Saturday, April 7, 2007

अप्रगतिशील साथियों से एक अपील..!

यह लजाने, ठिलठिलाने का नहीं, खुलकर सामने आने का समय है!

जब से हमने साहित्‍य की अप्रगतिशील धारा शुरु की है, ब्‍लॉगजगत में अपरि‍चय की असहजता का इसने हाथों-हाथ समाधान कर दिया है. जिनसे कोई पहचान तक न थी, उनके भी ‘राजा’, ‘यार’, ‘गुरु’ जैसे प्रेमभरे संबोधनों वाले पत्र आने लगे. उत्‍साह और अंतरंगता की कुछ हवा-सी बन गई. छंटे हुए गुंडे व पुलिसवालों का फ़ोन पर मां-बहन की की प्रीतभरी गालियों में नहाया ऐसा स्‍नेह मिलने लगा कि हमारी आंख और मुंह दोनों खुल गए, फिर खुले ही रहे.

हमें लगता है इस उत्‍साहवर्द्धक जन-प्रतिक्रिया के मद्देनज़र, जैसे मल्‍टीप्‍लेक्‍स और मैकडॉनल्‍ड बड़े शहरों को जीतते हुए छोटे शहरों की ओर धावा बोल रहे हैं, साहित्‍य की अप्रगतिशील धारा के भी चौतरफा विस्‍तार का समय आ गया है. हमारे ज़रा-सा ज़ोर लगाने की बात है, वह आसानी से इतना आत्‍मनिर्भर व आत्‍मविश्‍वासी हो सकता है कि देश के अंदर ही नहीं देश के बाहर भी अपना झंडा गाड़ सके. हां, बशर्ते संयुक्‍त अरब अमीरात (जे भैया), कनाडा (एस लाल), इटली (एसडी) और यूके (गुमनामदास) वाले छिप-छिपकर आंदोलन की तारीफ में गालियों की लोरी गाने की बजाय सार्वजनिक रूप से एकनॉलेज करें कि हां, उनके भी ख़ून में अप्रगतिशीलता है, और अपने अप्रगतिशील होने पर धिक्‍कारे जाने से उन्‍हें कतई शर्म नहीं. निश्‍चय ही यह कदम अभूतपूर्व साहस की मांग करता है. लेकिन यह भी सही है कि बहुत वक्‍त तक हम कायरता की मांग भरते रहे, आज समय की मांग साहस में रक्तिम सिंदूर चढ़ाने की है!.

रू‍ढिवादी संस्‍कारों व शिक्षण की हिचक और संकोच ही वह वजह है कि आज भी हिंदी ब्‍लॉगजगत के समलैंगिक भाईयों व बहनों के सामने आने का दरवाज़ा खुल नहीं पा रहा. कल को प्रगतिशीलता की दुहाई देकर मोहल्‍ले का अविनाश (अल्‍पसंख्‍यकों, किसानों, दलितों की ही तरह) समलैंगिकों को भी ले उड़ा व उनका संरक्षक बन बैठा व अखबार, पत्र-पत्रिकाओं में अपने यार-दोस्‍तों से आर्टिकल लिखवाने लगा, तो हमारे पास सिवा हाथ मलने के अन्‍य चारा न बचेगा. मेरी आप भाईयों व बहनों से सिर्फ़ इतनी गुजारिश है (प्रत्‍यक्षा, इस तरह से मुझे देखने की ज़रूरत नहीं! मैं किसी का नाम सार्वजनिक नहीं कर रहा. मुझे मालूम है लोग घर-फैमिली और हार्ट कंडीशन वाले हैं. एवरीबडी हैज़ टू कम आउट इन ओपन ऑन हिज़ ऑर हर ओन टर्म्‍स. डोंट वरी, बाबा, ऑल यूअर लेटर्स एंड राइटिंग्‍स अंडर फॉल्‍स नेम वोंट बी मेड पब्लिक, आई कैन अश्‍युर यू ऑफ दैट मच. डोंट गेट पैनिकी, टेक युअर टाईम. मैं अंदाज़ लगा सकता हूं कि चंडीगढ़ किस तरह का शहर होगा, और वहां की प्रगतिशील हवा में कैसे तुम घुट-घुटकर सांस लेती होगी. मगर साथ ही यह भी समझता हूं कि एक भारतीय कामकाजी स्‍त्री के लिए एकदम-से खुले में आकर अप्रगतिशीलता के साथ अठखेलियां करना कितने बड़े दु:स्‍साहसी कदम के बतौर देखा जाएगा. तुम जल्‍दी ओपन होगी तो तुम्‍हारा स्‍वागत है, यू विल बी कंसिडर्ड अ करेजियस वूमन. तुम सोचकर और फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहती हो, देट विल ऑल्‍सो बी ऑलराइट, वी विल हैव ऑल आवर सिम्‍पैथिज़ फॉर यू. हां, एक छोटा-सा रिक्‍वेस्‍ट है, जब भी आओ नोटपैड वाली सु को अपने साथ मत लाना. सु और अ तिवारी दोनों ही प्रगतिशीलता में कुछ ज्‍यादा ही गंधाये हुए हैं, और ऐसे लोगों को साथ रखना संख्‍यात्‍मक रूप से हमें भले मजबूत दिखाये, अप्रगतिशील साहित्यिकता के दूरगामी हितों के लिहाज से खासा रिस्‍की बिजनेस हो सकता है, डोंट यू थिंक सो? लेट मी नो बाइ यूअर सीक्रेट मेल..), बहुत ही विनम्र गुजारिश है: कि गुप्‍त व आभासी तलवारबाजी करने की बजाय बेहिचक सामने आएं और खुलकर अप्रगतिशील धारा की लड़ाई लड़ें, साहित्यिक योगदान दें! समय और साहित्‍य दोनों का इससे बहुत ही नुकसान हो रहा है. जैसे हमारे विशेष अनुरोध पर आज ही डाक से चौपाया (गाय नहीं, कुत्‍ता) पर तीन निबंध आए हैं- बालसुलभ प्राथमिक शाला वाली स्पिरिट है, वो सब तो ठीक है- लेकिन इस गुप्‍ताचार की वजह से मामला फिर आकर इस पर अटक रहा है कि इस अनोखे, विस्‍मयकारी लेखन का रचयिता किसे बताया जाए? चूंकि एस लाल व अ शुक्‍ल जूते पर हाल में काफी कलम चलाते रहे हैं तो ऐसा अनुमान करना स्‍वाभाविक लगता है कि जूते के बाद ‘ज’ की जगह वे पीछे ‘क’ पर लौटे और जूत्‍ते से मिलता-जुलता कुत्‍ते की (रचना की). मगर यहीं यह संशय भी पैदा होता है कि चूंकि अ दास (यूके वाले नहीं, मोहल्‍ला वाले!) में भौंकने की विशेष ऊर्जा है, तो कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे यहां सबकी गुमनामी का लाभ उठाकर जनाब अपने निबंध हमारे यहां ठेलकर अप्रगतिशील धारा को इन्‍फ्लुयेंस करने की कोशिश कर रहे हैं? यह एक संभावना है; मगर इस संभावना में रत्‍ती भर भी सत्‍यता है तो यह बहुत ही ख़तरनाक संकेत हैं; और केवल हमारे लिए ही नहीं, आप सभी की चिंता का विषय है. भाईयो (और बहनो), समय आ गया है कि आप सभी (देश के अंदर व बाहर) गुमनामी के मुखौटे उतार फेंकें, और अप्रगतिशील धारा के यशवर्द्धन में खुलकर सामने आयें!

आजीवन सचिव, संयोजक व कैशियर,
पी सिंह


(गुप्‍त सूचना: कल के विशेष बुलेटिन में विस्‍मयकारी निबंध 'कुत्‍ते' के प्रकाशित होने के पहले कृपया निबंध-लेखक स्‍वयं को प्रकाशित करे. गुप्‍त सूचना समाप्‍त.)

2 comments:

  1. भाईसाहब.. पिछली बार आपने कम से कम हमें कन्सीडर तो किया था.. बाद में जो हुआ सो हुआ.. इस बार तो आपने पहले ही हमें अप्रगतिशील धारा से निकाल फेंका.. ठीऽऽक है.. और बकिया जो आपको प्रेम पत्तर मिल रहे हैं.. बजाय अपनी बढ़ती पापुलैरिटी पे खुस होने के आप खिसिया रहे हैं.. आप काहे कपार में कलेस कररहे हैं..आप मौज में रहिये.. और जो बरबरा रहे हैं उन्हे बरबराने दीजिये.. बकिया मर्जी आपकी..

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  2. बंधु अभय जी तिवारी जी,
    आपकी उपरोक्‍त टिप्‍पणी अगर अप्रगतिशील धारा की प्रशस्ति व समर्थन में है तो अच्‍छी बात है (हम अपनी जगह सुखी हैं, आप अपनी जगह सुखी रहें ब्‍ला-ब्‍ला-ब्‍ला). लेकिन ऊपर से समर्थन और अंदर प्रगतिशीलता की ज़हर की अगर यह कोई षड्यंत्री चाल हुई (मोहल्‍ला वाले अ दास की तरह) तो भूलिये नहीं, हमारे एजेंट हर जगह मौजूद हैं, और ऐसे खेल के दुष्‍परिणामों के लिए आप और आप ही जिम्‍मेदार होंगे!
    कटुता से भरा, और फेंस के दूसरी ओर खड़ा,
    पी सिंह

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