नहीं हो रही थी.

(जारी..)

हिंदी कवि: एक क्रांतिकारी हस्‍ती का क्रांतिधर्मी परिचय

एक निबंध: (फिर वही) माध्‍यमिक शिक्षा में कम नंबरों से पास हुए छात्रों के लिए उपयोगी

लेखक: देवीप्रसाद, बीए, बीएड, लघु पत्रिकाओं के अनुभवी व मूर्धन्‍य कवि

हिंदी का कवि हिंदी में कवितायें लिखता है. हिंदी का कवि कवितायें लिखने के साथ-साथ कवितायें पढ़ता भी है (बशर्ते उसे दोस्‍तों ने, या उभरती हुई कवियत्री, या दो हाथ दो पैर वाली किसी भी लड़की ने लिखी हो). हिंदी का कवि सिर्फ हिंदी में लिखी कवितायें ही पढ़ता है. यह बात पूरी तरह से गलत, बेबूनियाद और हिंदी विरोधियों का षड्यंत्री दुष्‍प्रचार है कि वह अंग्रेजी, जापानी व अन्‍य विदेशी भाषाओं में छपी कवितायें पढ़ता है. गलत है. मलयालम में छपी तक नहीं पढ़ता. हिंदी कवि की मेज की दराज में छिपाकर रखी वर्ष भर प्रयोजन में आ सकने वाले विषयों की एक लिस्‍ट होती है जिसमें सामयिक प्रसंगों से लेकर चिरकाल को छेड़ते, झिंझोड़ते- नारी, वायु, नदी, समय, देश, चि‍ड़ि‍या, ईश्‍वर- आदि-इत्‍यादि वे सभी संभावित विषय-क्षेत्र होते हैं जिसपर फुरसत व तसल्‍ली से समय-समय कवि अपनी लेखनी चलाता उत्‍प्रेरक कविकर्म उत्‍पादित करता रह सके और हिंदी क्षेत्रों की अलग-अलग लघु पत्रिकाओं को दे-देकर उपकृत करता रहे. लघु पत्रिकायें उन्‍हें ले-लेकर उपकृत होती भी रहती हैं. हिंदी का कवि चुनावी नतीजों व उड़ीसा में भुखमरी के आंकड़ों की उस बेचैनी से प्रतीक्षा नहीं करता जिस बेचैनी से वह बेगुसराय व बांसडीह में छपी लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन की करता है, और तबतक करता रहता है जबतक पत्रिका हाथ में नहीं आ जाती. हाथ में आते ही सबसे पहले कवि मुंह में खैनी, तंबाकू, पान जैसी चीज़ दाबकर पत्रिका में छपी अपनी कविता खोजता है और खैनी, तंबाकू, पान के साथ कविता का रस लेता है. किसी कारणवश अगर पत्रिका अपने ताज़ा अंक में कविकर्म को प्रकाशमान न कर सकी हो तो हिंदी के कवि का रसास्‍वादन सूखकर भयानक वज्रपात में परिणत हो जाता है, और उसी को नहीं उसके परिवार, दफ्तर और आसपास के समाज सबको एक वीरान उदासी की जकड़ में ले लेता है. अदरवाइस हिंदी का कवि अपने समाज, देश, काल की चिंताओं, झमेलों से बहुत हद तक स्‍वतंत्र, स्‍वायत्‍त व सुखी प्राणी होता है. कवितायें अकसर वह गुनगुनाकर भी पढ़ता देखा गया है. उसके सामने समाज, अर्थशास्‍त्र व अन्‍य ज्ञान की पुस्‍तकें रख दीजिये, देखिये, सारा गुनगुनाना भूलकर कैसे वह भर्र-भर्र उल्टियां करने लगता है. हिंदी कवि के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए इस पर विशेष ध्‍यान देने की ज़रूरत है कि हिंदी कविता से अलग उसके सामने और किसी भी तरह की पठनीय सामग्री न रखी जाय. सामाजिक दबाव में बहुत हुआ तो कहानी, उपन्‍यास, नाटक की एकाध चीज़ पढ़वा लें, मगर समाजशास्‍त्रीय विषयों के बुरे असर से उसे कतई दूर रखें. थाली भर भात खाने के बाद दोपहर में उसे उचित मात्रा में सोने का अवकाश दें. जिला व प्रांतीय स्‍तर के विविध चिरकुट आयोजनों में निमंत्रित करके कवि को अपना कुर्ता-पजामा ही नहीं कवि छवि को भी मेंटेन करने का सुअवसर दें.

हिंदी को बचाओ

पैसे की गति क्‍या है बाज़ार कहां जाता है. कृषि किधर है खाद, खनिज, संसाधन, रोज़गार एस चांद एंड बुक्‍स के किन बक्‍सों में बंद क्‍या पहेली हैं. क्‍या बुद्ध, बनारस और बरसात पर लिखनेवाले कवियों ने इन पर कवितायें लिखीं. संपादक ओबीसी के पक्ष और विपक्ष में राय रख रहे हैं म्‍युचुअल फंड और इन्‍वेस्‍टमेंट बैंकर का धुंधलापन कौन साफ करेगा. सेंसेक्‍स का उतार-चढ़ाव ठीक है देश में धन आ रहा है की धमक है मगर गरीबी का क्‍या. रेल की पटरियों के बाजू की झोपड़पट्टि‍यां कहां जा रही हैं. उत्‍तर आधुनिकता पर कॉलम पर कॉलम भरे जाते हैं सुधीश, छोटा भाई देश को चौकन्‍ना किये रहता है मगर आर्थिक सूचकांकों पर कुछ नहीं बोलता. हम अंधेरे में हैं हिंदी के सुधी संपादक गण, बेचारे हैं मगर तुम्‍हारे ही तो हैं, ज्ञान का पेट्रोमेक्‍स नहीं लालटेन ही बरो ज़रा तेल भरो. हे पागलदास को रोनेवाले कवि हम भी यहां पागल हुए जा रहे हैं बनारस और बचपन से निकलकर सामने आओ, सर्वशिक्षा अभियान को कूचकर सरकार आगे निकल जाये हम पीछे छूट जायें इसके पहले हमको इस अशिक्षा के पागलपने से बचाओ. मकान और धन नहीं ज्ञान मांग रहे हैं, कवि, देव के आशीष, कुछ तकनीकी रास्‍ता दिखाओ. ओ बाबा, एइ रोकोम चोलबे ना, हिंदी को बाचाओ.

प्‍यार के पल दो पल

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: तैंतीस

मन शीतल होता न दिखा (यानी रेहाना पास आती न दिखी) तो मैं झुंझलाकर अनिल कपूर होने लगा (माने मवालीगिरी पर उतर आया), कहा- यार, हद है! जुम्‍मा-जुम्‍मा की मुलाकात.. प्‍यार-स्‍यार की रुमानियत में डूबने-उतराने की बजाय हर बखत हम एक-दूसरे का सिर नोंचे रहते हैं, ये कहां ले जाएगी हमारी मुहब्‍बत को!..

रेहाना में मेरी ओर ऐसे देखा जैसे अज्ञेय अपने काव्‍यपाठ के दरमियान अशोक चक्रधर की तरफ देखते. करीना कपूर मल्लिका शेरावत को देखती. बुंबई बोलांगीर देखती. मगर रेहाना ने महज़ देखा भर नहीं, देखती रही. किसकी पलक पहले गिर जायेगी वाला कंपिटिशन होने लगा. लेडीज़ फर्स्‍ट की याद करके पलकों को क्‍या, मैंने खुद को पूरा ही गिरा लिया, हें-हें हंसने लगा. रेहाना ने कान पर रखी सिगरेट निकाल कर सुलगा ली और धुआं उड़ाते हुए ‘पल्‍प फिक्‍शन’ के उमा थरमन वाले शॉट्स देने लगी. मैंने लेते हुए कहा- ये कान पर सिगरेट रखने का चलन तुम्‍हारे देश में भी है? हमने तो किसी ईरानी फिल्‍म में किसी कमउम्र हसीना को कभी सिगरेट पीते नहीं देखा. कमउम्र क्‍या बुजुर्गवार को भी नहीं देखा!

उमा थरमन की काया से निकलकर मांगा कॉमिक्‍स की किसी गंभीर विचारमग्‍न नायिका में तब्‍दील होती हुई रेहाना बोली- शायद शिक्षित, संस्‍कारी परिवार में तुम नहीं जन्‍मे. शायद बचपन में उपयुक्‍त मात्रा में तुम्‍हें प्रेम नहीं मिला. शायद इसीलिए प्रेम-प्रेम करके इतना ललकते रहते हो, छोटी-छोटी तकलीफ़ों से तुम्‍हारा चित्‍त अकिंचन होने लगता है (‘अकिंचन होने लगता है..’? तत्‍क्षण रेहाना की भाषा सुधारना चाहता था फिर मुझे लगा यह क्षण भाषा का नहीं भावनाओं का है), मैं इन तकलीफ़ों का जवाब नहीं हूं, प्रमोद. मैं यह रिक्‍तता व तिक्‍तता भर नहीं सकती! खुद तुम्‍हीं को इसकी लड़ाई लड़नी होगी. समाधान ढूंढ़ना होगा. मेरे ऊपर वैसे भी ढेरों जिम्‍मेदारियां हैं मेरी जिम्‍मेदारियां बढ़ाओ मत. बात-बात पर सताओ मत. बेवजह दुखी होऊंगी, तुम्‍हारा दुख हर नहीं सकूंगी!

भावों के ऐसे उच्‍छावास के बाद साहित्‍य और सिनेमा दोनों में प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से लिपट-चिपट जाते हैं, गले में बांह डालकर फुसफुसाते हुए दूसरे बड़े कारनामों की पूर्व पीठिका बनाने लगते हैं. मैं भी उसी परंपरा में स्‍नान करने को उद्धत हो रहा था, लेकिन परिस्थिति, साली, अनुकूल नहीं हो रही थी! नायिका तीन से छै कदम की दूरी पर चली गई और नौ साल का एक बेलग्रादी तस्‍कर लौंडा हमारे बीच अपने मर्चेंडाइस का मिनी स्‍टॉल लगाकर प्रेमबाधा बनने लगा. इसके पहले कि मैं हरकत में आऊं, रेहाना को वही रिझा रहा था. चीनी सिगरेट, सैंडल और ब्‍लॉग रिट्रीव करने के सॉफ्टवेयर दिखा रहा था. रेहाना ने गहरी उदासी से एक नज़र उसके माल-मत्‍ते पर डाली, फिर लौंडे के भूरे बालों में हाथ फेरकर नज़रें फेर लीं. मगर लौंडा उसमें संभावित ग्राहक देखकर चिपका रहा, तेजी से माल का रेट डाऊन करके मोलभाव करने लगा. भारतीय परिस्थिति होती तो कॉलर से लड़के को टांगकर चूतड़ पर एक लात लगाकर मैं उसे बाजू में कहीं ठेल देता, मगर रेहाना की मौजूदगी में शराफ़त की मुरव्‍वत करने को मजबूर था. मुस्‍कराकर लड़के को इशारा किया कि वी आर इन सीरियस डिस्‍कशन, डोंट बॉदर अस, पैल, प्‍लीज़? आज़ि‍ज आकर रेहाना ने कहा- आखिर तुम मुझसे चाहते क्‍या हो?

नीचे मैदान में हो रहे ह्यूज, अमानवीय कंस्‍ट्रक्‍शन को मानवीय उदास नज़रों से देखता मैंने धीरे-धीरे कहा- एक आदमी एक औरत से क्‍या चाह सकता है!

नायिका चिढ़कर बोली- येस, गो ऑन?.. आई डोंट नो. एजुकेट मी!

भरे गले से नायक ने कहा- मामूली, होमली कंफर्ट्स, मिस, व्‍हॉट एल्‍स. कि धुले हुए कुर्ते-पजामे में सोफे पर फैला हुआ, हाथ में पेपर लिये मैं समय और समाज के बारे में कंप्‍लेन करुं, तुम नाइटि में किचन में कोई ईरानियन डिश ट्राई करो, फिर खाने के बाद हम मल्‍टीप्‍लेक्‍स में साथ-साथ कोई बी ग्रेड चायनीज़ रोमेंटिक फिल्‍म देखने जायें, अंधेरे में मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर मेरे कंधे पर तुम अपना सिर टिका दो..- रेहाना के गुस्‍से से बचने के लिए मैंने ज़मीन पर गिरी एक सूखी टहनी उठा ली. धूल पर दिल में धंसी तीर की वर्ल्‍ड फेमस स्‍केच आंकने लगा.

रेहाना स्‍केच देखकर भावुक व इंप्रेस होने की बजाय और फैल गई, एकदम-से तेहरानी रेख्‍ता बोलने लगी- यू आर इनसपोर्टेबल. यू नो व्‍हॉट? मैं न आज तक कभी किचन में घुसी हूं न घुसने का इरादा है! तो फालतू सपने देखना बंद करो और अपने पैरों पर खड़े होना सीखो.. बिकॉज़ आई एम नॉट गोइंग टू कम एंड स्‍पून फीड यू! नेवर, एवर! रिमेम्‍बर दैट. आई हैव गॉट लॉट्स एंट लॉट्स ऑव अदर वरीस ऑन माई हेड. मैंने तुमसे पहले ही दिन कहा था और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्‍बत के सिवा..

मैं दुखी होकर बुदबुदाया- तब तुमने प्‍यार से कहा था. और ये भी कहा था कि तुमने हिंदी कैसे सीखी ये बताओगी, डिफ्लावर कब हुई थीं.. यू मेड सो मेनी प्रॉमिसेस, डिंडन्‍ट फुलफिल एनी..

- दैट्स एनफ, आई वोंट टेक एनी ऑव दिज़ बुलशिट, आई अम लीविंग..

- लीविंग? और मैं क्‍या करुंगा? इस अनजाने-बेगाने शहर में.. डोंट ब्रेक माई हार्ट, रेहु!

- डोंट कॉल मी दैट, यू हैव ऑलरेडी वल्‍गराइज्‍ड एनफ एज़ इट इज़.. तुम्‍हारे सिवा मैंने और भी प्रॉमिसेस किये हैं. अपनी कंट्री से किये हैं, आई कांट बीट्रे देम, कैन आई?.. वो नीचे टेंट के सामने कटिंग पी रहा एक इंडियन है, उससे गप्‍प लड़ाओ तबतक मैं कुछ काम की चीज़ करके आती हूं!

कौन इंडियन, कौन टेंट जैसे सवालों से मैं उसे और थोड़ी देर स्‍टाक करुं के पहले ही रेहाना ये आ और वो जा के अंदाज़ में फुर्र हो चुकी थी. उसके पीछे-पीछे वो तस्‍कर शैतान भी फुर्र हो गया. रह गया महज़ मेरा भीषण एकांत और सिगरेट का कुछ छूटा हुआ धुआं..

(जारी...)

Saturday, April 21, 2007

अप्रगतिशील कैंप में ज़हरीली घुसपैठ

अविनाशी शोले

चूंकि वृहत हिंदी ब्‍लॉगजगत (माने साढ़े पांच ब्‍लॉग) ने हिंदी फिल्‍मों के क्‍लाइमैक्‍स की तरह ‘शैतान’, ‘पाजी’, ‘कुत्‍ता कुमार’, ‘मिस्‍टर ज़हरीले’ का नगाड़ा पीट-पीटकर मोहल्‍ले के जंगली जानवर को उसके जंगले से बाहर खींच उसका पर्दाफाश कर दिया है, और आखिरकार अविनाश को अमरीश पुरी की श्रेणी में ला पटका है- तो अमरीश जी के पदचिन्‍हों पर चलते हुए स्‍वाभाविक हो जाता है कि अविनाश जंगले से कूदकर पहाड़ की तरफ भागें (शायद पहाड़ में पुलिस स्‍टेशन कम हैं, या शायद वहां अमरीशों को अविनाशिता का वर प्राप्‍त है- जो भी वजह हो, देखा यही गया है कि सुभाष घई का उटपटांगी खेल हो या श्‍याम बाबू की सामाजिक चेतना व कला व जाने और क्‍या-क्‍या से ओत-प्रोत- ‘निशांत’- विलेन अंत में नगाड़ों के शोर से कान बचाता हुआ पहाड़ की तरफ ही भागता है). इस तरह सांकेतिक अर्थों में कुत्‍ता पुकारे जाने की सार्थकता भी सिद्ध होती, मगर अविनाश ने सबकी (साढ़े पांच ब्‍लॉगों की) उम्‍मीदों पर पानी फेरते हुए, जैसाकि उनका दो महीने का पुराना इतिहास रहा है, बजटाभाव के बहाने की आड़ में पहाड़ जाने से कतरा गए, और उपद्रवी मॉब के रोश से बचने के लिए जाकर बाथरुम में छिप गए! और जैसाकि बाथरुम के तंग संकरेपने में होना था, हुआ. गुस्‍से- और गुस्‍से से ज्‍यादा गर्मी से उबलने लगे! चूंकि इस उबाल को शब्‍दों में व्‍यक्‍त करना उनकी स्‍वभावगत (व हिडेन एजेंडे की) मजबूरी है उन्‍होंने सीधे-सीधे ‘मुसलमान’, ‘स्‍त्री’ या ‘ओबीसी’ पर साथी, जुझारु व क्रांतिकारी सहकर्मी से पांच सौ शब्‍दों का लेख लिखवाने की बजाय सूत्र रूप में कविता रच डाली और साहित्यिक मासूम मनोभाव बनाये चुपके से हमारे यहां प्‍लांट कर गए. यह तो हमारी किस्‍मत कहिये कि हमने केवल सूत्रों ही नहीं हिडेन एजेंडे पर भी कुछ डॉक्‍यूमेंटरीज़ देख रखी हैं, हमने कविता देखते ही सूत्र और हिडेन एजेंडा दोनों पहचान लिया! आप भी पहचान लें और उसे साहित्‍य की गलतफहमी में न पढ़कर उसके वांछित अंदेशों में ही पढ़ें और समाज (माने हिंदी के वृहद सैकड़ा ब्‍लॉग) को सावधान किये रखें!


छै चार तीन दो एक पांच
स स स सात सात सात
ल ल ल ला म म म मु
ह ह ह हा हे हे हे हे हो
बारा तेरा ग्‍यारा समाज
गौर करने की बात है ‘समाज’ से अलग यहां सब सूत्रबद्ध है! ध्‍यान दीजिये ‘स’ और ‘म’ का कवि ने कितनी दफे इस्‍तेमाल किया है. वे निर्दोष ‘स’ व ‘म’ नहीं हैं जैसा मैं भी अपनी मासूमियत में गच्‍चा खाकर पहले समझने की भूल कर बैठा था. स ‘स्‍त्री! स्‍त्री!! स्‍त्री!!!’ है जैसे म ‘मुसलमान! मुसलमान!! मुसलमान!!!’ है! ठीक नाक और आंख के नीचे देखिये कैसा शैतानी गोरखधंधा फैला हुआ है और हम एजेंडा पहचानने से चूकते रहे.

कृपया टिप्‍पणी करने से बचिये. क्‍योंकि आपकी टिप्‍पणी इस हिडेन एजेंडे को प्रोत्‍साहन देने के ही काम आएगी. फिर भी आप टिपियाने से बाज नहीं आए तो हम यही समझेंगे कि आपको आग से खेलने का विशेष शौक है, और आपकी फेवरेट फिल्‍म ‘शोले’ है. मित्र विनयबिहारी ने गुप्‍त रूप से हिडेन एजेंडे का खुलासा किया है मगर आप उसे गुप्‍त ही रहने दीजिये. क्‍योंकि जान जाइएगा, शोलों का भड़कना बंद हो जाएगा फिर मज़ा किर्र हो जाएगा, बड़ी उदासी छा जाएगी.

Friday, April 20, 2007

दामोदर दास को गुस्‍सा क्‍यों आता है?

एच की मौत: तीन

थाना प्रभारी ने सुबह से नाश्‍ता नहीं किया था. गोइंठे में भुने शकरकंद और पवना की दूकान की कचौड़ी के बारे में सोच रहे थे. अभी भी पता नहीं कैसा संकोच था कि थाना में सबके सामने अखबार में लिपटी कचौड़ी खोल भंड़ुकी की तरकारी में बोरकर खाते संकोच होता. गफूर या राजनरायन सामने खड़े होकर पूछते जलेबी ले आयें, सर? चार ठो जलेबी ले लीजिये, बड़ा मज़ा आएगा! चाह का आर्डर कर दें? थाना प्रभारी को लगता नाश्‍ते का एक सामान्‍य, निजी काम नहीं कर रहे, बारात की पांत में बैठे भकोस रहे हैं और आजू-बाजू खड़े लोगों का अपनी दलिद्दरई से मनोरंजन कर रहे हैं. पवना की दूकान से परिचित होने पर शुरू के कुछ दिन वे कचौड़ी-जलेबी का यह लाड़-प्‍यार अपनी टेबुल पर मंगवाकर स्‍वाद से धीरे-धीरे कौर भरने की लीला खेलते रहे थे, फिर लगा मातहत उन्‍हें जिम्‍मेदार अधिकारी समझने की बजाय गणेश जी का कलैंडर न समझने लगें तब मन मारकर इस आनंदमयी आयोजन के दरवाज़े भेंड़ दिये. कोशिश करते कि चुप्‍पे यामहा एक्‍सएल 100 निकाल दस‍ मिनट के लिए थाना से गायब होकर पवना की दूकान का एक चक्‍कर लगा आयें, प्रेमभाव से जीमें, फिर संतुष्‍ट होकर टेबुल पर पुराने खड़ख‍ड़ि‍या फोन से मरियाडीह की माया संभालें. मज़ाक नहीं हक़ीकत था. बहुत बार सच्‍चो में लगता आपराधिक मामला नहीं सत्‍यनरायन की कथा बांच रहे हैं. अभीतक सत्‍यनरायन की जिज्ञासावर्द्धक कथा ही सुन रहे थे वाली नज़र से सुबाचन यादव ने दामोदर दास को देखा. बोले- किसी से खतरा है, भय होता है ऐसा कोई जिक्र किये थे?

दामोदर दास मासूमियत से समझाने लगे कैसे चूहा, सांप और छिपकिलियों से हजारी भैया की रूह कांपती थी. कितने भी ज़रूरी काम में बझे हों, कमरे में चूहा घुस आये तो कैसी हाय-हाय मच जाती थी. जहांतक प्रश्‍न के दूसरे पहलू- खतरे- की बात है तो वह हिंदी में पुरातनपंथी विचारों को सबसे बड़ा खतरा बताते थे. दुखी होकर कहते एक दिन यही हिंदी की हत्‍या की वजह बनेगा!

थाना प्रभारी सुबाचन यादव भूखे पेट उदास हो गए- मास्‍साब, किसकी हत्‍या हुई है? हिंदी की हुई है कि आपके ये हजारी भैया मारे गए हैं?

दामोदर दास हतप्रभ थाना प्रभारी को देखता रहा- इतनी सामान्‍य-सी बात इन्‍हें समझ नहीं आती! हजारी और हिंदी कोई एक-दूसरे से अलग थोड़ी हैं? मगर इस बात का जो सच्‍चा प्रमाण होता उस असल सबूत (किताब की पांडुलिपि) के गायब होने की सूरत में ही तो वह मरियाडीह थाने की शरण में आया है, एक उलझे व जटिल सामाजिक विमर्श में उतरने का जो‍ख़ि‍म मोल ले रहा है. कॉलेज के तथाकथित शिक्षित समुदाय तक में सही-सही इतिहास व भाषा-बोध नहीं, वहां एक गंवार थाने के गंवार पुलिस अधिकारी से इस उपेक्षा से अलग वह क्‍या अपेक्षा कर सकता है कि वह, हिंदी, हजारी भैया सब उनकी नज़रों में एक अबुझ प्रहसन व पहेली से ज्‍यादा महत्‍व न रखें! दामोदर दास को अचानक मरियाडीह थाने में लालबहादुर व राजीव गांधी की मढ़ी हुई तस्‍वीरों के संरक्षण में हिलते पायोंवाली कुर्सी पर बैठे भारी अकेलापन महसूस हुआ. थाना प्रभारी का कसूर नहीं, हिंदी व हजारी भैया प्रकरण में दामोदर दास सिर्फ और सिर्फ उपहास व हंसी का पात्र ही बन सकता है, एक गंवार थाने के गंवार सब-इंस्‍पेक्‍टर के पास उसके औज़ार ही नहीं कि वह ऐसी गुत्‍थी अपने हाथ में लेकर सुलझा सके. समाज ने उसे ऐसा संस्‍कार और उचित शिक्षा नहीं दी है. यहां बैठा हुआ मैं क्‍यों अपना मज़ाक बना रहा हूं? समाज व साहित्‍य का अमूल्‍य समय गंवा रहा हूं?- थाना प्रभारी ही नहीं अपनी नज़रों में भी दामोदर दास ग्‍लानि उत्‍पन्‍न करने लगा. क्षमा मांगकर उठने की सोचने लगा तभी थानेदार साहब ने सवाल किया- आप विवाहित हैं?..

चौंककर उन्‍हें देखा. इंस्‍पेक्‍टर साहब उससे इस तरह का अप्रासंगिक सवाल क्‍यों पूछ रहे हैं? इंस्‍पेक्‍टर साहब के लिए अप्रासंगिक नहीं था. अपने अंतर्मन में वे हिंदी व हजारी से दूर एक बार फिर अपनी घरेलू चिंताओं में बहक गए थे. आंखों में पत्‍नी का बढ़ता पेट तैर रहा था. व्‍याह के बाद बच्‍चे के बारे में पूछते, उसके आगे मास्‍टर से यह जानने का इरादा रखते थे कि डेलीवरी के लिए सेमलगंज सरकारी अस्‍पताल वाजिब जगह है या नहीं. मरीज को जीप में लादकर अस्‍सी किलोमीटर दूर भभैंया मटेर्निटी वार्ड तक ले जाने का ख्‍याल उन्‍हें बहुत उत्‍साहित नहीं करता. फिर बीच-बीच में सोचते यह सब अकेले उनसे सपरने का नहीं, कहां और कितना संभालेंगे; तुलसी को अच्‍छा लगे चाहे बुरा, बेहतर हो लालमोहन को भेजकर अम्‍मां को यहीं बुलवा लें. दिमाग में और वृहताकार तस्‍वीरें बनतीं मगर दामोदर दास के जवाब ने उनकी सोच का क्रम भंग कर दिया.

सिर झुकाकर दामोदर दास ने कहा- नहीं. उस शुभ मुहूर्त के पहले ही ऐसा जघन्‍य कांड हो गया?

मन ही मन दामोदर दास ने तय किया हजारी भैया की लिखी एक-एक पुर्जी, कागज़ का एक-एक टुकड़ा संजोकर वही संधान में निकलेगा. सूराग खोजेगा, सत्‍य तक पहुंचेगा, इस तरह समय व्‍यर्थ करने का कोई औचित्‍य नहीं.

थाना प्रभारी सुबाचन यादव कुछ और सोच रहे थे. कुछ और सोचते हुए माचिस की तीली से (जबकि दांत में कुछ था नहीं) दांत खोद रहे थे.

(जारी..)

पूरब और पच्छिम: प्रचलित धारणायें और नये तथ्‍य

एक निबंध: माध्‍यमिक शिक्षा में कम नंबरों से पास हुए छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी

ज्ञातव्‍य है पूरब पूर्व में होता है जबकि पच्छिम पश्चिम में. सूरज पूरब में निकलता है जबकि डूबने के लिए उसे पश्चिम तक का लंबा सफर करना पड़ता है. उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में अंग्रेज गर्व से कहा करते थे हमारे साम्राज्‍य में सूरज कभी डूबता नहीं, तो उसके पीछे पेंच यही था कि भाई लोगों ने पूरब और पच्छिम के बीच अच्‍छी धकापेल मचा रखी थी, दुनिया में यहां से वहां सूरज के पीछे-पीछे भागते हुए एक्‍सटोर्शन और उठाईगिरी का कारोबार फैला रखा था. हमेशा चौकन्‍ने रहते थे कि कहीं ऐसा न हो सूरज डूब जाय और उनकी वर्ल्‍डवाईड स्‍मगलिंग अंधेरे में गिरके उनके बेड़ों का बेड़ा गर्क करे. यही वजह है बाद की सदियों में (अंग्रेजों से सबक लेकर) दूसरे मुल्‍कों और हिंदी फिल्‍मों ने सूरज के पीछे भागने की बजाय स्‍मगलिंग के लिए रात का समय मुकर्रर किया. यह समझदार सीख आजतक काम में लायी जा रही है.

पूरब से आनेवाली हवा को पुरवैया और पच्छिमी को पछुआ कहते हैं. पुरवैया बड़ी रुमानी हवा समझी गई है जिसके गलत असर से बचाने के लिए स्त्रियों को ऊपर से नीचे तक बुरके और साड़ी में ढंके रहने का प्रावधान है. जैसे ही स्त्रियां बुरका और साड़ी फेंककर उन्‍मत्‍त होने लगती हैं तालिबान और विहिप भी उनके पीछे-पीछे उन्‍मत्‍त होने लगता है. जबकि पुरुषों में जिनके पास खाने को नहीं उनपर इस नियम की सख्‍ती को ढीला रखा गया है और ऐसे लोग कमर के पास एक छोटे वस्‍त्र से अलग अक्‍सर नंगे पाये जाते हैं, और उन्‍मत्‍त बने रहने को स्‍वतंत्र रहते हैं. यही वजह है इस तबके में बच्‍चा प्रजनन का रेशियो इतना हाई है. पछुवा में ऐसे उन्‍मत्‍त करनेवाले काम-वासना के तत्‍वों का अभाव समझा गया है इसीलिए पश्चिमी स्त्रियों पर बुरके और साड़ी का प्रतिबंध नहीं, और यही वजह है कि वे प्रजनन दर में भी पूरब से इतना पीछे हैं.

पूरब से आनेवाले आप्रवसियों को मुंबई में भैया बुलाने का रिवाज है जबकि इसके जवाब में भैयों की ओर से मुंबई वासियों को बहिनी या बहन वाला रिश्‍ता जोड़कर गाली देने का रिवाज अब तक प्रचलन में नहीं आ पाया है. चूंकि पूरब सूर्योदयी प्रदेश (सर्वोदयी नहीं. वह प्रदेश नहीं आंदोलन रहा है जिसे पैदा करनेवाले कोई बिनोबा भावे रहे हैं) रहा है और पच्छिम सनसेट ज़ोन इसलिए बिजली के अविष्‍कार की चिंता भी पूरब नहीं पश्चिम में हुई. इसलिए बिजली की खपत भी पूरब की तुलना में पश्चिम में सैकड़ों गुना ज्‍यादा है. फिर भी यह गौरतलब और ताजुब्‍ब की बात है कि सूर्योदयी देशों में अग्रणी इंडिया के बड़े हिस्‍से में अबतक उजाला क्‍यों नहीं पहुंच सका है. क्‍या इसकी वजह यह है कि सूर्यदेव इंडियावासियों से नाराज़ हैं, या अंधेरे का लाभ उठाकर पश्चिम उनके वरदानों की स्‍मगलिंग कर रहा है? (प्रतापगढ़, बांदा, जौनपुर में किसी बंधु को शोध के लिए विषय न मिल रहा हो तो वह इस विषय पर इंटरेस्टिंग डेटा कलेक्‍ट कर सकते हैं)

मनोज कुमार और विपुल शाह जैसे चंद सिरफिरे निर्देशकों ने चंद सिरफिरी फिल्‍म बनाकर पूरब और पच्छिम को मिलाने की घालमेली कोशिश की है. मनोज कुमार तो उत्‍साह में दो कदम आगे बढ़कर इराक में लात खाये पश्चिम को अपने यहां आने का न्‍यौता तक देने लगते हैं (गौर फरमाइये: ‘कोई जब तुम्‍हारा ह्रदय तोड़ दे, तड़पता हुआ तुम्‍हें छोड़ दे, तब तुम मेरे पास आना, प्रिये, मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा), जो बहुत ही खतरनाक संकेत है और जिसके खिलाफ तत्‍काल प्रदर्शन किये जाने की ज़रूरत है. हालांकि यह भी सत्‍य है कि मनोज कुमार के न बुलाने पर भी पश्चिम काफी हद तक पूरब के पोर-पोर में घुसा हुआ है, जबकि पूरब को अपने पोर-पोर में घुसने देने की हर कोशिश का पश्चिम जमकर विरोध करता रहा है. चीन इस क्‍लासकीय विरोध की मां-बहन करता ढेरों क्‍लासकीय अवधारणाओं की मां-बहन कर रहा है जो पूरब के पक्ष में एक स्‍वागत योग्‍य तथ्‍य है.

इस विषय पर किसी भी उद्वेलनकारी जिरह और सवाल के लिए कृपया संपर्क करें: यूके बेस्‍ड अनामदास अनोनिमस, ईस्‍टन एक्‍सपर्ट इन वेस्‍ट. फीस: फोर्टी पाउंड एन आवर (नेगोशियेबल इन डायर सिचुएशंस).

एक दिन निकल जाऊंगा

आप समझते नहीं हैं, प्रमोद जी, बड़ी मुश्किल है. अड़चन है उलझन है तंग आ गया हूं. रोज़ सिर कूटता सोचता हूं मगर रास्‍ता नहीं सूझता, शर्मिन्‍दा होकर दोस्‍त कहता है. धीरे-धीरे देखिये एक दिन निकल जाऊंगा इस झमेले से, भूल जाऊंगा घर लात मार दूंगा नौकरी को चल पड़ूंगा झोले में दो जोड़ी कपड़े और तीन किताबें लेकर. किस डोर से बंधा हूं फिर मेरी ज़रूरत क्‍या है! जहां मरजी होगी जाऊंगा, किसी नीम के नीचे किसी नदी के किनारे सो जाऊंगा जिधर इच्‍छा होगी. भूख लगेगी मांग लूंगा दो रोटी मटके का पानी ऐसा क्‍या है. आखिर करोड़ों-करोड़ जी ही रहे हैं देश में, उनसे अलग क्‍यों हूं. जवान हूं जानता हूं गरीबी. घास पर लेटकर रात को तारे देखने की बड़ी इच्‍छा है, प्रमोद जी, अनजाने लोगों से दोस्तियां बनाना चाहता हूं, उनके क़ि‍स्‍से कहानियां सुनना चाहता हूं समझना चाहता हूं हो क्‍या रहा है इस देश में. मालूम नहीं किस वजह से फंसा-अटका पड़ा हूं दिल्‍ली में, प्रमोद जी. दारू और ऊबी दोस्तियों से अलग आखिर बचा क्‍या है मेरे लिए इस शहर में?

Wednesday, April 18, 2007

लिंग भेद की उलझन

सच पूछिये तो इस विषय पर हम तो क्‍या हमारा कुत्‍ता भी नहीं सोचना नहीं चाहता. मगर चूंकि कुत्‍ता पालने का खर्चाभाव है, खर्चाभाव से ज्‍यादा स्‍थानाभाव है, और खुद हमारी हालत कुत्‍ते से बहुत बेहतर नहीं, हम इस विषय की फाईल खोलने को मजबूर हो रहे हैं. राष्‍ट्रीय भांड़गिरी का विष पी रहे हैं. सीमाओं को तोड़कर समय के तकाजे में सामाजिक हो रहे हैं, तो इसीलिए हो रहे हैं कि लिंग भेद की एक सामान्‍य उलझन हो गई है. समझने में दिक्‍कत हो रही है कि यहां दरअसल दुल्‍हा कौन है और दुल्‍हन कौन! यार लोगों व प्रेस की बेचैनियों से तो यही लगता है अभिषेक कुमारी हैं जिनकी श्री ऐश्‍वर्या से शादी होने जा रही है. ऐसा है क्‍या? शादी ऐ की अ से हो रही है या हल्‍ला इसका है कि अ जी ऐ जी के हो रहे हैं? प्रेस वालों को दुर-दुर किया जाता रहा मगर भाई लोग प्रतीक्षा की सजावट की झांकी उतार ही लाये! ऐसा क्‍या होनेवाला है प्रतीक्षा में? श्री ऐ जी क्‍या बारात लेकर वहीं पहुंचने वाले हैं? श्री बड़े अ जी वर पक्ष से हैं या वधु पक्ष से? बैठे-बिठाये खामखा का असमंजस हो गया है. आसपास कोई कुत्‍ता भी नहीं कि एक लात लगाकर मन शीतल करें. रिपोर्टो की झड़ी लगी हुई है मगर लिंग भेद के सवाल पर सब चुप्‍पी मारे बैठे हैं. रवीश कुमार, आप कहां हो, भाई? कुछ क्‍लैरिफाई करो, यार!

(विशेष सामाजिक इनपुट: आजमगढ़ वाले श्री विमलचंद्र वर्मा)

जात क्‍या है हजारी का राज़ क्‍या है?..

एच की मौत: दो

हजारी भैया का कोई घर नहीं था- पक्‍का, कच्‍चा किसी भी तरह का, और न परिवार जिसके स्‍नेह के ईंधन में वे बम-बम रहते थे.. छिपाकर प्रेयसी या भार्या रखे थे तो दामोदर दास को खबर नहीं थी (होती तो सबसे पहले भागकर वह उन तक इस मर्मांतक सूचना के साथ पहुंचता).. बातचीत में कभी घर-परिवार की चर्चा निकल आती तो भैया सीधे जवाब देने की बजाय हंसी की आड़ी-तिरछी गलियों में घुस जाते.. जोर-जोर से हंसते हुए कहते- चूतड़ के नीचे पक्‍की नौकरी दाबकर हमारा मज़ाक उड़ाते हो, पार्टनर? कौन पैसे से घर चलायेंगे और कहां से घरवाली को खिलायेंगे, हां? हा हा हा!.. दामोदर दास ने कहीं पढ़ रखा था बात-बात पर हंसनेवाले अंदर गहरा दु:ख छिपाये होते हैं. शायद हजारी भैया को देखकर ही लिखनेवाले ने यह बात लिखी थी. माथे के पीछे हाथ डाले, आंखें मूंदे कहीं सोचते पड़े हों या एकांत में विचार में गहरे डूबे चहलकदमी कर रहे हों, किसी के सामने पड़ते ही हो-हो करके हंसने लगते, मानो सामनेवाले व्‍यक्ति पर किसी भी सूरत में अपनी चिंता की छाया पड़ने देना न चाहते हों! एक बार दामोदर दास के कोंचने पर गंभीर हो गए, माथे पर हाथ बजाते हुए बोले- मेरा घर देखना चाहते हो? ठीक है, बेटा, तो वही कोने में धरा हुआ है मेरा घर.. नज़र की आरती उतार लो और संतोष करो!..

कोने में खटिये की पाटी पर खादी भंडार का चिमरख झोला पड़ा था जिसमें भैया का एक जोड़ी कुर्ता-पैजामा, एकाध किताब, कागज़-पत्‍तर और कुछ अटरम-सटरम पड़ा होता. दामोदर दास झींककर नाराज़ होता और हजारी भैया अपनी हो-हो वाली रेकॅर्ड छेड़ देते. नाम के बारे में भी यही राज़दारी बनाये रहते. सामनेवाला आदमी पूछता हजारी क्‍या? पंडित, परसाद, पांड़े, उपाध्‍याय आगे-पीछे कुछ बोलियेगा कि ऐसे ही अंजाद करते रहें? भैया मुस्‍कराकर जवाब देते बाभन, कुर्मी, भूमिहार, अहीर, डोम, दुसाध सबका मेल है तब न हजारी हुए हैं, महाराज! और हो-हो की हंसी में पूछवैया की जिरह तेल हो जाती. सवालिया ज्‍यादा बेचैन आत्‍मा होता तो भैया उसे शास्‍त्रीय तरीके से वर्तमान समय में राजनीतिक दलों के वोट बैंक से अलग जातीय पहचान की व्‍यर्थता समझाने लगते. और तब तक समझाते रहते जब तक आदमी हार मानकर अपना रास्‍ता नहीं नाप लेता..

यही बात दामोदर दास ने मरियाडीह थाना प्रभारी सुबाचन यादव से कही. कि भले हजारी भैया खादी भंडार के एक चिमरख झोले और हवाई चप्‍पल में घूमते रहे हों, यथार्थ में वे जानकारी का खज़ाना थे, कभी न खत्‍म होने वाला भंडारण थे!

रात में डोला मंडी से निकलते हुए सुबाचन यादव के यामहा 100 का आगेवाला चक्‍का पंचर हो गया था. जो सिपाही मरम्‍मत कराने ले गया था उसकी अभी तक खबर नहीं थी. डेरे पर पत्‍नी चार महीने के पेट से थी. दीवार का सहारा लेकर बात-बात में ऐसे दर्दभरी आह भरती कि थानेदार बाबू को असमंजस होता इतनी तकलीफ़ है तो यह मैका काहे नहीं जा रही, और न ही सास को सेमलगंज आने देने पर राजी होती थी. रात-बिरात उनके कंधे और पेट पर माथा रखकर ऊह-आह का गाना छेड़ देती और सुबाचन उनींदे अंधेरे में दवाई की इस और उस पु‍ड़ि‍या को खोजते पानी का गिलास लिये बीवी की मुरव्‍वत में पांच घंटे की नींद खराब करते. भोर में आंख लगी ही थी कि दूधवाले ने दरवाजा बजा के उठा दिया. दूध गरम करके और गंजी, जांघिया, दो पेटीकोट और साड़ी धोके भागे-भागे उधारी की साइकिल से थाना आये तो थाना पहुंचते ही एक बकरी के मालिकनामे को लेकर पौन घंटे की हुज्‍जत में फंसे रहे. मामला सुलझने की बजाय जब और उलझता गया तो वादी-प्रतिवादी दोनों को सुबाचन ने मां-बहन सुनाकर थाना से बाहर किया और गफूर को हुक्‍म दिया कि बकरी को आंगन के अमरूद के गाछ से बांध दे. और अभी ठीक से पंखा के नीचे पसीना सूखा भी नहीं था कि बिजली चली गई और सामने बैठे संजय गांधी इंटरमीडियेट कालेज के डी दास उनके साथ कौन बनेगा करोड़पति का बुझव्‍वल वाला खेल खेल रहे हैं. और ऐसी उमस, सड़ी हुई गर्मी में थक भी नहीं रहे हैं! कभी-कभी सुबाचन यादव को लगता उनसे भारी गलती हो गई जो पैरवी करवाकर, हाथ-गोड़ जोड़के मरियाडीह में अपना ट्रांसफर नहीं रुकवाया. इस तरह की जगह में कितने समय चलायेंगे, कैसे चलायेंगे? मरियाडीह में बच्‍चे का बाप बनेंगे?- सोचते ही थाना प्रभारी को बेचैनी होने लगी. एक दिन पुराने दैनिक जागरण से गाल पर हवा करते हुए बोले- जानकारी का खजाना थे इसलिए ये जो हजारी हैं इनकी हत्‍या कर दी गई?..

दामोदर दास अपलक देखता रहा. कहा कुछ नहीं, चुपचाप मुंडी हिलाई.

(जारी..)

Tuesday, April 17, 2007

दस्‍तावेज़ी डायरी के सनसनीखेज़ पृष्‍ठ..

मोहन राकेश को भूल जाइये, अविनाश बांस को ट्राई कीजिये!

आज तक आप मुगालते में रहे कि राजपाल एंड संस ने मोहन राकेश की डायरी छापकर डायरी विधा के प्रतिमान स्‍थापित कर दिये. अजी, वे (राजपाल नहीं राकेश) होते कौन और क्‍या चीज़ हैं कि कर दिये? सुधा, विधा हिंदी के चार शब्‍द पढ़ लिये और होंठ में चुरुट दाबकर तीन काली-सफेद फोटो खिंचवा ली तो बड़ डायरी लिखवैया हो गए? और आपने मान भी लिया? अविनाश बांस क्‍या घास छीलते रहे? चुरुट नहीं पाइप पीते हैं और सुधा, विधा ही नहीं अनीता को भी जानते हैं! दुर्जन नहीं किंतु सज्‍जन पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि श्री बांस को मोहल्‍ले वाले श्री दास से गड्ड-मड्ड न करें. श्री दास एनडीटीवी को बिलोंग करते हैं जबकि श्री बांस का तालुक्‍क दरभंगा और दलित साहित्‍य से समझा गया है!

17 अप्रैल, सुबह 09.22..
आज फिर चित्‍त अशांत है.. कंप्‍यूटर खोलकर सफेद स्‍क्रीन को तकता काफी देर तक उधेड़बुन में उलझा रहा.. कि उन किन विषयों पर लेखनी चलाऊं जिनकी सामयिक प्रासंगिकता भी हो और अच्‍छा विवाद भी जेनरेट कर सकें.. विवाद जीन में है, संस्‍कार में है.. उससे मुंह नहीं मोड़ सकता.. जैसे अनीता के प्‍यार और सेठ की नौकरी से (मुंह. नहीं मोड़ सकता.. मगर अपने अंतर्तम में क्‍या मैं सचमुच अनीता से प्‍यार करता हूं? दैहिक कामनाओं को इतने बड़े पद पर विराजना क्‍या अपने आधुनिक मूल्‍यों की अवज्ञा नहीं होगी? आय एम डेज्‍ड एंड कन्‍फ्यूज्‍ड).. लेखनी आगे नहीं बढ़ रही है.. अशांत चित्‍त और अनीता की कमनीयता चिंतन के आड़े आ रही है.. उदास होकर होंठों में पाइप सुलगा लेता हूं.. न्‍यू लेफ्ट रिव्‍यू के नीचे से निकालकर मनोहर कहानियां के पन्‍ने पलटने लगता हूं.. मगर मन रम नहीं रहा.. आंखें मूंदकर मेघदूत की पंक्तियों के रस में डूबने की कोशिश करता हूं.. मगर पंक्तियां याद नहीं आ रहीं.. ओ डैम इट!

17 अप्रैल, सुबह 10.29..
उद्वेलित मन से अनीता को फोन किया.. वह हमेशा की तरह घर और बिस्‍तरे में नहीं.. प्रिटी सरप्राइसिंग.. इज़ शी हैविंग एन इलिसिट अफेयर बिहाइंड माई बैक? कांट बी श्‍युअर ऑव गल्र्स दीज़ डेज़.. दे आर फायर्ड बाई सच स्‍ट्रेंज ड्रीम्‍स एंड डेसायर्स.. शायद अनीता के प्रति मेरे फेथफुल बने रहने का अभी या कभी कोई औचित्‍य नहीं रहा.. मुझे अपनी समस्‍त ऊर्जा सैक्‍स व सुंदरियों पर भ्रमित होने की बजाय साहित्‍य में केंद्रीत करनी होगी.. मगर साहित्‍य क्‍या सुंदरियों को प्राप्‍त करने का साधन भर नहीं?.. देयर आर सो मेनी क्‍वेस्‍चंस ऑव विच आई डोंट हैव एनी आनसर.. विचार करते हुए मानसिक उत्‍तेजना व उद्वेलन में सिर बजने लगता है.. शायद सांसारिक दबावों व प्रश्‍नों से मुक्ति का एक ही मार्ग है कि मैं पूरी तरह साहित्‍य रचने में डूब जाऊं (हंस के यादव ने अभी भी डेढ़ हजार का चेक क्लियर नहीं किया है. आई शुड रिमाइंड हिम वन्‍स मोर. ही इज़ सच अ मीन यादव!).

17 अप्रैल, सुबह 11.11..
पेपर में स्‍पोर्ट्स का पन्‍ना देख रहा हूं जब दरवाजे की घंटी बजी है. बीच क्रियेटिविटी में व्‍यतिक्रम के ख्‍याल से बेचैन होने लगता हूं.. अनीता फूलों का बूके लेकर आई है.. आई एम टच्‍ड एंड वरीड एट द सेम टाईम.. इज़ शी एक्‍सपेक्टिंग थिंग्‍स फ्रॉम मी? आई कांट हैव दोज़ काइंड ऑव कमिटमेंट्स.. नॉट एट दिस स्‍टेज ऑव माई करियर.. हम दोनों वहशियों की तरह लवमेकिंग करते हैं फिर वह किचन में कॉफ़ी बना रही है वेन वी स्‍टार्ट आर्ग्‍यूइंग.. दैन इट टर्न्‍स इन टू अ ब्‍लडी फाइट.. आई फील सिक ऑव हर.. क्‍या रचनाकार एक शांत सुबह तक का हक़दार नहीं?.. दैन वी मेक अप.. डिसाईड टू गो टू सीपी फॉर अ क्विक स्‍नैक.. मुंह में पाइप दबाये मैं इतमिनान से ड्रेस अप होता हूं.. अनीता शर्ट का बटन लगाते हुए मेरे गाल चूम लेती है.. दिमाग़ में ढेरों रचनायें गूंज रही हैं जिन्‍हें लिखने के लिए मुझे पहाड़ या दरभंगा कहीं जाना होगा.. आयम सिक ऑव सीपी एंड डेली (दिल्‍ली)..

(अप्रगतिशील दस्‍तावेज़ी लोकमाला, खंड एक, भाग दो. लेखक के पैसे से प्रकाशित)

कहां-कहां से गुज़र गया..

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: बत्‍तीस

बुज़ुर्गवार की ओर से मुझे पेट्रनाइज़ करने का माहौल बन ही रहा था कि जांघ और नितंबों पर अनावश्‍यक चर्बी की चिंताओं में रेत पर दौड़ती श्‍वेतबाला टीवी के अंदर से कूदकर बाहर चली आई और बुड्ढे का हाथ खींचकर पता नहीं किस ज़बान में एक दूसरा ही ड्रामा करने लगी- पप्‍पा! वी आर इन ग्रेव डेंजर.. दे हैव एनसर्किल्‍ड द हाउस! वी मस्‍ट लीव इम्मिडियेटली..!

बुज़ुर्गवार बिकिनी और जांघिया बाला के हाथ में हाथ फंसाये भागकर ऊंची फ्रेंच खिड़की तक गए जहां से नीचे दो एकड़ के आलीशान बागीचे की झांकी दिखती थी. तीन सौ तेरह प्रकार के वनस्‍पति व पुराने संगमरमर के एंजेल व अप्‍सराएं दिखती थीं. फ़ि‍लहाल सबके ऊपर धुआं उड़ रहा था और भारी टैंकों की गड़गड़ाहट गूंज रही थी. सदाशयी बुज़ुर्गवार ने चर्बी चढ़ रहे बेटी के गालों को स्‍नेहवत चूमा और फुसफुसाकर अपनी मातृभाषा में बोले कि उसे (बेटी) को चिंता करने की ज़रूरत नहीं क्‍योंकि कोई भी उनका (बाप-बेटी का) बाल बांका नहीं कर सकता! मेरे बाल और दूसरे अंगों के बारे में बुड्ढा कोई टिप्‍पणी नहीं कर रहा था, जबकि पांच मिनट पहले तक वह उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के मानवीय मूल्‍यों का बाप व दादा होने की बहुत ही विश्‍वसनीय मार्केटिंग पेले हुए था. मैं उसकी मार्केटिंग के झांसे में फंस भी गया होता अगर बीच में टैंकों की गड़गड़ाहट न गूंजने लगती, बिकिनी व जांघिया बाला ने हमें डिस्‍ट्रैक्‍ट न किया होता! इसके पहले कि हिंदी फिल्‍मों के क्‍लाइमेक्‍स के मानिंद अजीत और बिंदु की तरह बुड्ढा अपनी बेटी के साथ पुलिस की आंखों में धूल झोंककर हमेशा-हमेशा के लिए फ़रार हो जाये, मैं धर्मेद्र व अमिताभ की तरह ठीक उसके सामने कूदकर उसकी मानवीयता के मुंह पर एक घूंसा जड़ना चाहता था.

मगर देह में शर्ट और पैरों में हवाई चप्‍पल चढ़ाते-चढ़ाते देर हो गई. बुड्ढा बेटी के साथ फ़रार हो चुका था और टैंकों के हमले में आलीशान हवेली के परखचे उड़ रहे थे. छत के एक विशालकाय बॉरोक टुकड़े के नीचे आते और मरते-मरते मैं बचा. धुएं और धूल के अंधेरे में बचने के लिए मैं बदहवाशी में इधर-उधर हाथ मारता रहा. एक गोली मुझे छूती सन्‍न-सी एक संगमरमरी शबीह की आंखों में धंस गई. अंधेरे में एक हाथ ने मुझे तेजी से परे खींच लिया और मेरे होंठ किसी के गर्दन के छोटे-छोटे बालों से जा टकराये. छूटते ही पहचानी महक का ख्‍याल हुआ और मुंह से बेसाख्‍ता निकला- रेहाना, तुम ज़ि‍दा हो?..

***

मैंने चहकते हुए खुशी ज़ाहिर की कि अच्‍छा हुआ रेहाना चली आई वर्ना बुड्ढे की शराफ़त में तो मैं बिक ही गया था. रेहाना ने भागते-भागते ख़बर दी कि बुड्ढा सर्बिया का कूख्‍यात बच्‍चों का व्‍यापारी है, अंतर्राष्‍ट्रीय बाज़ार में शारीरिक अंगों का विक्रेता है. बाईस देशों की पुलिस उसे खोज रही है और ज़ि‍न्‍दगी भर खोजती रहेगी क्‍योंकि वह कभी पकड़ में नहीं आएगा. क्‍योंकि उसने सब जगह सबको पैसे देके सेट कर रखा है. जानकर एकदम ताजुब्‍ब नहीं हुआ. जीवन और समाज संबंधी ढेरों ऐसी बातें थीं जिनके बारे में स्‍कूल में पढ़कर भकुओं की तरह मुंह खोल लेता लेकिन अब उन्‍हें जीवन की सामान्‍य अस्तित्‍ववादी पृष्‍ठभूमि मानकर कड़वाहट से स्‍वीकार करना सीख रहा था. हालांकि यह जानकर ताजुब्‍ब ज़रूर हुआ कि रेहाना, मासुमेह, रैडिकल रुरल्‍स के नेटवर्क को किसी तरह की आंच नहीं आई थी; सब अविनाश का दुष्‍प्रचार था जो मूवमेंट फॉर डेमोक्रेसी के आत्‍मघाती दस्‍ते की दो नौजवान लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फांसकर, उनसे बम फोड़वाकर, उनके चंगुल से भाग निकलने में कामयाब हुआ था. रैडिकल रुरल्‍स का इकलौता नुकसान यह हुआ कि दुष्‍ट अपने साथ एक्‍टर इरफान को बंधक बनाकर ले गया जिसका वह हमेशा फैन रहा था और जिसकी क्रांति-विरोधी मदद से अंतर्राष्‍ट्रीय प्रेस में वह उनके ख़ि‍लाफ़ भ्रामक ख़बरें प्‍लांट करता फिर रहा है!

ब्‍लॉगजगत के ढेरों लोगों की तरह अविनाश से नफ़रत तो मैं करने ही लगा था लेकिन यह सब जानकर उसकी (नफ़रत की) मात्रा और बढ़ गई. हालांकि मैं टॉम क्रूज़ से बदसूरत था और रेहाना हाल बैरी से काफी खूबसुरत, फिर भी आग और ध्‍वंस के बैकग्राउंड में मिसन इंपोसिबल के लीड एक्‍टरों की तरह तहख़ानों व सुरंगों से होकर हम काफी देर और दूर तक भागते रहे. लोहे की जाली हटाकर वापस खुली रोशनी में एक ऐसी जगह निकले जहां बेलग्रेड के एक पड़ोसी शहर को पूरी तरह नेस्‍तनाबूद करके एक ताइवानी कंपनी के पैसों से विराट एंटरटेनमेंट पार्क में तब्‍दील किया जा रहा था. शहर की आबादी अभी भी हाशियों पर शरणार्थी शिविरों में टिकी राजनीतिक प्रदर्शन, पैंपलेटियरिंग इत्‍यादि से वापस अपनी ज़मीनें पाने का सपना पाले हुई थी, जबकि पार्क के इंवेस्‍टर ऑलरेडी उन ज़मीनों को डच, जर्मन व भारतीय बिजनेस घरानों को बेच रहे थे. रेहाना ने यह भी बताया कि भारतीय उद्यमी इस एंटरटेनमेंट पार्क में खास दिलचस्‍पी ले रहे हैं. मुंबई की झुग्‍गी-झोप‍ड़ि‍यों में काम करने वाली एनजीओ बालक ने चालीस-चालीस एकड़ के तीन प्‍लॉट खरीद रखे हैं. मैंने दुखी होकर रेहाना से कहा- कौन किस पाले में है यह जानना संसार में इतना मुश्किल क्‍यों हो गया है, प्रिये?

रेहाना एकदम-से नाराज़ हो गई. कहने लगी यहां जान और जीवन के बड़े प्रश्‍नों पर पड़ी है और मैं अभी भी प्रिया-श्रेया का खेल खेल रहा हूं! चिढ़कर आगे उसने ये भी कहा कि उसके पीठ पीछे मैं सोनाली-रुपाली के कैसे खेल खेलता रहा हूं यह भी वह बखूबी जानती है. इससे पहले कि वह और अग्रेसिव हो, मैंने ज्‍यादा अग्रेसिव होकर बचाव वाली तकनीक का सहारा लिया, फर्राटे से फ्रेंच बोलने लगा- हाऊ डेयर यू टॉक टू मी लाइक दिस? मुझपर तरस खाने की बजाय कि कैसे मैंने विरह का इतना समय गुज़ारा तुम गॉसिप कॉलम्‍स के अफवाहों का यकीन करने लगी हो! रुपाली हू?..

सामने खूले मैंदानों में भीमकाय जायंट मशीनें विध्‍वंस मचाये थीं, और यहां टीले पर छाती पर हाथ बांधे रूठी नायिका मुझसे तीन कदम की दूरी मेंटेन किये तप्‍त खड़ी थी.. तप्‍त मैं भी हो रहा था मगर निहायत दूसरे कारणों से..

(जारी...)

Monday, April 16, 2007

मर्डर इन सेमलगंज

एच की मौत: एक

लिफ्ट की जाली खोलते ही राजनाथ की बहू का मुंह खुला रह गया. सब्जियों का झोला छूटकर फर्श पर गिर पड़ा और मुंह से बरबस एक चीख़ निकलकर पूरी इमारत में गूंज गई! गिरी सब्जियों का एक टमाटर लुढ़कता हुआ गिरे आदमी की उंगलियों से जा टकराया मगर कोई हरकत न हुई, फटी आंखें राजनाथ की बहू को अपलक तकती रहीं. मुंह का तंबाकू कुर्सी के नीचे थूक सिक्‍युरिटी गार्ड सेवाराम भागता हुआ लिफ्ट तक गया. लिफ्ट के दरवाज़े पर सब्जियों के गिरे झोले के बाजू में जवान औरत बेहोश पड़ी थी. अंदर फटी आंखों वाला व्‍यक्ति इस बार सेवाराम को घूर रहा था. मरियाडीह थाने से इंस्‍पेक्‍टर सुबाचन यादव के आने में अभी भी एक घंटा बीस मिनट बाकी थे..

..या सबसे पहले सीढ़ि‍यों पर लुढ़की अवस्‍था में लाश को दुबेजी की नौकरानी सत्‍यवती ने देखा और चीखती हुई पूजाघर तक दौड़ी चली आई. दुबेजी की पुरनिया माता का पूजा ही नहीं पुराने स्‍टूल पर धरा दूध का गिलास छन्‍न-से छूटा और ज़मीन पर आकर चूर-चूर हो गया. चौकी से लपककर बिल्‍ली भुरई जंगले पर गई और चौकन्‍नी होकर अपने दोनो कान खड़े कर लिए.. या मवेशियों को हांककर जंगल की तरफ ले जाते हुए सूखे नाले में गिरी लाश पर सबसे पहले निगाह ढेपुआ की पड़ी. पहले तो ढेपुआ असमंजस में एक ओर हट गया. फिर जानवरों पर हल्‍ला करता हुआ उन्‍हें एक बाजू करके इतमिनान से नाले की गड़ही में उतरा. व्‍यक्ति का अनजानापन और लाश की तसल्‍ली हो चुकने पर ढेपुआ ने आसपास के सूनसान पर एक नज़र डाली और फिर झुककर मुर्दा के हाथ से घड़ी निकालने की कसरत में लग गया..

दामोदर दास ने घबराकर आंखें खोल दीं और बिछौने पर उठ बैठा. मसहरी की फंसावट में जोर-जोर से सांस लेने लगा. खुद से शर्म हो रही थी. झुंझलाहट हो रही थी. किस तरह की फिल्‍मी कल्‍पनाओं को वह अपने में प्रश्रय दे रहा है? सामाजिक पतन के साथ-साथ उसके व्‍यक्ति का यह किस तरह का पतन है? क्‍या हजारी भैया की संगत, उनकी शिक्षा से इसी तरह वह ऋणमुक्‍त होगा? मसहरी एक ओर हटाकर दामोदर दास तखत से नीचे उतर आया. मच्‍छरों की आवाज़ से अलग सर्वत्र निस्‍सीम शांति थी. अलबत्‍ता धीमे-धीमे बजते अपने छाती की धड़कनों को सुनकर दामोदर दास अपने जिंदा होने की तसल्‍ली कर लेना चाह रहा था. नहीं, वह जीवित है. उसकी क्षुद्रतमता में प्रभु उसकी रक्षा किये हुए हैं जबकि हजारी भैया और उनका साहित्‍य दोनों ही.. सोचते हुए उसकी छाती में कील-सी गड़ी और वह छटपटाया-सा अंधेरे में अंदाज़ करता रसोई तक गया. दूध का गिलास पीकर सोने गया होता तो ऐसी अव्‍यवस्थित कल्‍पनाएं मन में सिर न उठातीं, चित्‍त अशांत न बना रहता.. टटोलकर ढलकी हुई गिलास हाथ में ली तब जाकर दामोदर दास को ध्‍यान आया कि आज दूध पीना वह भूला नहीं था.. चाहता तो भी नहीं पी सकता था क्‍योंकि दूध तो संझा के ही किसी वक्‍त जंगले के रास्‍ते भुरई आकर चट कर गई थी. सुराही से अलग गिलास में पानी ढालकर दामोदर दास ने होंठों से लगाया और मन को थोड़ा ठंडा करके परिस्थिति का अध्‍ययन करने लगा. फिल्‍मी कल्‍पनायें उसे सत्‍य तक नहीं पहुंचाएंगी. जीवन पर उसे संयत और समझदार नियंत्रण रखना होगा तभी न केवल वह अपना अपितु हजारी भैया का भी भला कर सकेगा.. यही उनके प्रति सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी. यह भावुकता का नहीं विचारशील बनने का समय है. और भले यह बात सत्‍य हो कि आजतक दामोदर दास ने किसी भी बड़े निजी व सामाजिक जिम्‍मेदारी का वहन नहीं किया, मगर इसीलिए तो यह मौका इतनी बड़ी चुनौती है जिसमें खरा निकलकर वह अपने और हजारी भैया दोनों से उऋण हो सकेगा!

जंगले के चौखटे में रात का सलेटी उजाला था. महामाया जी की छत पर एक छाया डोलती-सी आई और मुंडेर पर खड़ी पेशाब करने लगी. पंडित जी ही होंगे सोचकर दामोदर दास ने नज़रें हटा लीं. कंधे के खालीपन से ध्‍यान गया कि हजारी भैया का हाथ अब फिर कभी हंसते हुए उसपर धौल नहीं जमायेगा, उनकी खुली हंसी फिर कभी दुबारा सुनने को न मिलेगी.. सब एक सुहाने अतीतकाल में दफ़्न हो चुका है.. भविष्‍य सिर्फ रहस्‍य का एक बड़ा अभेद्य पर्दा है.. जिसे हटाने का जिम्‍मा उसके नासमझ कंधों और नौसिखिये कौशल पर है.. क्‍या दामोदर दास उम्र ही नहीं अपने विवेक में भी वयस्‍क हो पायेगा? क्‍या इस जघन्‍य हिंसा की तहों के पार की वा‍स्‍तविकता का वह पर्दाफाश कर सकेगा?..

रात के डेढ़ बजे सेमलगंज के बियाबानी सन्‍नाटे में दामोदर दास एक हत्‍या की गुत्‍थी सुलझाने की मानसिक तैयारी करता रहा.. अलग-अलग योजनाएं बनाता रहा..

(जारी..)

विचार और वायु दोष

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: इक्‍तीस

सुकांतो दा, किंतु एक टू आमार जिग्‍गेसा छिलो?- तकिये पर कुहनी टेककर मैंने सवाल किया.

बुज़ुर्गवार हंसी रोककर संजीदा हो गए, संजीदगी में ही कहा- मैं सुकांतो नहीं हूं. मैं बंगाली भी नहीं हूं.

- मैं भी नहीं हूं. असल बात वो नहीं है. भोजपुरी-हिंदी में बोलता तो आप सीरियसली लेते नहीं. अपना ज्ञान ठेले रहते. बंगाली बोलते ही देखिये आप गोद की बांह उठाकर ठोड़ी पर विचार की मुद्रा में ले गए! (बुज़ुर्गवार ने एकदम-से गाल में गड़ी उंग‍ली हटा ली, असमंजस में लटके रहे कि अब उसे कहां ले जायें) क्‍यों करते हैं ये सब आपलोग? इतना वर्गीय विभाजन क्‍यों बना रखा है?

- तुम कहना क्‍या चाहते हो? सीधे-सीधे अपनी बात रखो. बौद्धिक व्‍यभिचार व भाषाई पहेलियों के लिए मेरे पास अब अवकाश नहीं.- बुज़ुर्गवार थोड़ा खिन्‍न होकर सोफे में मचलने लगे.

मैं अंदर ही अंदर खुश हो रहा था कि चलो, बुड्ढे को घेर लिया है. चेहरे से ज़ाहिर नहीं किया- वर्गीय विभाजन बोलता हूं तो आपको बौद्धिक व्‍यभिचार लगता है? और आऊट ऑफ वर्क गरीब के आगे आप सेहत का साज़ छेड़े रहें, वह बौद्धिक हस्‍तमैथुन नहीं? दो सौ एकड़ के प्‍लॉट पर हवेलियों में रहनेवाले मौका मिलते ही सादा जीवन का अपना रेकॅर्ड चालू कर देते हैं. निरंजन हिरानंदानी से लेकर अज़ीम प्रेमजी, अनिल अंबानी सब आपको दो फुलके और ज़रा सी सब्‍जी खाकर जीवन में सुखी बने रहने का राज़ समझाने लगते हैं. स्‍वीडन का मल्‍टी मिलियनेयर हंसते हुए कहता है दुनिया की सबसे अच्‍छी सवारी साइकिल की सवारी है. जहां गांवों में आज भी ढंग की एक सड़क नहीं और घर पहुंचने के लिए लोग दो घंटे पैदल चलते हैं, आप उनको मोटर-कार से दूर रखकर साइकिल का महत्‍व पिला रहे हैं! गरीब जो बीमारी-स्‍वास्‍थ्‍य हर घड़ी थाली भर भात और बरात के भोज का स्‍वप्‍न देखता है उसे समझाते हैं दो फुलका संजीवनी है? चे ग्‍वेवारा और माओ ने तो गरीब से कभी नहीं कहा कि दो फुलके खाकर प्रभुजी का झुनझुना बजाते हुए प्रसन्‍न रहो! दुनिया भर के बाज़ारों के स्‍टॉक चूतड़ों के नीचे दाबे आप ही लोगों की ओर से यह भजन बार-बार बजता रहता है. इसका रहस्‍य क्‍या है, साहब? गरीब के जीवन में अच्‍छी सड़क आने दीजिये, ढंग से दो वक्‍त का खुराक खाने दीजिये, मोटर-कार उसके घर में आ जाये फिर उसको तय करने दीजिये कि साइकिल अच्‍छी सवारी है या मोटर-कार! तन ढंकने का जिसके पास कपड़ा न हो उसको मत समझाइये कि नंगा रहने में कैसा ईश्‍वरीय सुख है. राजनीतिक सवाल को श्री श्री सत्‍यसाईं का सवाल बनाकर वर्गीय घालमेल का खेल मत खेलिये!

मैं उत्‍तेजना में कांप रहा था. नई लड़की को रिल्‍के की कविता सुनाकर इंप्रेस करने के चक्‍कर में अक्‍सरहा जैसी शौयपूर्ण बेचारगी की सूरत बन जाया करती थी कुछ वही हाल बन पड़ा था. मगर मैं सिर से पैर तक विजयी मद में नहाये था. बुज़ुर्गवार किंकर्तव्‍यविमूढ़ थे. किंकर्तव्‍यविमूढ़ ही हो सकते थे. चिढ़कर अपनी विदेशी ज़बान में बुदबुदाये- मुझे मालूम नहीं तुम क्‍या अनाप-शनाप बक रहे हो. जीवन में सुखी होना न होना निहायत व्‍यक्तिगत प्रसंग है. अपने ऊल-जुलूल जीवन शैली को ग़ैरजिम्‍मेदारी का वैचारिक जामा पहनाकर जस्टिफाइड बने रहना चाहते हो, अगर तुम्‍हें सुख मिलता है तो ईश्‍वर तुम्‍हें सुखी रखें!

मैं एकदम अनकंफर्टेबल होने लगा. दो सौ एकड़ के प्‍लॉटवाले और नफ़ासत में नहाये एक उम्रदराज़ बुज़ुर्ग को नाराज़ करके अपने पाप बढ़ाना नहीं चाहता था. पाप बढ़ाने से ज्‍यादा संबंध बिगाड़कर अपनी सामाजिकता का और रायता करना नहीं चाहता था. तेजी से भागकर बुज़ुर्गवार के पैरों पर आ गिरा, विचारमग्‍न उनके हाथों को अपने हाथ में लेकर लघु पत्रिका के उस संपादक की तरह रोने लगा जिसकी पत्रिका को प्रेस मालिक ने बंद करने का अल्‍टीमेटम दे दिया हो- ऐसा बोल के हमें अपने हाल पर अकेला न छोड़ें, गुरुवर! हर जगह लात मारके लोग अकेला छोड़ रहे हैं. नई प्रवृत्ति है. तेजी से फैशनेबल हो रही है. पहले सिर्फ लड़कियां छोड़कर कहीं और जाकर शादी कर लेती थीं. अब दोस्‍त, समाज सब वही खेल खेल रहे हैं! आई हैव स्‍टार्टेड टू फील लेटली वेरी लोनली, सर. सो प्‍लीज़ डोंट डू दीज़ टू मी. प्‍लीज़. वेट तो बढ़ ही रहा है, सिगरेट भी साली कम नहीं हो रही. फिर पेट में यह नया वायु दोष जैसी चीज़ आकर बैठ गई है. देह में कहां-कहां की महक ने आकर डेरा डाल लिया है, दिन भर इधर-उधर उंगली से टो-टोकर सूंघा करता हूं, इट्स बिकमिंग वेरी एम्‍बरेसिंग, सर! आई वॉंट टू लीड अ हेल्‍दी लाइफ़. रियली!

बुज़ुर्गवार नाराज़ हो गए. अपना हाथ मेरे हाथ में से निकालकर बोले- व्‍हॉट काइंड ऑफ परसन आर यू? विचारों में कोई कंसिस्‍टेंसी है या नहीं! आदमी हो या पजामा?..

भावुक होकर मैं लगभग डरने-सा लगा. सिर झुकाकर बोला- मालूम नहीं, सर. आई रियली डोंट हैव अ क्‍लू..

(जारी...)

अटकन बटकन दही चटाकन

समय के पुरालेखागार से

पवित्र पापी जी की एक और अविस्‍मरणीय रचना (बाल) जिसे बच्‍चे ही नहीं बड़े भी पढ़ सकते हैं (बशर्ते वे बड़े हो गए हों). खेद की बात है कि इसे खुद पर समर्पित करवाने के लिए श्री अविनाश दास कविवर पर जोर डालते रहे, और सफलता न मिलने पर अप्रगतिशील बताकर, उत्‍तरी बिहार के रास्‍ते स्‍मगल कराके (रचना को) नेपाल छोड़ आये. मगर सुखद आश्‍चर्य की बात है कि रचना नेपाल में भी बच्‍चों के बीच काफी सराही गई. बड़े अशिक्षा की चपेट में हैं इसलिए सराहने के सुख से वंचित रहे. लेकिन इस (रचना) ने फिर समाज (बड़े) को शिक्षा की उपयोगिता पर सोचने का मौका दिया और समाज (बड़ों) के बीच वापस आन्‍दोलन में वापसी का सवाल विचारणीय बना दिया है!



ता ता थइय्या ता ता थइय्या
खूब नचावन नाचो खिलवैया।

अटकन आगे भटकन पीछे
बायें त कब्‍बो दहिने फींचे।

रीत नीति न सऊर ठिकाना
नंगा आना नंगे जाना।

लंगी टंगी रूप नारंगी
हर हर हर जै बजरंगी।

बम सड़ाका धूम धड़ाका
बात बात में दे पटाखा।

कदुवन में मोती का झांसा
नियरे नाशा सगरे नाशा।

ता ता थइय्या ता ता थइय्या
खूब नचावन नाचो खिलवैया।

Friday, April 13, 2007

हां, गलती हुई है तो क्‍या करोगे.. जान लोगे?

जासूसी उपन्‍यास: एक वेरी ऑर्डिनरी भूल सुधार

भई, एक जघन्‍य अपराध हो गया है, ख़तरनाक गलती हो गई है. मतलब एक भूल सुधार वाली सिचुएशन हो गई है. जासूसी का मामला है इसीलिए ड्रामे के टोन में बोल रहे हैं वर्ना इस तरह की गल्तियां तो छापे में हर तीसरे दिन होती रहती है, और किसी का कुछ उखड़ता नहीं, तो आपके भी उखड़ने का सवाल नहीं. मगर इस छोटी, मामूली, बेमतलब-सी गलती से कोई उखड़ गया और फोन पर तू-तड़ाक की ज़बान में हमारी साहित्यिकता को क्‍वेस्‍चन करने लगा तो हम भी थोड़ा उखड़ गए- जैसा महसूस कर रहे हैं; और इस दो कौड़ी के आदमी को उसकी दो कौड़ी की औकात में वापस भेजते हुए इस बेमतलब-से प्रसंग का पटाक्षेप कर देना चाह रहे हैं. घबराइये नहीं आपका नुकसान नहीं होगा. मेरा तो नहीं ही होगा. जिस चिरकुट का होगा तो चूंकि वह ऑलरेडी दो कौड़ी का है तो उसके बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं. दफ्तर के चपरासी, सेक्रेट्री की गलती होती तो उन्‍हें एक कन्‍टाप और दस गालियां सुनाकर हम कलेजा ठंडा कर लेते लेकिन चूंकि हमारे आगे चपरासी और पीछे सेक्रेट्री और आसपास दूर तक कोई दफ्तर नहीं है तो मतलब यही निकलता है कि गलती हमीं से हुई है, और चाहें भी तो कलेजा ठंडा नहीं कर सकते. गरम किये हुए हैं मगर जानते हैं कि इससे भी कुछ उखड़ने वाला नहीं. भलाई इसी में है कि गलती सुधार ली जाये. हालांकि हमारा ईगो स्‍ट्रॉंगली हर्ट हो रहा है लेकिन हमारे जैसे संवेदनशील आदमी का ईगो कब हर्ट नहीं हुआ है. साहित्‍य में पाने क्‍या आये हैं? ईगो हर्ट करवाने ही आये हैं ना? बूस्‍ट करवाना होता तो सिनेमा में जाता, शाहरुख बनता, एलए-लेले में शो करता या फिर हारके-मारके सीरियल किलर हो जाता. न्‍यूज चैनल वाले समाज की चिंता में दुखी दिखने की एक्टिंग करते हुए बिजी हो जाते और बीस माइकों के बीच फंसे हुए फ्रेम में मीडिया इतिहास में अमर हो चुकता. ‘हां, हां, मैंने किया है.. और मैं शर्मिंदा नहीं हूं!’ कहते हुए मेरा ईगो बम-बम रहता. मगर अपने को तो साहित्‍य के सांप ने काटा था! जासूसी का जादू जगाने गये, पहले ही कदम पर मायूसी हो गई!

दोस्‍तो, लफड़ा ये हुआ है ‘हिंदी: एक जासूसी उपन्‍यास’ का हमने कर्टन रेज़र, भूमिका, पूर्व-पीठिका (कुछ भी कह लो, यार, बात को आगे बढ़ने दो!) जो भी था, जो छापा था हमने, उसमें जिन (दो कौड़ी के) प्रह्लाद चंद्र दास का नाम चला गया था वह जासूसी तो क्‍या ढंग की चिट्ठी लिख सकनेवाले लेखक भी नहीं हैं (अबे, तुम्‍हें शैंडलर, हेमेट, कल्विनो की श्रेणी में खड़ा किया, जनम-जनम का शुक्रगुज़ार होने की बजाय मां-बहन की तूने गाली दी, एहसानफ़रामोश? अबे, साले, तेरे जैसे तो.. यह भूल सुधार निपट लेने दे फिर निपटता हूं तुझसे!). जनाब दवाईयों की एक दो कौड़ी की दूकान के मालिक भी नहीं, फूटी कौड़ी के असिस्‍टेंट हैं.. पता नहीं मैंने सड़ा हुआ समोसा खा लिया था या फटी हुई दही पी ली थी कि इतने महत्‍वपूर्ण मौके की इतनी महत्‍वपूर्ण चीज़ पर ऐसी बेहूदी गलती कर बैठा. मुझसे गल्तियां पहले भी हुईं हैं (किससे नहीं हुई हैं?.. क्‍या हम ईश्‍वर हैं?) मगर बेहूदी गलती का यह पहला (और इंशाअल्‍ला आखिरी- या इंशाअल्‍लाह?- सुष्मिता तो वैसे इंशाअल्‍ला ही बोलती है?) मौका है. मुझे थोड़ा वक्‍त लगेगा लेकिन आप सबों से गुजारिश है भूल जाइए इस मवाद-प्रह्लाद-विवाद को, हालांकि पता नहीं उल्‍टी-सीधी दवाईयां देकर अब तक कितनों की जान ली होगी पाजी ने! (क्‍या इसकी जांच के लिए आपमें से कोई जनहित याचिका दायर करने का जिम्‍मा नहीं उठा सकता?.. टाईम नहीं है? टाईम निकालिये, यार! इतना ख़तरनाक आदमी- या मुज़रिम?- समाज में छुट्टा दवाईयां खिलाकर लोगों की जान ले रहा है और आप चैनल वालों की तरह बिजी होने की एक्टिंग कर रहे हो? बिजी होकर उखाड़ क्‍या रहे हो! कल को दवाई पिलाके सुला दिया फिर तुम नहीं तुम्‍हारे घरवाले हाथ में याचिका लिये इस और उस एडवोकेट के चक्‍कर लगा रहे होंगे? कोई ये नहीं कह रहा होगा कि टाईम नहीं है फिर! टाईम नहीं की बात करते हैं! हद है, यार? किसी चीज़ की कोई सीमा बची है कि नहीं? एक छोटी-सी, नाक के नोक बराबर गलती हुई है मुझसे मगर अपने में झांक के देखो कितना बड़ा जघन्‍य, ख़तरनाक अपराध कर रहे हो आप!)

सुबह-सुबह फालतू में दिमाग की ऐसी-तैसी करके छोड़ दी. बेवजह. फर्क क्‍या पड़ता है किताब प्रह्लाद चंद्र दास लिख रहा है या दामोदर दास? सबसे ताजुब्‍ब तो इस बात का है कि दामोदर डंडा लेकर नहीं आया. मवाद प्रह्लाद का बहता रहा (जबकि जनाब दवाईयों की दूकान में खाते-पीते-सोते और पता नहीं क्‍या-क्‍या करते हैं). एनीवे, जो हुआ सो हुआ (आखिर ऐसी बेहूदा गलती हुई कैसे?), आइंदा से रॉंग करेक्‍ट करके पढ़ि‍येगा. और फिलहाल मेरा सिर मत खाइये कि सनसनीखेज़ उपन्‍यास शुरू कब हो रहा है. जब होना होगा, होगा, पहले मैं इस पीसी दास को दवाई खाने की हालत में भेजने का कुछ इंतज़ाम कर लू (इज़ एनीबडी कमिंग फॉरवर्ड टू हेल्‍प मी इन दिज़ मेस?.. एंड वेट फॉर दामोदर नाउ!.. ही इज़ नॉट ऑनली अ बिग मैन, बट अमेजिंगली अ बिग राईटर एज़ वेल!)!