Monday, April 16, 2007

मर्डर इन सेमलगंज

एच की मौत: एक

लिफ्ट की जाली खोलते ही राजनाथ की बहू का मुंह खुला रह गया. सब्जियों का झोला छूटकर फर्श पर गिर पड़ा और मुंह से बरबस एक चीख़ निकलकर पूरी इमारत में गूंज गई! गिरी सब्जियों का एक टमाटर लुढ़कता हुआ गिरे आदमी की उंगलियों से जा टकराया मगर कोई हरकत न हुई, फटी आंखें राजनाथ की बहू को अपलक तकती रहीं. मुंह का तंबाकू कुर्सी के नीचे थूक सिक्‍युरिटी गार्ड सेवाराम भागता हुआ लिफ्ट तक गया. लिफ्ट के दरवाज़े पर सब्जियों के गिरे झोले के बाजू में जवान औरत बेहोश पड़ी थी. अंदर फटी आंखों वाला व्‍यक्ति इस बार सेवाराम को घूर रहा था. मरियाडीह थाने से इंस्‍पेक्‍टर सुबाचन यादव के आने में अभी भी एक घंटा बीस मिनट बाकी थे..

..या सबसे पहले सीढ़ि‍यों पर लुढ़की अवस्‍था में लाश को दुबेजी की नौकरानी सत्‍यवती ने देखा और चीखती हुई पूजाघर तक दौड़ी चली आई. दुबेजी की पुरनिया माता का पूजा ही नहीं पुराने स्‍टूल पर धरा दूध का गिलास छन्‍न-से छूटा और ज़मीन पर आकर चूर-चूर हो गया. चौकी से लपककर बिल्‍ली भुरई जंगले पर गई और चौकन्‍नी होकर अपने दोनो कान खड़े कर लिए.. या मवेशियों को हांककर जंगल की तरफ ले जाते हुए सूखे नाले में गिरी लाश पर सबसे पहले निगाह ढेपुआ की पड़ी. पहले तो ढेपुआ असमंजस में एक ओर हट गया. फिर जानवरों पर हल्‍ला करता हुआ उन्‍हें एक बाजू करके इतमिनान से नाले की गड़ही में उतरा. व्‍यक्ति का अनजानापन और लाश की तसल्‍ली हो चुकने पर ढेपुआ ने आसपास के सूनसान पर एक नज़र डाली और फिर झुककर मुर्दा के हाथ से घड़ी निकालने की कसरत में लग गया..

दामोदर दास ने घबराकर आंखें खोल दीं और बिछौने पर उठ बैठा. मसहरी की फंसावट में जोर-जोर से सांस लेने लगा. खुद से शर्म हो रही थी. झुंझलाहट हो रही थी. किस तरह की फिल्‍मी कल्‍पनाओं को वह अपने में प्रश्रय दे रहा है? सामाजिक पतन के साथ-साथ उसके व्‍यक्ति का यह किस तरह का पतन है? क्‍या हजारी भैया की संगत, उनकी शिक्षा से इसी तरह वह ऋणमुक्‍त होगा? मसहरी एक ओर हटाकर दामोदर दास तखत से नीचे उतर आया. मच्‍छरों की आवाज़ से अलग सर्वत्र निस्‍सीम शांति थी. अलबत्‍ता धीमे-धीमे बजते अपने छाती की धड़कनों को सुनकर दामोदर दास अपने जिंदा होने की तसल्‍ली कर लेना चाह रहा था. नहीं, वह जीवित है. उसकी क्षुद्रतमता में प्रभु उसकी रक्षा किये हुए हैं जबकि हजारी भैया और उनका साहित्‍य दोनों ही.. सोचते हुए उसकी छाती में कील-सी गड़ी और वह छटपटाया-सा अंधेरे में अंदाज़ करता रसोई तक गया. दूध का गिलास पीकर सोने गया होता तो ऐसी अव्‍यवस्थित कल्‍पनाएं मन में सिर न उठातीं, चित्‍त अशांत न बना रहता.. टटोलकर ढलकी हुई गिलास हाथ में ली तब जाकर दामोदर दास को ध्‍यान आया कि आज दूध पीना वह भूला नहीं था.. चाहता तो भी नहीं पी सकता था क्‍योंकि दूध तो संझा के ही किसी वक्‍त जंगले के रास्‍ते भुरई आकर चट कर गई थी. सुराही से अलग गिलास में पानी ढालकर दामोदर दास ने होंठों से लगाया और मन को थोड़ा ठंडा करके परिस्थिति का अध्‍ययन करने लगा. फिल्‍मी कल्‍पनायें उसे सत्‍य तक नहीं पहुंचाएंगी. जीवन पर उसे संयत और समझदार नियंत्रण रखना होगा तभी न केवल वह अपना अपितु हजारी भैया का भी भला कर सकेगा.. यही उनके प्रति सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी. यह भावुकता का नहीं विचारशील बनने का समय है. और भले यह बात सत्‍य हो कि आजतक दामोदर दास ने किसी भी बड़े निजी व सामाजिक जिम्‍मेदारी का वहन नहीं किया, मगर इसीलिए तो यह मौका इतनी बड़ी चुनौती है जिसमें खरा निकलकर वह अपने और हजारी भैया दोनों से उऋण हो सकेगा!

जंगले के चौखटे में रात का सलेटी उजाला था. महामाया जी की छत पर एक छाया डोलती-सी आई और मुंडेर पर खड़ी पेशाब करने लगी. पंडित जी ही होंगे सोचकर दामोदर दास ने नज़रें हटा लीं. कंधे के खालीपन से ध्‍यान गया कि हजारी भैया का हाथ अब फिर कभी हंसते हुए उसपर धौल नहीं जमायेगा, उनकी खुली हंसी फिर कभी दुबारा सुनने को न मिलेगी.. सब एक सुहाने अतीतकाल में दफ़्न हो चुका है.. भविष्‍य सिर्फ रहस्‍य का एक बड़ा अभेद्य पर्दा है.. जिसे हटाने का जिम्‍मा उसके नासमझ कंधों और नौसिखिये कौशल पर है.. क्‍या दामोदर दास उम्र ही नहीं अपने विवेक में भी वयस्‍क हो पायेगा? क्‍या इस जघन्‍य हिंसा की तहों के पार की वा‍स्‍तविकता का वह पर्दाफाश कर सकेगा?..

रात के डेढ़ बजे सेमलगंज के बियाबानी सन्‍नाटे में दामोदर दास एक हत्‍या की गुत्‍थी सुलझाने की मानसिक तैयारी करता रहा.. अलग-अलग योजनाएं बनाता रहा..

(जारी..)

3 comments:

  1. सही शुरुआत है..मगर दो रोटी खाकर ही उठा दिया आपने.. एक रोटी तो और खा ही सकता था.. अगली बार तीन से कम का माल मत परोसियेगा..

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  2. स्टाइल कुछ ज़्यादा ही वेद प्रकाश शर्मा टाइप लग रही है. देखते हैं आगे-आगे होता है क्या.

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  3. दुबारा गौर से पढ़ा. लगता है आगे चलकर कुछ बात बनेगी.

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