Tuesday, April 10, 2007

मुहल्‍ले में हल्‍ले को एक अप्रगतिशील चेतावनी

क्‍या एनडीटीवी आजतक हो रहा है? क्‍या अप्रगतिशील लौंडे गुमराह हो सकते हैं?(1)..

“मेले में ठेला

काहे का मेला
अबे, फिर तूने ठेला?”

- पवित्र पापी


कविवर पवित्र पापी की कालातीत पंक्तियां आज भी प्रासंगिक बनी हुई हैं. यह अकारण नहीं है कि मुहल्‍ले में फिर से उत्‍सव यानी मेले और मेले की ठेलठाल का माहौल बना हुआ है. म्‍यान से तलवारें खींचकर दांव भांजे जा रहे हैं. कोई नाना पाटेकर की तरह बम छोड़ रहा है तो कोई नाना पलसीकर की तरह झुलस भी रहा है. मगर गौर से देखिये तो इस त्रि-दिवसीय हिंसक मेले में न अभी तक कोई घायल हुआ है न किसी के अस्‍पताल ले जाये जाने की खबर है (अज्ञात सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि मंच संचालक श्री अ दास चैनल के अपने डेस्‍क पर बेमतलब के न्‍यूज़ की कांट-छांट में रोज़ की ही तरह व्‍यस्‍त हैं. रक्‍तचाप सामान्‍य है. और बाहर रिसेप्‍शन पर चाय पीते हुए बदसूरत सेक्रेटरी को उन्‍होंने रोज़ की ही तरह तीन फूहड़ जोक सुनाए हैं, और रोज़ की ही तरह हंसने की बजाय वह मुस्‍कराकर रह गई है). यहीं फिर गौर फरमाईये तो यह भी ज़ाहिर होगा कि क्‍यों श्री पवित्र जी पापी जी बेचारे नहीं सितारे कवि थे. आगे लिखते हैं “तू हिंदु बनेगा न मुसलमां बनेगा, इंसां की औलाद है इंसां बनेगा..” कैसी महीन नज़र है. अहाहा. इंसान की औलाद आखिर इंसान ही तो बन सकता है. ऐसा नहीं कि युद्ध की ताप में जलकर-निकलकर पंगेबाज पराशर साहब अशोक में बदल जाएगा. रवीश कुमार एनडीटीवी की ड्यूटी छोड़कर सद्भाव का शांतिदूत बनने की जिद करने लगेंगे. नहीं. सब इंसान बने हुए ग्रीन वर्सेस ऑरेंज ही खेलते रहेंगे. क्‍योंकि, बकौल कविवर पवित्र पापी, जैसे मेले में ठेलमठेली की भावना अंतर्निहित है, उसी तरह ‘मुग़ले आज़म’ और ‘ख़ून भरी मांग’ की असरवाली मिश्रित डायलाग डेलिवरी भी. तू-तड़ाक मेले की फिज़ा में रंगीनी भरने के उद्येश्‍य से है (ब्‍लॉग परिदृश्‍य में रंगीनी का अनुवाद टीआरपी करें) न कि वास्‍तव में किसी की गर्दन पकड़ने की. एक बात आप न भूलें यहां इस्‍तेमाल में लाई तलवारें लोहे की नहीं लकड़ी और गत्‍तों की हैं, और लोगों (इंसानों) की तीव्र भावनाएं और विचार रक्‍तरंजित भले हों, ख़ून जो दिख रहा है असल नहीं, पेंट और आलता है.

एनीवे, चूंकि यह लेख चंद पंक्तियों में तेजी से फिर द एंड की तरफ बढ़ने लगेगा, मैं लेख के मूल उद्येश्‍य की ओर आता हूं. मूल उद्येश्‍य उन सभी अप्रगतिशील लौंडों को सावधान करने की है जो मुहल्‍ले के लाउड स्‍पीकर पर “कोई दूर से आवाज़ दे, चले आओ..” का गाना सुनते हुए खामखा उसे पवित्र जी पापी जी की कविता समझकर आस्‍तीने ऊंची कर रहे हैं. लौंडो, यह पापी रचना नहीं बॉक्‍स ऑफिस पर बुरी तरह पिटी किसी बुरी फिल्‍म का बकवास गाना है, और इसके भुलावे में आकर अगर तुममें से कोई भी ग्रीन वर्सेस ऑरेंज की लड़ाई में टांग अड़ाया, तो न तो तुम अशोक बननेवाले हो, न ही तुममें पंगेबाज की तरह टिप्‍पणी में सत्‍ताईस लाइन लिखने की अथकनीय प्रतिभा है; और तलवार लोहे की न भी हो लकड़ी और गत्‍ते की तो है, और तुमलोग तो शुरू से कोमलता में दीक्षित रहे हो. जैसाकि तुम्‍हीं लोगों को ध्‍यान में रखकर पवित्र पापी जी ने कहा भी है- “फूल आहिस्‍ता फेंको, फूल नाज़ुक होते हैं..” फूल जोर से फेंकने में भी हर्ज़ नहीं है. लेकिन फल और टमाटर फेंकने की माया (टीआरपी) में मत फंसो. इंसान की औलाद हो इंसान ही बने रहो, खामखा हिंदु-मुसलमान बनने की रगड़ाई मत करो.

कविवर प पापी का श्रेष्‍ट शिष्‍य,
(कविवरता प्राप्‍त करता हुआ) दुष्‍ट पापी


(1). अप्रगतिशील टेलिफोनिक बुलेटिन में चिंता ज़ाहिर करते हुए विमलचंद्र वर्मा, आजमगढ़ वाले, एक जुझारु अप्रगतिशील हितैषी.

6 comments:

  1. saathi,
    ab chaaron taraf chaudhrahat barh rahi hai. gin ke 20- 25 log hi to hain, unmein bhi eka nahin, sab sansani faila rahe hain,saathi, blog mein to ye haal hai. agar vaakai in sab ko khud ka channel chalane ko de diya jay to sirfuttouval avashyambhavi hai.koi mahaan vyakti ne inke liye hi likha hai vo is tarah se hai
    SAKAL PADARATH KE JAG MAAHIN

    LAUKE KUCHH NAHIN

    CCHASHMEIN CHAHIN

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  2. ये बढिया कहा !

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  3. भाई विमलजी वर्मा की चिंता बाजिब है..ये लौंडा लड़ते लड़ते लुढ़क गया है..मा.ले. का चोला पहन कर बिहार से चला था.. लगता है दिल्ली के रस्ते जाने क्या हुई गवा.. जाने ऊपी में रहजनी का शिकार हो गया..जाने लू लग गई .. जाने पानी सूट नहीं किया.. माले का मुलायम हो गया.. सोसल कन्सर्न अभी भी करता है लेकिन जोड़ घटाये की फिकर जादे करता है.. हमार समझ में इसको बेड रेस्ट चहिये.. वैसे कोन्हू स्पेसलिस्ट को दिखलाये..

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  4. बउआ!
    ई सब मामला मा.ले. से खा ले की तरफ़ जाता बुझाता है . पंडित अभय तिवारी को सहिये इलहाम हो रहा है .

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  5. हम यहां भी सहमत हुए जाते हैं । थके और पिटे विषय पर हम ऐसे लड़ने लगे जैसे कोई फैसले की रात आ गई हो । लोगों ने ही इस मुद्दे को पीट पीट कर अधमरा कर दिया है और हम ज़िदा समझ कर उलझ रहे थे । सही कहा मेले में ठेला ठाली ही हो रही थी । इसलिए बंद । कोई सांप्रदायिक हमारा लेख पढ़ कर बदल जाएगा या मैं सांप्रदायिक हो जाऊंगा संभव नहीं । यह देश हरा भी रहेगा और नारंगी भी । और सफेद भी । एक भी रंग किसी की दलील से कम नहीं होने वाला । आज से इस गड़े मुर्दे को तथाअस्तु । प्रमोद जी गत्ते की तलवार को टूटने से बचा लिया । वैसे इस देश में तलवारें बचीं ही रह गईं । वो तो एक महात्मा था जो समझ गया था कि यह तलवारों से मामूली लड़ाई जीतने वाला देश है । छोटे छोटे सीमाई नायक पैदा करने वाला देश है । इसलिए उसने आते ही तलवार छोड़ दी । अहिंसा के दम पर लड़ने चला गया । आइये आज़ाद भारत के इस सबसे बड़े प्रतीक को गले लगाते हैं । तलवार गई तेल लेने ।

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