Monday, April 2, 2007

प्रामोड किंबा प्रोमोदेर प्रेम और ब्‍लॉग क्रांति

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: बाईस

गोलियों के दगने और आग के बबूलों के उठने से भय नहीं था. घटिया अमरीकी व हिंदी एक्‍शन फिल्‍में देखकर इतनी जानकारी तो हो ही गई थी कि ऐसे दृश्‍य भय खाने के लिए नहीं वीर रस की निष्‍पत्ति के लिए होते हैं. आग के बगूलों में किसी का परखचा उड़ना होता भी है तो रबर के पुतलों, एक्‍स्‍ट्रा व जूनियर आर्टिस्‍टों का. फिर हम तो यहां सूत्रधार वाली भूमिका में हैं, और रेहाना ने अभी-अभी हमारी तीन या जाने कितनी देवियों में से एक देवी का रोल स्‍वीकार किया है. ये भी बता दें कि हमारी देवी नंदा, कल्‍पना और सिमी गरेवाल सब पर बीस नहीं चालीस पड़ती है. रेनॉ एक्‍सलिरेट करके रेहाना एक्‍शन सीन से दूर हो रही है और उसके नयनाभिराम चितवन में गिरफ्तार मैं उन तमाम दृश्‍यों की सोच-सोचकर भावुक हो रहा हूं जहां हमें इंटिमेसी के पता नहीं कितने सीन अभी साथ-साथ शूट करने हैं.

फिर लिखे हुए सीन्‍स से अलग स्क्रिप्‍ट में कुछ निजी क्षण जोड़ने की भी इच्‍छा है. मसलन, मैं रेहाना को अपने हाई स्‍कूल के दिनों का अलबम दिखा रहा हूं, और वह अपने होंठों पर महीन, लंबी उंगलियां रखकर खुशी से चमकती है- रियली, ये तुम्‍हीं हो? या रात के ग्‍यारह बज रहे हैं. झमाझम बारिश हो रही है. बीच-बीच में कड़कड़ाती बिजलियों के शोर से मेरे जैसा साहसी नायक भी पल भर को कांप जाता है. झकाझक सफेद कुर्ते-पजामे में लैंप के नीचे कोई गंभीर किताब पढ़ने के अंतराल में मैं विचार करता हूं यह कैसी अनहोनी रात है, आज क्‍या अघट घटनेवाला है!.. कि तभी दरवाज़े की घंटी बजती है. मैं डोल्‍बी के टेस एक्‍सपेक्‍टेशंस वाले साउंडट्रैक के बैकग्राउंड पर भागकर दरवाज़ा खोलता हूं. बाहर चलती का नाम गाड़ी की भीगी हुई मधुबाला नहीं बालों, पलकों व टी-शर्ट से पानी चुआती एस गुड एस इट गेट्स की हेलेन हंट है. यानी कांपती-थरथराती नज़रें झुकाये रेहाना है. मैं बुरा मानने की एक्टिंग करता उससे कहता हूं ऐसा उसने क्‍यों किया! इतनी रात उसके मेरे यहां आने पर लोग (दो मुल्‍कों के) क्‍या सोचेंगे. ज़माना (दो मुल्‍कों के) क्‍या कहेगा. हम कैसे साथ हो सकते हैं जब हमारे बीच उम्र का इतना बड़ा फ़ासला है! रेहाना रोने लगती है कि बीस वर्ष पहले रामगोपाल ने निशब् बना ली थी लेकिन मैं अभी भी घटिया और पिछड़े विचार पाले हुए हूं. मैं घटिया विचार के कपड़े फर्श पर गिराकर रेहाना को भींच लेता हूं. बाहर बिजली जोर से कड़कती है. एकदम अंधेरा छा जाता है. मैं फुसफुसाकर कहता हूं- रेहाना!.. हॉल के उत्‍साही दर्शक सीटियां फूंकने लगते हैं.

कार मुख्‍य सड़क से उतर कर कच्‍चे, कंकड़ों भरे सड़क पर उछलती-गिरती भागती है. कहें तो मेरी मनोदशा का लिटरल ट्रांसलेशन कर रही है. लेकिन रेहाना नाराज़ है. खिझे स्‍वर में कहती है- मुझे रेहाना बुलाना बंद कीजिये! मैं रेहाने हूं, रेहाना नहीं! कोई बंगाली लड़की आपको प्रोमोद बुलाये या तमिलियन प्रामोड, तब?

- बोलो, बोलो, बोलती रहो! दो क्‍यों, और तरीकों से भी बुलाओ! मैं सुन रहा हूं, अच्‍छा लग रहा है!- नज़दीक होकर मैं रेहाना से चिरौरी करने लगा. लेकिन मेरे नाम के गुजराती, लातिनी, फिलीपिनो, उज़बेकी संबोधनों में मुझे नहलाने की बजाय रेहाना चुप हो गई. मुझे घूरती हुई बोली- आप बड़े वो हैं!

मन होता है हंसते ज़ख़्म का रफ़ी वाला गाना (तुम जो मिल गए हो..) गाने लगूं, लेकिन बात करने लगता हूं. कहता हूं- तुम भी बड़ी वो हो. ऐसा क्‍या बुरा मानना? हमारे यहां होतीं तो रेहाना सुल्‍तान होतीं! तुम्‍हारे देश में चेतना और दस्‍तक रीलीज हुई नहीं इसीलिए ऐसी बातें करती हो. हिंदी पाठकों का सोचो. रेहाने से पुरुष लिंग का भ्रम होता है. सीन की इंटेंसिटी अफेक्‍ट होती है, स्‍वीटी!

रेहाना फिर मुझे आप बड़े वो हैं वाले नज़रों से देखने लगती है. मैं स्क्रिप्‍ट की ज़रूरत के लिए नहीं अपने स्‍वार्थ में सोचता हूं यह सीन और-और खिंचता चला जाए. मैं रोमन हॉलीडे का ग्रेगरी पैक और रेहाना ऑड्री हैप्‍बर्न हो जाए! मगर तभी कंकड़ीली सड़क के मोड़ की ही तरह दृश्‍य में भी एक नाटकीय मोड़ आता है. पलस्‍तर उखड़ते एक ढहते मकान के पीछे से भागता हुआ एक तेरह-चौदह साल का लड़का सड़क पर कूदकर हमारा रास्‍ता छेंक लेता है. उसके चेहरे पर गुस्‍सा ही नहीं उस गुस्‍से को भयानक नतीजों तक पहुंचाने वाला एक मिसाइल लॉंचर भी है. मैं गाड़ी से उतर कर लड़के पर नाराज़ होना चाहता हूं कि बेटे, यह तुम्‍हारी स्‍कूल जाने की, ईरानी फुटबॉल प्‍लेयरों का नाम याद करने की उम्र है, लॉंचरों से प्‍ले करने की नहीं. लेकिन रेहाना मेरे हाथ पर अपना महीन हाथ रखकर मुझे रोक लेती है कि हाथ में हथियार लिए खड़ी लड़का नहीं लड़की है और मैंने भले एक ईरानी लड़की (यानी रेहाना) का दिल जीत लिया हो, सभी ईरानी लड़कियों के गुस्‍से को अंडरएस्टिमेट न करुं.

रेहाना कार से उतर कर लड़की से फारसी में बातें करती है. जर्जर मकान के पीछे वाली गली में कोई भारी बम फूटा है. काफी ऊपर तक धुंआ उठ रहा है. पुलिस गाडियों के साइरन बज रहे हैं. रेहाना मेरी सुरक्षा को लेकर टेंस हो रही है. उसका इस तरह मेरे लिए टेंस होना मुझे अच्‍छा लग रहा है. मिसाइल लॉंचर वाली लड़की असमंजस में है. वह अपनी सुरक्षा को लेकर टेंस है. चीखकर रेहाना से फारसी में कुछ कहती है और पलटकर धुंए के बगूलों की ओर भागती है. लव इन द टाईम ऑफ वार के निश्चिंत नायक की तरह मैं इतमिनान से आस-पास की सीनरी का नज़ारा लेता हूं और अब जाकर रियलाइज़ होता है कि हम तेहरान से कितना बाहर निकल आए हैं; जहां ग्रामीण शांति व सुख की सुकूनदेह दृश्‍यावलियां होनी चाहियें वहां साइरन बज रहा है, बम के गोले छूट रहे हैं! हद्द है. यह सोचकर भी अच्‍छा लग रहा है कि इन द टाईम ऑफ लव मैं वॉर के बारे में भी सोच पा रहा हूं.

***

मैं गलतफ़हमी में था नीची पहाडियों के आखिर में कोई सोते-वोते जैसी जगह होगी जिसके किनारे कार रोककर एडियों को पानी में नहलाते हुए हम एक-दूसरे को जाने किन-किन अजीब नज़रों से देखते हुए बेचैन होने व बनाने लगेंगे. लेकिन पहाडियों के खत्‍म होने पर कोई सोता नहीं एक पहाड़ी गांव आया. कच्‍चे, अधपके छोटे-छोटे मकान. संकरी पगडंडियां. मानो भटकते हुए हम हिमाचल चले आए हों. हरियाली की संपन्‍नता की जगह धूल व झाडियों का हिमाचल (गधों को हांककर ले जाते गड़ेरिये बच्‍चे का पिछड़ापन मैंने जीवन में पहली मर्तबा देखा).

पहुंचने के पहले ही जैसे हमारे आने की जानकारी पहुंच गई हो इस तर्ज़ पर आठ-दस लोग एक दोमंजिले मकान के बाहर हमारी राह तक रहे थे. रेहाना को देखते ही चार-पांच बुरके वाली लड़कियों ने खुश होकर हल्‍ला मचाना शुरू किया. रेहाना ने हाथ हिलाकर सबको सलाम किया, और आगे-आगे भागती लड़कियों की दिशा में कार धीमे-धीमे ड्राईव करती हुई गई. लड़कियों के कहे अनुसार रेनॉ जानवरों के एक बाड़े के भीतर दाखिल किया गया, और थोड़ी ही देर में पुआल, कपड़ों से ढंक दिये जाने के बाद कयास लगाना मुश्किल था कि ऐसी जगह का गाड़ी छिपाने के लिए भी इस्‍तेमाल हो सकता है. बाड़े से बाहर आते ही रेहाना को लड़कियों ने घेर लिया (मुझे कोई घेर नहीं रहा था). लड़कियां चहक-चहक कर बातें कर रही थीं, पिछले दिनों की कार्यवाईयों से रेहाना को अपडेट कर रही थीं. मुझे अकेले पड़ जाने पर अच्‍छा नहीं लग रहा था. लेकिन रेहाना लड़कियों की गप्‍प सुनती खुश थी. आंख मारकर उसने मुझे इतमिनान रखने का इशारा किया, या शायद मेरा वहम था. ईर्ष्‍या से छाती जलने लगी तो लड़कियों को लगभग ठेलता मैंने रेहाना से सवाल किया- यही दिखानेवाली थीं?.. इसीलिए आया था ईरान?..

रेहाना ने फुसफुसाकर लड़कियों से फारसी में कुछ कहा. मेरे हाथ में हाथ फंसाकर उनके गिरोहबंदी से बाहर आई. बुरकेवाली लड़कियां हैरत से हमें देखती रहीं. इस बार फुसफुसाकर रेहाना ने मुझसे कहा- आपका यह रूप रैडिकल रूरल्‍स की लड़कियों को रास नहीं आएगा.

मैंने चिढ़कर कहा- तुम्‍हारा भी मुझे नहीं आ रहा! मुझे घुमाने लाई हो और आते ही उनसे चिपट गईं!

रेहाना ने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे ख़ास मौकों पर बीवियां बुरा मानकर अपने शौहरों की ओर देखती हैं. कहा- मेरी स्‍टूडेंट्स हैं, भई! उनके प्रोग्रेस की खबर रखनी पड़ती है. कल को इनमें से ही फुलटाईम एक्टिविस्‍ट सेलेक्‍ट होंगी, और आपको बस अपनी पड़ी है.. मेरे हाथ में चिकोटी काटकर आगे बोली- आपने फैज़ को नहीं पढ़ा और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्‍बत के सिवा..?

- फैज़ की शेरो-शायरी समझाने के लिए तुम मुझे यहां लाईं हो? अपना स्‍टडी सर्किल चलाओगी, मैं बैठके गांव के बुड्ढों से खैयामचरितमानस सुनूंगा?- मैं ऐसे नाराज़ हो रहा था मानो सचमुच हमारी शादी हुई हो, और पहली ही रात बीवी ने सूचित किया हो कि वह सुबह नौ सौ किलोमीटर दूर एक नया जॉब जॉयन करने जा रही हो.

काली-काली आंखों और अनार-से दांतों से मुझे रिझाती हुई रेहाना बोली- हमेशा लड़कियों के बीच बने रहना भी कोई अच्‍छी आदत नहीं. थोड़ी बुज़ुर्गों की संगत भी करनी चाहिये. ज़ेलाल हसन आपको बिज़ी रखेंगे. मैं लड़कियों को निपटाकर चट लौटती हूं. फिर अकेले में बैठकर अपन खूब सारी बातें करेंगे.. अपने बारे में सब बताऊंगी.. मैंने हिंदी कहां सीखी, बंदूक चलाना कब शुरू किया, पहली दफ़े डिफ्लावर कब हुई.. सबकुछ..

मेरे अंदर करंट-सा दौड़ गया. मगर तब तक हम एक टूटे मकान के पिछवाड़े सीढियों से एक अंधेरे तहख़ाने में उतर रहे थे. हर तरफ बिजली के तार, केबल. और उनसे लगे दरवाज़े पर सफेद झक्‍क दाढ़ी में बुज़ुर्गवार मियां ज़ेलाल हसन. मुझे मियां और मेरे अंधेरों के हवाले कर रेहाना वापस सीढियों से ऊपर लौट गई. मियां ने अपनी झुर्रियों वाले हाथ में मेरा हाथ लेकर अपने को गुज़रे ज़माने का होने की माफ़ी मांगी. बताया हिंदुस्‍तानी या चीनी नहीं सीख पाये, अलबत्‍ता टूटी-फूटी अंग्रेजी ज़रूर जानते हैं. दरवाज़े के अंदर पैर रखते ही पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गई. धुप्‍प अंधेरे में जैसे पचासेक दीये टिमटिमा रहे हों. अंधेरे में आंखों के अभ्‍यस्‍त होने पर पता चला बीस से कम उम्र के करीब पचासेक बच्‍चे हैं जो मोनिटर के टिमटिमाते खालीपन को कीबोर्ड पर तेजी से भागती उंगलियों से भर रहे हैं. हैरान होकर मैंने मियां से सवाल किया- ये हो क्‍या रहा है, चचाजान?

ज़ेलाल हसन ने अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में जवाब दिया- रैडिकल रूरल्‍स के बच्‍चे हैं, दुनिया भर में ब्‍लॉग से अपने राजनीतिक संदेशे भेज रहे हैं.

(जारी...)

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