Friday, April 20, 2007

दामोदर दास को गुस्‍सा क्‍यों आता है?

एच की मौत: तीन

थाना प्रभारी ने सुबह से नाश्‍ता नहीं किया था. गोइंठे में भुने शकरकंद और पवना की दूकान की कचौड़ी के बारे में सोच रहे थे. अभी भी पता नहीं कैसा संकोच था कि थाना में सबके सामने अखबार में लिपटी कचौड़ी खोल भंड़ुकी की तरकारी में बोरकर खाते संकोच होता. गफूर या राजनरायन सामने खड़े होकर पूछते जलेबी ले आयें, सर? चार ठो जलेबी ले लीजिये, बड़ा मज़ा आएगा! चाह का आर्डर कर दें? थाना प्रभारी को लगता नाश्‍ते का एक सामान्‍य, निजी काम नहीं कर रहे, बारात की पांत में बैठे भकोस रहे हैं और आजू-बाजू खड़े लोगों का अपनी दलिद्दरई से मनोरंजन कर रहे हैं. पवना की दूकान से परिचित होने पर शुरू के कुछ दिन वे कचौड़ी-जलेबी का यह लाड़-प्‍यार अपनी टेबुल पर मंगवाकर स्‍वाद से धीरे-धीरे कौर भरने की लीला खेलते रहे थे, फिर लगा मातहत उन्‍हें जिम्‍मेदार अधिकारी समझने की बजाय गणेश जी का कलैंडर न समझने लगें तब मन मारकर इस आनंदमयी आयोजन के दरवाज़े भेंड़ दिये. कोशिश करते कि चुप्‍पे यामहा एक्‍सएल 100 निकाल दस‍ मिनट के लिए थाना से गायब होकर पवना की दूकान का एक चक्‍कर लगा आयें, प्रेमभाव से जीमें, फिर संतुष्‍ट होकर टेबुल पर पुराने खड़ख‍ड़ि‍या फोन से मरियाडीह की माया संभालें. मज़ाक नहीं हक़ीकत था. बहुत बार सच्‍चो में लगता आपराधिक मामला नहीं सत्‍यनरायन की कथा बांच रहे हैं. अभीतक सत्‍यनरायन की जिज्ञासावर्द्धक कथा ही सुन रहे थे वाली नज़र से सुबाचन यादव ने दामोदर दास को देखा. बोले- किसी से खतरा है, भय होता है ऐसा कोई जिक्र किये थे?

दामोदर दास मासूमियत से समझाने लगे कैसे चूहा, सांप और छिपकिलियों से हजारी भैया की रूह कांपती थी. कितने भी ज़रूरी काम में बझे हों, कमरे में चूहा घुस आये तो कैसी हाय-हाय मच जाती थी. जहांतक प्रश्‍न के दूसरे पहलू- खतरे- की बात है तो वह हिंदी में पुरातनपंथी विचारों को सबसे बड़ा खतरा बताते थे. दुखी होकर कहते एक दिन यही हिंदी की हत्‍या की वजह बनेगा!

थाना प्रभारी सुबाचन यादव भूखे पेट उदास हो गए- मास्‍साब, किसकी हत्‍या हुई है? हिंदी की हुई है कि आपके ये हजारी भैया मारे गए हैं?

दामोदर दास हतप्रभ थाना प्रभारी को देखता रहा- इतनी सामान्‍य-सी बात इन्‍हें समझ नहीं आती! हजारी और हिंदी कोई एक-दूसरे से अलग थोड़ी हैं? मगर इस बात का जो सच्‍चा प्रमाण होता उस असल सबूत (किताब की पांडुलिपि) के गायब होने की सूरत में ही तो वह मरियाडीह थाने की शरण में आया है, एक उलझे व जटिल सामाजिक विमर्श में उतरने का जो‍ख़ि‍म मोल ले रहा है. कॉलेज के तथाकथित शिक्षित समुदाय तक में सही-सही इतिहास व भाषा-बोध नहीं, वहां एक गंवार थाने के गंवार पुलिस अधिकारी से इस उपेक्षा से अलग वह क्‍या अपेक्षा कर सकता है कि वह, हिंदी, हजारी भैया सब उनकी नज़रों में एक अबुझ प्रहसन व पहेली से ज्‍यादा महत्‍व न रखें! दामोदर दास को अचानक मरियाडीह थाने में लालबहादुर व राजीव गांधी की मढ़ी हुई तस्‍वीरों के संरक्षण में हिलते पायोंवाली कुर्सी पर बैठे भारी अकेलापन महसूस हुआ. थाना प्रभारी का कसूर नहीं, हिंदी व हजारी भैया प्रकरण में दामोदर दास सिर्फ और सिर्फ उपहास व हंसी का पात्र ही बन सकता है, एक गंवार थाने के गंवार सब-इंस्‍पेक्‍टर के पास उसके औज़ार ही नहीं कि वह ऐसी गुत्‍थी अपने हाथ में लेकर सुलझा सके. समाज ने उसे ऐसा संस्‍कार और उचित शिक्षा नहीं दी है. यहां बैठा हुआ मैं क्‍यों अपना मज़ाक बना रहा हूं? समाज व साहित्‍य का अमूल्‍य समय गंवा रहा हूं?- थाना प्रभारी ही नहीं अपनी नज़रों में भी दामोदर दास ग्‍लानि उत्‍पन्‍न करने लगा. क्षमा मांगकर उठने की सोचने लगा तभी थानेदार साहब ने सवाल किया- आप विवाहित हैं?..

चौंककर उन्‍हें देखा. इंस्‍पेक्‍टर साहब उससे इस तरह का अप्रासंगिक सवाल क्‍यों पूछ रहे हैं? इंस्‍पेक्‍टर साहब के लिए अप्रासंगिक नहीं था. अपने अंतर्मन में वे हिंदी व हजारी से दूर एक बार फिर अपनी घरेलू चिंताओं में बहक गए थे. आंखों में पत्‍नी का बढ़ता पेट तैर रहा था. व्‍याह के बाद बच्‍चे के बारे में पूछते, उसके आगे मास्‍टर से यह जानने का इरादा रखते थे कि डेलीवरी के लिए सेमलगंज सरकारी अस्‍पताल वाजिब जगह है या नहीं. मरीज को जीप में लादकर अस्‍सी किलोमीटर दूर भभैंया मटेर्निटी वार्ड तक ले जाने का ख्‍याल उन्‍हें बहुत उत्‍साहित नहीं करता. फिर बीच-बीच में सोचते यह सब अकेले उनसे सपरने का नहीं, कहां और कितना संभालेंगे; तुलसी को अच्‍छा लगे चाहे बुरा, बेहतर हो लालमोहन को भेजकर अम्‍मां को यहीं बुलवा लें. दिमाग में और वृहताकार तस्‍वीरें बनतीं मगर दामोदर दास के जवाब ने उनकी सोच का क्रम भंग कर दिया.

सिर झुकाकर दामोदर दास ने कहा- नहीं. उस शुभ मुहूर्त के पहले ही ऐसा जघन्‍य कांड हो गया?

मन ही मन दामोदर दास ने तय किया हजारी भैया की लिखी एक-एक पुर्जी, कागज़ का एक-एक टुकड़ा संजोकर वही संधान में निकलेगा. सूराग खोजेगा, सत्‍य तक पहुंचेगा, इस तरह समय व्‍यर्थ करने का कोई औचित्‍य नहीं.

थाना प्रभारी सुबाचन यादव कुछ और सोच रहे थे. कुछ और सोचते हुए माचिस की तीली से (जबकि दांत में कुछ था नहीं) दांत खोद रहे थे.

(जारी..)

2 comments:

  1. अब ये चलते फिरते प्रेत की फोटो काहे डाल दी ? आगे कोई वेताल नुमा किस्सा बढेगा क्या ? या फिर ऑनरेबल स्कूल्ब्याय टाईप , मानसिक जासूसी ?

    ReplyDelete
  2. यह अच्‍छी बात नहीं है, भई.. कोई सुबाचन यादव का सीक्रेट खोल रहा है.. आप जानर स्‍पेसीफाइ करवाय ले रहे हो.. जासूसी को एकदम एनिड ब्‍लाइटन के लेवल पर उतार लायें, अच्‍छा नहीं है.. चलते-फिरते प्रेत की फोटो डाली है तो निश्‍चय ही कोई मतलब होगा.. बड़ा प्रतीकात्‍मक मतलब होगा.. दिमाग लड़ाइये तो समझेंगी.. मैं भी समझने की कोशिश कर रहा हूं..

    ReplyDelete