Wednesday, April 4, 2007

अनिल, आनंद और रुपाली

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: चौबीस

माथे पर गमछा डाले जीप की सीट पर खड़े जेपी भाषण दे रहे थे. औरतें सिर की साड़ी खींचे और आदमी आंखों पर हाथ का ओट लिये सुन रहे थे. लाउड स्‍पीकर की व्‍यवस्‍था खराब थी, लेकिन लोगों का उत्‍साह उस कमी को पूरी कर रहा था. बीच-बीच में जेपी सवाल करते. हुंकार भरते लोग जवाब देते. मेले-सा आनंद था, मगर डेढ़ घंटे से इधर-उधर भागता, पसीने में नहाया, मैं थक गया था. राजनीतिक जिरह से ज्‍यादा मुझे सिर पर ठंडा पानी गिराने और कहीं बैठकर तरबूज खाने की इच्‍छा हो रही थी. पानी और तरबूज नहीं मिला एक जगह पेड़ की छांह मिल गई. वहीं बंबई से संपूर्ण क्रांति की झलक लेने आए चमकते चेहरे वाले दो नौजवान भी मिल गए. एक कह रहा था कैनेडा के आप्रवासियों में वह बात नहीं है जो यहां बिहार के आम लोगों के गुस्‍से में दिख रही है. राजनीतिक चेतना है. नये की कामना है. संघर्ष की तीव्र इच्‍छा है. मैं इस पर तीस मिनट की एक फिल्‍म बनाना चाहता हूं. मेरे पास अपना ऐरिफ्लैक्‍स कैमरा है. जेपी मुझे जानते हैं; जीप में थोड़ी सी जगह निकाल दें तो दस दिनों में ‘वेव्‍स ऑफ रिवॉल्‍यूशन’ बनाकर इस देश में डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍ममेकिंग की क्रांतिकारी नींव रख दूं!

- मुझे लगता है, आनंद (पटवर्द्धन), फिल्‍म का नाम तुम्‍हें हिंदी में सोचना चाहिये? हाऊ डू यू फ़ील अबाउट ‘क्रांति की तरंगें’?- दूसरे बंदे ने अपने स्‍नीकर की तश्‍में कसते हुए और अपने लंबे बालों में हाथ फेरते हुए कहा.

- नॉट बैड, अनिल (कपूर). इन फैक्‍ट आई लाइक तरंगे काइंड ऑफ एक्‍सप्रेसिव थ्रो. बट आर यू श्‍युअर दीज़ इज़ द राईट वर्ड? बिकॉज़ आई आल्‍वेज़ सस्‍पेक्‍ट यूअर हैंगआउट्स एंड मवाली फ्रेंड सर्किल..

अनिल बुलायेजाना नौजवान बुरा मानकर अपने बालों में हाथ फेरने लगा. चिढ़कर कहा- तुम अमीर की औलाद, साले, बनाओ फिल्‍म.. पन अपन सथ्‍यू की फिल्‍म करें या कोई और लाईन ट्राई मारें कुछ समझ नहीं आ रहा, यार!.. बोनी कहता है एक दिन तुझे कंट्री का टापमोस्‍ट स्‍टार बनाऊंगा.. ये बिहारी पल्‍टन को तो जेपी रास्‍ता दिखा रैला है, तू अपन को रास्‍ता सजेस्‍ट कर, यार..

सामाजिक उद्वेलन के ऐसे उबलते क्षण में इस तरह की उटपटांग जिरह से मैं पक रहा था. तभी पांच फुट छै इंच, दो चोटियां और हरी चुन्‍नी डाले एक उन्‍नीस वर्षीय बाला के हाथों मुझे पानी का थर्मस दिखा. पानी और लड़की दोनों के लोभ में चोटियों के पीछे-पीछे चला आया. मगर लड़की अकेली नहीं थी, सूखे केश, कुम्‍हलाये चेहरे और खद्दर-पजामे में उसके साथ छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के चार-छह लड़के भी थे. एक सबों को दिनमान के ताज़ा अंक में छपी अपनी रपट दिखा रहा था. बनवारी और पंकज के लिखे पर बहस हो रही थी. लड़की आखिरी पृष्‍ठ पर छपे आधुनिक कविता के स्‍तम्‍भ से किसी बांग्‍लादेशी कवि की पंक्तियां गुनगुना रही थी. मेरी उम्र अभी ऐसा ओजस्‍वी विचार रखने की नहीं हुई थी लेकिन चूंकि मैं बचपन से ही क्रांतिकारी रहा था, लड़की का गुनगुनाना सुनते ही मुझे उससे पहली नज़र का प्‍यार हो गया!

लड़के दिनमान वाली बहसें करते जेपी के जीप की ओर निकल गए. लड़की को मैंने अपनी नज़रों की मार से रोक लिया. वह अपना हंसना रोक न सकी. हंसते हुए बोली- अभी तुम्‍हारी उम्र भी नहीं हुई, और मुझको ऐसे-वैसे देख रहे हो! उम्र में अपने से बड़ी लड़कियों को ऐसे देखना अच्‍छी बात नहीं, बच्‍चे!..

मैं नाराज़ हो गया- मैं बच्‍चा नहीं हूं. एडल्‍ट फिल्‍में देखी हैं.. एडल्‍ट लोगों के बीच उठता-बैठता हूं.. और तुमसे शिद्दत से मोहब्‍बत करता हूं.. तुम्‍हें एतराज़ न हो तो हम आज ही मंदिर जाकर शादी कर सकते हैं!..

लड़की फिर हंसने लगी- अच्‍छा?.. और मुझको रक्‍खोगे कहां? खिलाओगे-पहनाओगे क्‍या?..

मैंने इसके बारे में सोचा नहीं था. सोचकर थकने लगा. लड़की के हाथ से थर्मस लेकर पानी पिया. बुद्धि खुलने लगी थी. कहा- तुम्‍हें मैंने पहले भी देखा है. तुम एनडीटीवी में काम करती हो और तुम्‍हारा नाम रुपाली है!

रुपाली लजाकर मुस्‍कराने लगी- ओह्हो, तो आप फील्डिंग कर के आये हो? किसने हमारा नाम कह दिया? और ये एनडीटीवी क्‍या चीज़ है.. हमने तो आजतक दिनमान में किसी टीवी की तस्‍वीर तक नहीं देखी?.. कंकड़बाग में विप्‍लव के घर में पुराना रेडियोग्राम है, वहां कभी-कभी ज़रूर बिली हॉलीडे और एल्‍ला को सुना है.. तुम किस क्‍लास में पढ़ते हो?..

मैं इसे शादी का प्रस्‍ताव दे रहा हूं और यह मुझसे मेरा क्‍लास पूछ रही है! हाफ़ पैंट की जेब में हाथ डालकर मैं जिम्‍मेदार और गंभीर आशिक दिखने की कोशिश करता हूं. मगर रुपाली इंप्रेस होती नहीं दिखती. हारकर जिद में पैर पटकने लगता हूं- प्‍लीज़, मान जाओ, रुपाली! मुझसे शादी करके तुम हमेशा खुश रहोगी, देखना तुम? जेएनयू के पड़ोस में पॉश वसंत विहार कॉलोनी में तुम्‍हारे लिए थ्री बेडरुम फ्लैट खरीद दूंगा! टाटा के इंडिका पे बिठाके तुम्‍हें ग्रेटर कैलाश छोड़ आया करुंगा. एनडीटीवी में सब हमारे प्‍यार की कहानी से जलेंगे! ऐश्‍वर्या और अभिषेक से हमारी शादी को ज्‍यादा कवरेज़ मिलेगा!..

दांतों के बीच तिनका दबाकर रुपाली मुझे अजीब नज़रों से घूरती रही. थोड़े अंतराल से बोली- मुझे समझ में नहीं आ रहा तुम ऐसी बहकी-बहकी बातें क्‍यों कर रहे हो. जेएनयू के बगल में जंगल और झाडियां हैं, कॉलोनी नहीं. फिर टाटा ट्रक बनाती है. रेस्‍पेक्‍टेड जेंट्री एंबेसेडर और फियट में घूमती है.. संजय गांधी ने भी कार फैक्‍ट्री शुरू करने की बात की है, अभी शुरू किया नहीं है..

इसके आगे रुपाली ने कहा नहीं लेकिन उसकी नज़रें सवाल कर रही थीं कि क्‍या प्‍यार सचमुच आदमी (लड़के) को इस कदर दिवाना और पागल बना डालता है? मैं रुपाली का हाथ अपने हाथों में लेकर उसे समझाना चाह रहा था कि फ्यूचर और अतीत के बीच क्रिस-क्रॉस होता मैं कहीं हैंग हो गया हूं, और बाहर निकलने के लिए मुझे उसके कोमल-प्रेमपूर्ण सहारे की ज़रूरत है. लेकिन इन बातों को इसी-इसी तरह कह सकने लायक शब्‍द मेरे दिमाग़ में बन नहीं पा रहे थे. और रुपाली मदद करने की बजाय मुझे जज कर रही थी. और बाबूजी पीछे से आवाज़ दे रहे थे कि शाम तक घर में चक्‍की से गेंहू पिसकर नहीं आया तो वह सबकी (माने मेरी) रंगबाजी छुड़ा देंगे. इस बार जूता नहीं बेल्‍ट से समझायेंगे! जैपाल अलग हल्‍ला कर रहा था कि मिशन स्‍कूल वाली लड़कियों का रिक्‍शा लौट रहा है! मनोज के हाथ में फिरोज़ ख़ान के ‘काला सोना’ के चार थर्ड क्‍लास वाले टिकट थे जो उसने घर के चुराये पैसों से ब्‍लैक में खरीदा था. संस्‍कृत की किताब में पेन की लीपा-पोती देखकर झा सर ने छड़ी निकाल कर फिर से मुझे हाथ आगे बढ़ाने को कहा. मैं झा सर की छड़ी नहीं खाना चाहता. लेकिन क्‍लास की लड़कियों के आगे डरपोक भी नहीं दिखना चाहता. मैं रेहाने सबूरी को खोकर अब रुपाली को नहीं खोना चाहता लेकिन रुपाली मुझे झा सर की दया पर छोड़ वापस संघर्ष वाहिनी के मुरझाये नौजवानों के बीच लौट गई है.

(जारी...)

1 comment:

  1. अरे,भविष्‍य की कथा बांचते-बांचते तो आप अतीत मे चले गए। लग रहा है, आप बीस साल आगे की नहीं, बीस साल पहले की बात कर रहे हैं। वर्णन बहुत अच्‍छा है। उम्‍मीद है, अगले अंक में रूपाली हां कर देगी।

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