Sunday, April 22, 2007

संभावनाओं की हत्‍या

एच की मौत: चार

थाना प्रभारी सुबाचन यादव सोच रहे थे उनकी पत्‍नी समझदार और बच्‍चा बड़ा हो गया है. बच्‍चे के चेहरे की आभा को देखते हुए वैसा ही अनुकूल नाम चुना है उन्‍होंने- विवेक! पिता की गोद में चार साल का विवेक देह पर महंगा जाकिट और माथे पर ऊनी टोपा डाले जिज्ञासु दृष्टि से चौतरफा सौंदर्य का अवलोकन कर रहा है. कंधे पर कश्‍मीरी शॉल और हाथ में विवेक के दूध का फ्लास्‍क लिए पत्‍नी मुदित मन साथ चल रही है. सुबाचन सुखी हैं परिवार पहाड़ घुमने आया है. परिवार में पहले व्‍यक्ति हैं जो प्रदेश से बाहर निकला है. किसी काम-काज व रिश्‍तेदारी के संबंध में नहीं पर्यटन हेतु यात्रा कर रहा है. पर्यटन उद्योग से जुड़ गया है. सैकड़ों वर्षों के पददोलन के उपरांत क्रमश: स्थिति बदल रही है. और इसे परिवार और बिरादरी में उन्‍होंने कर दिखाया है. इसकी उन्‍हें प्रसन्‍नता है. गर्व है. उनका बेटा दो कदम और आगे जाएगा. दो क्‍यों बीस कदम आगे जाएगा! अध्‍ययन के लिए पहले दिल्‍ली फिर विदेश जाएगा. डाक्‍टरी और फिर जाने क्‍या-क्‍या की पढ़ाई करेगा. विवेक के मुंह से ज्ञान व तकनीक के ढेरों शब्‍द वे पहली दफा सुनेंगे और ताजुब्‍ब करेंगे कि संसार में शिक्षा के साथ कितना कुछ संभव है. हर्षातिरेक से तर सुबाचन यादव ने गोद में उनींदे बेटे का गाल चूम लिया. बेटे ने कुनमुनाकर बंधन से निकलने की छटपटाहट दिखाई. थाना प्रभारी चिंतित हुए- क्‍या परेशानी है? विवेक ने शांत स्‍वर के सुलझेपन में जवाब दिया- पप्‍पा, मुझे नीचे उतारो! मैं गोद की सुरक्षा में नहीं अपने पैरों के स्‍वावालंबन पर चलना चाहता हूं! बच्‍चे के जवाब से थाना प्रभारी का गला भर आया. भरी हुई अवस्‍था में ही था जब उन्‍हें संजय गांधी इंटरमीडियेट कॉलेज के मास्‍टर को अपनी कुर्सी में व्‍यग्र व उद्वेलित अवस्‍था में कसमसाते देखने का ध्‍यान हुआ. और बेख्‍याली में माचिस की तीली से मसूड़े के अवांछित स्‍थल को घायल करके एकदम-से सुबाचन यादव यथार्थ में लौटे. किंचित अप्रसन्‍नता से मसूड़े पर जीभ फिराते हुए बोले- जघन्‍य है जो है इसका वास्‍तविक प्रमाण कहां है, मास्‍साब? सब अनुमान, संभावना के दायरे में है. फिर आप हिंदी और हजारी जी को मिला रहे हैं. फिर एक्‍चुअल लाश है कहां? जब तक एक्‍चुअल बाडी नहीं मिलती एक्‍चुअल में केस नहीं बनता- आप समझ रहे हैं क्‍या कह रहा हूं?..

नहीं. दामोदर दास समझ नहीं रहा था. वह अब एक्‍चुअल में सुन भी नहीं रहा था.

थाना प्रभारी फिर माचिस की डिब्‍बी खोल तीलियों से छेड़छाड़ करने लगे- मुझे लगता है बिना भावुक हुए अभी भी पूरे मसले पर विचार करने की ज़रूरत है. हो सकता है हमेशा की तरह, जैसा आप खुद कह रहे थे- हजारी जी बनारस, इलाहाबाद, उज्‍ज‍यनि कहीं की यात्रा पर निकल गए हों और एक्‍चुअल में जो है कांड जैसा कोई कांड हुआ ही न हो!.. नहीं, आप बुरा मत मानिये, मैं ऐसे ही एक संभावना सजेस्‍ट कर रहा हूं. एक पॉसिबिलिटी हो सकती है, नहीं?..

सुबह से भूखे पेट थाना प्रभारी सुबाचन यादव थे लेकिन झुंझलाहट दामोदर दास को हो रही थी. कुर्सी से उठते हुए चिढ़े स्‍वर में कहा- एक क्‍यों सब संभावनाएं खुली हुई हैं. हिंदी एक दमित जाति की मार्मिक ज़बान हो सकती है, पुस्‍तकों की बिक्री में एक क्रांतिकारी उछाल आ सकता है मगर यह भी संभव है हिंदी रसातल में चली जाये. दुनिया की सारी तकनीकी क्रांति उसकी रक्षा न कर सके और एक भाषा का अंत हो जाये. यही सब तो सवाल थे जिसकी हजारी भैया ने अपनी पुस्‍तक में परीक्षा की थी.. मगर थानेदार साहब, उलझा प्रसंग है, समझ सकता हूं आप नहीं समझेंगे. आप सबूत और दरयाफ्त‍गी की भाषा बोलते हैं.. जबकि हजारी भैया इतिहास और राजनीति की पड़ताल में लगे थे. दो अलग-अलग धुरियों पर खड़े हैं आप लोग.. खड़े थे मेरा मतलब.. हजारी भैया..

- मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है, मास्‍साब, मगर...

- आप गलत समझ रहे हैं. मैं यहां दृश्‍य में हूं ही नहीं. मैं तो साधन मात्र हूं.., तुनककर दामोदर दास ने कहा- हमदर्दी तो आपको हिंदी से होनी चाहिये, जिसका वध हुआ है, जिसकी हजारी भैया पड़ताल में जुटे थे.. लेकिन आप उतना भी कष्‍ट न करें. मरियाडीह में और आपराधिक मामले हैं, आप उन्‍हीं पर ध्‍यान दें.. और यह जो जघन्‍य कांड हुआ है.. जो आपकी नज़र में अभी वास्‍तविकता भी नहीं मात्र संभावना, पासिबिलिटी और एक विचार भर है उसका मैं अनुसंधान करता हूं. काम के कुछ तथ्‍य हाथ लगे तो फिर लौटकर आपके पास आऊंगा.. हमारी मुलाकात होगी.. तब तक के लिए नमस्‍कार!- इतना कहकर थानेदार बाबू के जवाब की प्रतीक्षा किये बिना दामोदर दास तेज कदमों से कमरे से बाहर निकल आया. सुबाचन यादव थोड़ी देर तक असमंजस में रहे फिर नाराज़ होने लगे. दामोदर दास पर नहीं अपनी पत्‍नी पर हो रहे थे. कि बेवकूफ औरत मां के यहां बुलाये जाने पर राजी क्‍यों नहीं हो रही थी.

(जारी..)

1 comment:

  1. शायद अपने छोटे बच्चे को देखकर बाप सुवाचन यादव की तरह ही महसूस करते होंगे. दुनिया के बापों सावधान तुम्हारी पोल खुल रही है.

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