Wednesday, April 4, 2007

सब ठीक है मगर ठीक-ठीक ठीक नहीं है..

सुबह पता चला मैं ही अपने से दु:खी नहीं हूं, हमारे फ़र्श से लगी जिनकी छत है वह भी हैं, और फिलहाल हमारी ही वजह से हैं. अपनी चिंताओं में सुबह से यूं ही चौंकन्‍ना बना हुआ था, कि कौन-सा ऐसा कदम रखूं कि कहीं रोशनी की एक खिड़की खुले. दरवाज़ा बजने की बेचैनी सुनते ही समझ गया खिड़की रोशनी में नहीं अंधेरे में खुलनेवाली है. चौथे माले पर रहनेवाली और मेंहदी रंगे बॉब कट व पचास वर्षों की मालकिन मिस शर्मा मेरे दरवाज़े पर खड़ी लिटरली रो रही थीं कि मैं उन्‍हें तंग करना कब बंद करुंगा. मैं भी लिटरली अपनी आत्‍मा में रो रहा था कि मैं मिस शर्मा को तंग करना कब बंद करुंगा, क्‍योंकि मिस शर्मा के सवाल का मेरे पास सचमुच जवाब नहीं था. जवाब था तो मेरे जेब के पैसों की तरह- और इस शहर की नागरिक सुविधाओं की ही तरह- आधा-अधूरा था.

ऐसा नहीं है कि मैं चुपके से मिस शर्मा की टीवी पर एक लव लेटर छोड़ आया था, और अतीत की बेवफ़ाईयों व बॉब कट के बावजूद मेरे जैसे को पाने के स्‍मरण से उनकी आंखें गीली हो रही थीं. नहीं. ऐसी दुष्‍टताएं तो शायद वह माफ़ कर भी देतीं. लेकिन मेरे लीक करते किचन का सिंक और बाथरुम का रिसाव जिस तरह उनके बैठक की छत और दीवारों को गीला किये जा रहा था उसे माफ़ करने में वह खुद को असमर्थ पा रही थीं. उन्‍होंने कहा नहीं लेकिन उनके चेहरे से ज़ाहिर था कि थोड़ा दुस्‍साहसी होतीं तो बैठक में बैठने की बजाय छत के हुक से रस्‍सी डालकर लटक जाना ज्‍यादा प्रीफर करतीं. मैं भी अपनी ग्‍लानि में फ़र्श में गड़ जाना प्रीफर करता. मगर पांचवे माले के फ़र्श में गड़ जाने का सवाल नहीं था, नीचे मिस शर्मा के चौथे माले के फ़र्श पर ही गिरता, और उनके गीले फ्लोर के चुल्‍लू भर पानी में डूबकर तब शायद मुक्ति पा लेता!

अब इस चिकट व्‍यंग्‍य से ज़रा बाहर आकर सच्‍चाई पर गौर करें. सच्‍चाई यह है कि लीकेज़ की यह समस्‍या छह महीने पहले भी आई थी, और मिस शर्मा और मेरे बीच अपेक्षित भावों के आदान-प्रदान के उपरांत इस व्‍याधि का प्‍लंबर ने यथोचित उपचार किया था. छै महीने बाद वह फिर उपस्थित है. जासूसी फिल्‍मों में जिस तरह अंत में पुलिस क़ातिल तक पहुंच जाती है उसी पुराने प्‍लंबर तक मैं भी पहुंच जाता हूं और मेरे निर्मम सवाल-जवाब के जवाब में वह दु:खी होकर कहता है क़सूर उसका नहीं, म्‍हाडा (महाराष्‍ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) के घटिया कंस्‍ट्रक्‍शन का है. जब अंदर का बेस ही खोटा हो तो आप ऊपर कितनी लिपा-पोती करोगे!

मैं हैरानी से गोरखपुर के अशिक्षित- जाति से मल्‍लाह और पेशे से प्‍लंबर- लाजमनि डामरवाले को देखता हूं. लाजमनि को मालूम नहीं कि उसने अनजाने में कितना बड़ा सा‍माजिक-आर्थिक-राष्‍ट्रीय असेसमेंट कर दिया है. जिस नतीजे तक पहुंचने में अख़बार, पत्रिकाओं के सुधी संपादकों से लेकर खबरी चैनल की बेसुध सुंदरियां तक तीन सौ अस्‍सी खेल करती रहती हैं मगर इस सामान्‍य तथ्‍य को स्‍वीकारने से बचती रहती व रहते हैं, उसे लाजमनि ने ऐसे कह दिया था मानो गाय के चौपाया जानवर होने के सामान्‍य सच का हमें ध्‍यान दिला रहा हो!

क्‍योंकि इस दुष्‍कर्म में एक अकेला म्‍हाडा जैसा संस्‍थान ही नहीं है. इस महती अभियान में सरकारी, अर्द्धसरकारी, गैर-सरकारी सारे उद्यम बराबरी से योगदान करते हैं. कोरिया से कोई टुरिस्‍ट घुमता हुआ आपसे आ टकराये तो आप हंसते हुए उसे बता सकते हैं यह हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र है. हम काम शुरू करके खत्‍म भी कर देते हैं. लेकिन ठीक से नहीं करते. बच्‍चों की किताब छापकर उससे बाज़ार पाट देते हैं लेकिन उसकी छपाई दो कौड़ी की नहीं रहती. लकड़ी की महंगी आलमारी ग्राहक को चूना लगाकर दूकान से निकाल देते हैं, अब उसपर डेढ़ साल बाद फंगस चढ़ने लगे तो यह ग्राहक का सिरदर्द है, दूकानवाले का नहीं. मास्‍टर स्‍कूल में बच्‍चों की शिक्षा के लिए नहीं अपने माहवारी तनख्‍वाह के लिए जाता है. अख़बार से लेकर सिनेमा तक में वे सारे सजावटी एलिमेंट रहते हैं जिससे आप उसे चालीस साल तक अख़बार और सिनेमा ही मानते रहें भले वह चनाचूर लपेटने से ज्‍यादा और किसी उद्देश्‍य के काबिल न हो.

अब जैसे सूचना के अधिकार वाले एक्‍ट को ही ले लीजिये. दस रुपये की अर्जी डालकर सरकार से सूचना निकलवा लेने की बात सोचकर आप मन ही मन मुदित होने लग सकते हैं. सूचना न निकला तो ऊपर कंप्‍लेन कर दिया. वहां फेल हुए तो एक पायदान और ऊपर सीधे केंद्रीय सूचना कमिश्‍नर तक चले गए. सूचना मुहैया न करवाने पर अधिकारियों पर पच्‍चीस हज़ार तक का ज़ुर्माना मुक़र्रर है. सुनकर अच्‍छा लगता है ना? सुनने के लिए सचमुच अच्‍छा है. क्‍योंकि जो सच्‍चाई है आपको उसकी भी थोड़ी सूचना दे दें. नीचे के नीचों का रहने दीजिये (अड़ंगे डालकर आपको लाईन में रोके रहना, सीधे-सीधे घूस मांगना तो नीचेवालों का बड़ा स्‍वाभाविक पैटर्न है), ऊपर के जो बड़े केंद्रीय सूचना कमिश्‍नर हैं उनके यहां का ज़रा हाल लीजिये. केंद्रीय कमिश्‍नर एमएम अंसारी ने अस्‍सी प्रतिशत मामलों में सूचना देने से मना किया, दूसरे हबीबुल्‍लाह साहब हैं वह अड़तीस प्रतिशत मामलों में मुकर गए. आप कहेंगे, भई, पैनल्‍टी का भी तो प्रावधान है? एकदम है. उसी तरह जैसे देश में न्‍याय को समर्पित न्‍यायपालिका है और सरकार पूरे मनायोग से प्राथमिक शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य लागू करने में लगी हुई है.. मनाही का रेशियो इतना ऊपर है और पैनल्‍टी का? पिछले दो वर्षों में सिर्फ अट्ठारह ऐसे मामले हैं जिनमें अधिकारियों को दंड सुनाया गया, वास्‍तविकता में वह भी भरा केवल बारह लोगों ने.

इसी तरह से दो कदम दांये और डेढ़ बायें के हिसाब से मुल्‍क आगे चल रहा है. लीकेज़ कभी-कभी बंद हो भी जाती है. मिस शर्मा रोने की बजाय हंसते हुए भी दिखती हैं. मगर इस अंशकालिक उपचार के बाद फिर लाजमनि की खोज होती है, और लाजमनि आकर बड़ी सामाजिक सच्‍चाई खोलकर आपका पता नहीं कितना मगर हमारा दु:ख ज़रूर बढ़ा देता है.

(सूचना के अधिकार वाली सूचनाएं साभार, आउटलुक, अप्रैल 9, 2007)

1 comment:

  1. प्रमोद जी
    आपका लिखा हमेशा पढ़ता हूँ, अच्छा लगता है. आप नियमित रूप से लिखते हैं जो और भी अच्छा है.

    धन्यवाद, अपने पन्ने पर मेरा लिंक लगाने के लिए. ए दास का सी का दिलचस्प शीर्षक है लिंक के लिए. ए तो ठीक है लेकिन 'सी'से निकाले जाने वाले ज़्यादातर मतलब ख़तरनाक ही होंगे, यहाँ लिखना ठीक नहीं.

    इससे एक बात याद आई. मा. मुलायम सिंह यादव के पोस्टर पूरे गाज़ियाबाद में लहरा रहे थे और समाजवादी पार्टी उम्मीद कर रही थी कि लोग उसे माननीय ही पढ़ेंगे. जनता इतनी नाराज़ हो सकती है कि इस मा. को उनकी माता जी शान से जोड़कर पढ़े तो कोई ताज्जुब नहीं होगा.

    इसी तरह, उत्तर प्रदेश की एक और महिला नेता के नाम के आगे कु. लिखा जाता है, लिखने वाले कुमारी समझते हैं, उनके विरोधी कुलक्षिणी, कुलटा पढ़ें या कुछ और, यह उनकी मर्ज़ी.

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