Friday, April 6, 2007

उस्‍तादों की महफिल

रॉयल अल्‍बर्ट हॉल या बीबीसी स्‍टूडियो में नहीं. साऊथहॉल के एक सामान्‍य ग्रोसरी स्‍टोर के बाहर मिले दोनो उस्‍ताद. हुआ यूं कि पाकिस्‍तान के अंजार अहमद की टैक्‍सी में तीन जनाना थीं और थे पाकिस्‍तान की आवाज़. अतर, इमली या जाने कौन गरज थी औरतों की जो टैक्‍सी रुकवायी गई ऐन एन हबीबुल्‍लाह एंड संस के सामने. गले में मफलर डाले वहीं खड़े थे धूप के लौटने की राह तकते लाहौर के लाडले. मुस्‍कराकर सड़क की अनजानी चहल-पहल देखते. फोटो में हमेशा दिखने की तरह एकदम हंस नहीं रहे थे. पहचान लिया अंजार ने पहली नज़र में. तो अनीस सच कह रहा था कि रात खास सवारी हॉंन्‍स्‍लो से साऊथहॉल लाया है! भागकर सलाम अर्ज़ किया. अभी-अभी गाड़ी से उतरी सवारी का तआरुर्फ कराया. दोनों उस्‍ताद देखते खड़े रहे एक-दूसरे को. फिर महीन मूंछों के भीतर मुस्‍कराकर मेंहदी हसन ने कहा, बड़ा सुरीला गाते हैं आप. रफी साहब हंसने लगे, कहा, आपकी आवाज़ का सानी नहीं, हुज़ूर. अंजार अहमद खुश हुए अल्‍ला का फ़ज्‍ल, सुबह-सुबह बीच सड़क उस्‍तादों की महफिल सज गयी.

2 comments:

  1. कुछ लोग दिलों में घर कर के कहीं खो जाते हैं
    और फिर वक्त वेवक्त जिन्दगी भर याद आते हैं

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