Thursday, April 5, 2007

जाने भी दो यारो

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: पच्‍चीस

‘हकीक़त’ (पुरानी, चेतन आनंद, 1964) के सेट पर था और चटा हुआ था. एक तो लद्दाख की ठंड, दूसरे बर्फीली सुईओं की तरह मार करता अभी-अभी रुपाली का ख़त मिला था. छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के नाम पर छात्र-जीवन का ढोंग करते बेरोज़गार, दिशाहीन दिनमान पढ़ैया प्रगतिशीलता की पोल आखिर खुल ही गई! कहती है प्रमोद, मुझे भूल जाओ. तुम क्षत्रिय, मैं ब्राह्मण, हमारी शादी नहीं हो सकती. दुनिया क्‍या कहेगी? मीठापुर वाली मौसी क्‍या कहेंगी! फिल्‍म में बहुत सारे कैरेक्‍टर्स अपनी-अपनी प्रेमिकाओं को भूलने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए दिल पर पत्‍थर रखकर मेरे लिए भी रुपाली को भूलना आसान हो गया. हालांकि कभी-कभी स्क्रिप्‍ट के हाशिये पर या बर्फीली ज़मीन पर उं‍गलियों से अनजाने में मैं दो चोटियों दर्शाती आड़ी-तिरछी लकीरें खींच दिया करता. विजय आनंद पूछते किसको याद कर रहे हो. मैं चिढ़कर जवाब देता तुम्‍हें हैप्‍पी मूड का गाना मिला हुआ है, मस्‍त रहो. मेरे सैडनेस का माखौल मत बनाओ. भूपेंदर अल्‍यूमिनियम के मग में चाय पीता कंसंर्ड होकर कहता मेरी पहली फिल्‍म है (एज़ एक्‍टर एंड प्‍लेबैक सिंगर), चेतन साहब के एहसान हैं, गुलज़ार साहब की ‘किनारा’ या ‘परिचय’ होती तो मैं तुम्‍हारे लिए भी एक सैड गाने की सि‍फारिश करता.

धर्मेंद्र का मूड भी उखड़ा हुआ था. सस्‍ते पैंट और सस्‍ते शर्ट में रवीश कुमार उनके पीछे पड़ा उन्‍हें परेशान कर रहा था- सर, इंटरव्‍यू नहीं तो एक छोटा बाइट ही दे दीजिये. मैं ऐसा-वैसा पत्रकार नहीं हूं, सर. बीकानेर लोकसभा चुनाव में आप खुद मुझे अपने साथ टहलायेंगे. राजदीप सरदेसाई नहीं मेरे साथ हॉफएनऑवर का इंटरव्‍यू करेंगे! धर्मेंद्र ने रवीश को डांटकर सेट से बाहर करवा दिया और वापस प्रिया की सोचकर अप्रीतिकर होने लगे- बांस जैसी लड़की के साथ रोमेंटिक सीन करवा रहा है, यार! तुम्‍हारी होगी माशूका, अपने को किसी तरह से मीना कुमारी नहीं लगती! अबे, लाहौर के ल..., माला सिन्‍हा को ले लिया होता? (रामानंद सागर ने ‘ललकार’ में लिया या नहीं? फिल्‍म चली या नहीं?), हम इस ठूंठ के साथ लव सीन नहीं कर सकते, सॉरी!

बलराज साहनी बेवजह हंसते रहते, अदरवाइस सेट को सांप सूंघे हुए था. कोई खुश नहीं था. मुझसे सफेद बालों में अपने को कुछ समझनेवाले इस डायरेक्‍टर के नक्‍शे पच नहीं रहे थे. रहा नहीं गया. जाकर उनसे कहा- एक बात बताइयेगा, जेपी दत्‍ता की तरह ये आपका वॉर ऑब्‍सेशन क्‍या है, चेतन साब? क्‍यों है? आप साले को दस साल के भीतर फिर हिंदुस्‍तान की एक वर्स्‍ट वॉर फिल्‍म बनाओगे (हिंदुस्‍तान की कसम, 1973), प्रिया के साथ इस बार राजकुमार को फंसाकर दु:खी करोगे, ऐसा क्‍यों कर रहे हो, सर? आपकी फिल्‍ममेकिंग जा कहां रही है? ‘नीचा नगर’ (1946) से शुरू करके ये ‘हम रहे ना हम’ (1984), ‘हाथों की लकीरें’ (1986), ‘परमवीर चक्र’ (1988), ‘आजा मेरी जान’ (1993) बनाने का लॉजिक क्‍या है, चेतन साब? पब्लिक क्‍या डिस्ट्रिव्‍यूटर भी ऐसे रद्दी को हाथ नहीं लगायेंगे, मेरी बात लिख लो आप! चेतन साहब ने मेरी बात लिखी नहीं, बुरा मान गए. मैक मोहन से कहा मुझे टांगकर सेट से बाहर फेंक आये. मैंने कहा कोई ज़रूरत नहीं मेरे पैर हैं और दिल में रुपाली का प्‍यार है, मैं खुद चला जाता हूं. अपने को प्रोग्रेसिव कहनेवाले और ‘वसंत क्‍या कहेगा?’ जैसी प्रोग्रेसिव कहानियां लिखनेवाले बलराज साहनी तक ने इस फ्यूडल, पेटी बुर्जूआ एट्टीच्‍यूड का प्रोटेस्‍ट नहीं किया. सईद के यहां भी डिट्टो सेम स्‍टोरी रिपीट हुई. सच पूछिये तो अपने को प्रोग्रेसिव लगानेवाले ये सारे डायरेक्‍टर अंदर से उसी फ्यूडल थाली के चट्टे-बट्टे हैं!

यकीन मानिये, बुज़ुर्ग पाठक और जवान पाठिकाएं, मेरा दिल टूट गया था. माने बर्दाश्‍त की एक सीमा होती है. मैं यहां लद्दाख से लेकर बंबई तक स्‍ट्रगल कर रहा था और वहां वह (रुपाली) गया और हज़ारीबाग की सड़कों पर पता नहीं किन-किन लड़कों के साइकल के कैरियर पर सवारी करती देखी गई थी (मैंने काम पर लड़के लगा रखे थे. नियम से अपडेट मिल रहा था. उसी क्रम में नियम से दिल टूट भी रहा था!). छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के संगठन व संगठक तत्‍वों के पतन का इससे बेहतर और क्‍या प्रमाण हो सकता था! और यहां सईद साहब अल्‍बर्ट और स्‍टेला वाला सीन करके समझ रहे थे कि भारतीय सिनेमा में क्रांतिकारी मोड़ पैदा हो रहा है! दिलीप धवन के हाथ से चाय लेकर पीते हुए चहकने लगे कि उनकी फिल्‍में ही नहीं, फिल्‍मों के नाम तक जल्‍दी ही भारतीय सिनेमा में अपनी एक खास पहचान बना लेंगे. कुछ सालों बाद मिडिल क्‍लास टीवी खोलकर उन्‍हीं के सीरियल्‍स (नुक्‍कड़, इंतज़ार, सर्कस) देखेगा, और जब तक टेलीविजन आ नहीं जाता उनके पैरेलल सिनेमा को देख-देखकर प्रसन्‍न होता रहेगा. नसीर और शबाना कल के रियल मूवी स्‍टार होंगे! नसीर आईना में अपना चेहरा देखने लगा कि कितना स्‍टार मटिरियल है उसमें और चाहकर भी बहुत एक्‍साइट नहीं हो पा रहा था लेकिन शबाना तो एकदम झूमने लगी, आकर सईद की दाढ़ी और गले से लटक गई (ओम वहीं था, उसके स्‍टार बनने के बारे में कुछ नहीं कहा गया. बंदे को चोट लगी लेकिन चुप्‍पी ताने रहा. 'आक्रोश' के रियलिस्टिक परफॉरमेंस से चुप रहने की आदत पड़ गई थी). मगर मैं बुरा मान गया. कहा- हद है, सईद साब, बंद करो ये गंध. बच्‍चों को बेवकूफ बना रहे हो. फिल्‍म फायनांस कॉरपोरेशन और एनएफडीसी के सरकारी पैसे से आप रिवॉल्‍यूशनरी फिल्‍ममेकिंग स्‍पॉंन्‍सर कराओगे? पैरेलल सिनेमा का हल्‍ला मत करो. दस साल बाद श्‍याम, सईद, गोविंद आप सब सरकार की दलाली में चेकोस्‍लोवाकिया और चीन की यात्रा कर रहे होगे. नसीर तक आपके पास फटकने नहीं आएगा. पैसों के लिए फरहा खान और फरहान की फिल्‍म करेगा, प्रैस में यूज़ किये जाने का स्‍टेटमेंट देता गालियों से याद करेगा, लिख लो मेरी बात! दाढ़ी वाले सईद उखड़ गए. ओम पुरी मुझे समझाने लगे, अबे, कल के लौंडे, चुप करो, यार!

रुपाली को लेकर मेरे अंदर का दबा हुआ गुस्‍सा फूटकर बाहर निकलने का रास्‍ता खोज रहा था. खोजकर निकल आया. मैंने कहा- सईद साहब, फिल्‍मी खानदान के बच्‍चे हो, बीवी बड़े घर की बेटी है, बांद्रा और नेपियन सी-फेस में फ्लैट है, सलमान रुशदी गले में हाथ डालके फोटो खिंचवायेगा, रैडिकल फिल्‍म मेकिंग की बात करना आसान है आपके लिए. लेकिन हमारे जैसे लोग जो रैडिकल रूरल्‍स का चक्‍कर लगाकर यहां पहुंचे हैं, बाप हर महीने सवाल करता है तुम मनीऑर्डर नहीं भेज रहे, हम कहां से लायें अपनी रैडिकल फिल्‍ममेकिंग, आप जवाब दो? सईद ने जवाब नहीं दिया. दिलीप धवन मुझे मारता हुआ नटराज स्‍टूडियो के बाहर छोड़ आया. नसीर आईने में देखकर मुंह बनाते रहे. मुझे बचाने नहीं आये.

बाहर आया तो एनडीटीवी की गाड़ी लगी हुई थी, और आईना रुपाली के हाथ में ही नहीं था, वह उसमें चेहरा भी देख रही थी. रवीश ने आकर खबर दी कि दाढ़ीवाला इंटरव्‍यू देने में नखड़े कर रहा है. बोलता है बीस साल बाद गोवा में किताब लिख रहा होऊंगा तब आकर बात करो! आज नाम की नॉवेल्‍टी है, चार लोग इनकी फिल्‍म देख ले रहे हैं तो इनका भाव चढ़ा हुआ है. तुम्‍हारे-मेरे बच्‍चों के जेनरेशन में देखना, रुपाली, इनकी फिल्‍मों का नाम तक किसी को याद नहीं रहेगा! अंदर मुंह में सैंडविच दाबे इनके बॉस दि बिग ने सिर हिलाकर कहा इसीलिए कहता हूं आर्ट-सार्ट के चक्‍कर में मत पड़ो, पॉपुलर प्रोग्रेम्‍स करो, फ्यूचर उसीका है. मैं रुपाली के नज़दीक जाकर बुदबुदाया- कैन आई हैव अ वर्ड विद यू, प्‍लीज़, स्‍वीटहार्ट?

मेरे कहे का एकदम प्रतिकूल असर पड़ा. रुपाली मुंह पर हाथ रखकर रोने लगी. दि बिग ने गुस्‍से में लगभग खत्‍म हो रहे सैंडविच को खिड़की से बाहर फेंक दिया. और रवीश मोतिहारी के गुडों की तरह फैलने लगा- अबे, लड़की छेड़ते हो, स्‍साले! बत्‍तीसी निकाल कर हाथ में रख देंगे!

रुपाली ने एक बार भी उन्‍हें रोकने की कोशिश नहीं की. एक बार भी नहीं कहा कि प्‍लीज़, आप लोग इन्‍हें छोड़ दीजिये, ये मेरे वो हैं. मैं प्रेम की संदिग्‍धता और शोक में सन्‍न था. इच्‍छा हुई एनडीटीवी की गाड़ी पर चढ़कर अभी उसी वक्‍़त नीचे कूदकर जान दे दूं. मगर चूंकि आगे की कहानी भी मुझी को कहनी थी, मैंने खुद को रोक लिया. क्‍या ईरान की रेहाने हिंदुस्‍तान की रुपाली से ज्‍यादा कमिटेड थी?- यह सवाल मुझे उसी तरह परेशान कर रहा था जैसे अज्ञेय के तार सप्‍तक के संग्रहों ने हिंदी के दो कौड़ी के पाठकों को परेशान किया था.

(जारी...)

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