Saturday, April 21, 2007

अप्रगतिशील कैंप में ज़हरीली घुसपैठ

अविनाशी शोले

चूंकि वृहत हिंदी ब्‍लॉगजगत (माने साढ़े पांच ब्‍लॉग) ने हिंदी फिल्‍मों के क्‍लाइमैक्‍स की तरह ‘शैतान’, ‘पाजी’, ‘कुत्‍ता कुमार’, ‘मिस्‍टर ज़हरीले’ का नगाड़ा पीट-पीटकर मोहल्‍ले के जंगली जानवर को उसके जंगले से बाहर खींच उसका पर्दाफाश कर दिया है, और आखिरकार अविनाश को अमरीश पुरी की श्रेणी में ला पटका है- तो अमरीश जी के पदचिन्‍हों पर चलते हुए स्‍वाभाविक हो जाता है कि अविनाश जंगले से कूदकर पहाड़ की तरफ भागें (शायद पहाड़ में पुलिस स्‍टेशन कम हैं, या शायद वहां अमरीशों को अविनाशिता का वर प्राप्‍त है- जो भी वजह हो, देखा यही गया है कि सुभाष घई का उटपटांगी खेल हो या श्‍याम बाबू की सामाजिक चेतना व कला व जाने और क्‍या-क्‍या से ओत-प्रोत- ‘निशांत’- विलेन अंत में नगाड़ों के शोर से कान बचाता हुआ पहाड़ की तरफ ही भागता है). इस तरह सांकेतिक अर्थों में कुत्‍ता पुकारे जाने की सार्थकता भी सिद्ध होती, मगर अविनाश ने सबकी (साढ़े पांच ब्‍लॉगों की) उम्‍मीदों पर पानी फेरते हुए, जैसाकि उनका दो महीने का पुराना इतिहास रहा है, बजटाभाव के बहाने की आड़ में पहाड़ जाने से कतरा गए, और उपद्रवी मॉब के रोश से बचने के लिए जाकर बाथरुम में छिप गए! और जैसाकि बाथरुम के तंग संकरेपने में होना था, हुआ. गुस्‍से- और गुस्‍से से ज्‍यादा गर्मी से उबलने लगे! चूंकि इस उबाल को शब्‍दों में व्‍यक्‍त करना उनकी स्‍वभावगत (व हिडेन एजेंडे की) मजबूरी है उन्‍होंने सीधे-सीधे ‘मुसलमान’, ‘स्‍त्री’ या ‘ओबीसी’ पर साथी, जुझारु व क्रांतिकारी सहकर्मी से पांच सौ शब्‍दों का लेख लिखवाने की बजाय सूत्र रूप में कविता रच डाली और साहित्यिक मासूम मनोभाव बनाये चुपके से हमारे यहां प्‍लांट कर गए. यह तो हमारी किस्‍मत कहिये कि हमने केवल सूत्रों ही नहीं हिडेन एजेंडे पर भी कुछ डॉक्‍यूमेंटरीज़ देख रखी हैं, हमने कविता देखते ही सूत्र और हिडेन एजेंडा दोनों पहचान लिया! आप भी पहचान लें और उसे साहित्‍य की गलतफहमी में न पढ़कर उसके वांछित अंदेशों में ही पढ़ें और समाज (माने हिंदी के वृहद सैकड़ा ब्‍लॉग) को सावधान किये रखें!


छै चार तीन दो एक पांच
स स स सात सात सात
ल ल ल ला म म म मु
ह ह ह हा हे हे हे हे हो
बारा तेरा ग्‍यारा समाज
गौर करने की बात है ‘समाज’ से अलग यहां सब सूत्रबद्ध है! ध्‍यान दीजिये ‘स’ और ‘म’ का कवि ने कितनी दफे इस्‍तेमाल किया है. वे निर्दोष ‘स’ व ‘म’ नहीं हैं जैसा मैं भी अपनी मासूमियत में गच्‍चा खाकर पहले समझने की भूल कर बैठा था. स ‘स्‍त्री! स्‍त्री!! स्‍त्री!!!’ है जैसे म ‘मुसलमान! मुसलमान!! मुसलमान!!!’ है! ठीक नाक और आंख के नीचे देखिये कैसा शैतानी गोरखधंधा फैला हुआ है और हम एजेंडा पहचानने से चूकते रहे.

कृपया टिप्‍पणी करने से बचिये. क्‍योंकि आपकी टिप्‍पणी इस हिडेन एजेंडे को प्रोत्‍साहन देने के ही काम आएगी. फिर भी आप टिपियाने से बाज नहीं आए तो हम यही समझेंगे कि आपको आग से खेलने का विशेष शौक है, और आपकी फेवरेट फिल्‍म ‘शोले’ है. मित्र विनयबिहारी ने गुप्‍त रूप से हिडेन एजेंडे का खुलासा किया है मगर आप उसे गुप्‍त ही रहने दीजिये. क्‍योंकि जान जाइएगा, शोलों का भड़कना बंद हो जाएगा फिर मज़ा किर्र हो जाएगा, बड़ी उदासी छा जाएगी.

4 comments:

  1. हा, हा, हा, हा, हा.

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  2. स और ह की पोल तो खुल गई .. पर ये ल और ह का भेद क्या है.. इसे भी खोलिये..

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  3. अरे?.. अभय.. ऐसे कहीं?.. सार्वजनिक रूप से?.. देह हिलगाइये!.. अब कान बढ़ाइये!.. (फुस.. फुस.. फुस..) अब ल और ह बुझाया? खेल समझ में आया?..

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  4. बढ़िया फ़िल्म थी

    शोले. :)

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