Tuesday, April 3, 2007

एक्‍टर से एक्टिविस्‍ट हुए इरफान से मुलाकात (गुप्‍त)

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: तेईस

एक.. दो.. तीन.. चार.. आठ.. दस.. चौदह.. जैसे-जैसे टिमटिमाते मॉनिटर स्‍क्रीन आंखों से गुज़रते गए वैसे-वैसे मैं कुछ सन्‍न-सा होता गया. ये माज़रा क्‍या है! ये जंतर-मंतर, दुनिया का आठवां अजूबा.. पहाड़ी गांव के तंदूर में भला ये कैसा अनोखा नान पकाया जा रहा है?.. मेरी फटी-फटी आंखों की हैरानी देखकर ज़ेमाल हसन ने जवाब नहीं दिया, मुस्‍कराते हुए इलाहाबाद की श्‍याम बीड़ी सुलगा ली. कान में फुसफुसाकर कहा तुम्‍हारे परयाग का ही है, बोलो तो एक तुम्‍हारे लिए भी बाल दूं?.. मैंने इशारे से समझाया वैसे ही हैरानी में उबल रहा हूं, रहने दीजिए.

औरंगाबाद (बिहार) के हमारे पुराने साथी राजाराम होते तो मुंह बा कर और ‘गजब!’ बोलकर अब तक तीन दफे आड़ा-तिरछा नाच गए होते. हल्दिया का तन्‍मय होता तो ‘दारुण’ और ‘सोत्‍ती?’ बुदबुदाता हुआ अब तक दस बार पीछेवाली दीवार पर थूक आया होता (हैरत और हरामीपने के क्षणों में उसका पुराना एक्‍सेप्रेसिव औज़ार). एनिवेज़ (बतर्ज़ रितु सिन्‍हा, लखनऊ वाली), मामला यह था कि पचासेक कंप्‍यूटर स्‍क्रीनों पर (टिक्-टिक्-टिक्-टड़ाक) महज राजनीतिक मसौदे और कार्यक्रम ही नहीं छप रहे थे. सेक्‍स, भूगोल, गणित, बॉयो टेक, बॉयो केम, बॉयो दिस, बॉयो दैड जाने किन-किन विषयों पर पोस्‍ट्स, पोडकास्‍ट्स और भी बहुत कुछ सेंड हो रहा था. रैडिकल रूरल्‍स की राजनीति समझने में परेशानी हो रही थी. इससे भी परेशानी हो रही थी कि इस सारे तामे-झामे का पैसा कहां से आ रहा है. मगर सबसे ज्‍यादा परेशानी यह सोचकर हो रही थी कि रवीश रिसोर्सेस इंक ने जब एशिया भर के ब्‍लॉग्‍स को सीज़ किया हुआ है तो ईरान के एक पहाड़ी गांव में रॉबिनसन क्रूसो का गांव कैसे आबाद हो रहा है!

मेरे चेहरे पर बनते-बिगड़ते शिकनों को ज़ेमाल मियां ताड़े होंगे, या इस तरह फटी-फटी आंखें उन्‍होंने पहले भी कई मर्तबा देखी होंगी सो सफेद दाढ़ी में हाथ फेरते हुए मेरे आगे ब्‍लॉग-विचित्र का रहस्‍य इस तरह खोलने लगे जैसे हाई स्‍कूल में फेल हो जाने वाले छात्र को अनुभवी मास्‍टर समझा रहा हो कि बेटा, इस लात से झटका खाने की जगह इसे भविष्‍य में मिलनेवाले अन्‍य लातों के सुहाने ट्रेलर की तरह भी देख सकते हो. ट्रेलर के साथ धीरे-धीरे पूरी फिल्‍म भी खुलने लगी. रेडियो वेव्‍स की तरह यह ब्‍लॉग्‍स का अंडरग्राउंड नेटवर्क था, और ईरान ही नहीं समूचे एशिया का सबसे बड़ा अंडरग्राउंड सेटअप था. और अकेला नहीं इसी तरह से गांव में अन्‍य चार और तहख़ाने थे. पूरा नेटवर्क मासुमेह मोहामदी व मूवमेंट फॉर डेमोक्रेसी के पॉलित ब्‍यूरो द्वारा सीधे नियंत्रित था. ईरान की सरकार ही नहीं ताईवान, फिलीपीन, चायनीज़ सभी सरकारों ने मासुमेह के सिर पर इनाम घोषित कर रखा था.

तीसरी बीड़ी सुलगाकर ज़ेमाल मियां मुझे कंप्‍यूटरों के बीच और आगे ले गए. अनुभवी गाईड वाला लेक्‍चर बदस्‍तूर जारी रहा- नये ब्‍लॉग्‍स से अलग काम के बाकी बिलाग भी हमने क्‍लेम कर लिया है जिनका सोसायटी और ज़माने में कोई रोल था. तुम्‍हारे अज़दक में भी कोई उपयोगिता, थोड़ी सामाजिकता होती तो बच्‍चे उसको लौटाल लाते.. मगर तुम अकेले नहीं थे.. तुम्‍हारी तरह ढेरों लोग बिलाग को खिलौना बनाकर खेलते रहे.. खास तौर पर कनपुरिया, उड़नतश्‍तरिया, अनामदसिया.. बुरा मानने की बात नहीं, बच्‍चा.. There is nothing personal about it. Everyone here is working in a wider interest. For History. For betterment of the world, of our planet!

ये आखिरी पंक्तियां ज़ेमाल मियां ने खालिस फारसी में कहीं. मेरी असहजता भांपकर वापस टूटी-फूटी अंग्रेजी पर लौट आये- अपने ज़माने में हम जैसे तरक़्क़ीपसंद जो करने से रह गये, हमारी लड़कियां आज उसे कर रही है. काम इतना बढ़ गया है कि आउटसोर्सिंग कर रही हैं. थोड़े तुम्‍हारे मुलुक के भी बच्‍चे हैं.. आओ, तुम्‍हारा तआरुर्फ कराता हूं..

अब जाकर समझ आया रेहाना मुझे यहां लेकर क्‍यों आई थी! थोड़ा आगे जाकर रवीश के गांव का ही एक बच्‍चा मिला जिसके बारे में उड़ती खबर थी कि अपने रैडिकलनेस की वजह से रवीश ने उसे उड़वा लिया है. मगर यहां बच्‍चू भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में किस मद में कितना पैसा कहां, किसके मार्फत जाता-लुटता है के अपने ब्‍लॉग पर विरोध का पतंग उड़ा रहे थे. एक उडिया लड़का था जो बोलांगीर की बेहतरी का एक मास्‍टर प्‍लान वर्क-आउट कर रहा था. मैंने दोनों से हैलो कहा, अच्‍छे काम की बधाई दी. अपने बारे में यह नहीं बताया कि मेरा ब्‍लॉग रद्दी में पड़ा है, अपने को मासुमेह का खास बताकर उन्‍हें ऊंची नज़रों से नीचे देखता रहा.

थोड़ा आगे जाने पर और कोई नहीं अपने इरफ़ान खान मिल गए. बच्‍चे अच्‍छा मांजा कैसे तैयार करें, ब्‍लॉग पर इसका ताज़ा पोस्‍ट चढ़ा रहे थे. मैंने कहा गुरु, ‘हासिल’, ‘मक़बूल’, ‘दि नेमसेक’ के बाद फिर तुम्‍हारा पता ही नहीं चला! यहां कैसे?

पुराने अच्‍छे दिनों की याद में इरफान की आंखें भर आईं. लेकिन चूंकि वह अच्‍छा एक्‍टर था और बचपन में राजेश खन्‍ना की ‘अमर प्रेम’ भी देखी थी उसने हंसते हुए आंसू छिपा लिये. विगत वर्षों की जो जानकारी मैं उससे एक्‍सक्‍लूसिव निकाल पाया उसका जिस्‍ट ये है (पूरे इंटरव्‍यू के लिए लॉग इन करें: radicalrurals.blogblasts.inde/memories-sad/actor/irrfan.html. इरफान के संघर्षमय जीवन को डिटेल में जानने के लिए देखें: Sahibzade Irrfan Ali Khan: A Life Beyond Cameras, Ravish Rupa Random House, Beijing, 2027): बॉलीवुड में बीस वर्षों तक एडियां रगड़ने व अपनी आंखों के आगे अभिषेक को तीन और अतहर ख़ान को चार राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार जीतता देखने के बाद इरफान का मन बॉलीवुड से ही नहीं इंडिया से भी भर गया. एंजेलिना जोली की मदद से उसे तीन सी ग्रेड घटिया हॉलीवुड फिल्‍मों में रोल भी मिले मगर याट खरीदने या रुसी माफियाओं की ऐयाशियों को जी सकने लायक पैसे पर्याप्‍त नहीं मिले. ब्रेड और वाईन का खर्च निकल रहा था लेकिन एलए में फ्लैट खरीदने का नहीं. अंत में एलए से हारकर इरफान ने बड़े फिल्‍मी बाज़ार में किस्‍मत आजमाने का फैसला किया. ब्रैड पिट से पिटने के बावजूद एंजेलिना चाहती नहीं थी कि इरफान उसे छोड़कर चायना जाये. लेकिन एक्टिंग के लिए इरफान ने पहले भी त्‍याग किये थे. अभिषेक से भागकर आई ऐश्‍वर्या को छोड़कर एलए भागा था, अबकी एंजेलिना की नज़रें बचाकर बीइ-जिंग भागा. मगर चीन की विकराल इंडस्‍ट्री में इरफान स्टिरियो टाइप कास्‍ट होने को अभिशप्‍त था. हुआ. चीन में उसके लिए सिर्फ कुली और भंगियों जैसे ही रोल थे, जिन्‍हें करते रहने की बजाय इरफान ने बेइजिंग के भंगी बच्‍चों को एक्टिंग का ट्यूशन देना ज्‍यादा बेहतर समझा. मगर सभी भंगी चीनी नहीं थे, एक हिंदुस्‍तानी और रवीश के गांव का था जो ग्रह दशा और पंचांग के मुताबिक आगे चलकर बीस वर्ष बाद रवीश के गले की हड्डी बनने वाला था. रवीश को जैसे ही अपने चीनी सूत्रों से इसकी सूचना मिली उसने न केवल इरफान को गालियां और धमकी दी, चीनी प्रैस में उसका भयानक कैरेक्‍टर असेसिनेशन करना शुरू किया. उसे समलैंगिक बताने के साथ-साथ पी‍डोफिलिया से ग्रस्‍त दिखानेवाली तस्‍वीरें चायनीज़ प्रैस में प्‍लांट कीं. धर्मेंद्र की तर्ज़ पर इरफान ने वहीं सौगंध खाई कि जब तक वह इस दुनिया से रवीश के साम्राज्‍य का नामोनिशान नहीं मिटा देगा, कैमरे के आगे क्‍या टेलीविज़न तक पर एक्टिंग नहीं करेगा.

इतनी लंबी कहानी खत्‍म करने के बाद इरफान ने एक ईरानी भंगी लड़के को बुलाकर गिलास भर पानी पिया, और उत्‍साह से मुझे मोतिहारी के उस गांव का वीडियो दिखाने लगा जहां की बिजली और पानी की सप्‍लाई काटकर वह रवीश के मुंह पर एक सार्वजनिक तमाचा जड़ना चाहता था. मगर मोतिहारी के कलर्ड वीडियो की बजाय हमारे आगे पटना सिटी और गया के पुराने ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फाइल्‍स खुल रहे थे. एक जगह मैंने औरंगाबाद के अपने पुराने साथी राजाराम को अपने इंजीनियरिंग कॉलेज़ के कपड़ों में इंदिरा विरोधी नारे लगाते और पुलिस के साथ हाथापाई करते देखा. काले-सफेद वीडियो में यहां पुलिसवाला ‘गजब!’ कह रहा था. एक दूसरे वीडियो पर भी इसी तरह समाज परिवर्तन का हल्‍ला-गुल्‍ला हो रहा था. कोई दृश्‍य खटका होगा, इरफान से मैंने होल्‍ड करने को कहा. जीप पर सवार जेपी के पीछे भागते-नारा लगाते लोगों का रेला जा रहा था. ग्‍यारह-बारह साल का एक चेहरा कुछ पहचाना-सा लगा. जूम इन करने पर मुझे ही नहीं इरफान को भी हैरत हुई. क्‍योंकि नारे लगाता भीड़ और पुलिस के नाक में दम किये लड़का कोई और नहीं- मैं था! उस पार मुझे पहचान कर हैरानी से इरफान ने इस पार मेरी ओर देखा, और इस पार मुझे न पाकर उसे और हैरानी हुई.

(जारी...)

1 comment:

  1. I may not be qualified enough to give a criticism of your post. So please consider this an opinion, and not an expert criticism.

    Your style of writing is very good but vague. There was a very long description before the point became clear. It was not clear for a long time what the basis of the post was. You kept giving examples of your colleagues (what they would have done).

    I think you tried to build the tension. You were successful. But it was a little bit overdone.
    Otherwise, I like the language you write.

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