Sunday, April 8, 2007

जीवन में दु:ख क्‍यों और सुख कैसे का एक विमर्श

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: सत्‍ताईस

मगर अंतोनेल्‍ला ने जैसे मेरे मन को पढ़ लिया, मुस्‍कराने की जगह उसकी भी आंखें भीग गईं (रुपक में). भर्राये स्‍वर में बोली- तुम सिरे से सब गलत समझ रहे हो! हां. हम गलत समझ रहे होते हैं जभी हमें जीवन में दु:ख होता है. म्‍यूजिक, किताबें, कंप्‍यूटर जीवन में बेसिक नहीं है. बेसिक है प्‍यार. हां! मन में प्‍यार का स्‍नेह और समझदारी बनी रहे तो हमें फिर किसी का अभाव नहीं होगा. हम दु:खों को उनकी स्‍थूलता में पहचानकर उन्‍हें बेमतलब बना देंगे. आधुनिक जीवन ने हमसे हमारा प्‍यार का बेसिक्‍स छीनकर हमें वस्‍तुवादी बना दिया है. दु:खों की पहचान और उन्‍हें तार्किकता की सीमा में रखने की ताक़त गंवा दी है. अगर तुम आत्‍मा में प्रेम की केंद्रीयता रेखांकित कर लो तो फिर कोई सिसिलियन, पेरुवियन लड़की तुम्‍हें सुख की क्षणिकताओं में बरगला नहीं सकेगी. ठुमरियों की भावुकता भूलकर तुम ध्रुपद के आनंद में लीन हो सकोगे. वयस्‍कों की तुलना में बच्‍चे ज्‍यादा सुखी क्‍यों होते हैं? इसके बारे में सोचा है कभी? इसलिए कि उनमें प्रेम की निर्मल केंद्रीयता बनी रहती है, वे अभी संसार के वस्‍तुवाद में दीक्षित नहीं होते.

क्‍या ‘चतुरी चमार’ ने इस लड़की का दिमाग खराब कर दिया है? या यह किसी मदर शीतला का या द लाईट ऑफ शिवा जैसा कोई कैंप करके लौटी है? ऐसी बातें करके यह लड़की मुझे दु:खी क्‍यों कर रही है. मुझसे मेरी सिसिलियन, पेरुवियन लड़कियां क्‍यों छीन रही है? उनको पाने की संभावना खोकर मैं फिर कैसे बेमतलब, विराट शून्‍य में सिमट जाऊंगा? प्‍लीज़, मुझे केंद्र का फंडा मत दो, लड़की. केंद्रीयता के इसी दर्शन ने भारतीय राजनीति का बंटाधार किया है. सत्‍ता और साधनों का मोनोपोलाइज़ेशन किया है. मैं बचपन और बाबूजी की स्‍मृतियों में आजीवन बंधे रहना नहीं चाहता. बार-बार रुपाली की यादों में लौटकर उसे महत्‍वपूर्ण और अपने को ओछा बनाना नहीं चाहता. केंद्रीयता की धुरी नहीं, ब्रह्माण्‍डीय विस्‍तार में विलुप्‍त हो जाना चाहता हूं. आज यहां कल यमन में होना चाहता हूं. कन्‍फ्यूज़न के आज के महाकुंभ में यही मुक्ति-मंत्र हो सकता है. वस्‍तुओं से वंचित होकर फिर मेरी कोई पहचान नहीं बचेगी, अंतोनेल्‍ला! माजिद मजीदी के ‘बरान’ के कमउम्र आशिक के दीवानेपन को जीने देकर मुझे हास्‍यास्‍पद मत बनाओ, प्‍लीज़?..

- तुम्‍हें लगता है मैं दुनिया घूमने निकली थी? पर्यावरण और विश्‍वशांति के सवाल हल करके मंजिल पाना चाहती थी? नहीं, प्रमोद, नहीं. मेरा ह्रदय टूटा हुआ था. मेरी आत्‍मा खंडित-विखंडित थी. पर्यावरण के लिए नहीं अपनी भग्‍नावस्‍था से निजात पाने के लिए मैं संसार में बाहर निकली थी. अंतोन्‍यो, जुसेप्‍पे या मोकातान के प्रेम में अगर मैं खुद को पहचान गई होती तो दर-दर भटकने की बजाय आज घर के कोने अपनी कुर्सी पर गोद में अपने बिल्‍ले को लिये खेल रही होती. अमरीकी औरतों के आगे मिस्‍टर टैगोर का स्‍त्री संबंधी विमर्श पहले पढ़ा होता तो अपनी रसोई में पास्‍ता अल पेस्‍तो के स्‍वाद में डूबी संगीत लीन होती, तुम्‍हारे संग इस फालतू के जिरह में समय न गंवा रही होती!

- यह सब क्‍यों कह रही हो, अंतोनेल्‍ला?- मैं अंदर ही अंदर उबलने लगा. मैं आगे जाना चाहता हूं तुम मुझे पीछे खींच रही हो! रुपाली की गरदन की महक और उसकी उंगलियों में उलझा रही हो. तकिये के गिलाफ और छींट के हरे परदों की याद दिला रही हो. आंगन में तुलसी और छत पर कुम्‍हड़े के फूल सजा रही हो, प्‍लीज़? वह सब पीछे छूट गयी दुनिया है, अंतोनेल्‍ला, मेरे पास उन दिनों की याद की अब कोई फोटो तक नहीं बची! मैंने सारे पुराने अलबम जला दिये हैं. नये की विचित्रता में ही मेरी पहचान है. मैं एक मामूली ब्‍लॉगर हूं, मुझे मेरी ब्‍लॉगावस्‍था में बख्‍शो, अंतोनेल्‍ला!- अपनी बुदबुदाहटों में मैं थरथरा रहा था. अचानक बेहद ठंड लग रही थी. दूर कहीं अम्‍मां गाना गा रही थी. छोटा भाई रंगीन कागज़ काटकर पतंग बना रहा था. बाबूजी चबूतरे पर बैठे गाय को सानी खाता देख रहे थे. रस्‍सी पर मां का कंधे से फटा ब्‍लाऊज और फेवरेट नीली सूती की फूलदार साड़ी सूख रही थी. यादों से लड़ता-भिड़ता, उन्‍हें अपने आंखों के आगे से हटाने में हार कर मैं मन ही मन फट रहा था. अंतोनेल्‍ला फिर हंस रही थी. मैं फिर रो रहा था. ट्रेन कहीं नहीं जा रही थी.

(जारी...)

2 comments:

  1. प्यारा है ये भाग..

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  2. कहीं नहीं जाएगी ट्रेन, यहीं रहेगी हमेशा. ट्रेनें कहीं नहीं जातीं, वक्‍त चला जाता है।

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