Tuesday, April 17, 2007

कहां-कहां से गुज़र गया..

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: बत्‍तीस

बुज़ुर्गवार की ओर से मुझे पेट्रनाइज़ करने का माहौल बन ही रहा था कि जांघ और नितंबों पर अनावश्‍यक चर्बी की चिंताओं में रेत पर दौड़ती श्‍वेतबाला टीवी के अंदर से कूदकर बाहर चली आई और बुड्ढे का हाथ खींचकर पता नहीं किस ज़बान में एक दूसरा ही ड्रामा करने लगी- पप्‍पा! वी आर इन ग्रेव डेंजर.. दे हैव एनसर्किल्‍ड द हाउस! वी मस्‍ट लीव इम्मिडियेटली..!

बुज़ुर्गवार बिकिनी और जांघिया बाला के हाथ में हाथ फंसाये भागकर ऊंची फ्रेंच खिड़की तक गए जहां से नीचे दो एकड़ के आलीशान बागीचे की झांकी दिखती थी. तीन सौ तेरह प्रकार के वनस्‍पति व पुराने संगमरमर के एंजेल व अप्‍सराएं दिखती थीं. फ़ि‍लहाल सबके ऊपर धुआं उड़ रहा था और भारी टैंकों की गड़गड़ाहट गूंज रही थी. सदाशयी बुज़ुर्गवार ने चर्बी चढ़ रहे बेटी के गालों को स्‍नेहवत चूमा और फुसफुसाकर अपनी मातृभाषा में बोले कि उसे (बेटी) को चिंता करने की ज़रूरत नहीं क्‍योंकि कोई भी उनका (बाप-बेटी का) बाल बांका नहीं कर सकता! मेरे बाल और दूसरे अंगों के बारे में बुड्ढा कोई टिप्‍पणी नहीं कर रहा था, जबकि पांच मिनट पहले तक वह उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के मानवीय मूल्‍यों का बाप व दादा होने की बहुत ही विश्‍वसनीय मार्केटिंग पेले हुए था. मैं उसकी मार्केटिंग के झांसे में फंस भी गया होता अगर बीच में टैंकों की गड़गड़ाहट न गूंजने लगती, बिकिनी व जांघिया बाला ने हमें डिस्‍ट्रैक्‍ट न किया होता! इसके पहले कि हिंदी फिल्‍मों के क्‍लाइमेक्‍स के मानिंद अजीत और बिंदु की तरह बुड्ढा अपनी बेटी के साथ पुलिस की आंखों में धूल झोंककर हमेशा-हमेशा के लिए फ़रार हो जाये, मैं धर्मेद्र व अमिताभ की तरह ठीक उसके सामने कूदकर उसकी मानवीयता के मुंह पर एक घूंसा जड़ना चाहता था.

मगर देह में शर्ट और पैरों में हवाई चप्‍पल चढ़ाते-चढ़ाते देर हो गई. बुड्ढा बेटी के साथ फ़रार हो चुका था और टैंकों के हमले में आलीशान हवेली के परखचे उड़ रहे थे. छत के एक विशालकाय बॉरोक टुकड़े के नीचे आते और मरते-मरते मैं बचा. धुएं और धूल के अंधेरे में बचने के लिए मैं बदहवाशी में इधर-उधर हाथ मारता रहा. एक गोली मुझे छूती सन्‍न-सी एक संगमरमरी शबीह की आंखों में धंस गई. अंधेरे में एक हाथ ने मुझे तेजी से परे खींच लिया और मेरे होंठ किसी के गर्दन के छोटे-छोटे बालों से जा टकराये. छूटते ही पहचानी महक का ख्‍याल हुआ और मुंह से बेसाख्‍ता निकला- रेहाना, तुम ज़ि‍दा हो?..

***

मैंने चहकते हुए खुशी ज़ाहिर की कि अच्‍छा हुआ रेहाना चली आई वर्ना बुड्ढे की शराफ़त में तो मैं बिक ही गया था. रेहाना ने भागते-भागते ख़बर दी कि बुड्ढा सर्बिया का कूख्‍यात बच्‍चों का व्‍यापारी है, अंतर्राष्‍ट्रीय बाज़ार में शारीरिक अंगों का विक्रेता है. बाईस देशों की पुलिस उसे खोज रही है और ज़ि‍न्‍दगी भर खोजती रहेगी क्‍योंकि वह कभी पकड़ में नहीं आएगा. क्‍योंकि उसने सब जगह सबको पैसे देके सेट कर रखा है. जानकर एकदम ताजुब्‍ब नहीं हुआ. जीवन और समाज संबंधी ढेरों ऐसी बातें थीं जिनके बारे में स्‍कूल में पढ़कर भकुओं की तरह मुंह खोल लेता लेकिन अब उन्‍हें जीवन की सामान्‍य अस्तित्‍ववादी पृष्‍ठभूमि मानकर कड़वाहट से स्‍वीकार करना सीख रहा था. हालांकि यह जानकर ताजुब्‍ब ज़रूर हुआ कि रेहाना, मासुमेह, रैडिकल रुरल्‍स के नेटवर्क को किसी तरह की आंच नहीं आई थी; सब अविनाश का दुष्‍प्रचार था जो मूवमेंट फॉर डेमोक्रेसी के आत्‍मघाती दस्‍ते की दो नौजवान लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फांसकर, उनसे बम फोड़वाकर, उनके चंगुल से भाग निकलने में कामयाब हुआ था. रैडिकल रुरल्‍स का इकलौता नुकसान यह हुआ कि दुष्‍ट अपने साथ एक्‍टर इरफान को बंधक बनाकर ले गया जिसका वह हमेशा फैन रहा था और जिसकी क्रांति-विरोधी मदद से अंतर्राष्‍ट्रीय प्रेस में वह उनके ख़ि‍लाफ़ भ्रामक ख़बरें प्‍लांट करता फिर रहा है!

ब्‍लॉगजगत के ढेरों लोगों की तरह अविनाश से नफ़रत तो मैं करने ही लगा था लेकिन यह सब जानकर उसकी (नफ़रत की) मात्रा और बढ़ गई. हालांकि मैं टॉम क्रूज़ से बदसूरत था और रेहाना हाल बैरी से काफी खूबसुरत, फिर भी आग और ध्‍वंस के बैकग्राउंड में मिसन इंपोसिबल के लीड एक्‍टरों की तरह तहख़ानों व सुरंगों से होकर हम काफी देर और दूर तक भागते रहे. लोहे की जाली हटाकर वापस खुली रोशनी में एक ऐसी जगह निकले जहां बेलग्रेड के एक पड़ोसी शहर को पूरी तरह नेस्‍तनाबूद करके एक ताइवानी कंपनी के पैसों से विराट एंटरटेनमेंट पार्क में तब्‍दील किया जा रहा था. शहर की आबादी अभी भी हाशियों पर शरणार्थी शिविरों में टिकी राजनीतिक प्रदर्शन, पैंपलेटियरिंग इत्‍यादि से वापस अपनी ज़मीनें पाने का सपना पाले हुई थी, जबकि पार्क के इंवेस्‍टर ऑलरेडी उन ज़मीनों को डच, जर्मन व भारतीय बिजनेस घरानों को बेच रहे थे. रेहाना ने यह भी बताया कि भारतीय उद्यमी इस एंटरटेनमेंट पार्क में खास दिलचस्‍पी ले रहे हैं. मुंबई की झुग्‍गी-झोप‍ड़ि‍यों में काम करने वाली एनजीओ बालक ने चालीस-चालीस एकड़ के तीन प्‍लॉट खरीद रखे हैं. मैंने दुखी होकर रेहाना से कहा- कौन किस पाले में है यह जानना संसार में इतना मुश्किल क्‍यों हो गया है, प्रिये?

रेहाना एकदम-से नाराज़ हो गई. कहने लगी यहां जान और जीवन के बड़े प्रश्‍नों पर पड़ी है और मैं अभी भी प्रिया-श्रेया का खेल खेल रहा हूं! चिढ़कर आगे उसने ये भी कहा कि उसके पीठ पीछे मैं सोनाली-रुपाली के कैसे खेल खेलता रहा हूं यह भी वह बखूबी जानती है. इससे पहले कि वह और अग्रेसिव हो, मैंने ज्‍यादा अग्रेसिव होकर बचाव वाली तकनीक का सहारा लिया, फर्राटे से फ्रेंच बोलने लगा- हाऊ डेयर यू टॉक टू मी लाइक दिस? मुझपर तरस खाने की बजाय कि कैसे मैंने विरह का इतना समय गुज़ारा तुम गॉसिप कॉलम्‍स के अफवाहों का यकीन करने लगी हो! रुपाली हू?..

सामने खूले मैंदानों में भीमकाय जायंट मशीनें विध्‍वंस मचाये थीं, और यहां टीले पर छाती पर हाथ बांधे रूठी नायिका मुझसे तीन कदम की दूरी मेंटेन किये तप्‍त खड़ी थी.. तप्‍त मैं भी हो रहा था मगर निहायत दूसरे कारणों से..

(जारी...)

1 comment:

  1. जी आप जहां जहां से भी गुजरे... खूब गुजरे... कभी हमारे ब्लाग से हो कर भी गुजरिये ना...
    हो सके तो एक ऐसी ही बढिया स्टोरी उसके बारे में भी लिखियेगा...
    हा हा

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