Friday, April 20, 2007

पूरब और पच्छिम: प्रचलित धारणायें और नये तथ्‍य

एक निबंध: माध्‍यमिक शिक्षा में कम नंबरों से पास हुए छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी

ज्ञातव्‍य है पूरब पूर्व में होता है जबकि पच्छिम पश्चिम में. सूरज पूरब में निकलता है जबकि डूबने के लिए उसे पश्चिम तक का लंबा सफर करना पड़ता है. उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में अंग्रेज गर्व से कहा करते थे हमारे साम्राज्‍य में सूरज कभी डूबता नहीं, तो उसके पीछे पेंच यही था कि भाई लोगों ने पूरब और पच्छिम के बीच अच्‍छी धकापेल मचा रखी थी, दुनिया में यहां से वहां सूरज के पीछे-पीछे भागते हुए एक्‍सटोर्शन और उठाईगिरी का कारोबार फैला रखा था. हमेशा चौकन्‍ने रहते थे कि कहीं ऐसा न हो सूरज डूब जाय और उनकी वर्ल्‍डवाईड स्‍मगलिंग अंधेरे में गिरके उनके बेड़ों का बेड़ा गर्क करे. यही वजह है बाद की सदियों में (अंग्रेजों से सबक लेकर) दूसरे मुल्‍कों और हिंदी फिल्‍मों ने सूरज के पीछे भागने की बजाय स्‍मगलिंग के लिए रात का समय मुकर्रर किया. यह समझदार सीख आजतक काम में लायी जा रही है.

पूरब से आनेवाली हवा को पुरवैया और पच्छिमी को पछुआ कहते हैं. पुरवैया बड़ी रुमानी हवा समझी गई है जिसके गलत असर से बचाने के लिए स्त्रियों को ऊपर से नीचे तक बुरके और साड़ी में ढंके रहने का प्रावधान है. जैसे ही स्त्रियां बुरका और साड़ी फेंककर उन्‍मत्‍त होने लगती हैं तालिबान और विहिप भी उनके पीछे-पीछे उन्‍मत्‍त होने लगता है. जबकि पुरुषों में जिनके पास खाने को नहीं उनपर इस नियम की सख्‍ती को ढीला रखा गया है और ऐसे लोग कमर के पास एक छोटे वस्‍त्र से अलग अक्‍सर नंगे पाये जाते हैं, और उन्‍मत्‍त बने रहने को स्‍वतंत्र रहते हैं. यही वजह है इस तबके में बच्‍चा प्रजनन का रेशियो इतना हाई है. पछुवा में ऐसे उन्‍मत्‍त करनेवाले काम-वासना के तत्‍वों का अभाव समझा गया है इसीलिए पश्चिमी स्त्रियों पर बुरके और साड़ी का प्रतिबंध नहीं, और यही वजह है कि वे प्रजनन दर में भी पूरब से इतना पीछे हैं.

पूरब से आनेवाले आप्रवसियों को मुंबई में भैया बुलाने का रिवाज है जबकि इसके जवाब में भैयों की ओर से मुंबई वासियों को बहिनी या बहन वाला रिश्‍ता जोड़कर गाली देने का रिवाज अब तक प्रचलन में नहीं आ पाया है. चूंकि पूरब सूर्योदयी प्रदेश (सर्वोदयी नहीं. वह प्रदेश नहीं आंदोलन रहा है जिसे पैदा करनेवाले कोई बिनोबा भावे रहे हैं) रहा है और पच्छिम सनसेट ज़ोन इसलिए बिजली के अविष्‍कार की चिंता भी पूरब नहीं पश्चिम में हुई. इसलिए बिजली की खपत भी पूरब की तुलना में पश्चिम में सैकड़ों गुना ज्‍यादा है. फिर भी यह गौरतलब और ताजुब्‍ब की बात है कि सूर्योदयी देशों में अग्रणी इंडिया के बड़े हिस्‍से में अबतक उजाला क्‍यों नहीं पहुंच सका है. क्‍या इसकी वजह यह है कि सूर्यदेव इंडियावासियों से नाराज़ हैं, या अंधेरे का लाभ उठाकर पश्चिम उनके वरदानों की स्‍मगलिंग कर रहा है? (प्रतापगढ़, बांदा, जौनपुर में किसी बंधु को शोध के लिए विषय न मिल रहा हो तो वह इस विषय पर इंटरेस्टिंग डेटा कलेक्‍ट कर सकते हैं)

मनोज कुमार और विपुल शाह जैसे चंद सिरफिरे निर्देशकों ने चंद सिरफिरी फिल्‍म बनाकर पूरब और पच्छिम को मिलाने की घालमेली कोशिश की है. मनोज कुमार तो उत्‍साह में दो कदम आगे बढ़कर इराक में लात खाये पश्चिम को अपने यहां आने का न्‍यौता तक देने लगते हैं (गौर फरमाइये: ‘कोई जब तुम्‍हारा ह्रदय तोड़ दे, तड़पता हुआ तुम्‍हें छोड़ दे, तब तुम मेरे पास आना, प्रिये, मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा), जो बहुत ही खतरनाक संकेत है और जिसके खिलाफ तत्‍काल प्रदर्शन किये जाने की ज़रूरत है. हालांकि यह भी सत्‍य है कि मनोज कुमार के न बुलाने पर भी पश्चिम काफी हद तक पूरब के पोर-पोर में घुसा हुआ है, जबकि पूरब को अपने पोर-पोर में घुसने देने की हर कोशिश का पश्चिम जमकर विरोध करता रहा है. चीन इस क्‍लासकीय विरोध की मां-बहन करता ढेरों क्‍लासकीय अवधारणाओं की मां-बहन कर रहा है जो पूरब के पक्ष में एक स्‍वागत योग्‍य तथ्‍य है.

इस विषय पर किसी भी उद्वेलनकारी जिरह और सवाल के लिए कृपया संपर्क करें: यूके बेस्‍ड अनामदास अनोनिमस, ईस्‍टन एक्‍सपर्ट इन वेस्‍ट. फीस: फोर्टी पाउंड एन आवर (नेगोशियेबल इन डायर सिचुएशंस).

2 comments:

  1. धन्यवाद, प्रमोद जी. हौसला बढ़ाइए लेकिन ज़रा हिसाब से. अगर हमने जोश में आकर नौकरी छोड़ दी तो होश में आने पर आप ही से हिसाब करेंगे.

    ReplyDelete
  2. बहुत शानदार। देखने की नजर और लिखने का अंदाज दोनों ही निराला है। मुंह से बरबस वाह-वाह निकल जाता है।

    ReplyDelete