Monday, April 16, 2007

विचार और वायु दोष

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: इक्‍तीस

सुकांतो दा, किंतु एक टू आमार जिग्‍गेसा छिलो?- तकिये पर कुहनी टेककर मैंने सवाल किया.

बुज़ुर्गवार हंसी रोककर संजीदा हो गए, संजीदगी में ही कहा- मैं सुकांतो नहीं हूं. मैं बंगाली भी नहीं हूं.

- मैं भी नहीं हूं. असल बात वो नहीं है. भोजपुरी-हिंदी में बोलता तो आप सीरियसली लेते नहीं. अपना ज्ञान ठेले रहते. बंगाली बोलते ही देखिये आप गोद की बांह उठाकर ठोड़ी पर विचार की मुद्रा में ले गए! (बुज़ुर्गवार ने एकदम-से गाल में गड़ी उंग‍ली हटा ली, असमंजस में लटके रहे कि अब उसे कहां ले जायें) क्‍यों करते हैं ये सब आपलोग? इतना वर्गीय विभाजन क्‍यों बना रखा है?

- तुम कहना क्‍या चाहते हो? सीधे-सीधे अपनी बात रखो. बौद्धिक व्‍यभिचार व भाषाई पहेलियों के लिए मेरे पास अब अवकाश नहीं.- बुज़ुर्गवार थोड़ा खिन्‍न होकर सोफे में मचलने लगे.

मैं अंदर ही अंदर खुश हो रहा था कि चलो, बुड्ढे को घेर लिया है. चेहरे से ज़ाहिर नहीं किया- वर्गीय विभाजन बोलता हूं तो आपको बौद्धिक व्‍यभिचार लगता है? और आऊट ऑफ वर्क गरीब के आगे आप सेहत का साज़ छेड़े रहें, वह बौद्धिक हस्‍तमैथुन नहीं? दो सौ एकड़ के प्‍लॉट पर हवेलियों में रहनेवाले मौका मिलते ही सादा जीवन का अपना रेकॅर्ड चालू कर देते हैं. निरंजन हिरानंदानी से लेकर अज़ीम प्रेमजी, अनिल अंबानी सब आपको दो फुलके और ज़रा सी सब्‍जी खाकर जीवन में सुखी बने रहने का राज़ समझाने लगते हैं. स्‍वीडन का मल्‍टी मिलियनेयर हंसते हुए कहता है दुनिया की सबसे अच्‍छी सवारी साइकिल की सवारी है. जहां गांवों में आज भी ढंग की एक सड़क नहीं और घर पहुंचने के लिए लोग दो घंटे पैदल चलते हैं, आप उनको मोटर-कार से दूर रखकर साइकिल का महत्‍व पिला रहे हैं! गरीब जो बीमारी-स्‍वास्‍थ्‍य हर घड़ी थाली भर भात और बरात के भोज का स्‍वप्‍न देखता है उसे समझाते हैं दो फुलका संजीवनी है? चे ग्‍वेवारा और माओ ने तो गरीब से कभी नहीं कहा कि दो फुलके खाकर प्रभुजी का झुनझुना बजाते हुए प्रसन्‍न रहो! दुनिया भर के बाज़ारों के स्‍टॉक चूतड़ों के नीचे दाबे आप ही लोगों की ओर से यह भजन बार-बार बजता रहता है. इसका रहस्‍य क्‍या है, साहब? गरीब के जीवन में अच्‍छी सड़क आने दीजिये, ढंग से दो वक्‍त का खुराक खाने दीजिये, मोटर-कार उसके घर में आ जाये फिर उसको तय करने दीजिये कि साइकिल अच्‍छी सवारी है या मोटर-कार! तन ढंकने का जिसके पास कपड़ा न हो उसको मत समझाइये कि नंगा रहने में कैसा ईश्‍वरीय सुख है. राजनीतिक सवाल को श्री श्री सत्‍यसाईं का सवाल बनाकर वर्गीय घालमेल का खेल मत खेलिये!

मैं उत्‍तेजना में कांप रहा था. नई लड़की को रिल्‍के की कविता सुनाकर इंप्रेस करने के चक्‍कर में अक्‍सरहा जैसी शौयपूर्ण बेचारगी की सूरत बन जाया करती थी कुछ वही हाल बन पड़ा था. मगर मैं सिर से पैर तक विजयी मद में नहाये था. बुज़ुर्गवार किंकर्तव्‍यविमूढ़ थे. किंकर्तव्‍यविमूढ़ ही हो सकते थे. चिढ़कर अपनी विदेशी ज़बान में बुदबुदाये- मुझे मालूम नहीं तुम क्‍या अनाप-शनाप बक रहे हो. जीवन में सुखी होना न होना निहायत व्‍यक्तिगत प्रसंग है. अपने ऊल-जुलूल जीवन शैली को ग़ैरजिम्‍मेदारी का वैचारिक जामा पहनाकर जस्टिफाइड बने रहना चाहते हो, अगर तुम्‍हें सुख मिलता है तो ईश्‍वर तुम्‍हें सुखी रखें!

मैं एकदम अनकंफर्टेबल होने लगा. दो सौ एकड़ के प्‍लॉटवाले और नफ़ासत में नहाये एक उम्रदराज़ बुज़ुर्ग को नाराज़ करके अपने पाप बढ़ाना नहीं चाहता था. पाप बढ़ाने से ज्‍यादा संबंध बिगाड़कर अपनी सामाजिकता का और रायता करना नहीं चाहता था. तेजी से भागकर बुज़ुर्गवार के पैरों पर आ गिरा, विचारमग्‍न उनके हाथों को अपने हाथ में लेकर लघु पत्रिका के उस संपादक की तरह रोने लगा जिसकी पत्रिका को प्रेस मालिक ने बंद करने का अल्‍टीमेटम दे दिया हो- ऐसा बोल के हमें अपने हाल पर अकेला न छोड़ें, गुरुवर! हर जगह लात मारके लोग अकेला छोड़ रहे हैं. नई प्रवृत्ति है. तेजी से फैशनेबल हो रही है. पहले सिर्फ लड़कियां छोड़कर कहीं और जाकर शादी कर लेती थीं. अब दोस्‍त, समाज सब वही खेल खेल रहे हैं! आई हैव स्‍टार्टेड टू फील लेटली वेरी लोनली, सर. सो प्‍लीज़ डोंट डू दीज़ टू मी. प्‍लीज़. वेट तो बढ़ ही रहा है, सिगरेट भी साली कम नहीं हो रही. फिर पेट में यह नया वायु दोष जैसी चीज़ आकर बैठ गई है. देह में कहां-कहां की महक ने आकर डेरा डाल लिया है, दिन भर इधर-उधर उंगली से टो-टोकर सूंघा करता हूं, इट्स बिकमिंग वेरी एम्‍बरेसिंग, सर! आई वॉंट टू लीड अ हेल्‍दी लाइफ़. रियली!

बुज़ुर्गवार नाराज़ हो गए. अपना हाथ मेरे हाथ में से निकालकर बोले- व्‍हॉट काइंड ऑफ परसन आर यू? विचारों में कोई कंसिस्‍टेंसी है या नहीं! आदमी हो या पजामा?..

भावुक होकर मैं लगभग डरने-सा लगा. सिर झुकाकर बोला- मालूम नहीं, सर. आई रियली डोंट हैव अ क्‍लू..

(जारी...)

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