Wednesday, April 4, 2007

सोचिये तो..

सोचिये तो हम बड़ी समझदार नस्‍ल हैं. हमारे लात खाने का अंत नहीं है. हमारे गाल बजाने का अंत नहीं है. हम मुस्‍कराने से ज्‍यादा हंसते हैं. इतना हंसते हैं कि पेट में मरोड़ उठने लगे. सोचिये तो हमारी बेहयाई का भी अंत नहीं है

चार डेग चलें जो ठीक-ठीक चलना हो. चार पाठ पढ़ें जो ठीक-ठीक पढ़ना हो. दु:खी हों तो दु:ख की पूरी मार्मिकता में हों. और हंसें तो एक आदमी का हंसना हो. मगर हंसी में हम हंसी कम प्रहसन ज्‍यादा करते हैं. व्‍यक्ति के सुख की कम समाज के दारुण दु:ख की कथा ज्‍यादा कहते हैं. सोचिये तो हमारी हंसी में ही हमारे रुदन का अंत नहीं है.

सोचिये तो आदमी के गिरने की एक सीमा होती है. सोचिये तो एक सभ्‍यता के पतन की भी सीमा होती है. किताबें कक्षा पास करने के काम में लाई जा सकती हैं जैसे एक नौकरी से घर चलाया जा सकता है. बस और सड़कें समाज के बीच से गुज़रने की बजाय कहीं से कहीं पहुंचने में काम लाई जा सकती हैं. एक खेल के जुड़ाव के बहाने समय और एक देश में अपने होने को जिया जा सकता है. सोचिये तो गाल बजाते हुए हम बहुत ज्‍यादा तरक़्क़ी करते हुए भी दिख सकते हैं.

1 comment:

  1. आखिरा पैरा जोरदार है, सोचने पर मजबूर करता है!

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