Wednesday, April 11, 2007

शर्मिला, सोहा और अपर्णा

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: उन्‍तीस

बड़े सेट का ताम-झाम था. उत्‍पल दा रिहर्सल कर रहे थे. बीच-बीच में ऑफस्‍टेज बिजली कड़कती या किले के बुर्ज़ पर खड़े सिपाही के मुनादी की आवाज़ आती. मगर बीस-पच्‍चीस लोगों की बड़ी कास्‍ट में अभिनेतागण अपनी रटी हुई लाइनें दोहरा लेने से ज्‍यादा फ़ोकस नहीं हो पा रहे थे. लाइनें कहते ही भागकर गलियारे में जाते, फुसफुसाकर स्‍कोर पता करते. कोई अंतर्राष्‍ट्रीय फुटबॉल या क्रिकेट मैच चल रहा था. एक पतली-दुबली लड़की सीन में कम अपने सेल फोन में ज्‍यादा फंसी थी. शायद जिस लड़के के साथ सीन चल रहा था वह अपने एंड पर कहानी का पटाक्षेप कर रहा था और लड़की विश्‍वास नहीं कर पा रही थी. डिबेट और मॉडरेशन से प्रेमकथा का अभी भी एक्‍सटेंशन चाहती थी. रो रही थी कि उसके जीवन में अब तक सब उसी के वजह से हुआ है और अब इस तरह बीच मंझधार में वह उसे अकेला छोड़कर नहीं जा सकता. जबकि लड़का ऑलरेडी जा चुका था. उत्‍पल दा उत्‍साही दिखने की पूरी कोशिश कर रहे थे मगर ज़ाहिर था थके हुए हैं. ट्रिपल फाईव का तीसरा पैक खत्‍म होने व सीन के चौथी दबा गड़बड़ होने पर उन्‍होंने हारकर हाथ खड़े कर दिये- हे प्रोभु, आर होच्‍छे ना! उठिये नाव एबार!

अगली सीटों पर बैठी शर्मिला ठाकुर भावुक होकर समझाने लगी ऐसा नहीं सोचते, उत्‍पल दा. अभी आपको बहुत कुछ करना है. बंगाल से बाहर देश को रास्‍ता दिखाना है! दो पंक्ति पीछे बैठी अपर्णा इस विमर्श में पीछे छूट जाना नहीं चाहती थी, उत्‍तेजित होकर बोली- और शंभु दा? शंभु दा कुछ नहीं! उन्‍होंने देश और बंगाल के लिए कुछ नहीं किया? आर आमार बाबा चिदोनोंद, ओ कि किछु कोरेन नी?..

शर्मिला एक क्षेत्रीय और अब लगभग आऊट ऑफ वर्क एक्‍ट्रेस के साथ उलझकर अपनी नज़रों में गिरना नहीं चाहती थी, चुप रही. मतलब अपर्णा को और जलाती रही. सोहा मां के कंधे पर झुककर फुसफुसाई- ममा, हू केयर्स ऑफ ऑल दीज़? व्‍हाई यू आर स्‍पोयलिंग यूअर डे?

ममा बेटी के गाल पर पप्‍पी जड़कर बोली- डार्लिंग, इसलिए कहती हूं टेक सम आवर्स ऑफ एंड वॉच वन ऑफ दीज़ डेज़ ‘देवी’ एंड ‘ओपुर संसार’, उनको देखती तो अपने हेरिटेज के बारे में ऐसे इरेस्‍पोंसिबली कमेंट नहीं करती!

सोहा ने मुंह बनाकर ममा को देखा फिर ओल्‍ड क्राउड की तरफ देखकर डिप्रेस होने लगी. कोने में झोला और दाढ़ी लिये एक खूबसूरत नौजवान था लेकिन सोहा और उसकी पीढ़ी की ऐसे भावुक नौजवानों में अब दिलचस्‍पी नहीं थी (जो अब भी रिल्‍के की कविताओं और मोदिल्यानी की पेंटिग्‍स से ऊपर नहीं उठ पा रहे थे). खूबसुरत नौजवान को फिलहाल एक बदसुरत बूढ़ा हाथ में अद्धा और होंठों में बीड़ी फंसाये फंडा दे रहा था. नौजवान शिष्‍यवत जिम्‍मेदारी से ले भी रहा था. बूढ़े (ऋत्विक) ने बीड़ी का गहरा सुट्टा खींचकर कहा- बीस वर्ष बाद मेरी फिल्‍म देखेगा कोई? विल देयर बी स्टिल प्रोजेक्‍शंस ऑव ‘नागरिक’, ‘कोमल गांधार’ एंड ‘सुबोर्नोरेखा’? आई डोंट नो, डियार. आई एम नॉट श्‍युआर एबेन ऑव बुनुएल एंड फ्रिट्ज़ लांग छोबि गुलो! एइ बिश्‍शो टा जेइ रोकोम चोलिछे, काहादेर सोंबेदना एइ रोकोमेर छोबि गुलो चाइबे, बलो तुमि? वी आर हेडिंग फॉर द सिभिलाइजेशान ऑव वल्‍चर्स! लिखे नाव, इट्स द एंड ऑव द वर्ल्‍ड!..

इस ऊब से निकलकर बाहर तंग बालकनी में आकर सोहा ने ममा से छिपाकर एक सिगरेट सुलगा ली. खड़ी बागबाज़ार स्‍ट्रीट की आवाजाही देखने लगी. गंदगी और प्‍लास्‍तर उखड़े, काई लगे दीवारों को देखकर लग रहा था यह वास्‍तविक सड़क नहीं मीरा नायर के ‘द नेमसेक’ का पेंटेड सेट है. बाहर भी कोई हवा नहीं, सिडनी और ऑस्‍ट्रेलिया जैसी फीलिंग नहीं. हाऊ द हेल दीस प्‍लेस इज़ गोइंग टू सरवाइब? एम आई रियली सपोस्‍ड टू फील बैड ऑफ ऑल दीज़? एम आई रियली रिलेटेड टू दीज़ शिट ऑफ अ प्‍लेस? कैन इट बी पॉसिबल?..

सामनेवाले सलेटी मकान के बाहर धीरे-धीरे गाडियों की संख्‍या बढ़ रही थी. अंदर ‘गुरुदेव’ (मिथुन दा) की आदमकद तस्‍वीर पर फूल-मालाओं की सजावट के बाजू में खड़ा ग्रेटबोंग उपस्थित जनसमूह का ज्ञानवर्द्धन करता बता रहा था कि कैसे आज ब्‍लॉग-लेखन पत्रिका और अख़बारी लेखन को पीछे छोड़ चुका है. सुनील गोंगोपाध्‍याय जैसे पॉपुलर राईटर को भी अपने लिखे पर उतनी प्रतिक्रियाएं नहीं मिलतीं जितना मेरे एक पोस्‍ट पर रियेक्‍शन का ट्रैफिक रहता है!

मैं सोहा को कहना चाह रहा था कि लेट इट बी क्लियर दैड आई डोंट फील एनी इंटरेस्‍ट इन गर्ल्‍स लाइक हर. लेकिन वह सुनने की बजाय अपने सेल फोन में लगी हुई थी. शायद मैं अपनी बात ठीक-ठीक तक उस तक पहुंचा नहीं पा रहा था. या शायद मैं बागबाज़ार की उस बालकनी पर था ही नहीं. सब महज़ एक सपना था. हां, ऐसा ही कुछ रहा होगा क्‍योंकि होश लौटते मुझे अपने कानों पर झुके किसी महिला स्‍वर की फुसफुसाहट सुनाई दी- काली कॉफ़ी पियोगे?..

.. और एक झटके में मेरी आंखें खुल गईं.

(जारी...)

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