Thursday, April 12, 2007

अच्‍छी सेहत का राज़

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: तीस

आंख खुली तो रेडियो पर ‘ए पार ओ पार कोन पार जानि ना.. पद्दा आमार मां गोंगा आमार मां..’ गाना नहीं बज रहा था, टेलीविजन पर बिकिनी और जांघिये में एक श्‍वेत बाला जातीय नहीं जाती अस्मिता के शोध में डूबी हुई थी. समुद्री रेत पर दौड़ती हुई चिंतित हो रही थी कि अपने कमर व जांघों के अतिरिक्‍त बोझ का क्‍या करे. फूलते गर्दन व लटकते गालों की भ्रूण हत्‍या की किन तकनीकों को उपयोग में लाये. क्‍या महज़ चालीस वर्षों में उसका स्‍त्रीत्‍व, उसकी जवानी दीवानी नहीं रहेगी? क्‍या रेत पर दौड़ने की बजाय इस तरह के जीवन को ढोने से बेहतर नहीं होगा कि वह समुंदर की गहराई में उतर जाये और फिर कभी वापस न निकले?..

मैं आंखें मलते हुए समझने की कोशिश कर रहा था श्‍वेतबाला किस ज़बान में अपना दर्द रो रही है. क्‍योंकि अंग्रेजी, फ्रेंच, इटैलियन समझने के बावजूद अभी भी श्‍वेत संसार का एक बड़ा भूगोल था जिसकी गुत्थियां मेरे लिए गुत्थियां ही बनी हुई थीं. और बनी रहनेवाली हैं की बात सोच-सोचकर अक्‍सर- किसी विदेशी को विदेशी पत्रिका में सड़क पार करता देख या पाइरेटेड बिना सबटाईटल वाली डीवीडी को शुरू करते ही रोक कर- मैं उदास हो जाता रहा हूं. अभी भी लड़की की देह और उसकी ज़बान दोनों के अपरिचय में बेचैनी और हैरानी बनी हुई थी. और जानता था बनी रहनेवाली है इसलिए टेलीविजन से नज़र हटाकर दीवार की ओर देखने लगा. दीवार पर किसी मध्‍ययुगीन रूसी चर्च का प्रिंट, एंडी वॉरहॉल की मर्लिन मनरो और विदेशी ज़बान में किसी क्‍वोटेशन का फ्रेम टंगा हुआ था. पढ़ने की कोशिश की. और थोड़ी कोशिश में पढ़ भी गया- ‘क्‍या टीवी पर जो नहीं दिखता, उस जीवन का कोई मूल्‍य नहीं? मतलब नहीं?’ किसी स्‍वीडीश जासूसी उपन्‍यासकार हेनिंग मेंकेल की स्‍वीडीश जासूसी उपन्‍यास का क्‍वोट था. चूंकि मैंने कभी जासूसी किताबों को गंभीरता से नहीं लिया इसलिए खामखा ऐसे लिखे पर दिमाग़ खपाने की कसरत में नहीं गया, आंखें खोलकर अपनी स्थिति पर गौर करने लगा..

यह मैं ठीक-ठीक कहां हूं!.. कैसे हूं?.. सही है कि उत्‍पल दत्‍त, शर्मिला ठाकुर और ऋत्विक के कलकत्‍ते में भटकाव एक सपना था, लेकिन सपने में उतरने से पहले तो मैं अंतोनेल्‍ला को ट्रेन में छोड़ ट्रॉपिकल जंगल में उतरा था. बरसाती अंधेरे और ईरान में अविनाश के विनाश की सच्‍चाई जानकर पहले क्षत-विक्षत फिर बेहोश हो गया था! उसके बाद इस अपरिचित अजाने विदेशी भूमि में हूं.. किसकी वजह से हूं?.. क्‍या अंतोनेल्‍ला ट्रेन से मेरे पीछे-पीछे जंगलों में और अपने पीछे-पीछे यूएनओ की सहायता स्‍क्‍वाड लेकर तो नहीं आई थी?.. या दरअसल ट्रॉपिकल जंगल की बरसात में मेरा अब तक पूर्ण विलय हो चुका है और आंखों के आगे दिखती मर्लिन मनरो और मेंकेल की लिखाई फिर बस एक स्‍वप्निल छवि भर है!..

मेरा असमंजस अभी टूटा नहीं था कि कमरे में पुराने ढंग के एक बुज़ुर्ग दाखिल हुए. पुराने ढंग का जूता, पुराने ढंग का सूट, और चेहरे पर भी उसी तरह पुराने ढंग की शराफ़त. पतली-दुबली काठी, उम्र यही करीब अस्‍सीएक साल. सामने के सोफे पर धीमे शराफ़त से बैठने के बाद मेरी ओर मुखातिब हुए, और उसी अजानी विदेशी ज़बान में बातें कहना शुरू कीं- तुम्‍हारी उम्र में मैं भी इस चिंता से जूझता रहा हूं. कभी उत्‍तर नहीं मिला. कुछ सवाल ऐसे होते हैं उनका उत्‍तर नहीं मिलता. खुद उत्‍तर बनाना पड़ता है..

मेज़ के फ्लास्‍क से गिलास में पानी निकालकर बुज़ुर्गवार ने दो घूंट पीया, करीने से वापस फ्लास्‍क मेज़ पर रखा और सोफे की बांहों पर हाथ टिकाये धीमे-धीमे अपनी बात पर लौटे- भाषाओं से जुड़ी तुम्‍हारी चिंता ज्ञान का आदि प्रश्‍न है, बेटे. कितनी ज़बानें जानी जाये, कितनी किताबें पढ़ी जायें. जैसे-जैसे सभ्‍यता कॉम्‍प्‍लेक्‍स होती चलती है वैसे-वैसे हमपर इन ज़रूरतों का दबाव भी बढ़ता जाता है. मगर क्‍या मानव स्‍तर पर यह संभव है? संभव हो भी तो क्‍या सचमुच इतना ज़रूरी है? पूरी दुनिया घूम लेने के बाद भी हम कितना जान पाते हैं दुनिया को? क्‍या ठीक-ठीक आदमी अपने को भी आजतक जान पाया है? फिर खुद को ऐसे काम सौंपने का क्‍या औचित्‍य जो सिर्फ हमारी तक़लीफ़, हमारी कुंठा बढ़ाये. तुम्‍हारे ही मुल्‍क के रवि बाबू थे उन्‍होंने सत्‍यजीत राय को एक पते की बात कही थी. कि समूची दुनिया घूम लेने पर भी उन्‍हें सौंदर्य के दर्शन नहीं हुए, फिर अपनी कुटिया के बाहर एक फूल देखा जिसमें सारे विश्‍व की सुंदरता समायी हुई थी. ठीक यही शब्‍द नहीं थे मगर भाव ऐसा ही कुछ था. सौ और हज़ार और लाख किताबें ज्ञान नहीं हैं. जीवन के साथ स्‍वस्‍थ संबंध बना लेने का कौशल अर्जित कर लेना सबसे बड़ी दृष्टि है. नसीब वालों को मिलती है. मैं अब दुखी नहीं होता कि इतने वर्षों तक नहीं मिलने पर जीवन का बहुमूल्‍य समय कितना गंवाता रहा. जो बचा है उसे स्‍वस्‍थ बनाये रखने की कोशिश कर रहा हूं. तीन या चार किताबों से ज्‍यादा अब नहीं पढ़ता. सुबह साढ़े चार बजे उठ जाता हूं और सिर्फ सब्जियों का सेवन करता हूं. शरीर की हालत बुरी नहीं, अभी दस वर्ष और जीना चाहता हूं!

बूढ़े का स्‍वास्‍थ्‍य देखकर अपने भारी देह से मुझे शर्म होने लगी. झेंपकर मुस्‍कराने लगा. बुज़ुर्गवार धीमे-धीमे हंसने लगे.

(जारी...)

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