Monday, April 23, 2007

ज़माने की बेवफ़ाइयां और कुली नंबर वन की एंट्री

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: चौंतीस

नीचे टेंट के सामने कटिंग पी रहे इंडियन से गप्‍प लड़ाओ तब तक दुनिया के महान कार्य करके आती हूं कह के मनमोहिनी ईरानी ड्रीमगर्ल नहीं आने के लिए चली गईं! मैंने धूल में बनायी अपने दिल में धंसी तीर के गैर-महान स्‍केच को वापस धूल में मिला दिया और झींकने लगा. यह सब क्‍या होता रहता है मेरे साथ और क्‍यों होता रहता है! अविनाश मोहन राकेश के स्‍तर के चरित्र अभिनीत कर रहा है, अभय तिवारी चे ग्‍वेवारा और श्री अरविंद के बीच सेतु बन रहे हैं, रवीश कुमार मोतिहारी से मैक्सिको सिटी के बीच पता नहीं कितनी पूंजी इधर से उधर से इधर कर रहे हैं, और रेहाना रानी नारी के सभी प्रचलित, घिसे रूपों को झुठला कर जाने किस नए, अनोखे रूप की स्‍थापना को कृतसंकल्‍प है. माने सांस्‍कृतिक नवजागरण और पूंजी के जाने किस लेवल का जटिल एक्‍सपेरिमेंटेशन हो रहा है. एक के बाद एक सभी महानता के स्‍तर वाले कामों में ही हाथ, पैर, घुटना सब फंसाये हुए हैं (बीस वर्ष पहले का समय होता तो दूरदर्शन के ‘सुरभि’ के लिए सबका सिद्धार्थ काक टीवीआंकन कर रहे होते), अकेला एक मैं ही चिरकुट साबित हो रहा हूं जो माया मिली न राम का टीशर्ट पहने कभी इसके तो कभी उसके पीछे भाग रहा है. न अभी तक अपना ब्‍लॉग हाथ में आया है न ब्‍लॉग या बेब्‍लॉग की कोई बाला!

सबसे ज्‍यादा तकलीफ तो रुपाली से हो रही है.. जेपी आंदोलन के दौर से खादी भंडार का झोला और दिनमानी रंग-ढंग दिखाकर नचा रही है, और मैं नाच रहा हूं! सलमान खान ने भी एक पॉयंट पर जाकर हथियार (प्रेम के) डाल दिये थे, डब्‍ल्‍यूएस मैरियट के कॉफी शॉप में दूसरी लड़की को वाईन पिलाने चले गए थे- और मैं बजाय इसके कि वसंत विहार वाले घर में (हाय, जो हो न सका!) शेव करते हुए रुपाली से होन्‍डा सिटी बेचकर फोर्ड में शिफ्ट होने के सजेशन लेता, बिना शेव के अभी भी प्रेम का हथियार (जो वास्‍तव में बेड़ी साबित हो चुका है) लिए डटे हुए हूं! नीलिमा ने दो घंटे के लिए अपना शोध स्‍थगित करके प्रेम के इस निरर्थक, निर्मम चक्र से निकलने का कोई रास्‍ता सुझाया? नहीं. ब्‍लॉग की बत्‍ती बुझ जाने पर प्रत्‍यक्षा तो आ सकती थी. इतना तो कह सकती थी कि मैं भी बिहार की हूं और जिसे तुम बिचारी समझ रहे हो वह बिहारी नहीं बला और विषबाला दोनो है. बच के रहो. सच्‍चा प्रेम कैसे पाया जाता है इसपर मैं पेंग्विन हिंदी के लिए दो सौ पृष्‍ठों का एक लघु उपन्‍यास लिख रही हूं जो अरुधंति के लघु चीज़ों के देवता को बाज़ार में मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ेगी, किरण देसाई के ‘द इनहेरिटेंस ऑफ लॉस’ का अनुवाद स्‍थगित करवा देगी, तुम तब तक बस बेलग्रेड के पड़ोस में टीले पर मतवालेपन से बचे रहो, लेकिन नहीं, प्रत्‍यक्षा ने थोड़ा-सा भी सच्‍चा बिहारीपन नहीं दिखाया; मेरे दुख:हरण के साहित्यिक अनुसंधान की जगह लगभग मेरा माखौल-सा उड़ाते हुए पिकनिक के नाम से कहानी लिख ही नहीं डाली, उसे यादव के काले हंस में छपवा भी लिया. आह!.. कमसकम एक एसएमएस तो कर सकती थी कि प्रमोद, जानती हूं तुम्‍हें गहरी चोट पहुंची है, मगर पिकनिक सामाजिकता की मजबूरी थी, पति और साहित्यिक समाज के सामने अपने को स्‍थापित करने के लिए लिखा था, तुम्‍हारे लिए अभी दफ्तर के कंप्‍यूटर पर लिख रही हूं- तुम्‍हारे अंदर के प्रेम को बचा लूंगी, इट्स अ प्रॉमिस, लेकिन नत्थिंग ऑव दैट सॉर्ट! कुछ नहीं बचाया! हरियाणा की बिजली, अपना घर और ब्‍लॉग बचाने में फंसी रही एंड दैट्स इट! क्‍या निष्‍ठुर निर्ममता की यही छवियां देखने और इसी तरह का ठंडा स्‍नेह पाने के लिए मैं ब्‍लॉगजगत में आया था? क्‍या इसीलिए कहां-कहां से गुजरकर भी मैं कहीं नहीं गुजर पाया था! एकदम-से भोजपुरी में भावुक हो गया- ओह, रवीश, व्‍हॉट काइंड ऑव क्रुएल ट्रुत्‍थ्‍स यूअर एक्‍ट इज़ फोर्सिंग डाऊन अपॉन माई माऊथ?..

तीसरी कसम के आखिर में वहीदा रहमान को खोकर जो अवस्‍था हीरामन गाड़ीवान की होती है, कुछ वैसे ही गहरे सदमे से मैं भी गुजर रहा था. हालांकि यह ठीक-ठीक तय नहीं कर पा रहा था किस प्रेमिका को इन मीठे घावों के लिए जिम्‍मेदार ठहराऊं. रफी साहब वाली आवाज़ होती तो मैं मन ही मन गाईड का क्‍या से क्‍या हो गया का बर्मन दा वाली धुन गुनगुनाता, फिर शैलेंद्र को गालियां भी देता कि ये सब लिखकर आपने अच्‍छा नहीं किया, शैलेंद्र साहब, ये दर्द की मीठी गोलियां प्रेमी के दुख का निवारण नहीं करतीं, जीवन भर का टंटा दे देती हैं! मगर ये सब मैंने कुछ नहीं किया, मधुमती के दिलीप कुमार की तरह हाथ की छड़ी घुमाता हुआ बिना हुर्र-हुर्र किये टीले से नीचे उतर आया. दैत्‍याकार टेंट के सामने पीले पैंट और नारंगी जैकेट में जो भी साहब कटिंग पी रहे थे, अब तक पी चुके थे और दिहाड़ी के सर्बियाई मजदूरों को मां-बहन की गालियां पिला रहे थे, और ठेठ हिंदुस्‍तानी में पिला रहे थे. ज़ाहिर था इससे ज्‍यादा शानदार तरीके से किसी इंडियन का इंट्रोडक्‍शन संभव नहीं होता. मगर इस रौबिले शख्‍स को पहचानना अभी अधूरा था, क्‍योंकि उसके चेहरे पर नज़र जाते ही मेरे मुंह से बस इतना ही फूट पाया- अरे, हीरो नंबर वन? आप यहां?

(जारी...)

1 comment:

  1. उफ़्फ़ !! बीस साल बाद भी मैं प्रेम पर ही लिख रही हूँ । की दारूण कोथा !
    आपको माफ नहीं किया जायेगा । और दुख हरण का अनुसंधान , अब तो बिलकुल नहीं ।

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