Wednesday, April 18, 2007

जात क्‍या है हजारी का राज़ क्‍या है?..

एच की मौत: दो

हजारी भैया का कोई घर नहीं था- पक्‍का, कच्‍चा किसी भी तरह का, और न परिवार जिसके स्‍नेह के ईंधन में वे बम-बम रहते थे.. छिपाकर प्रेयसी या भार्या रखे थे तो दामोदर दास को खबर नहीं थी (होती तो सबसे पहले भागकर वह उन तक इस मर्मांतक सूचना के साथ पहुंचता).. बातचीत में कभी घर-परिवार की चर्चा निकल आती तो भैया सीधे जवाब देने की बजाय हंसी की आड़ी-तिरछी गलियों में घुस जाते.. जोर-जोर से हंसते हुए कहते- चूतड़ के नीचे पक्‍की नौकरी दाबकर हमारा मज़ाक उड़ाते हो, पार्टनर? कौन पैसे से घर चलायेंगे और कहां से घरवाली को खिलायेंगे, हां? हा हा हा!.. दामोदर दास ने कहीं पढ़ रखा था बात-बात पर हंसनेवाले अंदर गहरा दु:ख छिपाये होते हैं. शायद हजारी भैया को देखकर ही लिखनेवाले ने यह बात लिखी थी. माथे के पीछे हाथ डाले, आंखें मूंदे कहीं सोचते पड़े हों या एकांत में विचार में गहरे डूबे चहलकदमी कर रहे हों, किसी के सामने पड़ते ही हो-हो करके हंसने लगते, मानो सामनेवाले व्‍यक्ति पर किसी भी सूरत में अपनी चिंता की छाया पड़ने देना न चाहते हों! एक बार दामोदर दास के कोंचने पर गंभीर हो गए, माथे पर हाथ बजाते हुए बोले- मेरा घर देखना चाहते हो? ठीक है, बेटा, तो वही कोने में धरा हुआ है मेरा घर.. नज़र की आरती उतार लो और संतोष करो!..

कोने में खटिये की पाटी पर खादी भंडार का चिमरख झोला पड़ा था जिसमें भैया का एक जोड़ी कुर्ता-पैजामा, एकाध किताब, कागज़-पत्‍तर और कुछ अटरम-सटरम पड़ा होता. दामोदर दास झींककर नाराज़ होता और हजारी भैया अपनी हो-हो वाली रेकॅर्ड छेड़ देते. नाम के बारे में भी यही राज़दारी बनाये रहते. सामनेवाला आदमी पूछता हजारी क्‍या? पंडित, परसाद, पांड़े, उपाध्‍याय आगे-पीछे कुछ बोलियेगा कि ऐसे ही अंजाद करते रहें? भैया मुस्‍कराकर जवाब देते बाभन, कुर्मी, भूमिहार, अहीर, डोम, दुसाध सबका मेल है तब न हजारी हुए हैं, महाराज! और हो-हो की हंसी में पूछवैया की जिरह तेल हो जाती. सवालिया ज्‍यादा बेचैन आत्‍मा होता तो भैया उसे शास्‍त्रीय तरीके से वर्तमान समय में राजनीतिक दलों के वोट बैंक से अलग जातीय पहचान की व्‍यर्थता समझाने लगते. और तब तक समझाते रहते जब तक आदमी हार मानकर अपना रास्‍ता नहीं नाप लेता..

यही बात दामोदर दास ने मरियाडीह थाना प्रभारी सुबाचन यादव से कही. कि भले हजारी भैया खादी भंडार के एक चिमरख झोले और हवाई चप्‍पल में घूमते रहे हों, यथार्थ में वे जानकारी का खज़ाना थे, कभी न खत्‍म होने वाला भंडारण थे!

रात में डोला मंडी से निकलते हुए सुबाचन यादव के यामहा 100 का आगेवाला चक्‍का पंचर हो गया था. जो सिपाही मरम्‍मत कराने ले गया था उसकी अभी तक खबर नहीं थी. डेरे पर पत्‍नी चार महीने के पेट से थी. दीवार का सहारा लेकर बात-बात में ऐसे दर्दभरी आह भरती कि थानेदार बाबू को असमंजस होता इतनी तकलीफ़ है तो यह मैका काहे नहीं जा रही, और न ही सास को सेमलगंज आने देने पर राजी होती थी. रात-बिरात उनके कंधे और पेट पर माथा रखकर ऊह-आह का गाना छेड़ देती और सुबाचन उनींदे अंधेरे में दवाई की इस और उस पु‍ड़ि‍या को खोजते पानी का गिलास लिये बीवी की मुरव्‍वत में पांच घंटे की नींद खराब करते. भोर में आंख लगी ही थी कि दूधवाले ने दरवाजा बजा के उठा दिया. दूध गरम करके और गंजी, जांघिया, दो पेटीकोट और साड़ी धोके भागे-भागे उधारी की साइकिल से थाना आये तो थाना पहुंचते ही एक बकरी के मालिकनामे को लेकर पौन घंटे की हुज्‍जत में फंसे रहे. मामला सुलझने की बजाय जब और उलझता गया तो वादी-प्रतिवादी दोनों को सुबाचन ने मां-बहन सुनाकर थाना से बाहर किया और गफूर को हुक्‍म दिया कि बकरी को आंगन के अमरूद के गाछ से बांध दे. और अभी ठीक से पंखा के नीचे पसीना सूखा भी नहीं था कि बिजली चली गई और सामने बैठे संजय गांधी इंटरमीडियेट कालेज के डी दास उनके साथ कौन बनेगा करोड़पति का बुझव्‍वल वाला खेल खेल रहे हैं. और ऐसी उमस, सड़ी हुई गर्मी में थक भी नहीं रहे हैं! कभी-कभी सुबाचन यादव को लगता उनसे भारी गलती हो गई जो पैरवी करवाकर, हाथ-गोड़ जोड़के मरियाडीह में अपना ट्रांसफर नहीं रुकवाया. इस तरह की जगह में कितने समय चलायेंगे, कैसे चलायेंगे? मरियाडीह में बच्‍चे का बाप बनेंगे?- सोचते ही थाना प्रभारी को बेचैनी होने लगी. एक दिन पुराने दैनिक जागरण से गाल पर हवा करते हुए बोले- जानकारी का खजाना थे इसलिए ये जो हजारी हैं इनकी हत्‍या कर दी गई?..

दामोदर दास अपलक देखता रहा. कहा कुछ नहीं, चुपचाप मुंडी हिलाई.

(जारी..)

4 comments:

  1. येही सुबचना किए होगा मड्डर..इतना सब टेन्सन में फ़्र्स्टॆट हो के और दूसर कोई उपयुक्त पात्र मिला नाही ओके.. त आगे नाथ ना पाछे पगहा हजारी क माड्डालिस..हम आपका किलाइमेक्स ओपेन तो नहीं कर दिये हा हा हा..

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  2. बेहतरीन. अक्सर पढ़ता हूँ, प्रमोद जी आपका कल्पना संसार काफ़ी बड़ा है. बिना वास्तविक अनुभव के कल्पना भी नहीं की जा सकती, आपका अनुभव संसार भी बहुत बड़ा जान पड़ता है, उपन्यास लिखने के लिए आप निस्संदेह सुपात्र हैं, पूरा करिए और छपवाइए अच्छे प्रकाशक से. हम एक हल्ले में पूरा पढेंगे, हिंदी का पहला जासूसी ब्लॉग उपन्यास. साधुवाद

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  3. भाई अनामदास, चढ़ाइये नहीं. सुपात्रता का चित्र खिंचते ही घिग्‍घी बंधने लगती है, और गड़ही-भर के अनुभव संसार में दम फूलने लगता है.. जासूसी है, धीमे-धीमे धुआं छोड़ रहा हूं, नये साइकिल सिखवैया की तरह कैंची आजमा रहा हूं.. डोलते हुए साइकिल चल निकले, बहुत होगा.. प्रकाशक और अच्‍छा बोलकर हमारा हलक न सुखवाइये.. हालांकि ये जो प्रत्‍यक्षा और आपके बीच फंसे हुए बेनाम बानी हमारा सीक्रेट लीक किये दे रहे हैं, और प्रत्‍यक्षा लो एंगल के क्‍लोज़अप में 'आगे फिर?' की महीन फायरिंग दाग रही है, इच्‍छा हो रही है घबराकर बोल दूं- आगे प्र-ह-स-न!

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