Friday, April 13, 2007

हां, गलती हुई है तो क्‍या करोगे.. जान लोगे?

जासूसी उपन्‍यास: एक वेरी ऑर्डिनरी भूल सुधार

भई, एक जघन्‍य अपराध हो गया है, ख़तरनाक गलती हो गई है. मतलब एक भूल सुधार वाली सिचुएशन हो गई है. जासूसी का मामला है इसीलिए ड्रामे के टोन में बोल रहे हैं वर्ना इस तरह की गल्तियां तो छापे में हर तीसरे दिन होती रहती है, और किसी का कुछ उखड़ता नहीं, तो आपके भी उखड़ने का सवाल नहीं. मगर इस छोटी, मामूली, बेमतलब-सी गलती से कोई उखड़ गया और फोन पर तू-तड़ाक की ज़बान में हमारी साहित्यिकता को क्‍वेस्‍चन करने लगा तो हम भी थोड़ा उखड़ गए- जैसा महसूस कर रहे हैं; और इस दो कौड़ी के आदमी को उसकी दो कौड़ी की औकात में वापस भेजते हुए इस बेमतलब-से प्रसंग का पटाक्षेप कर देना चाह रहे हैं. घबराइये नहीं आपका नुकसान नहीं होगा. मेरा तो नहीं ही होगा. जिस चिरकुट का होगा तो चूंकि वह ऑलरेडी दो कौड़ी का है तो उसके बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं. दफ्तर के चपरासी, सेक्रेट्री की गलती होती तो उन्‍हें एक कन्‍टाप और दस गालियां सुनाकर हम कलेजा ठंडा कर लेते लेकिन चूंकि हमारे आगे चपरासी और पीछे सेक्रेट्री और आसपास दूर तक कोई दफ्तर नहीं है तो मतलब यही निकलता है कि गलती हमीं से हुई है, और चाहें भी तो कलेजा ठंडा नहीं कर सकते. गरम किये हुए हैं मगर जानते हैं कि इससे भी कुछ उखड़ने वाला नहीं. भलाई इसी में है कि गलती सुधार ली जाये. हालांकि हमारा ईगो स्‍ट्रॉंगली हर्ट हो रहा है लेकिन हमारे जैसे संवेदनशील आदमी का ईगो कब हर्ट नहीं हुआ है. साहित्‍य में पाने क्‍या आये हैं? ईगो हर्ट करवाने ही आये हैं ना? बूस्‍ट करवाना होता तो सिनेमा में जाता, शाहरुख बनता, एलए-लेले में शो करता या फिर हारके-मारके सीरियल किलर हो जाता. न्‍यूज चैनल वाले समाज की चिंता में दुखी दिखने की एक्टिंग करते हुए बिजी हो जाते और बीस माइकों के बीच फंसे हुए फ्रेम में मीडिया इतिहास में अमर हो चुकता. ‘हां, हां, मैंने किया है.. और मैं शर्मिंदा नहीं हूं!’ कहते हुए मेरा ईगो बम-बम रहता. मगर अपने को तो साहित्‍य के सांप ने काटा था! जासूसी का जादू जगाने गये, पहले ही कदम पर मायूसी हो गई!

दोस्‍तो, लफड़ा ये हुआ है ‘हिंदी: एक जासूसी उपन्‍यास’ का हमने कर्टन रेज़र, भूमिका, पूर्व-पीठिका (कुछ भी कह लो, यार, बात को आगे बढ़ने दो!) जो भी था, जो छापा था हमने, उसमें जिन (दो कौड़ी के) प्रह्लाद चंद्र दास का नाम चला गया था वह जासूसी तो क्‍या ढंग की चिट्ठी लिख सकनेवाले लेखक भी नहीं हैं (अबे, तुम्‍हें शैंडलर, हेमेट, कल्विनो की श्रेणी में खड़ा किया, जनम-जनम का शुक्रगुज़ार होने की बजाय मां-बहन की तूने गाली दी, एहसानफ़रामोश? अबे, साले, तेरे जैसे तो.. यह भूल सुधार निपट लेने दे फिर निपटता हूं तुझसे!). जनाब दवाईयों की एक दो कौड़ी की दूकान के मालिक भी नहीं, फूटी कौड़ी के असिस्‍टेंट हैं.. पता नहीं मैंने सड़ा हुआ समोसा खा लिया था या फटी हुई दही पी ली थी कि इतने महत्‍वपूर्ण मौके की इतनी महत्‍वपूर्ण चीज़ पर ऐसी बेहूदी गलती कर बैठा. मुझसे गल्तियां पहले भी हुईं हैं (किससे नहीं हुई हैं?.. क्‍या हम ईश्‍वर हैं?) मगर बेहूदी गलती का यह पहला (और इंशाअल्‍ला आखिरी- या इंशाअल्‍लाह?- सुष्मिता तो वैसे इंशाअल्‍ला ही बोलती है?) मौका है. मुझे थोड़ा वक्‍त लगेगा लेकिन आप सबों से गुजारिश है भूल जाइए इस मवाद-प्रह्लाद-विवाद को, हालांकि पता नहीं उल्‍टी-सीधी दवाईयां देकर अब तक कितनों की जान ली होगी पाजी ने! (क्‍या इसकी जांच के लिए आपमें से कोई जनहित याचिका दायर करने का जिम्‍मा नहीं उठा सकता?.. टाईम नहीं है? टाईम निकालिये, यार! इतना ख़तरनाक आदमी- या मुज़रिम?- समाज में छुट्टा दवाईयां खिलाकर लोगों की जान ले रहा है और आप चैनल वालों की तरह बिजी होने की एक्टिंग कर रहे हो? बिजी होकर उखाड़ क्‍या रहे हो! कल को दवाई पिलाके सुला दिया फिर तुम नहीं तुम्‍हारे घरवाले हाथ में याचिका लिये इस और उस एडवोकेट के चक्‍कर लगा रहे होंगे? कोई ये नहीं कह रहा होगा कि टाईम नहीं है फिर! टाईम नहीं की बात करते हैं! हद है, यार? किसी चीज़ की कोई सीमा बची है कि नहीं? एक छोटी-सी, नाक के नोक बराबर गलती हुई है मुझसे मगर अपने में झांक के देखो कितना बड़ा जघन्‍य, ख़तरनाक अपराध कर रहे हो आप!)

सुबह-सुबह फालतू में दिमाग की ऐसी-तैसी करके छोड़ दी. बेवजह. फर्क क्‍या पड़ता है किताब प्रह्लाद चंद्र दास लिख रहा है या दामोदर दास? सबसे ताजुब्‍ब तो इस बात का है कि दामोदर डंडा लेकर नहीं आया. मवाद प्रह्लाद का बहता रहा (जबकि जनाब दवाईयों की दूकान में खाते-पीते-सोते और पता नहीं क्‍या-क्‍या करते हैं). एनीवे, जो हुआ सो हुआ (आखिर ऐसी बेहूदा गलती हुई कैसे?), आइंदा से रॉंग करेक्‍ट करके पढ़ि‍येगा. और फिलहाल मेरा सिर मत खाइये कि सनसनीखेज़ उपन्‍यास शुरू कब हो रहा है. जब होना होगा, होगा, पहले मैं इस पीसी दास को दवाई खाने की हालत में भेजने का कुछ इंतज़ाम कर लू (इज़ एनीबडी कमिंग फॉरवर्ड टू हेल्‍प मी इन दिज़ मेस?.. एंड वेट फॉर दामोदर नाउ!.. ही इज़ नॉट ऑनली अ बिग मैन, बट अमेजिंगली अ बिग राईटर एज़ वेल!)!

2 comments:

  1. इन पी.सी. दास सज्‍जन से निपटने के लिए मैं आपके साथ आ रहा हूं। बताइए, कब और कहां चलना है।

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  2. भूमिका बहुत हो गई अब उपन्यास पढ़्वाओ नहीं तो बेनाम का गालियों का रोना रोओगे फिर..पैसे नहीं दिये तो क्या..सिनेमा हॉल के दर्शक नहीं तो क्या..सीटी नहीं मार सकते.. सीट नहीं फाड़ सकते तो जो मन चाहे करोगे.. बेनाम के मर्यादाओं की बात बहुत हो गई.. अब ब्लॉग मालिकों के कर्तव्यों की भी कुछ बात होनी चाहिये.. और अब उस पर मत लिखना शुरु कर देना.. जासूसी नॉवेल.. कर्नल रंजीत टैप..उसको शुरु करो जल्दी.. वरना.. गाली वाले बेनामों को भेज दूँगा..

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