Thursday, April 12, 2007

हिन्‍दी प्रदेश की लड़की की तरह

पिता पत्‍नी बच्‍चे बचपन हाट सड़क घर बाज़ार क्‍या होगा कविता में यही सब चलेगा? गजब. अरे भाई, धूल थकान साइकिल तार पर चिडिया टिन के छत पर बजती बारिश अलसायी रात का प्रेम और बेगानापन किस गुज़रे ज़माने का बस्‍ता ढो रहे हैं, हुज़ूर? कहां ठहरे पड़े कैसी अटकी सांसें ले रहे हैं? वही बीस वर्षों पहले का छोटा हुसैनगंज स्‍टेशन, गोधुलि बेला और गाड़ी में मकई बांधकर लौटते मैकूदास- आह भरकर हवा में हाथ फेंकते हैं अरुण प्रकाश. अंधेरे में उजली बत्‍ती जलाते हैं. मेज़ पर साहित्यिक पत्रिका बजाते हैं. सोचिये, साथी, सोचिये, सोचिये. कविता में सैंट्रो और स्विफ्ट कहां आ रही है. कोई हाईवे नहीं बन रहा किसी ट्रैफिक जाम के जगर-मगर की ज्‍यॉग्राफी नहीं तन रही. आंख खोलकर देखिये, प्रिंट जर्नलिज़्म वाले सब इलैक्‍ट्रोनिक में शिफ्ट होकर पैसा पीट रहे हैं, मकान की बुकिंग कर रहे हैं और यहां हम साले को अभी भी हज़ारीबाग और मदनपुरा का रोना रो रहे हैं. थेथर पड़ी कविता अभी तलक वही पुराना बासी घिस रही है. हिन्‍दी प्रदेश की लड़की की ही तरह बहुत आगे नहीं बढ़ रही. आंगन में पत्‍नी रस्‍सी से कपड़े उतार रही है यहां कमरे में पोद्दार डिग्री कॉलेज के सीनियर छात्र के समक्ष अरुण प्रकाश अकुला रहे हैं. अलमारी सोफे के बीच घूमते गुस्‍सा गा रहे हैं. दुआरे आके बैठा है, देखिये, कुत्‍ता है, हटाइये, और तत्‍सम के ताज़ा अंक में हमारी जो ‘हाई स्‍कूल’ कविता छपी है, ज़रा उसको दिखाइये.

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