Friday, April 6, 2007

डोंट कम एंड फॉल इन लव अगेन!

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: छब्‍बीस

मैं ट्रेन में था और ट्रेन चली जा रही थी. भोगौलिक ही नहीं, काल की दूरियां लांघकर जाने किस दिशा में लिये जा रही थी. देवदास के क्‍लाइमैक्‍स में जैसे दिलीप साहब के लिए गंतव्‍य का कोई अर्थ नहीं रह गया था, मेरे लिए भी अब जानने का मतलब नहीं था कि जीवन मुझे कहां लिये जा रही है. सबकुछ खो चुकने के बाद व्‍यक्ति जिस तरह की असीम शांति से भर जाता है, एक ब्‍लॉग और चंद लड़कियां खोकर मैं भी कुछ वैसी ही शांत दार्शनिकवस्‍था को छूने लगा था. ज़मीन, बागीचे, नदियां, सागर जिन्‍हें धांधली कर-करके देश बेचना-खरीदना हो, बेचें. जिन्‍हें यहां-वहां बम फेंक-फेंक के, पुलिया और इमारतों को उड़ाकर ग़दर मचानी हो, मचायें. सईद और चेतन को, श्‍याम और केतन को जो बनाना हो, बनायें. रुपाली को जहां मन की गांठ जुड़ती हो, जोड़े, गड्ढे गोड़े, चूल्‍हे में जाये, भाड़ में रहे, अपने को बख्‍शे, दैट्स इट. प्‍यार में सुख, भविष्‍य निधि योजना, ज़मीन का पर स्‍क्‍वेयर फुट रेट, बच्‍चों का एजुकेशन, हिंदी की दुर्दशा मैं किसी के बारे में सोचकर चिंतित और दुखी होना नहीं चाहता. थक गया हूं. वर्ल्‍ड वियरी हो गया हूं. दो घड़ी आंखें मूंदकर आराम करना चाहता हूं (‘अकेला छोड़ दो मुझे कहता है अकेला आदमी...’, मंगलेश डबराल). ट्रेन जा रही है. मैं कहीं जा रहा हूं. ट्रेन कहीं पहुंचेगी तो मैं भी कहीं पहुंचूंगा ही. इससे ज्‍यादा इस घड़ी मैं और कुछ नहीं सोचना चाहता. प्‍लीज़.

सामने की सीट पर एक इटैलियन लड़की हिंदी साहित्‍य की एक कल्‍ट रचना का फ्रेंच अनुवाद पढ़ रही है, उसे लगातार देखते हुए आदमी रूपाली और रेहाने को भूलकर उसके ख़्यालों में डूब सकता है. लेकिन नये प्रेम में पड़कर मैं नई मुसीबतें नहीं पालना चाहता. मैं उसे लगातार देखने की जगह कनखियों से देखता हूं (वह भी देखती है), और घबराकर कि ज्‍यादा चुप रहा तो कहीं उसके प्रेम में न पड़ जाऊं, ऊबकर मुस्‍कराने लगता हूं. मुस्‍कराते हुए कहता हूं- आप लगता है इंडिया को जानने की कोशिश कर रही हैं?..

- हां, ऐसा कह सकते हैं,- लड़की मुस्‍कराकर कहती है- आपने कैसे जाना?

उसके हाथ के हिंदी कल्‍ट क्‍लासिक (विदेशों में) के फ्रेंच अनुवाद की तरफ इशारा करता हूं- आपके हाथ में निराला जी की ‘चतुरी चमार’ देखकर समझ गया आप भारत की आत्‍मा देखने आयी हैं...

- ओह, स्‍वीट चतुरी?.. लड़की संकोच और लज्‍जा से किताब एक ओर हटाकर रख देती है, मानो वर्जित साहित्‍य पर अन्‍यथा सार्वजनिक ध्‍यान आकर्षित न करवाना चाहती हो. फुसफुसाकर मुझे टीज़ करती कहती है- फ्रांस और इटली दोनों ही जगह, एक सर्टेन सर्किल (समलैंगिक) में, चतुरी हैज़ बिकम क्‍वायट अ फिनॉमिनल हिट, यू नो!.. लेकिन इंडिया मैं सिर्फ चतुरी के लैंड को एक्‍सप्‍लोर करने नहीं आयी हूं, आइ हैव ग्रेट इंटरेस्‍ट इन पर्यावरण एंड विश्‍व शांति एज़ वेल..

- रियली? हाऊ एक्‍साइटिंग- लड़की की नकल में मैंने भी फ्रेंच के तीन शब्‍द बोल दिये. फिर अपनी औकात समझकर चुप हो गया (लिंग्विस्टिक एंड अदरवाइस).

लड़की बोलती रही. फ्रेंच में ही बोलती रही. मेरे लिए उसे कनखियों से देखकर बात करने में असुविधा हो रही थी. लेकिन लगातार देखकर मैं उसके प्रेम में फंसने का रिस्‍क भी उठाना नहीं चाहता था. वो पता नहीं क्‍या चाहती थी.

- फर्स्‍ट थिंग फर्स्‍ट. स्‍टॉप कॉलिंग मी वो एंड लड़की एटसेट्रा! आइ गॉट अ नेम एंड आईडी. ला लिबेरात्‍श्‍यों के लिए रिपोर्टिंग करती हूं और मेरा नाम है अंतोनेल्‍ला बुकारेल्‍ली. आपने किस्‍त नंबर दस में मेरे रिर्पोट से क्‍वोट भी किया था, एंड यू यूअरसैल्‍फ आर फॉरगेटिंग इट.. कॉलिंग मी वो एंड लड़की.. हाऊ एम्‍बैरेसिंग, माम्‍मा मिया!- लड़की (अंतोनेल्‍ला) मुंह पर हाथ रखकर हंसने लगी. और मैं उस बेचैनी में बेचैन होने लगा जिस बेचैनी में बेचैन होते-होते अक्‍सर लोग आसमान से गिरकर खजूर में अटक जाते हैं. माने अमोरे मिओ और हे प्रियतमा जैसी बकवास गाने लगते हैं.

बेचैन होने के साथ-साथ मैं नाराज़ भी हो रहा था. कि यह किस तरह का ईश्‍वरीय षड्यंत्र है जो एक पत्रकार से निकाल कर मुझे दूसरे पत्रकार में फंसा रहा है. क्‍या दूसरे क्षेत्रों की लड़कियां मर चुकी हैं? क्‍या उनसे आकर्षित होने की ताक़त मैं खो चूका हूं? मैं अंतोनेल्‍ला को लगातार देखते हुए बेचैन और दुखी होने लगा.

- अपनी तीसरी शादी टूटने के बाद (अंतोन्‍यो जवात्तिनी पंद्रह साल की एक सिसिलियन लड़की के पीछे पागल होकर मुझे डंप करके भाग गया था) मैंने सोचा अब मैं सिर्फ शादी में सुखी रहने के लिए नहीं जिऊंगी. ग़म हैं और भी ज़माने में शादी के सिवा. किसी के प्‍यार में पड़ जाना बहुत आसान है. प्‍यार में पड़कर मिलता क्‍या है. शादी मिलती है. और शादी में दुख ही दुख मिलते हैं. दो साल किसी स्‍त्री के साथ रहने के बाद मर्द दूसरी लड़की खोजने लगता है. रात को बिस्‍तर में उठकर हाय-हाय करने लगता है. हाऊ ह्युमिलियेटिंग! आई डिसाइडेड आई नेवर वांटेड टू फॉल इन लव अगेन. मैंने तय किया मैं दुनिया घुमूंगी. अन्‍याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाऊंगी. मजलूम की ताकत बनूंगी. नेपाल और चीन की वामपंथी सरकारों के जुल्‍मों का पर्दाफाश करुंगी. लेकिन दुबारा किसी के प्‍यार में नहीं पड़ूंगी!- इतना कहकर अंतोनेल्‍ला अजीब भूख और प्‍यास की नज़रों से मुझे कनखियों में देखने लगी. मैं घबराकर लगातार फ़र्श पर नज़रें टिकाये रहा.

अंतोनेल्‍ला से (मन ही मन) कहा- तुम यह ठीक नहीं कर रही, प्रिये. मैं तुम्‍हें लेकर कहां जाऊंगा? कहां रखूंगा? पता नहीं अब मेरे पास कोई घर है भी या नहीं. है तो किस अवस्‍था में है. या उस पर किसी तायवानी एजेंसी या सिंगापुर की कंपनी का कब्‍जा है. मेरे म्‍यूजिक पर, किताबों, कंप्‍यूटर पर! कुछ नहीं है मेरे पास अंतोनेल्‍ला जिसे देकर मैं तुम्‍हें तुम्‍हारी चौथी शादी में सुखी कर सकूं? और फिर कौन जानता है कि दो साल बाद किसी पंद्रह साल की सिसिलियन, पेरुवियन लड़की के पीछे पागल होकर मैं नहीं भागूंगा! मैं भी नहीं जानता, अंतोनेल्‍ला?

अचानक लगा जैसे ट्रेन कहीं नहीं जा रही. मेरा जीवन कहीं नहीं जा रहा. ब्‍लॉग और रवीश कुमार से नफ़रत होने लगी जिसने मुझे कभी न खत्‍म होनेवाले ऐसे दुष्‍चक्र में उलझा दिया था. अंतोनेल्‍ला ने अपने नर्म हाथ मेरे गर्म हाथों पर टिका दिया था, और मुस्‍करा रही थी. मैं भी मुस्‍करा रहा था (ऊपर से. अंदर से रो रहा था).

(जारी...)

1 comment:

  1. बहुत दिनों के बाद कम्यूटर बाबा के पास बैठा. सॉरी, घर पर. वरना नौकरी बजाते हुए तो हर रोज ही बैठना होता है. आपके ब्लॉग पर जो भी आज की डेट में मिला पढ़ चुका हूं. अच्छा लगा. वराइटी है. दुआ है कि आपका अप्रगतिशील साहित्य की दुनियाभर में मशहूर हो जाय. ये प्रेम वाला एपिसोड लेकिन कुछ ग़मगीन कर गया.

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