Thursday, April 12, 2007

भई, इन बेनामों का बाप कौन है?

भई, कोई साथ नहीं इनके? सामने आएगा कोई?.. ये कौन लोग हैं जो अनाम-बेनाम-गुमनाम नेट पर टहल रहे हैं? किसी ब्‍लॉग पर ये और किसी पर वो की बीट छोड़ रहे हैं? क्‍या इनकी मम्मियों ने इन्‍हें चड्डी नहीं पहनाया? इन मम्मियों के ह्रदय नहीं कि बिना नाम दिये इन्‍हें ऐसे ही घर से बाहर भेज दिया?.. क्‍या ये हिंदु माताएं हैं? या सभी मुसलमान हैं?.. या बड़े और वयस्‍क हो गए हैं.. लेकिन बेनाम बंधुओं, बंधुनियों को अभी इतनी बुद्धि नहीं आई कि गुगल में रजिस्‍टर होकर अप्रैल की धूप में सिर पर आईडी की एक छतरी रख लें? आईडी से नुकसान होता है? सिनेमा हॉल के बाहर पराये के साथ बांह में बांह धरे देख लिये का ‘डेंजर’ रहता है?.. या चुपके से टहलकर चोरों की तरह इधर-उधर उटपटांग टिप्‍पणी टीप आने का मज़ा छूट जाने की टीस उठने लगती है? बात क्‍या है?.. बोल दो, यारो. किस दीवार पर खड़ा होकर क्‍या गंदा करनेवाले हो, राज़ खोल दो, यारो.. या हिंदी के बी ग्रेड जासूसी उपन्‍यासों की तर्ज़ पर ‘अजय कौन?’, ‘विजय कौन?’ की रामलीला खेलने का लुत्‍फ़ छोड़ना नहीं चाहते?.. मम्‍मी ने मना किया है? या हलवाई की बेटी मीना ने मना किया है- जिसकी एक नज़र लेने के चक्‍कर में तुम तीन दफे दीवार से लड़ चुके हो और एक बार नाली में पैर पड़ चुका है? हां? बात क्‍या है?.. यार, हो सकता है दीवार से लड़कर तुम्‍हारी मुहब्‍बत परवान चढ़ती हो, मगर हम दीवार को साफ़-सुथरी रखने में विश्‍वास करते हैं, क्‍यों खामखा आके हमारी दीवार पर पेट का पानी निकालते हो? क्‍यों?.. नालियों से विशेष अंतरंग संबंध तो है ही तुम्‍हारा, वहीं अपने पेट और पानी के कर्म करो! कि तुमने स्‍कूल में हाईजीन की शिक्षा नहीं पाई है? कोई शिक्षा नहीं पाई है? बस दीवार पर खड़े होकर गुमनामी की धारा बहाना सीख गए हो? लाज-शरम नहीं आती? आत्‍मा धिक्‍कारती नहीं? विशेष मटिरियल के बने हो? देखकर कुत्‍ते भौंकने लगते हैं? चार कोस पहले से तुम्‍हारे आने की महक आने लगती है? बेटा (बेटी), कब तक ऐसे चलाओगे? मानोगे नहीं गंध फैलाये जाओगे? आयोडीन और आईडी के साबुन से नहा लेना देह में खुजली पैदा करता है? आदत से बाज नहीं आओगे? घर में भले मानस की तरह आकर बैठने की बजाय गुमनामी की खिड़की से बलग़म थूकोगे, ऊबकाई फैलाओगे? बार-बार याद दिलाओगे कि कुछ देशों में जो अभी भी खंभे से बांधकर कोड़े और चाबूक मारने का प्रचलन है, तुम उस सभ्‍यता से बहुत ऊपर नहीं उठ पाए? ऐसा है, मिस्‍टर बेहया बेनाम?..

5 comments:

  1. अरे प्रमोद जी, किस पर इतना गुस्‍सा उतार रहे हैं। शायद आप ब्‍लॉग के बेनाम घटिया टिप्‍पणियों से क्षुब्‍ध हैं। क्‍या करेंगे, ये देश ही ऐसा है। ब्‍लॉग का सार्थक कम और इस तरह का इस्‍तेमाल ज्‍यादा होता है। फिलहाल आप दुखी मत होइए। लेकिन ऐसे लोगों को सही धोया है आपने।

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  2. आई डी की छतरी ही नहीं..सभ्यता का पैंट शर्ट टोपी टाई वगैरा सब कुछ होगा इस बेहया बेनाम के पास.. पर उनको पहन कर इसके अन्दर का अधम पशु कुलबुलाता छ्टपटाता रहता है.. अतः ये वो सब करने पर बाध्य हो जाता है जिसका उचित वर्णन आपने किया.. इस पशु को सीधा करने एक ही रास्ता ये हो सकता है कि इसकी किसी नीच किस्म की टिप्पणी को प्रकाशित ही न किया जाय..तो शायद ये अपनी बेहयाई से बाज आ जाय..

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  3. भाई अजदक आप का प्रोफाइल देखा उसमे एसी तो कुछ खास जानकारी नही था आपके बारे मे सिवाय आपके नाम के वह भी सही है या गलत पता नही। तो आप नाम वाले हुए या बेनाम ?

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  4. सत्य कथन.

    उम्मीद है कथित श्रेणी के सभी अनाम-बेनाम इसे पढ़ेंगे और कुछ आत्मावलोकन करेंगे...:)

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  5. का हुआ सिंघ जी! कौनो उल्टा-सीधा लिख गवा का ? जाए दै . मुदा एतना टेंशन लेना ठीक नाहीं . ऊ त ससुरा कारगुजारी कर चलता बना अब आप काहे टट्टी-पिसाब-बलगम-उबकाई का जिक्र कर वीभत्स रस का संचार करते हैं . तनी धीरज धरा हो भाई .

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